Class 10 Social Science Notes Chapter 5 (औद्योगीकरण का युग) – Bharat aur Samkalin Vishwa-II Book

चलिए, आज हम कक्षा 10 के इतिहास की किताब 'भारत और समकालीन विश्व-II' के अध्याय 5, 'औद्योगीकरण का युग' पर विस्तार से चर्चा करेंगे। यह अध्याय सरकारी परीक्षाओं की दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें औद्योगिक क्रांति के विभिन्न पहलुओं, विशेषकर ब्रिटेन और भारत के संदर्भ में, को समझाया गया है।
अध्याय 5: औद्योगीकरण का युग - विस्तृत नोट्स (सरकारी परीक्षा हेतु)
1. औद्योगीकरण से पहले का दौर (आदि-औद्योगीकरण - Proto-industrialisation):
- परिभाषा: इंग्लैंड और यूरोप में फैक्ट्रियों की स्थापना से भी पहले, अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार के लिए बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन होने लगा था। यह उत्पादन फैक्ट्रियों में न होकर गाँवों में कारीगरों द्वारा किया जाता था। इतिहासकार उत्पादन की इस अवस्था को 'आदि-औद्योगीकरण' कहते हैं।
- प्रक्रिया:
- शहरों में स्थित व्यापारी (सौदागर) गाँवों की ओर रुख करते थे।
- वे किसानों और कारीगरों को पेशगी रकम देते थे और उनसे अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार के लिए उत्पाद बनवाते थे।
- शहरों में ट्रेड गिल्ड्स (व्यापारिक और उत्पादक संगठन) बहुत शक्तिशाली थे, जो नए व्यापारियों को शहरों में कारोबार करने से रोकते थे। इसलिए व्यापारी गाँवों की ओर गए।
- गाँवों में गरीब किसान और कारीगर सौदागरों के लिए काम करने को तैयार हो जाते थे क्योंकि इससे उन्हें खेती के साथ-साथ अतिरिक्त आय का स्रोत मिल जाता था।
- यह व्यवस्था एक ऐसे नेटवर्क का हिस्सा थी जिसे सौदागर नियंत्रित करते थे। माल का उत्पादन कारीगरों के घरों पर होता था, फिर उसे इकट्ठा करके शहरों में लाया जाता था और वहाँ से निर्यात किया जाता था।
- नियंत्रण: उत्पादन प्रक्रिया पर सौदागरों का नियंत्रण रहता था। वे ही बताते थे कि क्या बनाना है और किस गुणवत्ता का बनाना है।
2. कारखानों का उदय:
- प्रारंभिक कारखाने: इंग्लैंड में सबसे पहले 1730 के दशक में कारखाने खुले, लेकिन उनकी संख्या में तेज़ी से वृद्धि 18वीं सदी के अंत में हुई।
- कपास उद्योग: कपास (कॉटन) नए युग का पहला प्रतीक था। 19वीं सदी के आखिर में कपास उत्पादन में भारी बढ़ोतरी हुई।
- आविष्कार:
- रिचर्ड आर्कराइट: इन्होंने सूती कपड़ा मिल की रूपरेखा सामने रखी।
- जेम्स वॉट: इन्होंने न्यूकॉमेन द्वारा बनाए गए भाप के इंजन में सुधार किए और 1781 में इसे पेटेंट कराया।
- मैथ्यू बोल्टन: जेम्स वॉट के उद्योगपति मित्र, जिन्होंने मिलकर भाप के इंजनों का उत्पादन शुरू किया।
- कारखाना व्यवस्था का लाभ:
- श्रमिकों की निगरानी और उनसे काम लेना आसान हो गया।
- उत्पादन प्रक्रिया और गुणवत्ता पर नियंत्रण रखना संभव हुआ।
- एक ही छत के नीचे सारा काम होने से प्रबंधन सरल हुआ।
3. औद्योगिक परिवर्तन की रफ़्तार:
- धीमी प्रक्रिया: औद्योगीकरण का मतलब केवल फैक्ट्री उद्योगों का विकास नहीं था। यह प्रक्रिया उतनी तेज़ नहीं थी जितनी लगती है।
