Class 10 Sanskrit Notes Chapter 6 (सुभाषितानि) – Shemushi Book

हाँ बच्चो, आज हम कक्षा 10 की शेमुषी पुस्तक के छठे पाठ 'सुभाषितानि' का अध्ययन करेंगे। यह पाठ परीक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि सुभाषितों से अक्सर प्रश्न पूछे जाते हैं, चाहे वह अर्थ संबंधी हो, भावार्थ संबंधी हो या फिर व्याकरण संबंधी। 'सुभाषित' का अर्थ होता है - सुन्दर वचन या नीतिपूर्ण बातें। ये श्लोक हमें जीवन जीने की कला और नैतिक मूल्यों की शिक्षा देते हैं। चलिए, हम एक-एक श्लोक को विस्तार से समझते हैं।
पाठ ६ - सुभाषितानि (विस्तृत नोट्स)
श्लोक 1:
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥
- अन्वयः: मनुष्याणां शरीरस्थः महान् रिपुः आलस्यम् हि। उद्यमसमः बन्धुः न अस्ति, यं कृत्वा (मनुष्यः) न अवसीदति।
- शब्दार्थ:
- आलस्यम् - आलस, सुस्ती
- हि - निश्चय ही
- मनुष्याणाम् - मनुष्यों का
- शरीरस्थः - शरीर में स्थित
- महान् - बड़ा
- रिपुः - शत्रु
- न + अस्ति + उद्यमसमः (नास्त्युद्यमसमो) - परिश्रम के समान नहीं है
- उद्यमः - परिश्रम, मेहनत
- समः - समान
- बन्धुः - मित्र, भाई
- कृत्वा - करके
- यम् - जिसको
- न अवसीदति - दुखी नहीं होता है
- सरलार्थ/भावार्थ: निश्चय ही मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही उनका सबसे बड़ा शत्रु है। परिश्रम के समान (मनुष्य का) कोई मित्र नहीं है, जिसे (अर्थात् परिश्रम को) करके मनुष्य कभी दुखी नहीं होता।
- सन्देश: यह श्लोक हमें आलस्य त्यागकर परिश्रम करने की प्रेरणा देता है। परिश्रम सफलता और सुख की कुंजी है, जबकि आलस्य विनाश का कारण है।
- व्याकरण (विशेष):
- नास्त्युद्यमसमो = न + अस्ति + उद्यमसमः (दीर्घ संधि, गुण संधि)
- शरीरस्थः = शरीरे तिष्ठति यः सः (उपपद तत्पुरुष समास)
- रिपुः (विपरीतार्थक) = बन्धुः/मित्रम्
- अवसीदति (क्रियापद), कर्ता - (मनुष्यः - अध्याहार)
श्लोक 2:
गुणी गुणं वेत्ति न वेत्ति निर्गुणो,
बली बलं वेत्ति न वेत्ति निर्बलः।
पिको वसन्तस्य गुणं न वायसः,
करी च सिंहस्य बलं न मूषकः॥
- अन्वयः: गुणी गुणं वेत्ति, निर्गुणः (गुणं) न वेत्ति। बली बलं वेत्ति, निर्बलः (बलं) न वेत्ति। वसन्तस्य गुणं पिकः (वेत्ति), वायसः न (वेत्ति)। सिंहस्य बलं करी (वेत्ति), मूषकः न (वेत्ति)।
- शब्दार्थ:
- गुणी - गुणवान व्यक्ति
- गुणम् - गुण को
- वेत्ति - जानता है
- निर्गुणः - गुणहीन व्यक्ति
- बली - बलवान व्यक्ति
- बलम् - बल को, शक्ति को
- निर्बलः - कमजोर व्यक्ति
- पिकः - कोयल
- वसन्तस्य - वसंत ऋतु का
- वायसः - कौआ
- करी - हाथी
- सिंहस्य - शेर का
- मूषकः - चूहा
- सरलार्थ/भावार्थ: गुणवान व्यक्ति ही गुण को जानता है, गुणहीन व्यक्ति गुण को नहीं जानता। बलवान व्यक्ति ही बल (के महत्व) को जानता है, कमजोर व्यक्ति नहीं जानता। वसंत ऋतु के गुण (माधुर्य) को कोयल जानती है, कौआ नहीं। शेर के बल को हाथी जानता है, चूहा नहीं।
- सन्देश: इस श्लोक में बताया गया है कि किसी वस्तु या व्यक्ति के वास्तविक मूल्य या गुण को वही समझ सकता है जो स्वयं उस गुण से युक्त हो या उसे समझने की क्षमता रखता हो। समान योग्यता वाले ही एक-दूसरे के महत्व को समझते हैं।
- व्याकरण (विशेष):
- वेत्ति (क्रियापद) - विद् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन
- निर्गुणः = निर्गतः गुणः यस्मात् सः (बहुव्रीहि समास)
- निर्बलः = निर्गतं बलं यस्मात् सः (बहुव्रीहि समास)
श्लोक 3:
निमित्तमुद्दिश्य हि यः प्रकुप्यति,
ध्रुवं स तस्यापगमे प्रसीदति।
अकारणद्वेषि मनस्तु यस्य वै,
कथं जनस्तं परितोषयिष्यति॥
- अन्वयः: यः हि निमित्तम् उद्दिश्य प्रकुप्यति, सः तस्य अपगमे ध्रुवं प्रसीदति। यस्य मनः तु अकारणद्वेषि वै (अस्ति), जनः तं कथं परितोषयिष्यति?
