Class 11 Geography Notes Chapter 16 (जैव-विविधता एवं संरक्षण) – Bhautik Bhugol ke Mool Sidhant Book

Bhautik Bhugol ke Mool Sidhant
प्रिय विद्यार्थियों,

आज हम आपकी कक्षा 11 की भूगोल पाठ्यपुस्तक 'भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत' के अध्याय 16 'जैव-विविधता एवं संरक्षण' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय सरकारी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें पर्यावरण और पारिस्थितिकी से संबंधित मूलभूत अवधारणाएँ शामिल हैं। आइए, इसे विस्तार से समझते हैं।


अध्याय 16: जैव-विविधता एवं संरक्षण (Biodiversity and Conservation)

1. जैव-विविधता (Biodiversity) क्या है?

  • परिभाषा: जैव-विविधता शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम 'वॉल्टर जी. रोज़ेन' ने 1985 में किया था। यह पृथ्वी पर जीवन की विविधता और परिवर्तनशीलता को संदर्भित करता है। इसमें सभी प्रकार के जीव-जंतु, पेड़-पौधे, सूक्ष्मजीव और उनके पारिस्थितिक तंत्र शामिल हैं। यह किसी भी क्षेत्र में पाए जाने वाले जीवों की प्रजातियों की विभिन्नता को दर्शाता है।
  • घटक/स्तर (Levels of Biodiversity):
    • आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity): एक ही प्रजाति के जीवों में जीन स्तर पर पाई जाने वाली विविधता। यह एक प्रजाति को विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुकूल ढलने में मदद करती है।
      • उदाहरण: चावल की विभिन्न किस्में (जैसे बासमती, सोना मसूरी), मानव की विभिन्न प्रजातियाँ।
    • प्रजातीय विविधता (Species Diversity): एक निश्चित क्षेत्र में पाई जाने वाली विभिन्न प्रजातियों की संख्या और उनकी बहुलता। यह प्रजातियों की समृद्धि (species richness - प्रजातियों की संख्या) और प्रजातियों की समरूपता (species evenness - विभिन्न प्रजातियों के सदस्यों की सापेक्ष संख्या) को दर्शाता है।
    • पारिस्थितिक तंत्र विविधता (Ecosystem Diversity): विभिन्न प्रकार के पारिस्थितिक तंत्रों जैसे वन, घास के मैदान, रेगिस्तान, झीलें, नदियाँ, समुद्र, आर्द्रभूमि आदि की विविधता। प्रत्येक पारिस्थितिक तंत्र में विशिष्ट प्रकार के जीव पाए जाते हैं और वे एक-दूसरे के साथ तथा अपने अजैविक पर्यावरण के साथ अंतःक्रिया करते हैं।

2. जैव-विविधता का महत्व

  • पारिस्थितिकीय महत्व (Ecological Importance):
    • पारिस्थितिक तंत्रों को स्थिर, स्वस्थ और क्रियाशील बनाए रखती है।
    • खाद्य श्रृंखला और खाद्य जाल का आधार है, जो ऊर्जा प्रवाह को सुनिश्चित करता है।
    • पोषक तत्वों के चक्रण (जैसे नाइट्रोजन, कार्बन, जल चक्र) में सहायक।
    • परागण (pollination) जैसी प्रक्रियाओं के लिए आवश्यक, जो फसलों और पौधों के प्रजनन के लिए महत्वपूर्ण है।
    • मिट्टी निर्माण, जल शुद्धिकरण, वायु गुणवत्ता नियमन और जलवायु नियमन में भूमिका निभाती है।
  • आर्थिक महत्व (Economic Importance):
    • भोजन: फसलें, पशुधन, मछली, फल और अन्य खाद्य पदार्थ।
    • औषधि: अनेक जीवन रक्षक दवाएँ पौधों और जीवों से प्राप्त होती हैं (जैसे मॉर्फिन, कुनैन, पेनिसिलिन)।
    • ईंधन: लकड़ी, बायोमास।
    • औद्योगिक उत्पाद: रेशे (कपास, जूट), रबर, गोंद, रेजिन, चमड़ा, लकड़ी।
    • पर्यटन: इको-टूरिज्म और वन्यजीव पर्यटन से आर्थिक लाभ।
  • वैज्ञानिक महत्व (Scientific Importance):
    • प्रजातियों के विकास, अनुकूलन और पारिस्थितिक तंत्रों की कार्यप्रणाली को समझने के लिए अनुसंधान का आधार।
    • नए उत्पादों और प्रक्रियाओं के विकास के लिए आनुवंशिक संसाधनों का स्रोत।
  • नैतिक एवं सांस्कृतिक महत्व (Ethical and Cultural Importance):
    • अनेक संस्कृतियों में पौधों और जानवरों का धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व है।
    • प्रत्येक प्रजाति का पृथ्वी पर अस्तित्व का अधिकार है।