- औद्योगिक क्रांति के दौरान भी सबसे गतिशील उद्योग कपास (सूती वस्त्र) और धातु उद्योग (लोहा और इस्पात) ही थे।
- नए उद्योग पारंपरिक उद्योगों को आसानी से हाशिये पर नहीं धकेल सके। 19वीं सदी के अंत तक भी तकनीकी रूप से उन्नत औद्योगिक क्षेत्रों में काम करने वाले मज़दूरों की संख्या कुल मज़दूरों के 20% से ज़्यादा नहीं थी।
- कपड़ा उद्योग एक गतिशील क्षेत्र था, लेकिन उसका एक बड़ा हिस्सा कारखानों में नहीं, बल्कि घरेलू इकाइयों में ही संगठित था।
- पारंपरिक उद्योगों का महत्व: गैर-मशीनी क्षेत्रों के बहुत सारे उद्योग, जैसे - खाद्य प्रसंस्करण, भवन निर्माण, मिट्टी के बर्तन, काँच का काम, चमड़े का काम आदि, में साधारण और छोटे अविष्कारों का ही योगदान था, विशाल कारखानों का नहीं।
- प्रौद्योगिकी का धीमा प्रसार: तकनीकी बदलावों की गति धीमी थी। नई मशीनें महंगी थीं, व्यापारी और उद्योगपति उनके इस्तेमाल को लेकर सतर्क रहते थे। मशीनों की मरम्मत भी एक बड़ी समस्या थी। उदाहरण: भाप का इंजन काफी समय तक उतना प्रभावी नहीं था जितना माना जाता था।
- मानव श्रम की बहुतायत: विक्टोरिया कालीन ब्रिटेन में मानव श्रम की कोई कमी नहीं थी। इसलिए उद्योगपतियों को श्रमिकों की कमी या वेतन के मद में भारी लागत जैसी कोई परेशानी नहीं थी। वे मशीनों में पूँजी लगाने की बजाय मज़दूरों से ही काम चलाना पसंद करते थे। कई उद्योगों में श्रमिकों की माँग मौसमी आधार पर घटती-बढ़ती रहती थी (जैसे गैस घर, शराबखाने, बंदरगाह, जिल्दसाज़ी)। इन सब उद्योगों में उद्योगपति मशीनों की बजाय मज़दूरों को ही काम पर रखना बेहतर समझते थे।
4. मज़दूरों की ज़िंदगी:
- रोज़गार की अनिश्चितता: बाज़ार में श्रम की बहुतायत से मज़दूरों का जीवन प्रभावित हुआ। काम मिलने की संभावना यारी-दोस्ती और रिश्तेदारी पर निर्भर करती थी। जिसे 'नेटवर्किंग' कहा जा सकता है।
- नौकरी की तलाश: नौकरी चाहने वालों को हफ़्तों इंतज़ार करना पड़ता था। वे पुलों के नीचे या रैन बसेरों में रातें काटते थे।
- मौसमी काम: बहुत सारे उद्योगों में काम मौसमी था, जिससे मज़दूरों को साल के बाकी समय बेरोज़गार रहना पड़ता था।
- कम मज़दूरी और बेरोज़गारी: 19वीं सदी की शुरुआत में मज़दूरी कुछ बेहतर हुई, लेकिन औसत आय से मज़दूरों की दशा का पता नहीं चलता। मंदी के दौर में बेरोज़गारी बढ़ जाती थी। नेपोलियन युद्धों के बाद बेरोज़गारी में भारी इज़ाफ़ा हुआ।
- प्रौद्योगिकी का भय: मज़दूर नई प्रौद्योगिकी से चिढ़ते थे क्योंकि उससे उनका रोज़गार छिनने का खतरा रहता था। उदाहरण: ऊन उद्योग में स्पिनिंग जेनी (Spinning Jenny) मशीन के आने पर मज़दूरों (खासकर महिलाओं) ने हमले किए क्योंकि यह एक साथ कई धागे कात सकती थी और इससे कताई करने वाली महिलाओं का काम छिन गया था।
5. उपनिवेशों में औद्योगीकरण (भारत का संदर्भ):
- भारतीय कपड़े का युग (औपनिवेशिक शासन से पहले):
- मशीन उद्योगों के युग से पहले, अंतर्राष्ट्रीय कपड़ा बाज़ार में भारत के रेशमी और सूती उत्पादों का दबदबा था।
- बारीक किस्म का कपास भारत में पैदा होता था।
