Class 10 Science Notes Chapter 6 (जैव प्रक्रम) – Vigyan Book

Vigyan
चलिए, आज हम कक्षा 10 विज्ञान के अध्याय 6 'जैव प्रक्रम' का विस्तृत अध्ययन करेंगे, जो सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

अध्याय 6: जैव प्रक्रम (Life Processes)

परिचय:
वे सभी प्रक्रम जो सम्मिलित रूप से जीव के शरीर का अनुरक्षण (maintenance) का कार्य करते हैं, जैव प्रक्रम कहलाते हैं। जीवित रहने के लिए जीवों द्वारा की जाने वाली मूलभूत क्रियाएँ ही जैव प्रक्रम हैं।

मुख्य जैव प्रक्रम:

  1. पोषण (Nutrition):

    • परिभाषा: जीवों द्वारा भोजन (पोषक तत्वों) को ग्रहण करने तथा उसका उपयोग ऊर्जा प्राप्ति, शरीर निर्माण एवं मरम्मत के लिए करने की प्रक्रिया पोषण कहलाती है।
    • पोषण के प्रकार:
      • स्वपोषी पोषण (Autotrophic Nutrition): इसमें जीव अकार्बनिक स्रोतों (जैसे CO2, जल) से अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। उदाहरण: हरे पौधे, कुछ जीवाणु।
        • प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis): वह प्रक्रिया जिसके द्वारा हरे पौधे सूर्य के प्रकाश और क्लोरोफिल की उपस्थिति में कार्बन डाइऑक्साइड और जल का उपयोग करके कार्बोहाइड्रेट (ग्लूकोज) का निर्माण करते हैं तथा ऑक्सीजन गैस सह-उत्पाद के रूप में निकालते हैं।
          • समीकरण:
            6CO₂ + 12H₂O --(सूर्य का प्रकाश / क्लोरोफिल)--> C₆H₁₂O₆ + 6O₂ + 6H₂O
          • आवश्यक कच्ची सामग्री: कार्बन डाइऑक्साइड (वायुमंडल से, रंध्रों द्वारा), जल (मृदा से, जड़ों द्वारा), सूर्य का प्रकाश, क्लोरोफिल (पत्तियों की कोशिकाओं के क्लोरोप्लास्ट में उपस्थित)।
          • घटनाएँ:
            1. क्लोरोफिल द्वारा प्रकाश ऊर्जा का अवशोषण।
            2. प्रकाश ऊर्जा का रासायनिक ऊर्जा में रूपांतरण तथा जल अणुओं का हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन में अपघटन।
            3. कार्बन डाइऑक्साइड का कार्बोहाइड्रेट (ग्लूकोज) में अपचयन।
          • रंध्र (Stomata): पत्तियों की सतह पर उपस्थित सूक्ष्म छिद्र जो गैसों के आदान-प्रदान (CO₂ लेना, O₂ छोड़ना) तथा वाष्पोत्सर्जन (जलवाष्प का निकलना) में सहायक होते हैं। रंध्रों का खुलना और बंद होना द्वार कोशिकाओं (Guard cells) द्वारा नियंत्रित होता है।
      • विषमपोषी पोषण (Heterotrophic Nutrition): इसमें जीव अपने भोजन के लिए अन्य जीवों (पौधों या जंतुओं) पर निर्भर रहते हैं।
        • प्रकार:
          1. प्राणीसम पोषण (Holozoic): जीव भोज्य पदार्थों को अंतर्ग्रहण करते हैं तथा शरीर के अंदर उनका पाचन होता है। उदा. अमीबा, मानव।
          2. मृतजीवी पोषण (Saprotrophic): जीव मृत एवं सड़े-गले कार्बनिक पदार्थों से अपना भोजन प्राप्त करते हैं। उदा. कवक (फफूँदी, यीस्ट), कुछ जीवाणु। ये जटिल कार्बनिक पदार्थों को शरीर के बाहर सरल पदार्थों में तोड़कर अवशोषित करते हैं।
          3. परजीवी पोषण (Parasitic): जीव अन्य जीवित जीव (पोषी) के शरीर के अंदर या बाहर रहकर उससे अपना भोजन प्राप्त करते हैं, जिससे पोषी को हानि होती है। उदा. अमरबेल (पादप परजीवी), जूँ, फीताकृमि (जंतु परजीवी)।