3. जैव-विविधता का वितरण

  • अक्षांशीय प्रवणता (Latitudinal Gradient): भूमध्य रेखा (विषुवत वृत्त) से ध्रुवों की ओर जाने पर जैव-विविधता सामान्यतः कम होती जाती है।
    • उष्णकटिबंधीय क्षेत्र (Tropical regions): ये क्षेत्र सर्वाधिक जैव-विविधता वाले होते हैं। यहाँ उच्च तापमान, उच्च वर्षा और कम मौसमी बदलाव होते हैं, जो प्रजातियों के विकास और विविधता के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ प्रदान करते हैं। अमेज़न वर्षावन इसका उत्कृष्ट उदाहरण है।
    • समशीतोष्ण और ध्रुवीय क्षेत्र: इन क्षेत्रों में मौसमी बदलाव अधिक होते हैं, जिससे प्रजातियों की संख्या कम होती जाती है।
  • जैव-विविधता हॉटस्पॉट (Biodiversity Hotspots): ये ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ उच्च प्रजातीय समृद्धि (endemism - स्थानिक प्रजातियों की उच्च संख्या) होती है और साथ ही इन प्रजातियों पर मानव गतिविधियों के कारण गंभीर खतरा होता है।
    • विश्व में 36 ऐसे हॉटस्पॉट पहचाने गए हैं।
    • भारत में 4 प्रमुख हॉटस्पॉट हैं:
      1. पश्चिमी घाट (Western Ghats)
      2. हिमालय (पूर्वी हिमालय) (Eastern Himalayas)
      3. इंडो-बर्मा क्षेत्र (Indo-Burma Region)
      4. सुंडालैंड (निकोबार द्वीप समूह सहित) (Sundaland)

4. जैव-विविधता का ह्रास (Loss of Biodiversity)

