Class 11 Geography Notes Chapter 3 (पृथ्वी की आंतरिक संरचना) – Bhautik Bhugol ke Mool Sidhant Book

Bhautik Bhugol ke Mool Sidhant
प्रिय विद्यार्थियों,

आज हम आपकी कक्षा 11 की भूगोल पाठ्यपुस्तक 'भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत' के अध्याय 3 'पृथ्वी की आंतरिक संरचना' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय सरकारी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें पृथ्वी के भीतर की उन जटिल प्रक्रियाओं और संरचनाओं को समझाया गया है जो हमारे ग्रह को आकार देती हैं।


अध्याय 3: पृथ्वी की आंतरिक संरचना (Detailed Notes)

1. परिचय:
पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझना भूवैज्ञानिक प्रक्रियाओं जैसे ज्वालामुखी, भूकंप, प्लेट विवर्तनिकी और पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र की उत्पत्ति को समझने के लिए आवश्यक है। पृथ्वी की त्रिज्या लगभग 6370 किलोमीटर है, और इसके केंद्र तक पहुँच पाना असंभव है। इसलिए, वैज्ञानिक विभिन्न प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष स्रोतों के माध्यम से इसकी आंतरिक संरचना का अनुमान लगाते हैं।

2. पृथ्वी की आंतरिक संरचना की जानकारी के स्रोत:

अ. प्रत्यक्ष स्रोत:
ये वे स्रोत हैं जिनसे सीधे तौर पर पृथ्वी के आंतरिक भाग से प्राप्त सामग्री का अध्ययन किया जाता है।

  • खनन (Mining): सोने की खानें (जैसे दक्षिण अफ्रीका में लगभग 3-4 किमी गहरी) हमें पृथ्वी के ऊपरी भाग की जानकारी देती हैं।
  • भेदन परियोजनाएँ (Drilling Projects): वैज्ञानिक गहरे भेदन परियोजनाओं के माध्यम से पृथ्वी के क्रस्ट में छेद करके नमूने प्राप्त करते हैं। उदाहरण:
    • आर्कटिक महासागर में कोला सुपर डीप बोरहोल (लगभग 12 किमी गहरा)।
    • गहराई तक समुद्री भेदन परियोजनाएँ।
  • ज्वालामुखी उद्गार (Volcanic Eruptions): ज्वालामुखी उद्गार के दौरान पृथ्वी के आंतरिक भाग से मैग्मा (पिघली हुई चट्टानें) सतह पर आता है, जो हमें ऊपरी मेंटल की जानकारी देता है।

ब. अप्रत्यक्ष स्रोत:
ये वे स्रोत हैं जो पृथ्वी के आंतरिक भाग की भौतिक विशेषताओं (जैसे तापमान, दबाव, घनत्व) या अन्य खगोलीय पिंडों के अध्ययन पर आधारित होते हैं।

  • तापमान (Temperature): गहराई के साथ तापमान में वृद्धि होती है (लगभग 1 डिग्री सेल्सियस प्रति 32 मीटर)। यह दर्शाता है कि पृथ्वी का आंतरिक भाग बहुत गर्म है।
  • दबाव (Pressure): गहराई बढ़ने के साथ ऊपर की परतों का भार बढ़ता है, जिससे दबाव भी बढ़ता है। अत्यधिक दबाव के कारण आंतरिक भाग में पदार्थ ठोस अवस्था में भी रह सकते हैं, भले ही उनका तापमान बहुत अधिक हो।
  • घनत्व (Density): पृथ्वी की सतह पर चट्टानों का औसत घनत्व 2.7-3.3 g/cm³ है, जबकि पूरी पृथ्वी का औसत घनत्व 5.5 g/cm³ है। यह दर्शाता है कि पृथ्वी का आंतरिक भाग अधिक सघन पदार्थों से बना है।
  • उल्कापिंड (Meteors): उल्कापिंड बाहरी अंतरिक्ष से पृथ्वी पर गिरने वाले चट्टानी या धात्विक पिंड होते हैं। ये उसी पदार्थ से बने होते हैं जिससे पृथ्वी बनी है, और इसलिए इनके अध्ययन से पृथ्वी की आंतरिक संरचना के बारे में अनुमान लगाया जा सकता है।
  • गुरुत्वाकर्षण बल (Gravitational Force): पृथ्वी के विभिन्न अक्षांशों पर गुरुत्वाकर्षण बल में भिन्नता पाई जाती है (गुरुत्वाकर्षण विसंगति)। यह पृथ्वी के भीतर पदार्थ के असमान वितरण को दर्शाता है।
  • चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field): पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र आंतरिक क्रोड में संवहन धाराओं से उत्पन्न होता है, जो आंतरिक संरचना के बारे में महत्वपूर्ण सुराग देता है।
  • भूकंप विज्ञान (Seismology): यह पृथ्वी की आंतरिक संरचना की जानकारी का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। भूकंपीय तरंगों के व्यवहार (गति, दिशा, परावर्तन, अपवर्तन) का अध्ययन करके पृथ्वी की विभिन्न परतों की विशेषताओं का पता लगाया जाता है।

