Class 10 Sanskrit Notes Chapter 4 (व्यायामः सर्वदा पथ्यः) – Shemushi Book

Shemushi
चलिए, आज हम आपकी कक्षा 10 की संस्कृत पुस्तक 'शेमुषी' के चतुर्थ पाठ 'व्यायामः सर्वदा पथ्यः' का गहन अध्ययन करते हैं। यह पाठ परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है और इसमें व्यायाम के लाभों को बहुत सुन्दर ढंग से समझाया गया है।

पाठ परिचय:
यह पाठ आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रन्थ 'सुश्रुतसंहिता' के चिकित्सास्थान में वर्णित 24वें अध्याय से संकलित है। इसमें आचार्य सुश्रुत ने व्यायाम की परिभाषा बताते हुए उससे होने वाले लाभों की चर्चा की है। शरीर में सुगठन, कान्ति, स्फूर्ति, सहिष्णुता, नीरोगता आदि व्यायाम के प्रमुख लाभ हैं।

श्लोकों का विस्तृत अर्थ (परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण):

श्लोक 1:
शरीरायासजननं कर्म व्यायामसंज्ञितम्।
तत्कृत्वा तु सुखं देहं विमृद्नीयात् समन्ततः॥

  • अन्वयः शरीरायासजननं कर्म व्यायामसंज्ञितम् (भवति)। तत् कृत्वा तु समन्ततः सुखं देहं विमृद्नीयात्।
  • सरलार्थ: शरीर के परिश्रम (थकावट) को उत्पन्न करने वाला कार्य व्यायाम कहलाता है। उस (व्यायाम) को करके तो (व्यक्ति को) सुखपूर्वक सारे शरीर की मालिश करनी चाहिए।
  • मुख्य बिंदु: व्यायाम की परिभाषा - वह कार्य जिससे शरीर में थकावट उत्पन्न हो। व्यायाम के बाद शरीर की मालिश की सलाह।

श्लोक 2:
शरीरोपचयः कान्तिर्गात्राणां सुविभक्तता।
दीप्ताग्नित्वमनालस्यं स्थिरत्वं लाघवं मृजा॥

  • अन्वयः (व्यायामात्) शरीरोपचयः, कान्तिः, गात्राणां सुविभक्तता, दीप्ताग्नित्वम्, अनालस्यं, स्थिरत्वं, लाघवं, मृजा (च जायते)।
  • सरलार्थ: व्यायाम से शरीर की वृद्धि, (चेहरे पर) चमक, अंगों का सुडौलपन, जठराग्नि का तेज होना (पाचन शक्ति बढ़ना), आलस्यहीनता, स्थिरता, हल्कापन और शुद्धता (आती है)।
  • मुख्य बिंदु: व्यायाम के शारीरिक और आंतरिक लाभ गिनाए गए हैं - वृद्धि, चमक, सुडौलता, पाचन, स्फूर्ति, स्थिरता, हल्कापन, स्वच्छता।

श्लोक 3:
श्रमक्लमपिपासोष्णशीतादीनां सहिष्णुता।
आरोग्यं चापि परमं व्यायामादुपजायते॥

  • अन्वयः (व्यायामात्) श्रमक्लमपिपासोष्णशीतादीनां सहिष्णुता, परमम् आरोग्यं च अपि उपजायते।
  • सरलार्थ: व्यायाम से परिश्रम की थकान, मानसिक थकान (क्लम), प्यास, गर्मी, सर्दी आदि को सहन करने की शक्ति तथा परम स्वास्थ्य (उत्तम निरोगिता) भी उत्पन्न होता है।
  • मुख्य बिंदु: व्यायाम सहनशक्ति (थकान, प्यास, मौसम) बढ़ाता है और उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करता है।

श्लोक 4:
न चास्ति सदृशं तेन किञ्चित् स्थौल्यापकर्षणम्।
न च व्यायामिनं मर्त्यमर्दयन्त्यरयो बलात्॥