  • मानव गतिविधियों के कारण प्रजातियों के विलुप्त होने की दर प्राकृतिक दर से 100 से 1000 गुना अधिक हो गई है। इसे अक्सर "छठा सामूहिक विलुप्तिकरण" कहा जाता है।
  • प्रमुख कारण (The Evil Quartet):
    • आवास का विनाश एवं विखंडन (Habitat Loss and Fragmentation): वनों की कटाई, कृषि विस्तार, शहरीकरण, प्रदूषण, खनन आदि के कारण जीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं या छोटे-छोटे टुकड़ों में बँट रहे हैं। यह जैव-विविधता के ह्रास का सबसे बड़ा कारण है।
    • अति-दोहन (Over-exploitation): मानव द्वारा संसाधनों का अत्यधिक उपयोग (जैसे मछली पकड़ना, शिकार, लकड़ी काटना, औषधीय पौधों का संग्रह) प्रजातियों की संख्या को कम कर देता है और उन्हें विलुप्ति के कगार पर ला देता है।
    • विदेशी प्रजातियों का आक्रमण (Invasion of Alien Species): जब कोई बाहरी प्रजाति जानबूझकर या अनजाने में किसी नए पारिस्थितिक तंत्र में प्रवेश करती है, तो वह वहाँ की मूल प्रजातियों के लिए खतरा बन सकती है, क्योंकि वे प्रतिस्पर्धा में हार जाती हैं, नए रोगों का शिकार होती हैं या उनका शिकार बन जाती हैं।
      • उदाहरण: गाजर घास (Parthenium), जलकुंभी (Eichhornia), अफ्रीकन कैटफिश (Clarias gariepinus)।
    • सह-विलुप्तता (Co-extinction): जब एक प्रजाति विलुप्त होती है, तो उस पर निर्भर रहने वाली अन्य प्रजातियाँ भी विलुप्त हो सकती हैं।
      • उदाहरण: एक परजीवी का अपने पोषक के साथ विलुप्त होना, या एक विशेष परागणक का अपने पौधे के साथ विलुप्त होना।
  • अन्य कारण:
    • प्रदूषण (Pollution): वायु, जल और मृदा प्रदूषण (कीटनाशक, औद्योगिक अपशिष्ट) जीवों के स्वास्थ्य और अस्तित्व को खतरे में डालता है।
    • जलवायु परिवर्तन (Climate Change): वैश्विक तापमान वृद्धि, समुद्र स्तर में वृद्धि और चरम मौसमी घटनाएँ अनेक प्रजातियों के आवास और जीवनचक्र को प्रभावित करती हैं।
    • अवैध शिकार एवं व्यापार (Poaching and Illegal Trade): दुर्लभ और लुप्तप्राय प्रजातियों (जैसे बाघ, हाथी, गैंडा) का उनके अंगों (खाल, दाँत, सींग) के लिए अवैध शिकार और व्यापार।

5. जैव-विविधता का संरक्षण (Conservation of Biodiversity)

  • आवश्यकता:
    • प्रजातियों और पारिस्थितिक तंत्रों को बचाना।
    • मानव कल्याण और भविष्य की पीढ़ियों के लिए संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
    • पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखना।
    • नैतिक और सौंदर्यवादी मूल्य।
  • संरक्षण के तरीके:
    • स्व-स्थाने संरक्षण (In-situ Conservation): जीवों और पौधों को उनके प्राकृतिक आवास में ही संरक्षित करना। यह सबसे प्रभावी तरीका माना जाता है।
      • राष्ट्रीय उद्यान (National Parks): वन्यजीवों और उनके आवासों को पूरी तरह से संरक्षित किया जाता है। यहाँ मानवीय गतिविधियों जैसे चराई, कृषि, लकड़ी काटना, पर्यटन आदि पर पूर्ण प्रतिबंध होता है।
        • उदाहरण: जिम कॉर्बेट (उत्तराखंड), कान्हा (मध्य प्रदेश), रणथंभौर (राजस्थान)।
      • वन्यजीव अभयारण्य (Wildlife Sanctuaries): विशिष्ट प्रजातियों या वन्यजीवों के संरक्षण पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। राष्ट्रीय उद्यानों की तुलना में यहाँ कुछ मानवीय गतिविधियों (जैसे सीमित चराई, लकड़ी इकट्ठा करना) की अनुमति हो सकती है, बशर्ते वे वन्यजीवों को नुकसान न पहुँचाएँ।
        • उदाहरण: पेरियार (केरल), घाना पक्षी विहार (राजस्थान)।
      • जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र (Biosphere Reserves): ये बड़े बहुउद्देशीय संरक्षित क्षेत्र होते हैं, जिनमें प्राकृतिक और सांस्कृतिक परिदृश्य दोनों शामिल होते हैं। इनका उद्देश्य संरक्षण के साथ-साथ सतत विकास और अनुसंधान को बढ़ावा देना भी है। इनमें तीन ज़ोन होते हैं:
        • कोर ज़ोन (Core Zone): पूर्णतः संरक्षित, कोई मानवीय गतिविधि नहीं।
        • बफर ज़ोन (Buffer Zone): सीमित अनुसंधान और शिक्षा की अनुमति।
        • संक्रमण ज़ोन (Transition Zone): स्थानीय समुदायों के साथ सहयोग से सतत विकास गतिविधियाँ।
        • उदाहरण: नीलगिरि, नंदा देवी, सुंदरबन।
      • पवित्र उपवन (Sacred Groves): ये ऐसे वन क्षेत्र होते हैं जिन्हें स्थानीय समुदायों द्वारा धार्मिक और सांस्कृतिक कारणों से संरक्षित किया जाता है। ये जैव-विविधता के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, विशेषकर भारत में।
    • पर-स्थाने संरक्षण (Ex-situ Conservation): संकटग्रस्त प्रजातियों को उनके प्राकृतिक आवास से बाहर निकालकर विशेष स्थानों पर संरक्षित करना।
      • चिड़ियाघर (Zoological Parks): जानवरों को कृत्रिम वातावरण में रखा, पाला और प्रजनन कराया जाता है।
      • वानस्पतिक उद्यान (Botanical Gardens): पौधों की विभिन्न प्रजातियों को उगाया और संरक्षित किया जाता है।
      • बीज बैंक (Seed Banks): भविष्य के लिए पौधों के बीजों को कम तापमान और कम आर्द्रता पर संग्रहीत किया जाता है। यह आनुवंशिक संसाधनों का एक महत्वपूर्ण भंडार है।
      • जीन बैंक (Gene Banks): पौधों और जानवरों के आनुवंशिक पदार्थों (जैसे डीएनए, ऊतक, युग्मक) को संरक्षित किया जाता है।
      • क्रायोप्रिजर्वेशन (Cryopreservation): अत्यंत कम तापमान पर (तरल नाइट्रोजन में -196°C) युग्मकों, ऊतकों, कोशिकाओं आदि का संरक्षण।

