Class 10 Social Science Notes Chapter 3 (भारत में राष्ट्रवाद) – Bharat aur Samkalin Vishwa-II Book

Bharat aur Samkalin Vishwa-II
चलिए, आज हम कक्षा 10 के इतिहास की पुस्तक 'भारत और समकालीन विश्व-II' के अध्याय 3, 'भारत में राष्ट्रवाद' का गहराई से अध्ययन करेंगे। यह अध्याय सरकारी परीक्षाओं की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के निर्णायक दौर की घटनाओं और विचारों को समझाया गया है।

अध्याय 3: भारत में राष्ट्रवाद (विस्तृत नोट्स)

परिचय:
भारत में आधुनिक राष्ट्रवाद का उदय कई कारकों का परिणाम था, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण कारक उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलन था। जैसे-जैसे लोगों ने औपनिवेशिक शासन के उत्पीड़न और दमन को साझा रूप से अनुभव किया, उनमें एकता की भावना और राष्ट्र के प्रति अपनेपन का भाव विकसित हुआ। महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने इन समूहों को एकत्रित कर एक विशाल आंदोलन का रूप दिया।

1. प्रथम विश्व युद्ध, खिलाफत और असहयोग आंदोलन

  • प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) का प्रभाव:

    • आर्थिक प्रभाव: युद्ध के कारण रक्षा व्यय में भारी वृद्धि हुई, जिसे पूरा करने के लिए कर्जे लिए गए और करों में वृद्धि की गई। सीमा शुल्क बढ़ा दिया गया और आयकर शुरू किया गया।
    • मूल्य वृद्धि: युद्ध के दौरान कीमतें लगभग दोगुनी हो गईं, जिससे आम लोगों की मुश्किलें बढ़ गईं।
    • जबरन भर्ती: गाँवों में सिपाहियों की जबरन भर्ती से ग्रामीण इलाकों में व्यापक गुस्सा था।
    • महामारी: 1918-19 और 1920-21 में देश के कई हिस्सों में फसलें खराब हो गईं और इन्फ्लूएंजा महामारी फैल गई, जिससे लाखों लोग मारे गए।
    • इन समस्याओं ने लोगों में औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध असंतोष पैदा किया।
  • सत्याग्रह का विचार:

    • गांधीजी का आगमन: महात्मा गांधी जनवरी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में नस्लभेद के खिलाफ 'सत्याग्रह' नामक जन आंदोलन का सफलतापूर्वक प्रयोग किया था।
    • सत्याग्रह का अर्थ: सत्य + आग्रह। यह सत्य की शक्ति पर आग्रह और सत्य की खोज पर आधारित था। इसका अर्थ था कि यदि आपका उद्देश्य सच्चा है और संघर्ष अन्याय के खिलाफ है, तो उत्पीड़क से मुकाबला करने के लिए शारीरिक बल की आवश्यकता नहीं है। अहिंसा के माध्यम से उत्पीड़क की चेतना को झिंझोड़ा जा सकता है।
    • प्रारंभिक सत्याग्रह आंदोलन:
      • चंपारण (बिहार, 1917): दमनकारी बागान व्यवस्था के खिलाफ किसानों को प्रेरित किया।
      • खेड़ा (गुजरात, 1917): फसल खराब हो जाने और प्लेग महामारी के कारण लगान चुकाने में असमर्थ किसानों के लिए लगान में ढील की मांग की।
      • अहमदाबाद (गुजरात, 1918): सूती कपड़ा कारखानों के मजदूरों के लिए आंदोलन।
  • रॉलेट एक्ट (1919):

    • इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल द्वारा भारतीय सदस्यों के विरोध के बावजूद पारित किया गया।
    • इस कानून ने सरकार को राजनीतिक गतिविधियों को कुचलने और राजनीतिक कैदियों को बिना मुकदमा चलाए दो साल तक जेल में बंद रखने का अधिकार दे दिया।
    • गांधीजी ने इसे 'काला कानून' कहा और इसके खिलाफ 6 अप्रैल 1919 को एक राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आह्वान किया। विभिन्न शहरों में रैलियां निकाली गईं, दुकानें बंद हो गईं।
  • जलियाँवाला बाग हत्याकांड (13 अप्रैल 1919):