- शब्दार्थ:
- निमित्तम् - कारण
- उद्दिश्य - लक्ष्य करके, कारण से
- यः - जो
- प्रकुप्यति - अत्यधिक क्रोधित होता है
- ध्रुवम् - निश्चित रूप से
- सः - वह
- तस्य - उसके (कारण के)
- अपगमे - समाप्त हो जाने पर
- प्रसीदति - प्रसन्न हो जाता है
- अकारणद्वेषि - बिना कारण के द्वेष (घृणा) करने वाला
- मनः - मन
- तु - तो
- यस्य - जिसका
- वै - निश्चय ही
- कथम् - कैसे
- जनः - व्यक्ति, लोग
- तम् - उसको
- परितोषयिष्यति - संतुष्ट करेगा
- सरलार्थ/भावार्थ: जो व्यक्ति किसी कारण को लक्ष्य करके (अर्थात् किसी कारण से) अत्यधिक क्रोधित होता है, वह उस कारण के समाप्त हो जाने पर निश्चित रूप से प्रसन्न हो जाता है। परन्तु जिसका मन बिना किसी कारण के ही द्वेष करने वाला है, (कोई) व्यक्ति उसको भला कैसे सन्तुष्ट करेगा?
- सन्देश: किसी कारण से नाराज हुए व्यक्ति को मनाना संभव है, क्योंकि कारण दूर होने पर नाराजगी भी दूर हो जाती है। लेकिन जो बिना वजह ही नाराज या द्वेष रखता है, उसे संतुष्ट करना असंभव है। हमें अकारण द्वेष नहीं करना चाहिए।
- व्याकरण (विशेष):
- निमित्तमुद्दिश्य = निमित्तम् + उद्दिश्य (व्यंजन संधि)
- तस्यापगमे = तस्य + अपगमे (दीर्घ संधि)
- अकारणद्वेषि = न कारणम् अकारणम्, अकारणं द्वेष्टि इति (नञ् तत्पुरुष, उपपद तत्पुरुष)
- परितोषयिष्यति (क्रियापद) - परि + तुष् + णिच् + लृट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन
श्लोक 4:
उदीरितोऽर्थः पशुनापि गृह्यते,
हयाश्च नागाश्च वहन्ति बोधिताः।
अनुक्तमप्यूहति पण्डितो जनः,
परेङ्गितज्ञानफला हि बुद्धयः॥
- अन्वयः: उदीरितः अर्थः पशुना अपि गृह्यते। हयाः च नागाः च बोधिताः (भारं) वहन्ति। पण्डितः जनः अनुक्तम् अपि ऊहति। बुद्धयः हि पर-इङ्गित-ज्ञान-फलाः (भवन्ति)।
- शब्दार्थ:
- उदीरितः अर्थः - कहा गया अर्थ (बात)
- पशुना अपि - पशु के द्वारा भी
- गृह्यते - ग्रहण किया जाता है, समझा जाता है
- हयाः - घोड़े (अश्व)
- नागाः - हाथी (गज)
- वहन्ति - ढोते हैं, वहन करते हैं
- बोधिताः - समझाए जाने पर, सिखाए जाने पर
- अनुक्तम् अपि - बिना कहे हुए को भी
- ऊहति - अंदाज़ा लगा लेता है, समझ लेता है
- पण्डितः जनः - बुद्धिमान व्यक्ति
- पर + इङ्गित + ज्ञान + फलाः (परेङ्गितज्ञानफलाः) - दूसरों के संकेत से उत्पन्न ज्ञान रूपी फल वाली
- बुद्धयः - बुद्धियाँ
- सरलार्थ/भावार्थ: कहा हुआ अर्थ तो पशु भी ग्रहण कर लेता है (समझ लेता है)। घोड़े और हाथी भी बताए जाने पर (बोझ) ढोते हैं। परन्तु बुद्धिमान व्यक्ति बिना कहे हुए का भी अंदाज़ा लगा लेता है। निश्चय ही बुद्धियाँ दूसरों के संकेत से उत्पन्न ज्ञान रूपी फल वाली होती हैं (अर्थात् बुद्धिमान व्यक्ति संकेत मात्र से ही बात समझ जाते हैं)।
