Class 11 Geography Notes Chapter 13 (महासागरीय जल) – Bhautik Bhugol ke Mool Sidhant Book

Bhautik Bhugol ke Mool Sidhant
प्रिय विद्यार्थियों,

आज हम कक्षा 11 भूगोल के अध्याय 13 'महासागरीय जल' का विस्तृत अध्ययन करेंगे, जो आपकी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह अध्याय महासागरीय जल की गतियों, उसके तापमान और लवणता जैसे मूलभूत पहलुओं को समझने में सहायक होगा।


अध्याय 13: महासागरीय जल (Oceanic Water)

महासागर पृथ्वी की सतह का लगभग 71% भाग घेरे हुए हैं और जीवन के लिए आवश्यक जल का विशाल भंडार हैं। महासागरीय जल स्थिर नहीं रहता, बल्कि यह लगातार गतिशील रहता है। इसकी गतियाँ, तापमान और लवणता पृथ्वी की जलवायु और पारिस्थितिकी तंत्र को गहराई से प्रभावित करती हैं।

1. महासागरीय जल की गतियाँ (Movements of Oceanic Water)

महासागरीय जल की गतियों को मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा जा सकता है:
अ. तरंगें (Waves)
ब. ज्वार-भाटा (Tides)
स. महासागरीय धाराएँ (Ocean Currents)

अ. तरंगें (Waves):
तरंगें महासागरीय जल की सतह पर ऊर्जा का संचरण हैं, न कि जल का। जल के कण अपनी जगह पर वृत्ताकार गति करते हैं।

  • उत्पत्ति: मुख्य रूप से पवनों द्वारा जल की सतह पर घर्षण के कारण। भूकंप, ज्वालामुखी उद्गार या अंतःसागरीय भूस्खलन से सुनामी जैसी विशाल तरंगें उत्पन्न होती हैं।
  • विशेषताएँ:
    • शिखर (Crest): तरंग का उच्चतम बिंदु।
    • गर्त (Trough): तरंग का निम्नतम बिंदु।
    • तरंग दैर्ध्य (Wavelength): दो लगातार शिखरों या गर्तों के बीच की क्षैतिज दूरी।
    • तरंग ऊँचाई (Wave Height): एक शिखर और एक गर्त के बीच की ऊर्ध्वाधर दूरी।
    • तरंग आयाम (Wave Amplitude): तरंग की औसत ऊँचाई का आधा।
    • तरंग काल (Wave Period): एक निश्चित बिंदु से दो लगातार तरंग शिखरों या गर्तों के गुजरने में लगा समय।
    • तरंग गति (Wave Speed): तरंग दैर्ध्य को तरंग काल से विभाजित करने पर प्राप्त होती है।
  • तरंगों की ऊर्जा: अधिकांश तरंगें पवन से ऊर्जा प्राप्त करती हैं और पवन के रुकने पर भी आगे बढ़ती रहती हैं। तटों के पास पहुँचने पर तरंगें टूट जाती हैं।

ब. ज्वार-भाटा (Tides):
ज्वार-भाटा महासागरीय जल स्तर का नियमित रूप से ऊपर उठना (ज्वार) और नीचे गिरना (भाटा) है।