    • अमृतसर में कई स्थानीय नेताओं को गिरफ्तार किया जा चुका था और गांधीजी के दिल्ली प्रवेश पर पाबंदी थी।
    • 13 अप्रैल को बैसाखी के दिन अमृतसर के जलियाँवाला बाग में लोग सालाना मेले में शिरकत करने और सरकार की दमनकारी नीति का शांतिपूर्ण विरोध करने के लिए जमा हुए थे।
    • जनरल डायर हथियारबंद सैनिकों के साथ वहां पहुंचा, बाहर निकलने के रास्ते बंद कर दिए और भीड़ पर अंधाधुंध गोलियां चलवा दीं। सैकड़ों लोग मारे गए।
    • इस घटना ने पूरे भारत में आक्रोश फैला दिया। लोग सड़कों पर उतर आए, सरकारी इमारतों पर हमले हुए। सरकार ने निर्ममता से आंदोलन को कुचला।
  • खिलाफत आंदोलन:

    • प्रथम विश्व युद्ध में ऑटोमन तुर्की की हार के बाद इस्लामिक विश्व के आध्यात्मिक नेता (खलीफा) पर एक सख्त संधि थोपे जाने की अफवाहें थीं।
    • खलीफा की तात्कालिक शक्तियों की रक्षा के लिए बंबई में मार्च 1919 में एक खिलाफत समिति का गठन किया गया। मुहम्मद अली और शौकत अली (अली बंधु) इसके प्रमुख नेता थे।
    • गांधीजी ने इसे हिन्दू-मुसलमानों को एकजुट करने का एक अवसर माना। सितंबर 1920 में कलकत्ता में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में उन्होंने खिलाफत के समर्थन और स्वराज के लिए एक असहयोग आंदोलन शुरू करने का प्रस्ताव रखा।
  • असहयोग ही क्यों?

    • गांधीजी का मानना था (जैसा उन्होंने अपनी पुस्तक 'हिंद स्वराज' (1909) में लिखा था) कि भारत में ब्रिटिश शासन भारतीयों के सहयोग से ही स्थापित हुआ था और इसी सहयोग के कारण चल पा रहा है।
    • यदि भारत के लोग अपना सहयोग वापस ले लें, तो साल भर के भीतर ब्रिटिश शासन ढह जाएगा और स्वराज की स्थापना हो जाएगी।
    • कार्यक्रम: सरकारी उपाधियों को लौटाना, सरकारी नौकरियों, सेना, पुलिस, अदालतों, विधायी परिषदों, स्कूलों और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना। व्यापक सविनय अवज्ञा भी प्रस्तावित थी।
    • स्वीकृति: दिसंबर 1920 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में असहयोग कार्यक्रम पर मुहर लगा दी गई।
  • आंदोलन के भीतर अलग-अलग धाराएँ:

    • शहरों में: आंदोलन की शुरुआत मध्य वर्ग की हिस्सेदारी के साथ हुई। हजारों विद्यार्थियों ने स्कूल-कॉलेज छोड़े, शिक्षकों और वकीलों ने इस्तीफे दिए। विदेशी सामानों का बहिष्कार किया गया, शराब की दुकानों की पिकेटिंग हुई, विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई। खादी का प्रयोग बढ़ा। हालांकि, वैकल्पिक भारतीय संस्थानों की कमी और खादी के महंगे होने के कारण आंदोलन धीमा पड़ गया।
    • ग्रामीण इलाकों में:
      • अवध: बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में किसानों ने तालुकदारों और जमींदारों के खिलाफ आंदोलन किया जो भारी लगान और बेगार करवाते थे। कांग्रेस ने उनके आंदोलन को अपने व्यापक संघर्ष में शामिल करने का प्रयास किया।
      • आंध्र प्रदेश की गुडेम पहाड़ियाँ: अल्लूरी सीताराम राजू के नेतृत्व में आदिवासियों ने हिंसक गुरिल्ला आंदोलन छेड़ा। वे बड़े वन क्षेत्रों को बंद करने और आदिवासियों को उनके पारंपरिक अधिकारों (मवेशी चराने, जलावन लकड़ी व फल बीनने) से वंचित करने वाले वन कानूनों से नाराज थे। राजू गांधीजी के प्रशंसक थे लेकिन मानते थे कि स्वराज केवल बल प्रयोग से ही हासिल हो सकता है।
      • बागानों में स्वराज: असम के बागान मजदूरों के लिए स्वराज का मतलब था चारदीवारी से बाहर निकलना और अपने गाँवों से संपर्क रख पाना। 1859 के इंग्लैंड इमिग्रेशन एक्ट के तहत उन्हें बिना इजाजत बागान छोड़ने की छूट नहीं थी। असहयोग आंदोलन के बारे में सुनकर वे बागानों से भाग निकले, लेकिन पकड़े गए और बुरी तरह पीटे गए।
  • आंदोलन की वापसी (चौरी चौरा कांड):

    • फरवरी 1922 में गोरखपुर जिले के चौरी चौरा नामक स्थान पर एक शांतिपूर्ण जुलूस हिंसक हो गया और प्रदर्शनकारियों ने एक पुलिस थाने में आग लगा दी, जिसमें कई पुलिसकर्मी मारे गए।
    • गांधीजी हिंसा के सख्त खिलाफ थे। उन्हें लगा कि आंदोलन हिंसक हो रहा है और सत्याग्रहियों को व्यापक प्रशिक्षण की जरूरत है। अतः उन्होंने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया।

2. सविनय अवज्ञा आंदोलन की ओर

  • स्वराज पार्टी का गठन:

    • असहयोग आंदोलन की वापसी से कुछ कांग्रेसी नेता निराश थे। सी. आर. दास और मोतीलाल नेहरू जैसे नेताओं ने तर्क दिया कि परिषदों के चुनावों में हिस्सा लेकर परिषदों के भीतर सरकारी नीतियों का विरोध करना चाहिए।
    • उन्होंने कांग्रेस के भीतर ही 'स्वराज पार्टी' का गठन किया।
    • जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस जैसे युवा नेता अधिक उग्र जन आंदोलन और पूर्ण स्वतंत्रता के पक्ष में थे।
  • साइमन कमीशन (1928):

    • ब्रिटेन की टोरी सरकार ने भारत में संवैधानिक व्यवस्था की कार्यशैली का अध्ययन करने और सुझाव देने के लिए सर जॉन साइमन के नेतृत्व में एक आयोग का गठन किया।
    • इस आयोग में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था, जिससे भारतीयों में भारी रोष उत्पन्न हुआ।
    • जब कमीशन भारत पहुंचा तो उसका स्वागत 'साइमन वापस जाओ' (Simon Go Back) के नारों और प्रदर्शनों से हुआ। कांग्रेस और मुस्लिम लीग सहित सभी पार्टियों ने प्रदर्शनों में हिस्सा लिया।
  • पूर्ण स्वराज की मांग (लाहौर अधिवेशन, दिसंबर 1929):

    • वायसराय लॉर्ड इरविन ने अक्टूबर 1929 में भारत के लिए 'डोमिनियन स्टेटस' का गोलमोल सा ऐलान किया, लेकिन कोई समय-सीमा नहीं बताई।
    • दिसंबर 1929 में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन हुआ।
    • इस अधिवेशन में 'पूर्ण स्वराज' (पूर्ण स्वतंत्रता) का प्रस्ताव पारित किया गया।
    • तय किया गया कि 26 जनवरी 1930 को 'स्वतंत्रता दिवस' के रूप में मनाया जाएगा और उस दिन लोग पूर्ण स्वराज के लिए संघर्ष की शपथ लेंगे।
  • नमक यात्रा और सविनय अवज्ञा आंदोलन:

    • गांधीजी की 11 सूत्री मांग: गांधीजी ने 31 जनवरी 1930 को वायसराय इरविन को एक पत्र लिखा जिसमें 11 मांगें थीं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण मांग नमक कर को खत्म करने की थी। नमक अमीर-गरीब सभी इस्तेमाल करते थे और यह भोजन का अभिन्न हिस्सा था। नमक पर कर को ब्रिटिश शासन का सबसे दमनकारी पहलू माना गया।
    • दांडी यात्रा (नमक मार्च): इरविन के झुकने को तैयार न होने पर गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का निर्णय लिया। उन्होंने अपने 78 विश्वस्त स्वयंसेवकों के साथ साबरमती आश्रम से गुजरात के तटीय कस्बे दांडी तक की प्रसिद्ध नमक यात्रा शुरू की (12 मार्च 1930)। 240 मील की दूरी 24 दिनों में तय की गई। 6 अप्रैल 1930 को वे दांडी पहुंचे और समुद्र का पानी उबालकर नमक बनाकर ब्रिटिश कानून तोड़ा।
    • आंदोलन का प्रसार: यहीं से सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ। देश के विभिन्न भागों में हजारों लोगों ने नमक कानून तोड़ा। विदेशी कपड़ों का बहिष्कार किया गया, शराब की दुकानों की पिकेटिंग हुई, किसानों ने लगान और चौकीदारी कर चुकाने से इनकार कर दिया, गाँवों में तैनात सरकारी कर्मचारी इस्तीफे देने लगे, वन कानूनों का उल्लंघन हुआ।
    • सरकारी दमन: सरकार ने आंदोलन को निर्ममता से कुचलना शुरू किया। नेताओं को गिरफ्तार किया गया। शांतिपूर्ण सत्याग्रहियों पर हमले हुए, महिलाओं व बच्चों को पीटा गया और लगभग एक लाख लोग गिरफ्तार किए गए।
    • गांधी-इरविन समझौता (5 मार्च 1931): हिंसक टकरावों के बीच गांधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया और वायसराय इरविन के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसके तहत गांधीजी लंदन में होने वाले दूसरे गोलमेज सम्मेलन में हिस्सा लेने पर सहमत हुए और सरकार राजनीतिक कैदियों को रिहा करने पर राजी हुई।
    • दूसरे गोलमेज सम्मेलन की विफलता और आंदोलन पुनः प्रारंभ: दिसंबर 1931 में गांधीजी लंदन गए, लेकिन वार्ता विफल रही और उन्हें निराश लौटना पड़ा। भारत आकर उन्होंने देखा कि सरकार ने नया दमन चक्र शुरू कर दिया है। अतः उन्होंने सविनय अवज्ञा आंदोलन दोबारा शुरू कर दिया, लेकिन 1934 तक आते-आते आंदोलन की गति मंद पड़ गई।
  • आंदोलन में विभिन्न सामाजिक समूहों की हिस्सेदारी:

    • संपन्न किसान समुदाय: (जैसे गुजरात के पाटीदार, उत्तर प्रदेश के जाट) व्यापारिक फसलों की खेती करने के कारण कीमतों में गिरावट और नकदी आय खत्म होने से परेशान थे। सरकारी लगान घटाने से इनकार करने पर वे सविनय अवज्ञा आंदोलन के उत्साही समर्थक बने। जब 1931 में लगान घटाए बिना आंदोलन वापस ले लिया गया तो वे निराश हुए।
    • गरीब किसान: वे केवल लगान में कमी नहीं चाहते थे, बल्कि जमींदारों को जो भाड़ा चुकाना था, उसे भी माफ करवाना चाहते थे। कांग्रेस भाड़ा विरोधी आंदोलनों को समर्थन देने में हिचकिचाती थी, क्योंकि इससे अमीर किसान और जमींदार नाराज हो सकते थे।
    • व्यवसायी वर्ग: पहले विश्व युद्ध के दौरान भारी मुनाफा कमाने वाले भारतीय व्यापारी और उद्योगपति औपनिवेशिक नीतियों के विरुद्ध थे जो उनके व्यावसायिक हितों में बाधक थीं। वे विदेशी वस्तुओं के आयात से सुरक्षा चाहते थे। उन्होंने आंदोलन को आर्थिक सहायता दी और आयातित वस्तुओं को खरीदने या बेचने से इनकार कर दिया। (जैसे पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास, जी.डी. बिड़ला)। गोलमेज सम्मेलन की विफलता और उग्र गतिविधियों के भय से उनका उत्साह मंद पड़ गया।
    • औद्योगिक श्रमिक वर्ग: श्रमिकों की भागीदारी सीमित थी (नागपुर क्षेत्र को छोड़कर)। उद्योगपतियों के कांग्रेस के नजदीक आने के कारण मजदूर कांग्रेस से दूर रहे। फिर भी कुछ मजदूरों ने आंदोलन में हिस्सा लिया, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया और कम वेतन व खराब कार्यस्थितियों के खिलाफ अपनी लड़ाई को स्वराज की लड़ाई से जोड़ा।
    • महिलाएँ: सविनय अवज्ञा आंदोलन में औरतों ने बड़े पैमाने पर हिस्सा लिया। गांधीजी की नमक यात्रा के दौरान हजारों औरतें उनकी बात सुनने के लिए घर से बाहर आती थीं। उन्होंने जुलूसों में हिस्सा लिया, नमक बनाया, विदेशी कपड़ों व शराब की दुकानों की पिकेटिंग की, और जेल भी गईं। हालांकि, कांग्रेस संगठन में उन्हें प्रतीकात्मक उपस्थिति से आगे बढ़कर किसी महत्वपूर्ण पद पर लाने में हिचकिचाती थी।
  • सविनय अवज्ञा की सीमाएँ:

    • 'अछूतों' (दलितों) की भागीदारी: लंबे समय तक कांग्रेस ने दलितों पर ध्यान नहीं दिया था, क्योंकि वह रूढ़िवादी सवर्ण हिंदुओं की नाराजगी से डरती थी। गांधीजी ने घोषणा की कि अस्पृश्यता (छुआछूत) खत्म किए बिना सौ साल तक भी स्वराज की स्थापना नहीं हो सकती। उन्होंने अछूतों को 'हरिजन' (ईश्वर की संतान) नाम दिया, उनके मंदिरों में प्रवेश, सार्वजनिक तालाबों, सड़कों और कुओं पर समान अधिकार दिलाने के लिए सत्याग्रह किया। मैला ढोने वालों के काम को प्रतिष्ठा दिलाने के लिए वे स्वयं शौचालय साफ करने लगे।
    • डॉ. अंबेडकर और पूना पैक्ट: डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने दलितों को संगठित किया और उनके लिए अलग निर्वाचन क्षेत्रों की मांग की। उनका मानना था कि सामाजिक अपंगता केवल राजनीतिक सशक्तीकरण से ही दूर हो सकती है। दूसरे गोलमेज सम्मेलन में गांधीजी के साथ उनका विवाद हुआ। ब्रिटिश सरकार ने अंबेडकर की मांग मान ली। गांधीजी आमरण अनशन पर बैठ गए क्योंकि उन्हें भय था कि अलग निर्वाचन क्षेत्रों से समाज के एकीकरण की प्रक्रिया धीमी पड़ जाएगी। अंततः अंबेडकर ने गांधीजी की बात मानी और सितंबर 1932 में 'पूना पैक्ट' पर हस्ताक्षर हुए। इसके तहत दलित वर्गों (जिन्हें बाद में अनुसूचित जाति कहा गया) को प्रांतीय एवं केंद्रीय विधायी परिषदों में आरक्षित सीटें मिलीं, लेकिन उनके लिए मतदान सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में ही होना था।
    • मुस्लिम राजनीतिक संगठनों का अलगाव: असहयोग-खिलाफत आंदोलन के शांत पड़ने के बाद मुसलमानों का एक बड़ा तबका कांग्रेस से कटा हुआ महसूस करने लगा। 1920 के दशक के मध्य से कांग्रेस, हिंदू महासभा जैसे हिंदू धार्मिक राष्ट्रवादी संगठनों के करीब दिखने लगी, जिससे दोनों समुदायों के बीच संबंध खराब हुए। मुहम्मद अली जिन्ना (मुस्लिम लीग के नेता) पृथक निर्वाचिका की मांग छोड़ने को तैयार थे यदि मुसलमानों को केंद्रीय सभा में आरक्षित सीटें दी जाएं और मुस्लिम बहुल प्रांतों (बंगाल, पंजाब) में आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिया जाए। 1928 में आयोजित सर्वदलीय सम्मेलन में हिंदू महासभा के एम.आर. जयकर ने इस समझौते का खुले तौर पर विरोध किया, जिससे यह प्रयास विफल हो गया। सविनय अवज्ञा आंदोलन के शुरू होने पर मुस्लिम समुदाय का एक बड़ा हिस्सा इसमें शामिल नहीं हुआ।