- सन्देश: बुद्धिमान व्यक्ति की पहचान यह है कि वह केवल कही हुई बात को ही नहीं समझता, बल्कि इशारों और संकेतों से भी गूढ़ अर्थ को समझ लेता है। हमें अपनी बुद्धि को इतना विकसित करना चाहिए।
- व्याकरण (विशेष):
- उदीरितोऽर्थः = उदीरितः + अर्थः (विसर्ग संधि - उत्व)
- पशुनापि = पशुना + अपि (दीर्घ संधि)
- अनुक्तमप्यूहति = अनुक्तम् + अपि + ऊहति (व्यंजन संधि, यण संधि)
- पण्डितो जनः = पण्डितः + जनः (विसर्ग संधि - उत्व)
- परेङ्गितज्ञानफलाः = परेषां इङ्गितम्, तेन ज्ञानम्, तत् फलम् यासाम् ताः (षष्ठी तत्पुरुष, तृतीया तत्पुरुष, बहुव्रीहि समास)
श्लोक 5:
क्रोधो हि शत्रुः प्रथमो नराणां,
देहस्थितो देहविनाशनाय।
यथास्थितः काष्ठगतो हि वह्निः,
स एव वह्निर्दहते शरीरम्॥
- अन्वयः: नराणां देहविनाशनाय प्रथमः शत्रुः देहस्थितः क्रोधः हि (अस्ति)। यथा काष्ठगतः स्थितः वह्निः काष्ठम् एव दहते, (तथैव) सः एव (क्रोध रूपी) वह्निः शरीरं दहते।
- शब्दार्थ:
- क्रोधः - गुस्सा
- शत्रुः - दुश्मन
- प्रथमः - पहला
- नराणाम् - मनुष्यों का
- देहस्थितः - शरीर में स्थित
- देहविनाशनाय - शरीर के विनाश के लिए
- यथा - जैसे
- स्थितः - स्थित, मौजूद
- काष्ठगतः - लकड़ी में स्थित
- वह्निः - अग्नि, आग
- सः एव - वही
- दहते - जलाता है
- शरीरम् - शरीर को
- सरलार्थ/भावार्थ: मनुष्यों के शरीर के विनाश के लिए उनके शरीर में स्थित क्रोध ही (उनका) पहला शत्रु है। जैसे लकड़ी में स्थित अग्नि (पहले) लकड़ी को ही जलाती है, वैसे ही शरीर में स्थित वह क्रोध रूपी अग्नि शरीर को ही जलाती है।
- सन्देश: क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है जो उसी के शरीर में रहकर उसी का नाश करता है। अतः हमें क्रोध पर नियंत्रण रखना चाहिए।
- व्याकरण (विशेष):
- क्रोधो हि = क्रोधः + हि (विसर्ग संधि - उत्व)
- देहस्थितः = देहे स्थितः (सप्तमी तत्पुरुष समास)
- काष्ठगतः = काष्ठं गतः (द्वितीया तत्पुरुष समास)
- वह्निर्दहते = वह्निः + दहते (विसर्ग संधि - रेफ)
श्लोक 6:
मृगा मृगैः सङ्गमनुव्रजन्ति,
गावश्च गोभिस्तुरगास्तुरङ्गैः।
मूर्खाश्च मूर्खैः सुधियः सुधीभिः,
समानशीलव्यसनेषु सख्यम्॥
- अन्वयः: मृगाः मृगैः सह सङ्गम् अनुव्रजन्ति। गावः च गोभिः सह (अनुव्रजन्ति)। तुरगाः तुरङ्गैः सह (अनुव्रजन्ति)। मूर्खाः च मूर्खैः सह (अनुव्रजन्ति)। सुधियः सुधीभिः सह (अनुव्रजन्ति)। सख्यं समान-शील-व्यसनेषु (भवति)।
- शब्दार्थ:
- मृगाः - हिरण
- मृगैः सह - हिरणों के साथ ('सह' के योग में तृतीया विभक्ति)
- सङ्गम् - साथ
- अनुव्रजन्ति - पीछे चलते हैं, अनुसरण करते हैं
- गावः - गायें
- गोभिः - गायों के साथ