  • कारण:
    1. चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल (मुख्य): चंद्रमा पृथ्वी के निकट होने के कारण इसका गुरुत्वाकर्षण बल सूर्य से अधिक प्रभावी होता है।
    2. सूर्य का गुरुत्वाकर्षण बल: सूर्य का गुरुत्वाकर्षण बल भी ज्वार-भाटा उत्पन्न करता है, लेकिन दूरी अधिक होने के कारण इसका प्रभाव चंद्रमा से कम होता है।
    3. अपकेंद्रीय बल (Centrifugal Force): पृथ्वी के घूर्णन के कारण उत्पन्न होने वाला बल जो गुरुत्वाकर्षण बल के विपरीत कार्य करता है।
  • ज्वार-भाटा के प्रकार:
    • आवृत्ति के आधार पर:
      • दैनिक ज्वार (Diurnal Tide): प्रतिदिन एक उच्च ज्वार और एक निम्न ज्वार आता है। (लगभग 24 घंटे 52 मिनट में)
      • अर्ध-दैनिक ज्वार (Semi-diurnal Tide): प्रतिदिन दो उच्च ज्वार और दो निम्न ज्वार आते हैं, जिनकी ऊँचाई लगभग समान होती है। (लगभग 12 घंटे 26 मिनट में)
      • मिश्रित ज्वार (Mixed Tide): प्रतिदिन आने वाले ज्वार-भाटा की ऊँचाई में भिन्नता होती है। यह उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी तट और प्रशांत महासागर के द्वीपों पर सामान्य है।
    • सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी की स्थिति के आधार पर:
      • वृहत् ज्वार/दीर्घ ज्वार (Spring Tide): जब सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी एक सीधी रेखा में होते हैं (सिजिगी), तो दोनों के गुरुत्वाकर्षण बल मिलकर कार्य करते हैं, जिससे सबसे ऊँचा ज्वार (उच्च ज्वार) और सबसे नीचा भाटा (निम्न भाटा) आता है। यह स्थिति अमावस्या और पूर्णिमा को होती है।
      • लघु ज्वार (Neap Tide): जब सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी समकोण पर होते हैं (कृष्ण पक्ष या शुक्ल पक्ष की सप्तमी/अष्टमी), तो सूर्य और चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण बल एक-दूसरे के विपरीत कार्य करते हैं, जिससे सामान्य से कम ऊँचाई का ज्वार (निम्नतम ज्वार) आता है।
  • ज्वार-भाटा का महत्व:
    • नौवहन में सहायक (बंदरगाहों में प्रवेश/निकास)।
    • मछली पकड़ने में सहायक (ज्वार के साथ मछलियाँ तटों के करीब आती हैं)।
    • तटों से गाद हटाने में सहायक।
    • विद्युत उत्पादन की संभावना (ज्वारीय ऊर्जा)।

स. महासागरीय धाराएँ (Ocean Currents):
महासागरीय धाराएँ एक निश्चित दिशा में महासागरीय जल के विशाल द्रव्यमान का सतत प्रवाह हैं।

  • उत्पत्ति के कारण:
    • प्राथमिक बल (जो धाराओं को गति प्रदान करते हैं):
      • सौर ऊर्जा से गर्म होना: विषुवतीय क्षेत्रों में जल गर्म होकर फैलता है और ध्रुवों की ओर बहता है।
      • पवनें: स्थायी पवनों (व्यापारिक पवनें, पछुआ पवनें) द्वारा जल की सतह पर घर्षण।
      • गुरुत्वाकर्षण बल: जल के ढाल के कारण।
      • कोरिओलिस बल: पृथ्वी के घूर्णन के कारण धाराओं की दिशा में विक्षेपण (उत्तरी गोलार्ध में दाहिनी ओर, दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर)।
    • द्वितीयक बल (जो धाराओं को नियंत्रित करते हैं):
      • तापमान में भिन्नता: गर्म जल हल्का होता है, ठंडा जल भारी।
      • लवणता में भिन्नता: कम लवणता वाला जल हल्का, अधिक लवणता वाला जल भारी।
      • घनत्व में भिन्नता: तापमान और लवणता के कारण घनत्व में अंतर।
      • तटों की आकृति: तटों की आकृति धाराओं की दिशा को मोड़ती है।
  • महासागरीय धाराओं के प्रकार:
    • गर्म धाराएँ: विषुवत रेखा से ध्रुवों की ओर चलती हैं और अपने मार्ग में तापमान बढ़ाती हैं (जैसे गल्फ स्ट्रीम, क्यूरोशियो)।
    • ठंडी धाराएँ: ध्रुवों या उच्च अक्षांशों से विषुवत रेखा की ओर चलती हैं और अपने मार्ग में तापमान घटाती हैं (जैसे लेब्राडोर, पेरू)।
  • प्रमुख महासागरीय धाराएँ (उदाहरण):
    • अटलांटिक महासागर:
      • गर्म: गल्फ स्ट्रीम, उत्तरी अटलांटिक अपवाह, ब्राजील धारा।
      • ठंडी: लेब्राडोर धारा, कनारी धारा, बेंग्वेला धारा।
    • प्रशांत महासागर:
      • गर्म: क्यूरोशियो धारा, उत्तरी प्रशांत अपवाह, अलास्का धारा।
      • ठंडी: ओयाशियो धारा, कैलिफोर्निया धारा, पेरू (हम्बोल्ट) धारा।
    • हिंद महासागर:
      • गर्म: मोजाम्बिक धारा, अगुलहास धारा।
      • ठंडी: पश्चिमी ऑस्ट्रेलियाई धारा, सोमाली धारा (गर्मियों में ठंडी, सर्दियों में गर्म)।
  • महासागरीय धाराओं का महत्व:
    • जलवायु पर प्रभाव: गर्म धाराएँ तटीय क्षेत्रों को गर्म और आर्द्र बनाती हैं, ठंडी धाराएँ शुष्क और ठंडी।
    • मत्स्यन: जहाँ गर्म और ठंडी धाराएँ मिलती हैं, वहाँ प्लैंकटन की वृद्धि होती है, जिससे मछली पकड़ने के उत्तम क्षेत्र बनते हैं (जैसे ग्रैंड बैंक)।
    • नौवहन: नाविक धाराओं का उपयोग कर समय और ईंधन बचाते हैं।
    • तापमान का पुनर्वितरण: पृथ्वी पर तापमान संतुलन बनाए रखने में मदद करती हैं।