3. भूकंप (Earthquakes):

  • परिभाषा: भूकंप का अर्थ है पृथ्वी का कंपन। यह एक प्राकृतिक घटना है, जो ऊर्जा के निकलने के कारण होती है। यह ऊर्जा पृथ्वी के भीतर भ्रंश (fault) के किनारों के सहारे चट्टानों के अचानक खिसकने से उत्पन्न होती है।
  • भूकंप मूल (Hypocenter/Focus): वह स्थान जहाँ ऊर्जा निकलती है (भ्रंश के सहारे)।
  • अधिकेंद्र (Epicenter): भूकंप मूल के ठीक ऊपर धरातल पर स्थित बिंदु, जहाँ भूकंपीय तरंगें सबसे पहले पहुँचती हैं और सर्वाधिक विनाश होता है।

अ. भूकंपीय तरंगें (Seismic Waves):
भूकंप के दौरान तीन प्रकार की तरंगें उत्पन्न होती हैं:

i. कायिक तरंगें (Body Waves):
ये तरंगें भूकंप मूल से ऊर्जा के मुक्त होने के बाद पृथ्वी के अंदर सभी दिशाओं में यात्रा करती हैं।

  • P-तरंगें (Primary Waves/अनुदैर्ध्य तरंगें):
    • ये सबसे तीव्र गति वाली तरंगें हैं और सबसे पहले अधिकेंद्र पर पहुँचती हैं।
    • ये ध्वनि तरंगों के समान होती हैं, जो पदार्थ के कणों को तरंग के समानांतर दिशा में आगे-पीछे कंपन कराती हैं।
    • ये ठोस, तरल और गैसीय तीनों माध्यमों से गुजर सकती हैं, लेकिन तरल माध्यम में इनकी गति कम हो जाती है।
    • इन्हें 'प्राथमिक तरंगें' भी कहते हैं।
  • S-तरंगें (Secondary Waves/अनुप्रस्थ तरंगें):
    • ये P-तरंगों के बाद अधिकेंद्र पर पहुँचती हैं।
    • ये प्रकाश तरंगों के समान होती हैं, जो पदार्थ के कणों को तरंग के समकोण पर (ऊपर-नीचे) कंपन कराती हैं।
    • ये केवल ठोस माध्यम से ही गुजर सकती हैं; तरल माध्यम में ये लुप्त हो जाती हैं। यह विशेषता पृथ्वी के बाह्य क्रोड की तरल अवस्था का प्रमाण है।
    • इन्हें 'द्वितीयक तरंगें' भी कहते हैं।

ii. धरातलीय तरंगें (Surface Waves/L-Waves):

  • ये तरंगें कायिक तरंगों के धरातल पर पहुँचने के बाद उत्पन्न होती हैं और धरातल के साथ-साथ चलती हैं।
  • ये सबसे धीमी गति वाली तरंगें होती हैं, लेकिन सबसे अधिक विनाशकारी होती हैं।
  • इनकी गति कम होने के बावजूद, इनका आयाम (amplitude) सबसे अधिक होता है, जिससे ये इमारतों को अधिक नुकसान पहुँचाती हैं।

ब. भूकंपीय छाया क्षेत्र (Seismic Shadow Zone):