- अर्मेनियन और फ़ारसी सौदागर पंजाब से अफ़गानिस्तान, पूर्वी फ़ारस और मध्य एशिया के रास्ते चीज़ें ले जाते थे।
- सूरत (गुजरात), मसूलीपट्टनम (कोरोमंडल तट) और हुगली (बंगाल) महत्वपूर्ण बंदरगाह थे जहाँ से व्यापार चलता था।
- इस व्यापार नेटवर्क में भारतीय व्यापारी और बैंकर सक्रिय थे। वे उत्पादन में पैसा लगाते, चीज़ों को लेकर जाते और निर्यातकों को पहुँचाते थे।
- यूरोपीय कंपनियों का आगमन और भारतीय व्यापार पर प्रभाव:
- यूरोपीय कंपनियों ने धीरे-धीरे स्थानीय दरबारों से व्यापारिक रियायतें हासिल कीं और फिर व्यापार पर इजारेदारी (monopoly) अधिकार प्राप्त कर लिए।
- इससे सूरत और हुगली जैसे पुराने बंदरगाह कमज़ोर पड़ गए।
- नये बंदरगाहों (जैसे बंबई और कलकत्ता) का महत्व बढ़ा, जो ब्रिटिश नियंत्रण में थे। पुराने व्यापारिक घराने ढह गए।
- बुनकरों का क्या हुआ?
- ईस्ट इंडिया कंपनी ने सत्ता स्थापित करने के बाद कपड़ा व्यापार पर एकाधिकार स्थापित करने का प्रयास किया।
- कंपनी ने बुनकरों पर सीधा नियंत्रण स्थापित करने के लिए गुमाश्ता (वेतनभोगी कर्मचारी) नियुक्त किए। इनका काम बुनकरों पर निगरानी रखना, माल इकट्ठा करना और कपड़ों की गुणवत्ता जाँचना था।
- कंपनी बुनकरों को पेशगी (कर्ज़) देती थी ताकि वे किसी और व्यापारी के लिए काम न कर सकें।
- इससे बुनकरों और गुमाश्तों के बीच टकराव होने लगे। गुमाश्ते बाहर के लोग होते थे, दंभपूर्ण व्यवहार करते थे, सिपाहियों और चपरासियों को लेकर आते थे तथा माल समय पर तैयार न होने पर सज़ा देते थे (पीटते थे)।
- बुनकर अब मोल-भाव नहीं कर सकते थे और न ही किसी और को अपना माल बेच सकते थे। उन्हें कंपनी द्वारा तय कीमत ही मिलती थी, जो बहुत कम होती थी।
- कई बुनकरों ने कर्ज़ लौटाकर गाँव छोड़ दिया या खेतीहर मज़दूर बन गए।
- भारत में मैनचेस्टर का आना:
- 19वीं सदी में ब्रिटेन में सूती वस्त्र उद्योग के विकास के साथ, वहाँ के उद्योगपति सरकार पर दबाव डालने लगे कि वह भारतीय कपड़ों को ब्रिटेन में आने से रोके और ब्रिटिश कपड़ों को भारतीय बाज़ारों में बेचे।
- इंग्लैंड में बने सूती उत्पादों ने 19वीं सदी की शुरुआत तक भारतीय कपड़ा निर्यात की जगह ले ली।
- 1850 के दशक तक, भारत में आयातित सूती माल का मूल्य, भारत से होने वाले सभी निर्यातों के मूल्य से अधिक हो गया था।
- समस्याएँ:
- भारतीय बुनकरों का निर्यात बाज़ार ढह गया।
- स्थानीय बाज़ार भी मैनचेस्टर के आयातित, सस्ते, मशीन-निर्मित माल से पट गया।
- अच्छी कपास (कच्चा माल) की कमी हो गई क्योंकि अमेरिका में गृह युद्ध के कारण ब्रिटेन भारत से कच्चा कपास भारी मात्रा में मंगाने लगा, जिससे भारत में कच्चे कपास की कीमतें बढ़ गईं।
- कारखानों के आने से बुनकरों का उत्पादन और उनकी आय और भी कम हो गई।
6. भारत में फैक्ट्रियों का आना:
- प्रारंभिक उद्यमी:
- बंबई: पहली सूती कपड़ा मिल 1854 में लगी।
- बंगाल: पहली जूट मिल 1855 में रिसड़ा में लगी।
- कानपुर: 1860 के दशक में एल्गिन मिल शुरू हुई।
- अहमदाबाद: 1861 में पहली कपड़ा मिल खुली।
- मद्रास: पहली कताई और बुनाई मिल 1874 में खुली।
- शुरुआती उद्यमी कौन थे?