2. महासागरीय जल का तापमान (Temperature of Oceanic Water)

महासागरीय जल का तापमान सतह पर और गहराई में भिन्न होता है।

  • तापमान को प्रभावित करने वाले कारक:
    • अक्षांश: विषुवत रेखा से ध्रुवों की ओर तापमान घटता है।
    • स्थल और जल का वितरण: उत्तरी गोलार्ध में स्थल भाग अधिक होने से तापमान में अधिक भिन्नता।
    • प्रचलित पवनें: पवनें गर्म या ठंडे जल को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती हैं।
    • महासागरीय धाराएँ: गर्म धाराएँ तापमान बढ़ाती हैं, ठंडी धाराएँ घटाती हैं।
  • तापमान का ऊर्ध्वाधर वितरण (Vertical Distribution):
    • सतही परत: लगभग 500 मीटर तक, तापमान सूर्य के प्रकाश से प्रभावित।
    • थर्मोक्लाइन (Thermocline): वह परत जहाँ गहराई के साथ तापमान में तेजी से गिरावट आती है (लगभग 100-1000 मीटर)।
    • गहरी परत: 1000 मीटर से नीचे, तापमान लगभग स्थिर और बहुत कम (लगभग 0°C से 3°C)।

3. महासागरीय जल की लवणता (Salinity of Oceanic Water)

लवणता 1000 ग्राम समुद्री जल में घुले हुए ठोस नमक की मात्रा है, जिसे प्रति हजार (‰) में व्यक्त किया जाता है। औसत महासागरीय लवणता 35‰ है।

  • लवणता को प्रभावित करने वाले कारक:
    • वाष्पीकरण: उच्च वाष्पीकरण से लवणता बढ़ती है (जैसे उष्णकटिबंधीय क्षेत्र)।
    • वर्षा: अधिक वर्षा से लवणता घटती है (जैसे विषुवतीय क्षेत्र)।
    • नदी जल का अंतर्प्रवाह: नदियों द्वारा लाए गए ताजे जल से लवणता घटती है (जैसे नदी मुहाने)।
    • बर्फ का पिघलना/जमना: बर्फ पिघलने से लवणता घटती है, बर्फ जमने से शेष जल की लवणता बढ़ती है।
    • महासागरीय धाराएँ: धाराएँ कम/अधिक लवणता वाले जल को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती हैं।
  • लवणता का क्षैतिज वितरण (Horizontal Distribution):
    • विषुवत रेखा के पास वर्षा अधिक होने के कारण लवणता थोड़ी कम होती है।
    • उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों (20°-30° अक्षांश) में उच्च वाष्पीकरण के कारण लवणता सर्वाधिक होती है।
    • ध्रुवों की ओर लवणता घटती जाती है।
    • बंद सागरों में लवणता अधिक होती है (जैसे लाल सागर 41‰, मृत सागर 240‰)।
  • लवणता का ऊर्ध्वाधर वितरण (Vertical Distribution):
    • सतह पर लवणता वाष्पीकरण और वर्षा से प्रभावित होती है।
    • गहराई के साथ लवणता सामान्यतः बढ़ती है, लेकिन एक निश्चित गहराई के बाद स्थिर हो जाती है।
    • हैलोक्लाइन (Halocline): वह परत जहाँ गहराई के साथ लवणता में तेजी से परिवर्तन होता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions - MCQs)