- तुरगाः - घोड़े
- तुरङ्गैः - घोड़ों के साथ
- मूर्खाः - मूर्ख लोग
- मूर्खैः - मूर्खों के साथ
- सुधियः - बुद्धिमान लोग (सुधी)
- सुधीभिः - बुद्धिमानों के साथ
- समान-शील-व्यसनेषु - समान स्वभाव और आदतों वालों में
- सख्यम् - मित्रता
- सरलार्थ/भावार्थ: हिरण हिरणों के साथ, गायें गायों के साथ, घोड़े घोड़ों के साथ, मूर्ख मूर्खों के साथ और बुद्धिमान बुद्धिमानों के साथ ही रहते (अनुसरण करते) हैं। (क्योंकि) मित्रता समान स्वभाव और आदतों वालों में ही होती है।
- सन्देश: मित्रता प्रायः उन्हीं लोगों में होती है जिनके स्वभाव, चरित्र और आदतें (व्यसन) समान होती हैं। संगति का व्यक्ति पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
- व्याकरण (विशेष):
- गावश्च = गावः + च (विसर्ग संधि - श्)
- तुरगास्तुरङ्गैः = तुरगाः + तुरङ्गैः (विसर्ग संधि - स्)
- मूर्खाश्च = मूर्खाः + च (विसर्ग संधि - श्)
- समानशीलव्यसनेषु = शीलं च व्यसनं च शीलव्यसने (द्वन्द्व समास), समानं शीलं व्यसनं येषां तेषु (बहुव्रीहि समास)
- 'सह' के योग में तृतीया विभक्ति (मृगैः, गोभिः, तुरङ्गैः, मूर्खैः, सुधीभिः)।
श्लोक 7:
सेवितव्यो महावृक्षः फलच्छायासमन्वितः।
यदि दैवात् फलं नास्ति छाया केन निवार्यते॥
- अन्वयः: फल-छाया-समन्वितः महावृक्षः सेवितव्यः। यदि दैवात् फलं न अस्ति, (तर्हि तस्य) छाया केन निवार्यते?
- शब्दार्थ:
- सेवितव्यः - सेवन करना चाहिए, आश्रय लेना चाहिए
- महावृक्षः - विशाल पेड़
- फलच्छायासमन्वितः - फल और छाया से युक्त
- यदि - अगर
- दैवात् - भाग्य से
- फलम् - फल
- न अस्ति - नहीं है
- छाया - छाँव
- केन - किसके द्वारा
- निवार्यते - रोकी जाती है
- सरलार्थ/भावार्थ: फल और छाया से युक्त विशाल वृक्ष का ही आश्रय लेना चाहिए। यदि भाग्यवश (किसी समय) उस पर फल न भी हों, तो (उसकी) छाया को भला किसके द्वारा रोका जा सकता है? (अर्थात् छाया तो वह अवश्य ही देगा)।
- सन्देश: हमें महान और गुणी व्यक्तियों का आश्रय लेना चाहिए। यदि कभी उनसे कोई एक लाभ (जैसे फल) न भी मिले, तो भी अन्य लाभ (जैसे छाया) तो अवश्य ही प्राप्त होंगे। गुणी व्यक्ति का साथ कभी व्यर्थ नहीं जाता।
- व्याकरण (विशेष):
- सेवितव्यः = सेव् + तव्यत् (प्रत्यय) - चाहिए अर्थ में
- फलच्छायासमन्वितः = फलं च छाया च फलच्छाये (द्वन्द्व समास), फलच्छायाभ्यां समन्वितः (तृतीया तत्पुरुष समास)
- नास्ति = न + अस्ति (दीर्घ संधि)
श्लोक 8:
अमन्त्रमक्षरं नास्ति, नास्ति मूलमनौषधम्।
अयोग्यः पुरुषो नास्ति, योजकस्तत्र दुर्लभः॥
- अन्वयः: अमन्त्रम् अक्षरं न अस्ति। अनौषधं मूलं न अस्ति। अयोग्यः पुरुषः न अस्ति। तत्र योजकः दुर्लभः (अस्ति)।
- शब्दार्थ:
- अमन्त्रम् - मन्त्रहीन, बिना अर्थ का
- अक्षरम् - वर्ण, अक्षर
- न अस्ति - नहीं है
- मूलम् - जड़ (पेड़-पौधे की)
- अनौषधम् - जो औषधि न हो
- अयोग्यः - योग्यता रहित
- पुरुषः - व्यक्ति
- योजकः - जोड़ने वाला, सही उपयोग करने वाला, पारखी
- तत्र - वहाँ, उस विषय में
- दुर्लभः - कठिनाई से मिलने वाला
- सरलार्थ/भावार्थ: कोई भी अक्षर ऐसा नहीं है जो मन्त्रहीन (व्यर्थ) हो। कोई भी (वनस्पति की) जड़ ऐसी नहीं है जो औषधि न हो। कोई भी पुरुष अयोग्य नहीं होता है। (बस) वहाँ (उनको सही कार्य में) जोड़ने वाला (पारखी व्यक्ति) दुर्लभ होता है।
- सन्देश: संसार में कोई भी वस्तु या व्यक्ति निरर्थक या अयोग्य नहीं है। प्रत्येक का अपना महत्व और उपयोगिता है। आवश्यकता है एक ऐसे पारखी व्यक्ति की जो उनकी योग्यता को पहचानकर उन्हें सही स्थान पर या सही कार्य में लगा सके।
- व्याकरण (विशेष):
- अमन्त्रम् = न मन्त्रम् (नञ् तत्पुरुष समास)
- अनौषधम् = न औषधम् (नञ् तत्पुरुष समास)
- अयोग्यः = न योग्यः (नञ् तत्पुरुष समास)
- पुरुषो नास्ति = पुरुषः + न + अस्ति (विसर्ग संधि - उत्व, दीर्घ संधि)
- योजकस्तत्र = योजकः + तत्र (विसर्ग संधि - स्)
श्लोक 9:
सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता।
उदये सविता रक्तो रक्तश्चास्तमये तथा॥
- अन्वयः: सम्पत्तौ च विपत्तौ च महताम् एकरूपता (भवति)। यथा सविता उदये रक्तः (भवति) तथा अस्तमये च रक्तः (भवति)।
- शब्दार्थ:
- सम्पत्तौ - संपत्ति में, सुख में
- विपत्तौ - विपत्ति में, दुःख में
- महताम् - महान लोगों की
- एकरूपता - एक समान रहना, समरूपता
- उदये - उदय होते समय
- सविता - सूर्य
- रक्तः - लाल
- अस्तमये - अस्त होते समय
- तथा - वैसे ही
- सरलार्थ/भावार्थ: महान लोग संपत्ति (सुख) और विपत्ति (दुःख) में एक समान रहते हैं (अर्थात् वे सुख में न तो अधिक उत्साहित होते हैं और न ही दुःख में अधिक विचलित)। जैसे सूर्य उदय होते समय भी लाल होता है और अस्त होते समय भी लाल ही होता है।
- सन्देश: महान व्यक्ति सुख और दुःख, दोनों परिस्थितियों में समभाव रखते हैं, विचलित नहीं होते। हमें भी जीवन के उतार-चढ़ाव में धैर्य और समता बनाए रखनी चाहिए।
- व्याकरण (विशेष):
- महतामेकरूपता = महताम् + एकरूपता (व्यंजन संधि)
- रक्तश्चास्तमये = रक्तः + च + अस्तमये (विसर्ग संधि - श्, दीर्घ संधि)
श्लोक 10:
विचित्रे खलु संसारे नास्ति किञ्चिन्निरर्थकम्।
अश्वश्चेद्धावने वीरः खरः भारस्य वाहने॥
- अन्वयः: विचित्रे संसारे खलु किञ्चित् निरर्थकं न अस्ति। अश्वः चेत् धावने वीरः (अस्ति, तर्हि) खरः भारस्य वाहने (वीरः अस्ति)।
- शब्दार्थ:
- विचित्रे - इस अनोखे, रंग-बिरंगे
- खलु - निश्चय ही