- ये वो लोग थे जिन्होंने चीन के साथ व्यापार (मुख्यतः अफ़ीम) के माध्यम से पैसा कमाया था।
- बंगाल: द्वारकानाथ टैगोर।
- बंबई: दिनशॉ पेटिट, जमशेदजी नुसरवानजी टाटा (जिन्होंने बाद में जमशेदपुर में भारत का पहला लौह एवं इस्पात संयंत्र - TISCO स्थापित किया)।
- सेठ हुकुमचंद: मारवाड़ी व्यवसायी, जिन्होंने कलकत्ता में पहली भारतीय जूट मिल (1917) लगाई।
- अन्य व्यापारिक पृष्ठभूमि से आने वाले लोग भी थे।
- औपनिवेशिक नियंत्रण की बाधाएँ: भारतीय व्यापारियों के लिए औद्योगिक क्षेत्र में आगे बढ़ना आसान नहीं था। उन्हें यूरोपीय प्रबंधकीय एजेंसियों (European Managing Agencies) से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती थी, जिनका दबदबा था। ये एजेंसियाँ वित्त जुटाती थीं और संयुक्त उद्यम कंपनियाँ लगाती थीं। ज़्यादातर मामलों में भारतीय फाइनेंसर केवल पूँजी उपलब्ध कराते थे जबकि निवेश और व्यवसाय संबंधी फ़ैसले यूरोपीय एजेंसियाँ ही लेती थीं।
7. मज़दूर कहाँ से आए?
- ज़्यादातर औद्योगिक मज़दूर आस-पास के ज़िलों से आते थे। जिन किसानों और कारीगरों को गाँव में काम नहीं मिलता था, वे औद्योगिक केंद्रों की तरफ़ जाने लगते थे।
- उदाहरण: बंबई सूती कपड़ा मिलों में काम करने वाले ज़्यादातर मज़दूर पास के रत्नागिरी ज़िले से आते थे। कानपुर की मिलों में काम करने वाले ज़्यादातर मज़दूर कानपुर ज़िले के ही गाँवों से आते थे।
- जॉबर (Jobber): उद्योगपतियों ने मज़दूरों की भर्ती के लिए 'जॉबर' रखे। यह कोई पुराना और विश्वस्त कर्मचारी होता था।
- वह अपने गाँव से लोगों को लाता था, उन्हें काम का भरोसा देता था, शहर में जमने के लिए मदद करता था और ज़रूरत पर पैसा भी देता था।
- जॉबर एक ताक़तवर और मज़बूत व्यक्ति बन गया। वह मदद के बदले पैसे व तोहफ़े माँगने लगा और मज़दूरों के जीवन पर नियंत्रण रखने लगा।
8. औद्योगिक विकास का अनूठापन:
- यूरोपीय एजेंसियों का दबदबा: भारत में औद्योगिक उत्पादन पर यूरोपीय प्रबंधकीय एजेंसियों का दबदबा था। ये चाय-कॉफ़ी के बागान, खनन, नील व जूट व्यवसाय में रुचि रखती थीं। ये वो उत्पाद थे जिनकी भारत में बिक्री के लिए नहीं, बल्कि मुख्य रूप से निर्यात के लिए ज़रूरत थी।
- भारतीय उद्योगपतियों के क्षेत्र: भारतीय उद्योगपतियों ने 19वीं सदी के आख़िर में जो उद्योग लगाए, वे मैनचेस्टर की बनी चीज़ों से प्रतिस्पर्धा नहीं करते थे। वे ब्रिटेन से आने वाले धागे का आयात करते थे या भारत में ही मोटा सूती धागा बनाते थे, जिसका इस्तेमाल भारतीय हथकरघा बुनकर करते थे या उसे चीन को निर्यात किया जाता था।
- स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव: 20वीं सदी के पहले दशक में 'स्वदेशी आंदोलन' ने भारतीय उद्योगों को बल दिया। राष्ट्रवादियों ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आंदोलन चलाया, जिससे भारत में कपड़े का उत्पादन बढ़ा।
- प्रथम विश्व युद्ध का प्रभाव:
- युद्ध के कारण ब्रिटेन उलझ गया और भारत में मैनचेस्टर का माल आना कम हो गया। भारतीय बाज़ारों को रातोंरात एक विशाल देशी बाज़ार मिल गया।
- भारतीय कारखानों से फ़ौज के लिए जूट की बोरियाँ, कपड़े, टेंट, चमड़े के जूते, घोड़े व खच्चर की जीन आदि बनाने को कहा गया।
- नए कारखाने लगे, पुरानों में कई पालियों में काम होने लगा।
- युद्ध के बाद भी मैनचेस्टर भारत में अपनी पुरानी स्थिति हासिल नहीं कर सका। आधुनिक तकनीक अपनाकर अमेरिका, जर्मनी और जापान ने ब्रिटेन को चुनौती दी।
9. लघु उद्योगों की बहुतायत:
- युद्ध के बाद भी अर्थव्यवस्था में बड़े उद्योगों का हिस्सा बहुत छोटा था। लगभग 67% बड़े उद्योग बंगाल और बंबई में ही थे।
- देश के बाकी हिस्सों में लघु उद्योग यानी छोटे स्तर के उत्पादन का ही दबदबा बना रहा।
- केवल एक छोटा हिस्सा ही पंजीकृत कारखानों में काम करता था, बाकी घरेलू इकाइयों में काम करते थे।
- तकनीकी सुधार: 20वीं सदी में हथकरघा कपड़ा उत्पादन में भी सुधार हुआ। 1941 तक भारत में 35% से अधिक हथकरघे 'फ्लाई शटल' (Fly Shuttle) वाले करघों से चलते थे। इससे कामगारों की उत्पादन क्षमता बढ़ी, श्रम की माँग कम हुई और उत्पादन तेज़ हुआ। त्रावणकोर, मद्रास, मैसूर, कोचीन, बंगाल आदि क्षेत्रों में ऐसे करघे बहुत थे।
- मिलों के साथ प्रतिस्पर्धा के बावजूद बुनकर अपना अस्तित्व बचाए रहे। मोटे कपड़े गरीब पहनते थे, जिनकी माँग बनी रही। बनारसी या बालूचरी साड़ियों जैसी विशेष बुनाई वाली साड़ियों की माँग भी बनी रही।
10. वस्तुओं के लिए बाज़ार तैयार करना:
- जब नए उत्पाद बनते हैं तो लोगों को उन्हें खरीदने के लिए प्रेरित करना पड़ता है। इसके लिए विज्ञापनों का सहारा लिया गया।
- विज्ञापन के तरीके:
- लेबल: मैनचेस्टर के उद्योगपति अपने कपड़ों के बंडलों पर लेबल लगाते थे। इस पर 'Made in Manchester' लिखा होता था, जिससे ख़रीदार को गुणवत्ता का भरोसा हो।
- तस्वीरें: लेबलों पर भारतीय देवी-देवताओं (जैसे कृष्ण, सरस्वती) की तस्वीरें होती थीं। यह दिखाने के लिए कि ईश्वर भी चाहता है कि लोग वह चीज़ ख़रीदें।
- कैलेंडर: 19वीं सदी के अंत में निर्माता अपने उत्पादों को लोकप्रिय बनाने के लिए कैलेंडर छपवाते थे। इन्हें चाय की दुकानों, दफ्तरों, घरों में लटकाया जाता था। इनमें भी देवी-देवताओं या महत्वपूर्ण व्यक्तियों, नवाबों, सम्राटों की तस्वीरें होती थीं।
- राष्ट्रवादी संदेश: जब भारतीय निर्माताओं ने विज्ञापन बनाए तो उनमें राष्ट्रवादी संदेश साफ़ दिखाई देता था। जैसे - 'अगर आप राष्ट्र की परवाह करते हैं तो केवल भारतीय वस्तुएँ ही ख़रीदें'। विज्ञापन स्वदेशी के राष्ट्रवादी संदेश के वाहक बन गए।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs):
-
औद्योगीकरण से पहले अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार के लिए गाँवों में होने वाले उत्पादन को क्या कहा जाता था?