  • अन्वयः तेन सदृशं किञ्चित् स्थौल्यापकर्षणम् न च अस्ति। व्यायामिनं मर्त्यम् अरयः च बलात् न अर्दयन्ति।
  • सरलार्थ: उस (व्यायाम) के समान मोटापे को दूर करने वाला कुछ भी नहीं है। और व्यायाम करने वाले व्यक्ति को शत्रु (यहाँ रोग) बलपूर्वक नहीं कुचल पाते (अर्थात् बीमार नहीं कर पाते)।
  • मुख्य बिंदु: व्यायाम मोटापे का सर्वोत्तम उपाय है और यह रोगों से बचाता है। 'अरयः' का अर्थ यहाँ 'रोग' लेना अधिक उपयुक्त है।

श्लोक 5:
न चैनं सहसाक्रम्य जरा समधिरोहति।
स्थिरीभवति मांसं च व्यायामाभिरतस्य च॥

  • अन्वयः एनं (व्यायामिनं जनम्) जरा सहसा आक्रम्य न समधिरोहति। व्यायामाभिरतस्य मांसं च स्थिरीभवति।
  • सरलार्थ: इस (व्यायाम करने वाले व्यक्ति) पर बुढ़ापा अचानक आक्रमण करके सवार नहीं होता है। व्यायाम में लगे रहने वाले व्यक्ति का मांस भी स्थिर (मजबूत) हो जाता है।
  • मुख्य बिंदु: व्यायाम असमय बुढ़ापे को रोकता है और मांसपेशियों को दृढ़ बनाता है।

श्लोक 6:
व्यायामस्विनगात्रस्य पद्भ्यामुद्वर्तितस्य च।
व्याधयो नोपसर्पन्ति वैनतेयमिवोरगाः॥
वयो रूप गुणैर्हीनमपि कुर्यात् सुदर्शनम्।

  • अन्वयः व्यायामस्विन्नगात्रस्य पद्भ्याम् उद्वर्तितस्य च (जनस्य समीपे) व्याधयः न उपसर्पन्ति, इव उरगाः वैनतेयम्। (व्यायामः) वयो रूप गुणैः हीनम् अपि (जनं) सुदर्शनं कुर्यात्।
  • सरलार्थ: व्यायाम के कारण पसीने से लथपथ शरीर वाले और दोनों पैरों से ऊपर उठने वाले (अर्थात् अच्छी तरह व्यायाम करने वाले) व्यक्ति के पास रोग उसी प्रकार नहीं आते, जैसे गरुड़ (वैनतेय) के पास साँप (उरगाः) नहीं आते। व्यायाम आयु, रूप और गुणों से हीन व्यक्ति को भी सुन्दर बना देता है।
  • मुख्य बिंदु: रोगों से सुरक्षा (गरुड़-सर्प का उदाहरण महत्वपूर्ण), व्यायाम व्यक्ति को आकर्षक बनाता है। 'वैनतेय' - गरुड़, 'उरगाः' - साँप।

श्लोक 7:
व्यायामं कुर्वतो नित्यं विरुद्धमपि भोजनम्।
विदग्धमविदग्धं वा निर्दोषं परिपच्यते॥

  • अन्वयः नित्यं व्यायामं कुर्वतः विरुद्धम् अपि भोजनं, विदग्धम् अविदग्धं वा, निर्दोषं परिपच्यते।
  • सरलार्थ: प्रतिदिन व्यायाम करने वाले व्यक्ति का अनुचित (प्रकृति विरुद्ध) भोजन भी, चाहे वह पका हुआ हो या बिना पका हुआ (कच्चा), बिना किसी दोष के (आसानी से) पच जाता है।
  • मुख्य बिंदु: व्यायाम पाचन शक्ति को अत्यंत प्रबल बनाता है।

श्लोक 8:
व्यायामो हि सदा पथ्यो बलिनां स्निग्धभोजिनाम्।
स च शीते वसन्ते च तेषां पथ्यतमः स्मृतः॥