3. सामूहिक अपनेपन का भाव

राष्ट्रवाद की भावना तब पनपती है जब लोग यह महसूस करने लगते हैं कि वे एक ही राष्ट्र के अंग हैं और कोई बात उन्हें एकता के सूत्र में बांधती है। यह भावना आंशिक रूप से संयुक्त संघर्षों के चलते पैदा हुई, लेकिन साथ ही कई सांस्कृतिक प्रक्रियाओं ने भी इसमें योगदान दिया:

  • इतिहास और साहित्य, लोककथाएँ और गीत, चित्र और प्रतीक: इन सबने राष्ट्रवाद को साकार करने में अपना योगदान दिया।
  • भारत माता की छवि: राष्ट्र की पहचान सबसे ज्यादा किसी तस्वीर में अंकित की जाती है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक में मातृभूमि की स्तुति के रूप में 'वंदे मातरम' गीत लिखा (जो बाद में उनके उपन्यास 'आनंदमठ' में शामिल हुआ)। अवनींद्रनाथ टैगोर ने भारत माता की प्रसिद्ध छवि को चित्रित किया जिसमें उन्हें एक संन्यासिनी के रूप में दर्शाया गया - शांत, गंभीर, दैवी और आध्यात्मिक गुणों से युक्त।
  • लोककथाएँ: राष्ट्रवादियों ने भाटों और चारणों द्वारा गाई जाने वाली लोककथाओं को दर्ज करना शुरू किया। उनका मानना था कि यही कथाएँ परंपरागत संस्कृति की सही तस्वीर पेश करती हैं जो बाहरी ताकतों के प्रभाव से भ्रष्ट हो चुकी है। अपनी राष्ट्रीय पहचान को ढूँढने और अतीत में गौरव का भाव पैदा करने के लिए यह आवश्यक था।
  • राष्ट्रीय ध्वज: स्वदेशी आंदोलन (बंगाल) के दौरान एक तिरंगा झंडा (हरा, पीला, लाल) तैयार किया गया। 1921 तक गांधीजी ने भी स्वराज का झंडा (सफेद, हरा, लाल) तैयार कर लिया था जिसके मध्य में चरखे को स्थान दिया गया था, जो स्वावलंबन का प्रतीक था। जुलूसों में यह झंडा थामना शासन के प्रति अवज्ञा का संकेत था।
  • इतिहास की पुनर्व्याख्या: बहुत से भारतीय महसूस करने लगे थे कि राष्ट्र के प्रति गर्व का भाव जगाने के लिए भारतीय इतिहास को अलग ढंग से पढ़ाया जाना चाहिए। अंग्रेज भारतीय इतिहास को पिछड़ा हुआ, आदिम और अपना शासन स्वयं न चला सकने वाला मानते थे। इसके जवाब में भारतीयों ने भारत के गौरवमयी अतीत की खोज शुरू की, जब कला, वास्तुकला, विज्ञान, गणित, धर्म, संस्कृति, कानून, दर्शन, हस्तकला और व्यापार फल-फूल रहे थे। इस गौरवमयी अतीत में महानता का भाव और ब्रिटिश शासन के तहत दुर्दशा से मुक्ति के लिए संघर्ष का संकल्प निहित था।