(क) कारखाना उत्पादन
(ख) आदि-औद्योगीकरण
(ग) हस्तशिल्प उत्पादन
(घ) गिल्ड उत्पादन -
स्पिनिंग जेनी (Spinning Jenny) का आविष्कार किसने किया था?
(क) जेम्स वॉट
(ख) रिचर्ड आर्कराइट
(ग) जेम्स हरग्रीव्ज
(घ) मैथ्यू बोल्टन -
ईस्ट इंडिया कंपनी ने बुनकरों पर निगरानी रखने, माल इकट्ठा करने और गुणवत्ता जाँचने के लिए किन्हें नियुक्त किया था?
(क) जॉबर
(ख) गुमाश्ता
(ग) सौदागर
(घ) दीवान -
भारत में पहली सूती कपड़ा मिल कहाँ और कब स्थापित हुई?
(क) कलकत्ता, 1855
(ख) बंबई, 1854
(ग) अहमदाबाद, 1861
(घ) मद्रास, 1874 -
जमशेदपुर में भारत का पहला लौह एवं इस्पात संयंत्र (TISCO) स्थापित करने वाले उद्योगपति कौन थे?
(क) द्वारकानाथ टैगोर
(ख) दिनशॉ पेटिट
(ग) जमशेदजी नुसरवानजी टाटा
(घ) सेठ हुकुमचंद -
उद्योगपतियों द्वारा मज़दूरों की भर्ती के लिए रखे गए व्यक्ति को क्या कहा जाता था, जो गाँवों से लोगों को लाता और उन्हें काम दिलवाता था?
(क) गुमाश्ता
(ख) सौदागर
(ग) जॉबर
(घ) सुपरवाइज़र -
किस घटना के बाद ब्रिटेन से मैनचेस्टर का माल भारत आना कम हो गया और भारतीय उद्योगों को घरेलू बाज़ार मिला?
(क) स्वदेशी आंदोलन
(ख) प्रथम विश्व युद्ध
(ग) अमेरिकी गृह युद्ध
(घ) प्लासी का युद्ध -
'फ्लाई शटल' (Fly Shuttle) का प्रयोग किस उद्योग में किया जाता था?
(क) जूट उद्योग
(ख) लौह एवं इस्पात उद्योग
(ग) हथकरघा बुनाई उद्योग
(घ) खनन उद्योग -
उन्नीसवीं सदी में इंग्लैंड के उत्पादकों ने अपने उत्पादों को बेचने के लिए किन माध्यमों का प्रयोग किया?
(क) लेबल और कैलेंडर
(ख) रेडियो विज्ञापन
(ग) टेलीविजन विज्ञापन
(घ) समाचार पत्र विज्ञापन -
निम्नलिखित में से कौन सा बंदरगाह यूरोपीय कंपनियों के आने के बाद कमज़ोर पड़ गया?
(क) बंबई
(ख) कलकत्ता
(ग) मद्रास
(घ) सूरत
उत्तर कुंजी:
- (ख)
- (ग)
- (ख)
- (ख)
- (ग)
- (ग)
- (ख)
- (ग)
- (क)
- (घ)
मुझे उम्मीद है कि ये नोट्स और प्रश्न आपकी परीक्षा की तैयारी में सहायक होंगे। इस अध्याय को अच्छी तरह समझने के लिए एनसीईआरटी की किताब को ध्यान से पढ़ना भी बहुत ज़रूरी है। कोई और प्रश्न हो तो पूछ सकते हैं।