6. भारत में जैव-विविधता संरक्षण

  • भारत विश्व के 12 मेगा-विविधता वाले देशों में से एक है, जिसमें विश्व की लगभग 7-8% प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
  • प्रमुख पहलें और कानून:
    • वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972: वन्यजीवों और उनके आवासों के संरक्षण के लिए कानूनी ढाँचा प्रदान करता है।
    • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986: पर्यावरण की सुरक्षा और सुधार के लिए एक व्यापक कानून।
    • जैव-विविधता अधिनियम, 2002: जैव-विविधता के संरक्षण, उसके घटकों के सतत उपयोग और आनुवंशिक संसाधनों से प्राप्त लाभों के उचित और न्यायसंगत बँटवारे के लिए।
  • प्रमुख परियोजनाएँ:
    • प्रोजेक्ट टाइगर (1973): बाघों के संरक्षण के लिए।
    • प्रोजेक्ट एलीफेंट (1992): हाथियों के संरक्षण के लिए।
    • घड़ियाल प्रजनन परियोजना, मगरमच्छ प्रजनन परियोजना, हंगुल परियोजना आदि।
  • संरक्षित क्षेत्र: भारत में 106 राष्ट्रीय उद्यान, 567 वन्यजीव अभयारण्य और 18 जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र हैं (फरवरी 2024 तक के आँकड़े)।