निष्कर्ष:
अंग्रेजी शासन के खिलाफ बढ़ता गुस्सा विभिन्न भारतीय समूहों और वर्गों को स्वतंत्रता के साझा संघर्ष में खींच रहा था। महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने लोगों के असंतोष और परेशानियों को संगठित करके एक विशाल आंदोलन खड़ा किया। इन आंदोलनों के माध्यम से लोगों में राष्ट्रीय एकता की चेतना और अपनेपन का भाव विकसित हुआ, जिसने अंततः भारत की स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया।


अभ्यास हेतु बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs):

  1. महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत कब लौटे?
    (क) जनवरी 1914
    (ख) जनवरी 1915
    (ग) मार्च 1916
    (घ) अप्रैल 1917
    उत्तर: (ख) जनवरी 1915

  2. रॉलेट एक्ट किस वर्ष पारित किया गया?
    (क) 1918
    (ख) 1919
    (ग) 1920
    (घ) 1921
    उत्तर: (ख) 1919

  3. जलियाँवाला बाग हत्याकांड की घटना कहाँ हुई थी?
    (क) लाहौर
    (ख) दिल्ली
    (ग) अमृतसर
    (घ) कलकत्ता
    उत्तर: (ग) अमृतसर

  4. असहयोग आंदोलन किस घटना के कारण स्थगित किया गया?
    (क) जलियाँवाला बाग हत्याकांड
    (ख) साइमन कमीशन का विरोध
    (ग) चौरी चौरा कांड
    (घ) गांधी-इरविन समझौता
    उत्तर: (ग) चौरी चौरा कांड

  5. 'हिंद स्वराज' नामक पुस्तक किसने लिखी?
    (क) जवाहरलाल नेहरू
    (ख) सरदार पटेल
    (ग) महात्मा गांधी
    (घ) सुभाष चंद्र बोस
    उत्तर: (ग) महात्मा गांधी

  6. दिसंबर 1929 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन की अध्यक्षता किसने की थी?
    (क) मोतीलाल नेहरू
    (ख) महात्मा गांधी
    (ग) जवाहरलाल नेहरू
    (घ) सी. आर. दास
    उत्तर: (ग) जवाहरलाल नेहरू

  7. सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत किस ऐतिहासिक घटना से हुई?
    (क) रॉलेट एक्ट का विरोध
    (ख) दांडी यात्रा (नमक मार्च)
    (ग) साइमन कमीशन का आगमन
    (घ) चौरी चौरा कांड
    उत्तर: (ख) दांडी यात्रा (नमक मार्च)

  8. दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्रों की मांग किसने की थी?
    (क) महात्मा गांधी
    (ख) जवाहरलाल नेहरू
    (ग) डॉ. बी. आर. अंबेडकर
    (घ) सरदार पटेल
    उत्तर: (ग) डॉ. बी. आर. अंबेडकर

  9. 'पूना पैक्ट' किनके बीच हुआ था?
    (क) गांधीजी और लॉर्ड इरविन
    (ख) गांधीजी और मुहम्मद अली जिन्ना
    (ग) गांधीजी और डॉ. बी. आर. अंबेडकर
    (घ) नेहरू और जिन्ना
    उत्तर: (ग) गांधीजी और डॉ. बी. आर. अंबेडकर

  10. भारत माता की पहली छवि किसने बनाई थी?
    (क) रबींद्रनाथ टैगोर
    (ख) बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय
    (ग) अवनींद्रनाथ टैगोर
    (घ) राजा रवि वर्मा
    उत्तर: (ग) अवनींद्रनाथ टैगोर (ध्यान दें: बंकिमचंद्र ने 'वंदे मातरम' लिखा, छवि अवनींद्रनाथ ने बनाई)

मुझे उम्मीद है कि ये नोट्स और प्रश्न आपकी परीक्षा की तैयारी में सहायक होंगे। इस अध्याय को अच्छी तरह समझें क्योंकि यह आधुनिक भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। कोई और प्रश्न हो तो अवश्य पूछें।

Read more