Class 10 Sanskrit Notes Chapter 10 (अन्योक्तयः) – Shemushi Book

Shemushi
बच्चों, आज हम आपकी पाठ्यपुस्तक 'शेमुषी भाग 2' के दशम पाठ 'अन्योक्तयः' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह पाठ परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें श्लोकों के माध्यम से गूढ़ बातें कही गयी हैं, जिन्हें समझना आवश्यक है। 'अन्योक्ति' का अर्थ है - 'अन्या उक्तिः', अर्थात् किसी अन्य को माध्यम बनाकर कोई बात कहना। इसमें प्रस्तुत श्लोकों में हंस, कोयल, बादल, माली आदि को संबोधित करते हुए मानव जीवन के लिए उपयोगी नैतिक मूल्यों और व्यवहार कुशलता की शिक्षा दी गई है।

पाठ 10: अन्योक्तयः (विस्तृत नोट्स)

अन्योक्ति का अर्थ:
जब प्रस्तुत (जिसके बारे में बात करनी है) का वर्णन न करके, अप्रस्तुत (किसी अन्य वस्तु या प्राणी) के वर्णन द्वारा प्रस्तुत का बोध कराया जाता है, तो उसे अन्योक्ति अलंकार कहते हैं। इस पाठ में विभिन्न प्रतीकों (जैसे - हंस, सरोवर, मेघ, चातक, भ्रमर, माली) के माध्यम से मनुष्य को सद्गुणों को अपनाने और दुर्गुणों को त्यागने की प्रेरणा दी गई है।

श्लोक 1:

मूल श्लोक:
एकेन राजहंसेन या शोभा सरसो भवेत्।
न सा बकसहस्रेण परितस्तीरवासिना॥

अन्वयः
सरसः या शोभा एकेन राजहंसेन भवेत्, सा परितः तीरवासिना बकसहस्रेण न (भवेत्)।

सरलार्थ:
सरोवर की जो शोभा एक राजहंस से होती है, वैसी शोभा तालाब के किनारे रहने वाले हजारों बगुलों से भी नहीं होती।

भावार्थ (अन्योक्ति):
इस श्लोक में 'राजहंस' गुणी और विवेकशील व्यक्ति का प्रतीक है, जबकि 'बगुले' गुणहीन और अविवेकी व्यक्तियों के प्रतीक हैं। कवि कहना चाहता है कि एक ही गुणी व्यक्ति समाज या परिवार की जितनी शोभा बढ़ाता है, उतनी शोभा हजारों गुणहीन व्यक्ति मिलकर भी नहीं बढ़ा सकते। अतः संख्या की अपेक्षा गुणों का महत्व अधिक है।

मुख्य शब्द: सरसः (सरोवर की), राजहंसेन (राजहंस से), बकसहस्रेण (हजारों बगुलों से), परितः (चारों ओर), तीरवासिना (किनारे रहने वाले)।


श्लोक 2:

मूल श्लोक:
भुक्ता मृणालपटली भवता निपीता-
न्यम्बूनि यत्र नलिनानि निषेवितानि।
रे राजहंस, वद तस्य सरोवरस्य,
कृत्येन केन भवितासि कृनोपकारी॥

अन्वयः
रे राजहंस! यत्र भवता मृणालपटली भुक्ता, अम्बूनि निपीतानि, नलिनानि निषेवितानि, तस्य सरोवरस्य केन कृत्येन कृतोपकारी भविता असि? वद।

सरलार्थ:
हे राजहंस! जिस सरोवर में तुमने कमलनाल के समूह को खाया, जल पिया, कमलों का सेवन किया, बताओ उस सरोवर का किस कार्य से उपकार चुकाने वाले होगे?

भावार्थ (अन्योक्ति):
यहाँ राजहंस को संबोधित करते हुए कृतज्ञता के भाव पर बल दिया गया है। मनुष्य जिस समाज, देश या व्यक्ति से लाभ प्राप्त करता है, उसके प्रति उसका भी कुछ कर्तव्य बनता है। उसे उस उपकार का बदला चुकाने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए। यह श्लोक हमें कृतज्ञ बनने की प्रेरणा देता है।

मुख्य शब्द: भुक्ता (खाई गई), मृणालपटली (कमलनाल का समूह), निपीतानि (पिए गए), अम्बूनि (जल), नलिनानि (कमल), निषेवितानि (सेवन किए गए), कृत्येन (कार्य से), कृतोपकारी (उपकार का बदला चुकाने वाला)।


श्लोक 3:

मूल श्लोक:
तोयैरल्यैरपि करुणया भीमभानौ निदाघे,
मालाकार! व्यरचि भवता या तरोरस्य पुष्टिः।
सा किं शक्या जनयितुमिह प्रावृषेण्येन वारां,
धारासारानपि विकिरता विश्वतो वारिदेन॥

अन्वयः
हे मालाकार! भीमभानौ निदाघे अल्पैः तोयैः अपि करुणया भवता अस्य तरोः या पुष्टिः व्यरचि, सा पुष्टिः किं इह विश्वतः धारासारान् अपि वारान् विकिरता प्रावृषेण्येन वारिदेन जनयितुम् शक्या?