7. अंतर्राष्ट्रीय प्रयास

  • IUCN (International Union for Conservation of Nature): यह प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए काम करने वाला एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन है। यह लाल सूची (Red List) जारी करता है, जिसमें संकटग्रस्त प्रजातियों को उनकी विलुप्ति के खतरे के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है (जैसे विलुप्त, गंभीर रूप से लुप्तप्राय, लुप्तप्राय, सुभेद्य आदि)।
  • CITES (Convention on International Trade in Endangered Species of Wild Fauna and Flora): यह जंगली जीवों और वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को नियंत्रित करने के लिए एक बहुपक्षीय संधि है, ताकि उनके अस्तित्व को खतरा न हो।
  • जैव-विविधता पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (Convention on Biological Diversity - CBD): 1992 के रियो पृथ्वी शिखर सम्मेलन में हस्ताक्षरित यह एक अंतर्राष्ट्रीय कानूनी उपकरण है जिसके तीन मुख्य उद्देश्य हैं:
    1. जैव-विविधता का संरक्षण।
    2. जैव-विविधता के घटकों का सतत उपयोग।
    3. आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग से होने वाले लाभों का उचित और न्यायसंगत बँटवारा।
  • विश्व संरक्षण रणनीति (World Conservation Strategy): IUCN, UNEP और WWF द्वारा 1980 में जारी की गई, जिसका उद्देश्य सतत विकास के लिए संरक्षण को एकीकृत करना है।

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

  1. 'जैव-विविधता' शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम किस वैज्ञानिक ने किया था?
    a) ए.जी. टैन्सले
    b) ई.ओ. विल्सन
    c) वॉल्टर जी. रोज़ेन
    d) अर्नेस्ट हैकल

  2. निम्नलिखित में से कौन-सा जैव-विविधता का घटक नहीं है?
    a) आनुवंशिक विविधता
    b) प्रजातीय विविधता
    c) पारिस्थितिक तंत्र विविधता
    d) भौगोलिक विविधता

  3. विश्व के कुल जैव-विविधता हॉटस्पॉट की संख्या कितनी है?
    a) 25
    b) 36
    c) 40
    d) 12

  4. भारत में निम्नलिखित में से कौन-सा एक जैव-विविधता हॉटस्पॉट नहीं है?
    a) पश्चिमी घाट
    b) पूर्वी हिमालय
    c) थार रेगिस्तान
    d) इंडो-बर्मा क्षेत्र

  5. जैव-विविधता के ह्रास का सबसे प्रमुख कारण क्या है?
    a) विदेशी प्रजातियों का आक्रमण
    b) आवास का विनाश
    c) अति-दोहन
    d) जलवायु परिवर्तन

  6. संकटग्रस्त प्रजातियों को उनके प्राकृतिक आवास से बाहर निकालकर विशेष स्थानों पर संरक्षित करना क्या कहलाता है?
    a) स्व-स्थाने संरक्षण
    b) पर-स्थाने संरक्षण
    c) जैवमंडल संरक्षण
    d) राष्ट्रीय उद्यान

  7. निम्नलिखित में से कौन-सा पर-स्थाने संरक्षण का उदाहरण है?
    a) राष्ट्रीय उद्यान
    b) वन्यजीव अभयारण्य
    c) बीज बैंक
    d) पवित्र उपवन

  8. IUCN का पूर्ण रूप क्या है?
    a) Indian Union for Conservation of Nature
    b) International Union for Conservation of Nature
    c) International United Conservation Network
    d) Indian United Conservation Network

  9. भारत में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम किस वर्ष पारित किया गया था?
    a) 1972
    b) 1986
    c) 1992
    d) 2002

  10. 'प्रोजेक्ट टाइगर' भारत में किस वर्ष शुरू किया गया था?
    a) 1970
    b) 1973
    c) 1982
    d) 1992


उत्तरमाला (Answer Key):

  1. c) वॉल्टर जी. रोज़ेन
  2. d) भौगोलिक विविधता
  3. b) 36
  4. c) थार रेगिस्तान
  5. b) आवास का विनाश
  6. b) पर-स्थाने संरक्षण
  7. c) बीज बैंक
  8. b) International Union for Conservation of Nature
  9. a) 1972
  10. b) 1973

मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपको इस अध्याय को समझने और सरकारी परीक्षाओं की तैयारी करने में सहायक होंगे। किसी भी अन्य प्रश्न के लिए आप पूछ सकते हैं।

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