    • अमीबा में पोषण: अमीबा एककोशिकीय जीव है। यह कूटपादों (Pseudopodia) की सहायता से भोजन (जैसे शैवाल के छोटे टुकड़े) को घेरकर खाद्य रिक्तिका (Food vacuole) बनाता है। खाद्य रिक्तिका में एंजाइमों द्वारा भोजन का पाचन होता है और पचा हुआ भोजन कोशिकाद्रव्य में विसरित हो जाता है। अपचित पदार्थ कोशिका सतह की ओर गति करके बाहर निकाल दिया जाता है। (अंतर्ग्रहण -> पाचन -> अवशोषण -> स्वांगीकरण -> बहिःक्षेपण)
    • मानव में पोषण (पाचन तंत्र - Digestive System):
      • आहार नाल (Alimentary Canal): मुख से गुदा तक फैली एक लंबी नली।
        • मुख (Mouth): भोजन का अंतर्ग्रहण। दाँतों द्वारा चबाना, जिह्वा द्वारा लार मिलाना। लार ग्रंथि से स्रावित लार में एमाइलेज (टायलिन) एंजाइम होता है जो स्टार्च (मंड) को शर्करा में बदलता है।
        • ग्रसिका (Oesophagus): मुख से आमाशय तक भोजन को क्रमाकुंचन गति (Peristalsis) द्वारा पहुँचाना।
        • आमाशय (Stomach): J-आकार का अंग। आमाशय भित्ति में जठर ग्रंथियाँ होती हैं जो जठर रस स्रावित करती हैं। जठर रस में हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl), पेप्सिन एंजाइम और श्लेष्मा होता है।
          • HCl: माध्यम को अम्लीय बनाता है (पेप्सिन की क्रिया के लिए आवश्यक), भोजन के साथ आए जीवाणुओं को नष्ट करता है।
          • पेप्सिन: प्रोटीन का पाचन करता है।
          • श्लेष्मा: आमाशय की आंतरिक सतह की अम्ल से रक्षा करता है।
        • क्षुद्रांत्र (Small Intestine): आहार नाल का सबसे लंबा भाग (लगभग 6.5 मीटर)। कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन तथा वसा का पूर्ण पाचन यहीं होता है। इसमें यकृत और अग्न्याशय से स्राव प्राप्त होते हैं।
          • यकृत (Liver): शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि। पित्त रस (Bile juice) स्रावित करता है जो पित्ताशय (Gall bladder) में संग्रहित होता है। पित्त रस वसा का इमल्सीकरण (बड़ी गोलिकाओं को छोटी गोलिकाओं में तोड़ना) करता है और माध्यम को क्षारीय बनाता है (अग्न्याशयी एंजाइमों की क्रिया के लिए)।
          • अग्न्याशय (Pancreas): अग्न्याशयी रस स्रावित करता है जिसमें ट्रिप्सिन (प्रोटीन पाचन), लाइपेज (इमल्सीकृत वसा पाचन) और एमाइलेज (कार्बोहाइड्रेट पाचन) एंजाइम होते हैं।
          • आंत्र रस (Intestinal Juice): क्षुद्रांत्र की भित्ति से स्रावित होता है, जिसमें उपस्थित एंजाइम अंततः प्रोटीन को अमीनो अम्ल में, जटिल कार्बोहाइड्रेट को ग्लूकोज में तथा वसा को वसा अम्ल और ग्लिसरॉल में बदल देते हैं।
          • अवशोषण: पचे हुए भोजन का अवशोषण क्षुद्रांत्र की आंतरिक भित्ति पर उपस्थित अँगुली जैसे प्रवर्धों, जिन्हें दीर्घरोम (Villi) कहते हैं, द्वारा होता है। दीर्घरोम अवशोषण के लिए सतही क्षेत्रफल बढ़ा देते हैं। अवशोषित भोजन रुधिर वाहिकाओं में पहुँच जाता है।
        • बृहदांत्र (Large Intestine): बिना पचे भोजन से जल का अवशोषण करती है। शेष पदार्थ गुदा (Anus) द्वारा मल के रूप में शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है (बहिःक्षेपण)।
  2. श्वसन (Respiration):