  • अन्वयः व्यायामः हि बलिनां स्निग्धभोजिनां सदा पथ्यः (अस्ति)। सः च शीते वसन्ते च तेषां पथ्यतमः स्मृतः।
  • सरलार्थ: व्यायाम निश्चित रूप से बलवान और चिकनाई युक्त भोजन करने वालों के लिए सदा हितकर होता है। और वह (व्यायाम) सर्दी और वसंत ऋतु में उनके (बलवान और स्निग्ध भोजी लोगों के) लिए सबसे अधिक हितकर माना गया है।
  • मुख्य बिंदु: व्यायाम विशेषकर बलवानों और घी-तेल खाने वालों के लिए, तथा सर्दी और वसंत ऋतु में अत्यधिक लाभकारी है।

श्लोक 9:
सर्वेष्वृतुष्वहरहः पुम्भिरात्महितैषिभिः।
बलस्यार्धेन कर्तव्यो व्यायामो हन्त्यतोऽन्यथा॥

  • अन्वयः आत्महितैषिभिः पुम्भिः सर्वेषु ऋतुषु अहरहः बलस्य अर्धेन व्यायामः कर्तव्यः। अतः अन्यथा (अधिक व्यायामः) हन्ति।
  • सरलार्थ: अपना हित चाहने वाले पुरुषों द्वारा सभी ऋतुओं में प्रतिदिन आधे बल से व्यायाम करना चाहिए। इससे अधिक (व्यायाम) हानिकारक होता है (या मृत्युकारक भी हो सकता है)।
  • मुख्य बिंदु: व्यायाम कितना करना चाहिए - अपनी शारीरिक क्षमता के आधे बल तक। यह नियम सभी ऋतुओं में प्रतिदिन लागू होता है। अधिक व्यायाम हानिकारक है।

श्लोक 10:
हृदि स्थानस्थितो वायुर्यदा वक्त्रं प्रपद्यते।
व्यायामं कुर्वतो जन्तोस्तद्बलार्धस्य लक्षणम्॥

  • अन्वयः व्यायामं कुर्वतः जन्तोः हृदि स्थानस्थितः वायुः यदा वक्त्रं प्रपद्यते, तत् बलार्धस्य लक्षणम् (भवति)।
  • सरलार्थ: व्यायाम करते हुए व्यक्ति के हृदय में स्थित वायु जब मुख तक पहुँच जाती है (अर्थात् साँस फूलने लगती है), वही उसके आधे बल का लक्षण होता है।
  • मुख्य बिंदु: आधे बल से व्यायाम करने की पहचान - जब हृदय की वायु मुख तक आए (साँस फूलना शुरू हो)।

श्लोक 11:
वयोबलशरीराणि देशकालाशनानि च।
समीक्ष्य कुर्याद्व्यायाममन्यथा रोगमाप्नुयात्॥

  • अन्वयः वयः बल शरीराणि देश काल अशनानि च समीक्ष्य व्यायामं कुर्यात्। अन्यथा रोगम् आप्नुयात्।
  • सरलार्थ: आयु, बल, शरीर, स्थान, समय और भोजन आदि की अच्छी तरह जाँच करके ही व्यायाम करना चाहिए। अन्यथा (इन बातों का ध्यान न रखने पर) रोग प्राप्त होता है (व्यक्ति रोगी हो जाता है)।
  • मुख्य बिंदु: व्यायाम करने से पहले ध्यान रखने योग्य बातें - आयु, शक्ति, शारीरिक बनावट, स्थान (वातावरण), समय (मौसम, दिन का समय) और भोजन। इनका ध्यान न रखने पर लाभ के बजाय हानि होती है।

परीक्षा हेतु सारांश एवं मुख्य बिन्दु:

  1. व्यायाम की परिभाषा: शरीर को थकाने वाला कर्म।
  2. व्यायाम के लाभ:
    • शारीरिक: शरीर वृद्धि, कान्ति, सुडौलता, स्थिरता, हल्कापन, शुद्धि, मांसपेशियों की मजबूती, मोटापा घटाना।
    • आंतरिक: पाचन शक्ति (दीप्ताग्नि) बढ़ाना, आलस्य दूर करना।
    • सहिष्णुता: थकान, प्यास, गर्मी-सर्दी सहने की शक्ति।
    • स्वास्थ्य: उत्तम आरोग्य, रोगों से बचाव, असमय बुढ़ापा न आना।
    • अन्य: कुरूप को भी सुन्दर बनाना, खराब भोजन भी पचा देना।
  3. व्यायाम की मात्रा: आधे बल तक (लक्षण: साँस फूलना)।
  4. व्यायाम कब अधिक लाभकारी: सर्दी और वसंत ऋतु में (विशेषकर बलवानों और स्निग्ध भोजन करने वालों के लिए)।
  5. व्यायाम से पूर्व विचारणीय: आयु, बल, शरीर, देश, काल, भोजन।
  6. स्रोत: सुश्रुतसंहिता।
  7. महत्वपूर्ण शब्द: शरीरायासजननम्, लाघवम्, मृजा, स्थैर्यम्, दीप्ताग्नित्वम्, स्थौल्यापकर्षणम्, अरयः (रोग), जरा, वैनतेय (गरुड़), उरगाः (सर्प), पथ्यः, बलस्यार्धेन, वक्त्रं प्रपद्यते।

अभ्यास हेतु बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs):

प्रश्न 1: 'शरीरायासजननं कर्म' किं कथ्यते?
(क) भोजनम्
(ख) शयनम्
(ग) व्यायामः
(घ) अध्ययनम्

प्रश्न 2: व्यायामात् किं किं उपजायते?
(क) श्रमः, क्लमः
(ख) आरोग्यं, सहिष्णुता
(ग) रोगः, आलस्यम्
(घ) स्थौल्यम्, जरा

प्रश्न 3: कस्य समीपे व्याधयः न उपसर्पन्ति?
(क) धनिकस्य
(ख) व्यायामस्विन्नगात्रस्य
(ग) वृद्धस्य
(घ) बालकस्य

प्रश्न 4: 'वैनतेयः' इति पदस्य कः अर्थः?
(क) सर्पः
(ख) गरुडः
(ग) सिंहः
(घ) व्याघ्रः

प्रश्न 5: कीदृशं भोजनम् अपि व्यायामिनः परिपच्यते?
(क) केवलं सुस्वादु
(ख) केवलम् अल्पम्
(ग) विरुद्धम् अपि
(घ) केवलं शाकाहारम्

प्रश्न 6: कैः सर्वदा व्यायामः कर्तव्यः?
(क) केवलं युवकैः
(ख) केवलं रुग्णैः
(ग) आत्महितैषिभिः पुम्भिः
(घ) केवलं महिलाभिः

प्रश्न 7: कियता बलेन व्यायामः कर्तव्यः?
(क) सम्पूर्णबलेन
(ख) बलस्य अर्धेन
(ग) बलस्य चतुर्थांशेन
(घ) यथेच्छम्

प्रश्न 8: कदा व्यायामः पथ्यतमः स्मृतः?
(क) ग्रीष्मे বর্ষাসু च
(ख) शरदि हेमन्ते च
(ग) शीते वसन्ते च
(घ) सर्वेषु ऋतुषु समानरूपेण

प्रश्न 9: बलार्धस्य लक्षणं किम्?
(क) अत्यधिकस्वेदः
(ख) हृदिस्थवायोः वक्त्रं प्रपद्यते
(ग) तीव्रपिपासा
(घ) शरीरकम्पनम्

प्रश्न 10: किं समीक्ष्य व्यायामं न कुर्यात् चेत् किं भवति?
(क) लाभः भवति
(ख) रोगम् आप्नुयात्
(ग) शरीरं सुदृढं भवति
(घ) किमपि न भवति


उत्तरमाला (MCQs):

  1. (ग) व्यायामः
  2. (ख) आरोग्यं, सहिष्णुता
  3. (ख) व्यायामस्विन्नगात्रस्य
  4. (ख) गरुडः
  5. (ग) विरुद्धम् अपि
  6. (ग) आत्महितैषिभिः पुम्भिः
  7. (ख) बलस्य अर्धेन
  8. (ग) शीते वसन्ते च
  9. (ख) हृदिस्थवायोः वक्त्रं प्रपद्यते
  10. (ख) रोगम् आप्नुयात्

इन नोट्स और प्रश्नों से आपको परीक्षा की तैयारी में अवश्य सहायता मिलेगी। शुभकामनाएँ!

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