  1. महासागरीय जल की सतह पर तरंगों की उत्पत्ति का मुख्य कारण क्या है?
    अ) चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल
    ब) पवनें
    स) पृथ्वी का घूर्णन
    द) महासागरीय धाराएँ

  2. जब सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी एक सीधी रेखा में होते हैं, तो किस प्रकार का ज्वार आता है?
    अ) लघु ज्वार
    ब) दैनिक ज्वार
    स) वृहत् ज्वार
    द) मिश्रित ज्वार

  3. 'थर्मोक्लाइन' महासागरीय जल की वह परत है जहाँ:
    अ) लवणता में तेजी से परिवर्तन होता है
    ब) तापमान में तेजी से गिरावट आती है
    स) घनत्व में तेजी से वृद्धि होती है
    द) जल का रंग बदलता है

  4. निम्नलिखित में से कौन सी एक ठंडी महासागरीय धारा है?
    अ) गल्फ स्ट्रीम
    ब) क्यूरोशियो धारा
    स) लेब्राडोर धारा
    द) ब्राजील धारा

  5. महासागरीय जल की औसत लवणता कितनी है?
    अ) 25 प्रति हजार (‰)
    ब) 30 प्रति हजार (‰)
    स) 35 प्रति हजार (‰)
    द) 40 प्रति हजार (‰)

  6. उत्तरी गोलार्ध में महासागरीय धाराएँ किस बल के कारण अपनी दाहिनी ओर विक्षेपित होती हैं?
    अ) गुरुत्वाकर्षण बल
    ब) अपकेंद्रीय बल
    स) कोरिओलिस बल
    द) पवन बल

  7. वह स्थान जहाँ गर्म और ठंडी महासागरीय धाराएँ मिलती हैं, मत्स्यन के लिए आदर्श क्यों होते हैं?
    अ) वहाँ का तापमान मध्यम होता है।
    ब) वहाँ प्लैंकटन की वृद्धि अधिक होती है।
    स) वहाँ जल का स्तर नीचा होता है।
    द) वहाँ अधिक ऑक्सीजन उपलब्ध होती है।

  8. निम्न में से किस सागर की लवणता सर्वाधिक है?
    अ) भूमध्य सागर
    ब) लाल सागर
    स) मृत सागर
    द) बाल्टिक सागर

  9. ज्वार-भाटा की उत्पत्ति के लिए कौन सा खगोलीय पिंड मुख्य रूप से जिम्मेदार है?
    अ) सूर्य
    ब) पृथ्वी
    स) चंद्रमा
    द) मंगल

  10. 'तरंग दैर्ध्य' (Wavelength) किसे कहते हैं?
    अ) एक शिखर और एक गर्त के बीच की ऊर्ध्वाधर दूरी।
    ब) दो लगातार शिखरों या गर्तों के बीच की क्षैतिज दूरी।
    स) तरंग के बनने में लगा समय।
    द) तरंग की गति।


उत्तरमाला (Answer Key):


मुझे आशा है कि यह विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपको 'महासागरीय जल' अध्याय को गहराई से समझने और आपकी सरकारी परीक्षाओं की तैयारी में सहायक होंगे। शुभकामनाएँ!

Read more