    • परिभाषा: वह प्रक्रम जिसके द्वारा कोशिकाएँ भोजन (ग्लूकोज) का ऑक्सीकरण करके ऊर्जा (ATP के रूप में) मुक्त करती हैं। इसमें गैसों का आदान-प्रदान (साँस लेना) भी शामिल है।
    • ग्लूकोज विखंडन के विभिन्न पथ:
      • कोशिकाद्रव्य में: ग्लूकोज (6-कार्बन अणु) पाइरुवेट (3-कार्बन अणु) + ऊर्जा में विखंडित होता है।
      • पाइरुवेट का भविष्य (ऑक्सीजन की उपलब्धता पर निर्भर):
        • अवायवीय श्वसन (Anaerobic Respiration) (ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में):
          • यीस्ट में: पाइरुवेट इथेनॉल (2-कार्बन अणु) + कार्बन डाइऑक्साइड + ऊर्जा (कम) में परिवर्तित होता है। इसे किण्वन (Fermentation) भी कहते हैं।
          • हमारी पेशी कोशिकाओं में: ऑक्सीजन की कमी होने पर (जैसे अत्यधिक व्यायाम के समय) पाइरुवेट लैक्टिक अम्ल (3-कार्बन अणु) + ऊर्जा में परिवर्तित होता है। लैक्टिक अम्ल के जमाव से पेशियों में ऐंठन (cramps) होती है।
        • वायवीय श्वसन (Aerobic Respiration) (ऑक्सीजन की उपस्थिति में):
          • माइटोकॉन्ड्रिया में: पाइरुवेट कार्बन डाइऑक्साइड + जल + ऊर्जा (बहुत अधिक) में विखंडित होता है।
    • ATP (एडेनोसीन ट्राइफॉस्फेट): श्वसन में मुक्त ऊर्जा ATP के रूप में संचित होती है, जिसे कोशिका की 'ऊर्जा मुद्रा' कहते हैं। ATP के विखंडन से प्राप्त ऊर्जा कोशिका के अंदर होने वाली विभिन्न क्रियाओं को संपन्न कराती है।
    • पौधों में श्वसन: पौधे रंध्रों (पत्तियों में), वातरंध्रों (Lenticels - तने में) और जड़ों की सतह से गैसों (O₂ लेना, CO₂ छोड़ना) का आदान-प्रदान करते हैं। दिन में प्रकाश संश्लेषण के कारण CO₂ की नेट खपत होती है और O₂ निकलती है, जबकि रात में केवल श्वसन होता है (O₂ लेना, CO₂ छोड़ना)।
    • मानव में श्वसन तंत्र (Respiratory System):
      • मार्ग: नासाद्वार (Nostrils) -> नासा मार्ग -> ग्रसनी (Pharynx) -> कंठ (Larynx) -> श्वासनली (Trachea) -> श्वसनी (Bronchi - दो शाखाएँ, प्रत्येक फेफड़े में) -> श्वसनिकाएँ (Bronchioles - महीन शाखाएँ) -> कूपिका कोष (Alveolar sac) -> कूपिका (Alveoli - गुब्बारे जैसी संरचनाएँ)।
      • श्वासनली: उपास्थि वलयों (Rings of cartilage) से समर्थित होती है ताकि वायु की अनुपस्थिति में यह पिचक न जाए।
      • फुप्फुस (Lungs): वक्ष गुहा में स्थित स्पंजी अंग।
      • कूपिका: अत्यंत पतली भित्ति वाली संरचनाएँ जहाँ गैसों का विनिमय (ऑक्सीजन का रक्त में जाना, CO₂ का रक्त से बाहर आना) होता है। इनकी सतह पर रक्त केशिकाओं का घना जाल होता है।
      • श्वसन क्रियाविधि (Mechanism of Breathing):
        • अंतःश्वसन (Inhalation): पसलियाँ ऊपर और बाहर की ओर गति करती हैं, डायाफ्राम चपटा होता है -> वक्ष गुहा का आयतन बढ़ता है -> वायुदाब कम होता है -> वायु फेफड़ों में भरती है।
        • उच्छ्वसन (Exhalation): पसलियाँ नीचे और अंदर की ओर गति करती हैं, डायाफ्राम गुंबद आकार का हो जाता है -> वक्ष गुहा का आयतन घटता है -> वायुदाब बढ़ता है -> वायु फेफड़ों से बाहर निकलती है।
      • गैसों का परिवहन: ऑक्सीजन मुख्यतः लाल रक्त कोशिकाओं (RBC) में उपस्थित हीमोग्लोबिन (Haemoglobin) वर्णक द्वारा परिवहन की जाती है। कार्बन डाइऑक्साइड रक्त में घुलनशील अवस्था में तथा बाइकार्बोनेट के रूप में अधिक मात्रा में परिवहन की जाती है।
  3. वहन/परिवहन (Transportation):