सरलार्थ:
हे माली! भयंकर सूर्य वाले ग्रीष्मकाल में थोड़े से जलों से भी करुणापूर्वक तुमने इस वृक्ष का जो पोषण किया है, क्या वह पोषण यहाँ संसार में चारों ओर से मूसलाधार जल बरसाने वाले वर्षाकालीन बादल के द्वारा उत्पन्न किया जा सकता है? (अर्थात् नहीं किया जा सकता)।

भावार्थ (अन्योक्ति):
माली के माध्यम से कवि यह बताना चाहता है कि संकट के समय की गई थोड़ी सी सहायता भी बहुत मूल्यवान होती है। उसका महत्व उस सहायता से कहीं अधिक है जो सब कुछ अनुकूल होने पर प्रचुर मात्रा में दी जाती है। समय पर की गई मदद अमूल्य होती है।

मुख्य शब्द: तोयैः (जलों से), अल्पैः (थोड़े से), भीमभानौ (प्रचंड सूर्य वाले), निदाघे (ग्रीष्मकाल में), व्यरचि (की गई), पुष्टिः (पोषण), प्रावृषेण्येन (वर्षाकालीन), वारिदेन (बादल से), धारासारान् (मूसलाधार), विकिरता (बरसाते हुए)।


श्लोक 4:

मूल श्लोक:
आपादितानि परितः परितारितानि,
खेदं तनोषि नितरां सरसोऽपि यस्य।
हंहो मृणालविसभङ्गकृतेऽपि यस्मै,
नास्मात् परं तव मुखं कुपितेन दृष्टम्॥
(यह श्लोक कुछ संस्करणों में भिन्न हो सकता है या क्रम अलग हो सकता है। प्रचलित श्लोकों पर ध्यान केंद्रित करते हैं।)

(प्रचलित संस्करणों के अनुसार अगला श्लोक चातक या मेघ पर होता है, उसे लेते हैं)

श्लोक 4 (चातक):

मूल श्लोक:
रे रे चातक! सावधानमनसा मित्र! क्षणं श्रूयताम्,
अम्भोदा बहवो हि सन्ति गगने सर्वेऽपि नैतादृशाः।
केचिद् वृष्टिभिरार्द्रयन्ति वसुधां गर्जन्ति केचिद् वृथा,
यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरतो मा ब्रूहि दीनं वचः॥

अन्वयः
रे रे मित्र चातक! सावधानमनसा क्षणं श्रूयताम्। गगने बहवः हि अम्भोदाः सन्ति। सर्वे अपि एतादृशाः न (सन्ति)। केचित् वृष्टिभिः वसुधाम् आर्द्रयन्ति, केचित् वृथा गर्जन्ति। (त्वम्) यं यं पश्यसि, तस्य तस्य पुरतः दीनं वचः मा ब्रूहि।

सरलार्थ:
अरे अरे मित्र चातक! सावधान मन से क्षण भर सुनो। आकाश में निश्चय ही बहुत से बादल होते हैं, (परन्तु) सभी ऐसे (उदार) नहीं होते। कुछ (तो) वर्षा से पृथ्वी को गीला कर देते हैं, (और) कुछ व्यर्थ ही गरजते हैं। (तुम) जिस-जिस (बादल) को देखते हो, उस-उसके सामने दीन वचन मत बोलो।

भावार्थ (अन्योक्ति):
चातक पक्षी केवल स्वाति नक्षत्र के बादल का ही जल पीता है, ऐसी मान्यता है। यहाँ चातक के माध्यम से स्वाभिमानी व्यक्ति को संदेश दिया गया है कि संसार में अनेक प्रकार के लोग हैं - कुछ दानी और उदार, कुछ केवल दिखावा करने वाले। हमें हर किसी के सामने सहायता के लिए हाथ नहीं फैलाना चाहिए और याचना करके अपने स्वाभिमान को ठेस नहीं पहुँचानी चाहिए। केवल योग्य और समर्थ व्यक्ति से ही सहायता माँगनी चाहिए, वह भी आवश्यकता पड़ने पर।

मुख्य शब्द: चातक (पपीहा पक्षी), सावधानमनसा (सावधान मन से), अम्भोदाः (बादल), गगने (आकाश में), एतादृशाः (ऐसे), वृष्टिभिः (वर्षाओं से), आर्द्रयन्ति (गीला करते हैं), वसुधाम् (पृथ्वी को), वृथा (व्यर्थ), गर्जन्ति (गरजते हैं), पुरतः (सामने), दीनं वचः (दीनता भरे वचन), मा ब्रूहि (मत बोलो)।