- संसारे - संसार में
- न अस्ति - नहीं है
- किञ्चित् - कुछ भी
- निरर्थकम् - व्यर्थ, बेकार
- अश्वः - घोड़ा
- चेत् - यदि
- धावने - दौड़ने में
- वीरः - कुशल, श्रेष्ठ
- खरः - गधा
- भारस्य - बोझ के
- वाहने - ढोने में
- सरलार्थ/भावार्थ: इस अनोखे संसार में निश्चय ही कुछ भी व्यर्थ नहीं है। यदि घोड़ा दौड़ने में वीर है, तो गधा बोझ ढोने में वीर (कुशल) है।
- सन्देश: इस संसार में प्रत्येक प्राणी या वस्तु का अपना-अपना महत्व और उपयोगिता है। किसी को भी छोटा या बेकार नहीं समझना चाहिए। ईश्वर ने सबको किसी न किसी विशेष कार्य के लिए बनाया है। यह श्लोक 8 के भाव का समर्थन करता है।
- व्याकरण (विशेष):
- किञ्चिन्निरर्थकम् = किञ्चित् + निरर्थकम् (व्यंजन संधि)
- अश्वश्चेद्धावने = अश्वः + चेत् + धावने (विसर्ग संधि - श्, व्यंजन संधि - जश्त्व)
पाठ का सार:
यह पाठ हमें जीवन के अनेक महत्वपूर्ण पहलुओं पर नीतिपूर्ण शिक्षा देता है। परिश्रम का महत्व, गुणी व्यक्ति की पहचान, क्रोध पर नियंत्रण, बुद्धिमान व्यक्ति के लक्षण, संगति का प्रभाव, महान व्यक्तियों का आश्रय लेने का लाभ, संसार में किसी की भी निरर्थकता न होना, और सुख-दुःख में समान भाव रखना - ये सभी मूल्यवान शिक्षाएं इन सुभाषितों में निहित हैं।
अभ्यास हेतु बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs):
-
मनुष्याणां शरीरस्थः महान् रिपुः कः?
(क) उद्यमः
(ख) बन्धुः
(ग) आलस्यम्
(घ) क्रोधः
उत्तर: (ग) आलस्यम् -
कः वसन्तस्य गुणं वेत्ति?
(क) वायसः
(ख) मूषकः
(ग) पिकः
(घ) गजः
उत्तर: (ग) पिकः -
यस्य मनः अकारणद्वेषि भवति, तं कः परितोषयितुं न शक्नोति?
(क) मित्रम्
(ख) बन्धुः
(ग) जनः
(घ) शत्रुः
उत्तर: (ग) जनः -
'ऊहति' इति पदस्य कः अर्थः?
(क) कथयति
(ख) पृच्छति
(ग) अनुमानं करोति
(घ) गच्छति
उत्तर: (ग) अनुमानं करोति -
नराणां प्रथमः शत्रुः कः?
(क) लोभः
(ख) मोहः
(ग) आलस्यम्
(घ) क्रोधः
उत्तर: (घ) क्रोधः -
सख्यं केषु भवति?
(क) भिन्न-स्वभावेषु
(ख) समान-शील-व्यसनेषु
(ग) केवलं धनिषु
(घ) केवलं निर्धनेषु
उत्तर: (ख) समान-शील-व्यसनेषु -
महावृक्षस्य किं कदापि न निवार्यते?
(क) फलम्
(ख) पुष्पम्
(ग) छाया
(घ) पत्रम्
उत्तर: (ग) छाया -
संसारे कः दुर्लभः अस्ति?
(क) अक्षरम्
(ख) मूलम्
(ग) पुरुषः
(घ) योजकः
उत्तर: (घ) योजकः -
केषां सम्पत्तौ विपत्तौ च एकरूपता भवति?
(क) मूर्खाणाम्
(ख) पण्डितानाम्
(ग) महताम्
(घ) निर्बलानाम्
उत्तर: (ग) महताम् -
खरः कस्य वाहने वीरः भवति?
(क) जनस्य
(ख) अश्वस्य
(ग) भारस्य
(घ) गजस्य
उत्तर: (ग) भारस्य
इन नोट्स और प्रश्नों का अच्छे से अभ्यास करें। ये आपकी परीक्षा की तैयारी में बहुत सहायक होंगे। कोई शंका हो तो अवश्य पूछें।