    • परिभाषा: शरीर के एक भाग से अवशोषित या संश्लेषित पदार्थों का दूसरे भागों तक पहुँचाने की प्रक्रिया।
    • पादपों में परिवहन:
      • जल और खनिज लवणों का परिवहन: जड़ों द्वारा अवशोषित जल और खनिज लवणों को जाइलम ऊतक (Xylem tissue) द्वारा पत्तियों तक पहुँचाया जाता है। यह मुख्यतः वाष्पोत्सर्जन खिंचाव (Transpiration pull) के कारण होता है। वाष्पोत्सर्जन पत्तियों के रंध्रों द्वारा जल का वाष्प के रूप में हानि है, जो एक चूषण बल उत्पन्न करता है।
      • भोजन का परिवहन (स्थानांतरण - Translocation): पत्तियों में बने भोजन (सुक्रोज) को फ्लोएम ऊतक (Phloem tissue) द्वारा पौधे के अन्य भागों (जड़, फल, बीज, वृद्धि वाले क्षेत्र) तक पहुँचाया जाता है। यह एक सक्रिय प्रक्रिया है जिसमें ATP ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
    • मानव में परिवहन (परिसंचरण तंत्र - Circulatory System):
      • रुधिर (Blood): एक तरल संयोजी ऊतक।
        • घटक:
          • प्लाज्मा (Plasma): तरल आधात्री। इसमें जल, प्रोटीन, लवण, हार्मोन, पचा हुआ भोजन, CO₂, उत्सर्जी पदार्थ आदि होते हैं।
          • लाल रक्त कोशिकाएँ (RBCs): इनमें हीमोग्लोबिन होता है जो ऑक्सीजन का परिवहन करता है। ये केंद्रक रहित होती हैं (स्तनधारियों में)।
          • श्वेत रक्त कोशिकाएँ (WBCs): शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली का हिस्सा, रोगाणुओं से लड़ती हैं।
          • प्लेटलेट्स (Platelets) / बिंबाणु: रक्त का थक्का जमाने में मदद करती हैं, चोट लगने पर रक्तस्राव रोकती हैं।
      • हृदय (Heart): एक पेशीय अंग जो रक्त को पंप करता है।
        • संरचना: चार कक्ष - दो ऊपरी कक्ष अलिंद (Atria - दायाँ और बायाँ) और दो निचले कक्ष निलय (Ventricles - दायाँ और बायाँ)। कक्षों के बीच वाल्व (Valves) होते हैं जो रक्त के विपरीत प्रवाह को रोकते हैं। दायाँ और बायाँ भाग एक विभाजिका (Septum) द्वारा अलग रहते हैं ताकि ऑक्सीजनित और विऑक्सीजनित रक्त न मिलें।
        • कार्य:
          • शरीर से विऑक्सीजनित (CO₂ युक्त) रक्त दाएँ अलिंद में आता है -> दाएँ निलय में जाता है -> फुप्फुस धमनी द्वारा फेफड़ों में भेजा जाता है।