श्लोक 5 (भ्रमर):

मूल श्लोक:
रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातम्,
भास्वानुदेष्यति हसिष्यति पङ्कजश्रीः।
इत्थं विचिन्तयति कोशगते द्विरेफे,
हा हन्त! हन्त! नलिनीं गज उज्जहार॥

अन्वयः
कोशगते द्विरेफे इत्थं विचिन्तयति - रात्रिः गमिष्यति, सुप्रभातम् भविष्यति, भास्वान् उदेष्यति, पङ्कजश्रीः हसिष्यति। हा हन्त! हन्त! गजः नलिनीम् उज्जहार।

सरलार्थ:
(कमल के) कोष में बंद भौंरा इस प्रकार सोच ही रहा था - रात बीतेगी, सुंदर सवेरा होगा, सूर्य उगेगा, कमल की शोभा खिलेगी (और मैं बाहर निकलकर रसपान करूँगा)। हाय! दुख की बात है! (उसी समय) एक हाथी ने कमलिनी को ही उखाड़ फेंका।

भावार्थ (अन्योक्ति):
भ्रमर के माध्यम से मनुष्य के जीवन की अनिश्चितता और भाग्य की प्रबलता को दर्शाया गया है। मनुष्य भविष्य के लिए अनेक योजनाएँ बनाता है और सुखद कल्पनाओं में खोया रहता है, परन्तु अगले ही पल क्या हो जाए, यह कोई नहीं जानता। जीवन अनिश्चित है, इसलिए वर्तमान में सजग रहकर कर्म करना चाहिए और भविष्य की चिंता में अत्यधिक नहीं डूबना चाहिए।

मुख्य शब्द: कोशगते (कोष/कली में बंद), द्विरेफे (भौंरे के), विचिन्तयति (सोचते हुए), भास्वान् (सूर्य), उदेष्यति (उदय होगा), पङ्कजश्रीः (कमल की शोभा), हसिष्यति (खिलेगी/हँसेगी), हन्त (हाय/खेद), नलिनीम् (कमलिनी को), गजः (हाथी), उज्जहार (उखाड़ दिया)।


श्लोक 6 (नीर-क्षीर विवेक - हंस):

मूल श्लोक:
नीरक्षीरविवेके हंस! आलस्यं त्वमेव तनुषे चेत्।
विश्वस्मिन् अधुना अन्यः कः कुलव्रतं पालयिष्यति॥

अन्वयः
हंस! चेत् त्वम् एव नीरक्षीरविवेके आलस्यं तनुषे, (तर्हि) अधुना अस्मिन् विश्वे अन्यः कः कुलव्रतं पालयिष्यति?

सरलार्थ:
हे हंस! यदि तुम ही दूध और पानी को अलग करने (अर्थात् उचित-अनुचित का निर्णय करने) में आलस्य करोगे, तो अब इस संसार में दूसरा कौन अपने कुल की मर्यादा (कर्तव्य) का पालन करेगा?

भावार्थ (अन्योक्ति):
हंस को नीर-क्षीर विवेक (दूध और पानी अलग करने की क्षमता) के लिए जाना जाता है, जो गुण-दोष, उचित-अनुचित को परखने की क्षमता का प्रतीक है। इस श्लोक में हंस के माध्यम से गुणी, ज्ञानी और विवेकशील लोगों को संबोधित किया गया है। यदि ऐसे समर्थ लोग ही अपने कर्तव्य (न्याय करने, सत्य-असत्य बताने, गुण-दोष परखने) में आलस्य करेंगे या उससे विमुख होंगे, तो संसार में न्याय और विवेक की रक्षा कौन करेगा? गुणी व्यक्तियों को अपने दायित्वों का निर्वहन पूरी निष्ठा से करना चाहिए।

मुख्य शब्द: नीरक्षीरविवेके (पानी और दूध को अलग करने में), आलस्यम् (आलस्य को), तनुषे (करते हो/फैलाते हो), विश्वस्मिन् (संसार में), अधुना (अब), कुलव्रतम् (कुल की मर्यादा/परंपरा/कर्तव्य), पालयिष्यति (पालन करेगा)।


श्लोक 7 (वृक्ष):

मूल श्लोक:
एको देवः केशवो वा शिवो वा,
ह्येकं मित्रं भूपतिर्वा यतिर्वा।
एको वासः पत्तने वा वने वा,
ह्येका भार्या सुन्दरी वा दरी वा॥
(यह श्लोक 'अन्योक्तयः' पाठ का मानक श्लोक नहीं है, यह सुभाषित है। पाठ के श्लोकों पर ही केंद्रित रहते हैं।)