          • फेफड़ों से ऑक्सीजनित (O₂ युक्त) रक्त फुप्फुस शिरा द्वारा बाएँ अलिंद में आता है -> बाएँ निलय में जाता है -> महाधमनी द्वारा शरीर के विभिन्न भागों में पंप किया जाता है।
        • दोहरा परिसंचरण (Double Circulation): रक्त परिसंचरण के एक पूरे चक्र में हृदय से दो बार गुजरता है (एक बार विऑक्सीजनित और एक बार ऑक्सीजनित)। यह ऑक्सीजनित और विऑक्सीजनित रक्त को अलग रखने में मदद करता है, जिससे शरीर को ऑक्सीजन की कुशल आपूर्ति सुनिश्चित होती है (उच्च ऊर्जा आवश्यकता वाले जीवों जैसे पक्षी और स्तनधारी के लिए महत्वपूर्ण)।
      • रक्त वाहिकाएँ (Blood Vessels):
        • धमनियाँ (Arteries): ऑक्सीजनित रक्त को हृदय से शरीर के विभिन्न अंगों तक ले जाती हैं (अपवाद: फुप्फुस धमनी)। इनकी भित्ति मोटी और लचीली होती है क्योंकि रक्त उच्च दाब से बहता है।
        • शिराएँ (Veins): विऑक्सीजनित रक्त को शरीर के विभिन्न अंगों से हृदय तक लाती हैं (अपवाद: फुप्फुस शिरा)। इनकी भित्ति पतली होती है। इनमें वाल्व होते हैं जो रक्त को वापस बहने से रोकते हैं।
        • केशिकाएँ (Capillaries): अत्यंत महीन वाहिकाएँ जो धमनियों को शिराओं से जोड़ती हैं। इनकी भित्ति एक-कोशिकीय मोटी होती है, जिससे रक्त और ऊतकों के बीच पदार्थों का विनिमय आसानी से हो जाता है।
      • लसिका (Lymph): केशिकाओं की भित्ति से रिसकर ऊतकों के बीच खाली स्थान में आया हुआ रंगहीन तरल, जिसमें प्लाज्मा, प्रोटीन और रक्त कोशिकाएँ (मुख्यतः लिम्फोसाइट्स) होती हैं। यह ऊतक तरल भी कहलाता है। लसिका वाहिकाओं द्वारा एकत्र होकर अंततः बड़ी शिराओं में डाल दिया जाता है। यह परिवहन और प्रतिरक्षा में सहायक है।
      • रक्त दाब (Blood Pressure): रक्त वाहिकाओं की भित्ति के विरुद्ध रक्त द्वारा लगाया गया दाब। एक स्वस्थ वयस्क का प्रकुंचन दाब (Systolic pressure - निलय संकुचन के समय धमनी में दाब) लगभग 120 mm Hg और अनुशिथिलन दाब (Diastolic pressure - निलय शिथिलन के समय धमनी में दाब) लगभग 80 mm Hg होता है। इसे स्फिग्मोमैनोमीटर (Sphygmomanometer) से मापते हैं।
  4. उत्सर्जन (Excretion):

    • परिभाषा: उपापचयी क्रियाओं के फलस्वरूप बने हानिकारक नाइट्रोजनी वर्ज्य पदार्थों (जैसे यूरिया, यूरिक अम्ल) का शरीर से बाहर निकालने का प्रक्रम।
    • पादपों में उत्सर्जन:
      • गैसीय अपशिष्ट (CO₂, O₂, जलवाष्प) रंध्रों और वातरंध्रों द्वारा उत्सर्जित होते हैं।
      • कुछ ठोस और द्रव अपशिष्ट पत्तियों (जो बाद में गिर जाती हैं), छाल, पुराने जाइलम (रेजिन, गोंद के रूप में) में संचित होते हैं।
      • कुछ अपशिष्ट पदार्थ जड़ों द्वारा आसपास की मृदा में उत्सर्जित कर दिए जाते हैं।
    • मानव में उत्सर्जन तंत्र (Excretory System):
      • अंग: एक जोड़ा वृक्क (Kidneys), एक जोड़ा मूत्रवाहिनी (Ureters), एक मूत्राशय (Urinary Bladder) और एक मूत्रमार्ग (Urethra)।
      • वृक्क (Kidneys): सेम के बीज के आकार के अंग, उदर में रीढ़ की हड्डी के दोनों ओर स्थित। रक्त से नाइट्रोजनी वर्ज्य पदार्थों (जैसे यूरिया) को छानकर मूत्र का निर्माण करते हैं।
      • वृक्काणु (Nephron): वृक्क की संरचनात्मक और कार्यात्मक इकाई। प्रत्येक वृक्क में लाखों वृक्काणु होते हैं।
        • संरचना:
          • बोमन सम्पुट (Bowman's Capsule): कप के आकार की संरचना।
          • केशिकागुच्छ (Glomerulus): बोमन सम्पुट में स्थित रक्त केशिकाओं का गुच्छा।
          • नलिकाकार भाग (Tubular Part): लंबा, कुंडलित भाग जो संग्राहक वाहिनी (Collecting duct) में खुलता है।
      • मूत्र निर्माण की क्रियाविधि:
        1. गुच्छीय निस्यंदन (Glomerular Filtration): केशिकागुच्छ में उच्च दाब के कारण रक्त से जल, ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, लवण, यूरिया आदि छनकर बोमन सम्पुट में आ जाते हैं (प्रोटीन और रक्त कोशिकाएँ नहीं छनती)। इसे प्रारंभिक निस्यंद कहते हैं।
        2. चयनात्मक पुनरावशोषण (Selective Reabsorption): जब निस्यंद नलिकाकार भाग से गुजरता है, तो शरीर के लिए उपयोगी पदार्थ जैसे अधिकांश जल, ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, लवण आदि का पुनः अवशोषण करके रक्त में वापस भेज दिया जाता है।
        3. स्रवण (Secretion): कुछ उत्सर्जी पदार्थ (जैसे पोटैशियम आयन, अमोनिया) रक्त से सीधे नलिकाकार भाग में स्रावित किए जाते हैं।
        • नलिकाकार भाग में बचा हुआ तरल मूत्र (Urine) कहलाता है, जिसमें मुख्यतः जल, यूरिया और कुछ लवण होते हैं। मूत्र संग्राहक वाहिनी से मूत्रवाहिनी में, फिर मूत्राशय में एकत्र होता है और अंततः मूत्रमार्ग द्वारा शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है।
      • कृत्रिम वृक्क (अपोहन - Haemodialysis): वृक्क के खराब हो जाने की स्थिति में रक्त से अपशिष्ट पदार्थों को कृत्रिम विधि द्वारा निकालने की प्रक्रिया। इसमें रोगी के रक्त को एक उपकरण (डायलिसिस मशीन) से गुजारा जाता है, जिसमें एक अर्धपारगम्य झिल्ली द्वारा रक्त से यूरिया आदि अपशिष्ट पदार्थ विसरण द्वारा एक डायलिसिस द्रव में चले जाते हैं और शुद्ध रक्त वापस रोगी के शरीर में भेज दिया जाता है।