(पाठ का एक और संभावित श्लोक सरोवर और हंसों के वियोग पर आधारित हो सकता है।)

श्लोक 7 (सरोवर):

मूल श्लोक:
आपादितानि परितः परितारितानि... (यह श्लोक भी कम प्रचलित है)

(यदि पाठ में 7 श्लोक हैं, तो ऊपर दिए गए 6 श्लोक (राजहंस-शोभा, राजहंस-कृतज्ञता, माली, चातक, भ्रमर, हंस-विवेक) सामान्यतः पढ़ाए जाते हैं।)

पाठ का सार:
यह पाठ विभिन्न अन्योक्तियों के माध्यम से जीवन के महत्वपूर्ण मूल्यों जैसे - गुणों का महत्व, कृतज्ञता, समय पर की गई सहायता का मूल्य, स्वाभिमान, याचना में विवेक, जीवन की अनिश्चितता और विवेकशील व्यक्तियों के कर्तव्य पर प्रकाश डालता है। ये श्लोक हमें प्रतीकों के माध्यम से गहरी सीख देते हैं।


परीक्षा हेतु 10 महत्वपूर्ण बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs):

प्रश्न 1: 'एकेन राजहंसेन या शोभा सरसो भवेत्' - अत्र 'राजहंसः' कस्य प्रतीकः अस्ति?
(क) सरोवरस्य
(ख) गुणहीनस्य जनस्य
(ग) गुणीजनस्य
(घ) बकस्य

उत्तर: (ग) गुणीजनस्य

प्रश्न 2: कः नीरक्षीरविवेके आलस्यं न कुर्यात्?
(क) बकः
(ख) काकः
(ग) हंसः
(घ) मीनः

उत्तर: (ग) हंसः

प्रश्न 3: चातकः कस्य पुरतः दीनं वचः न ब्रूयात्?
(क) सर्वेषां मेघानाम्
(ख) गर्जतां मेघानाम्
(ग) वृथा गर्जतां मेघानाम्
(घ) वृष्टिं कुर्वतां मेघानाम्

उत्तर: (ग) वृथा गर्जतां मेघानाम् (अर्थात् हर किसी के सामने, विशेषकर जो केवल गरजते हैं, देते नहीं)

प्रश्न 4: गजः कां उज्जहार?
(क) पङ्कजम्
(ख) नलिनीम्
(ग) द्विरेफम्
(घ) सरोवरम्

उत्तर: (ख) नलिनीम्

प्रश्न 5: 'कृतोपकारी' इत्यस्य पदस्य कः अर्थः?
(क) उपकारं करोति यः
(ख) उपकारस्य फलं प्राप्नोति यः
(ग) कृतस्य उपकारस्य प्रतिकारं करोति यः
(घ) उपकारं न जानाति यः

उत्तर: (ग) कृतस्य उपकारस्य प्रतिकारं करोति यः (किए गए उपकार का बदला चुकाने वाला)

प्रश्न 6: मालाकारः कदा अल्पैः तोयैः अपि तरोः पुष्टिं व्यरचि?
(क) वर्षाकाले
(ख) शरत्काले
(ग) वसन्तकाले
(घ) निदाघे (ग्रीष्मकाले)

उत्तर: (घ) निदाघे (ग्रीष्मकाले)

प्रश्न 7: कोशगतः कः भविष्यतः विषये चिन्तयति स्म?
(क) हंसः
(ख) गजः
(ग) द्विरेफः (भ्रमरः)
(घ) चातकः

उत्तर: (ग) द्विरेफः (भ्रमरः)

प्रश्न 8: 'अन्योक्तिः' इत्यस्य कोऽभिप्रायः?
(क) सरला उक्तिः
(ख) कठोरा उक्तिः
(ग) अन्यस्य माध्यमेन कथनम्
(घ) प्रत्यक्षं कथनम्

उत्तर: (ग) अन्यस्य माध्यमेन कथनम्

प्रश्न 9: 'वसुधाम्' इति पदस्य पर्यायः कः?
(क) गगनम्
(ख) जलम्
(ग) पृथ्वीम्
(घ) वायुम्

उत्तर: (ग) पृथ्वीम्

प्रश्न 10: 'आर्द्रयन्ति' इति क्रियापदस्य कर्तृपदं किम्? (चातक श्लोकानुसारम्)
(क) चातकः
(ख) वसुधा
(ग) अम्भोदाः (केचित्)
(घ) मित्रम्

उत्तर: (ग) अम्भोदाः (केचित्) - (कुछ बादल पृथ्वी को गीला करते हैं)


इन नोट्स और प्रश्नों का ध्यानपूर्वक अध्ययन करें। श्लोकों का अन्वय, सरलार्थ और विशेष रूप से भावार्थ (अन्योक्ति का गूढ़ अर्थ) समझना परीक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है। शुभकामनाएँ!

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