अभ्यास हेतु बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs):

  1. प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया के लिए आवश्यक कच्ची सामग्री कौन सी नहीं है?
    (a) कार्बन डाइऑक्साइड
    (b) जल
    (c) ऑक्सीजन
    (d) सूर्य का प्रकाश

  2. मानव आमाशय में स्रावित होने वाला अम्ल कौन सा है?
    (a) सल्फ्यूरिक अम्ल
    (b) नाइट्रिक अम्ल
    (c) हाइड्रोक्लोरिक अम्ल
    (d) एसिटिक अम्ल

  3. वसा का इमल्सीकरण (पायसीकरण) किसके द्वारा होता है?
    (a) पेप्सिन
    (b) पित्त रस
    (c) लार एमाइलेज
    (d) ट्रिप्सिन

  4. अवायवीय श्वसन (ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में) यीस्ट में क्या उत्पाद बनाता है?
    (a) लैक्टिक अम्ल + ऊर्जा
    (b) कार्बन डाइऑक्साइड + जल + ऊर्जा
    (c) इथेनॉल + कार्बन डाइऑक्साइड + ऊर्जा
    (d) इथेनॉल + लैक्टिक अम्ल + ऊर्जा

  5. पौधों में जल का परिवहन किस ऊतक द्वारा होता है?
    (a) फ्लोएम
    (b) जाइलम
    (c) विभज्योतक
    (d) स्थूलकोण ऊतक

  6. मानव हृदय में ऑक्सीजनित रक्त किस भाग में सबसे पहले प्रवेश करता है?
    (a) दायाँ अलिंद
    (b) बायाँ अलिंद
    (c) दायाँ निलय
    (d) बायाँ निलय

  7. रक्त का थक्का जमाने में कौन सी कोशिकाएँ सहायक होती हैं?
    (a) लाल रक्त कोशिकाएँ (RBC)
    (b) श्वेत रक्त कोशिकाएँ (WBC)
    (c) प्लेटलेट्स (बिंबाणु)
    (d) प्लाज्मा कोशिकाएँ

  8. वृक्क की कार्यात्मक इकाई क्या कहलाती है?
    (a) न्यूरॉन
    (b) केशिकागुच्छ
    (c) वृक्काणु (नेफ्रॉन)
    (d) संग्राहक वाहिनी

  9. मूत्र निर्माण के दौरान ग्लूकोज जैसे उपयोगी पदार्थों का पुनरावशोषण कहाँ होता है?
    (a) केशिकागुच्छ में
    (b) बोमन सम्पुट में
    (c) वृक्काणु के नलिकाकार भाग में
    (d) मूत्राशय में

  10. सामान्य प्रकुंचन दाब (Systolic pressure) तथा अनुशिथिलन दाब (Diastolic pressure) क्रमशः कितना होता है?
    (a) 120 mm Hg तथा 80 mm Hg
    (b) 80 mm Hg तथा 120 mm Hg
    (c) 100 mm Hg तथा 60 mm Hg
    (d) 140 mm Hg तथा 90 mm Hg

उत्तर:

  1. (c) ऑक्सीजन (यह उत्पाद है, कच्ची सामग्री नहीं)
  2. (c) हाइड्रोक्लोरिक अम्ल
  3. (b) पित्त रस
  4. (c) इथेनॉल + कार्बन डाइऑक्साइड + ऊर्जा
  5. (b) जाइलम
  6. (b) बायाँ अलिंद (फुप्फुस शिरा द्वारा)
  7. (c) प्लेटलेट्स (बिंबाणु)
  8. (c) वृक्काणु (नेफ्रॉन)
  9. (c) वृक्काणु के नलिकाकार भाग में
  10. (a) 120 mm Hg तथा 80 mm Hg

यह अध्याय अत्यंत महत्वपूर्ण है, इसलिए इन नोट्स का अच्छी तरह अध्ययन करें और प्रश्नों का अभ्यास करें। शुभकामनाएँ!

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