  • पृथ्वी के कुछ ऐसे क्षेत्र होते हैं जहाँ भूकंपीय तरंगें बिल्कुल भी नहीं पहुँचतीं या बहुत कमजोर पहुँचती हैं। इन क्षेत्रों को छाया क्षेत्र कहते हैं।
  • S-तरंगों का छाया क्षेत्र: S-तरंगें पृथ्वी के बाह्य क्रोड (जो तरल अवस्था में है) से होकर नहीं गुजर सकतीं। इसलिए, अधिकेंद्र से 103° से 103° के बीच का क्षेत्र S-तरंगों का छाया क्षेत्र होता है। (कुछ स्रोतों में यह 105° से 105° भी मिलता है)।
  • P-तरंगों का छाया क्षेत्र: P-तरंगें तरल माध्यम में अपवर्तित (refract) हो जाती हैं और उनकी गति धीमी हो जाती है। इस अपवर्तन के कारण, अधिकेंद्र से 103° से 142° के बीच का क्षेत्र P-तरंगों का छाया क्षेत्र होता है। (कुछ स्रोतों में यह 105° से 145° भी मिलता है)।
  • P-तरंगों का छाया क्षेत्र S-तरंगों के छाया क्षेत्र से छोटा होता है।

स. भूकंप का मापन:

  • तीव्रता (Intensity): यह भूकंप से होने वाले विनाश का प्रत्यक्ष माप है। इसे मर्केली स्केल (Mercalli Scale) पर मापा जाता है, जो 1 से 12 तक होता है। यह व्यक्तिपरक (subjective) होता है।
  • परिमाण (Magnitude): यह भूकंप के दौरान मुक्त हुई ऊर्जा का माप है। इसे रिक्टर स्केल (Richter Scale) पर मापा जाता है, जो 0 से 10 तक होता है। यह एक लघुगणकीय (logarithmic) स्केल है, जिसमें प्रत्येक पूर्ण संख्या की वृद्धि पर ऊर्जा 32 गुना बढ़ जाती है। यह वस्तुनिष्ठ (objective) होता है।

4. ज्वालामुखी (Volcanoes):

  • परिभाषा: ज्वालामुखी पृथ्वी के क्रस्ट में एक ऐसा छिद्र या दरार है, जिससे पिघली हुई चट्टानें (मैग्मा), राख, गैसें और अन्य पदार्थ पृथ्वी की सतह पर बाहर निकलते हैं।
  • मैग्मा (Magma): पृथ्वी के आंतरिक भाग में पिघली हुई चट्टानों को मैग्मा कहते हैं।
  • लावा (Lava): जब मैग्मा सतह पर आता है तो उसे लावा कहते हैं।

अ. ज्वालामुखी निर्मित स्थलाकृतियाँ (Volcanic Landforms):

i. अंतर्वेधी स्थलाकृतियाँ (Intrusive Forms): जब मैग्मा सतह पर न पहुँचकर पृथ्वी के भीतर ही ठंडा होकर जम जाता है, तो विभिन्न आकृतियाँ बनती हैं।

  • बैथोलिथ (Batholith): ये ग्रेनाइट के बड़े पिंड होते हैं, जो पृथ्वी के अंदर गहराई में गुंबद के आकार में जम जाते हैं। ये सबसे बड़े अंतर्वेधी पिंड हैं।
  • लैकोलिथ (Laccolith): ये गुंबद के आकार की संरचनाएँ होती हैं, जो सतह के पास मैग्मा के जमने से बनती हैं और ऊपर की परतों को ऊपर उठा देती हैं।
  • लैपोलिथ (Lopolith): ये अवतल (saucer-shaped) आकार के जमाव होते हैं, जो बेसिन के तल में जमते हैं।
  • फैकोलिथ (Phacolith): ये लहरदार या मोड़दार चट्टानों की अपनति (anticline) और अभिनति (syncline) के ऊपर या नीचे मैग्मा के जमने से बनते हैं।
  • सिल (Sill): जब मैग्मा क्षैतिज रूप से चट्टानों की परतों के बीच जम जाता है, तो उसे सिल कहते हैं। यदि यह पतला हो तो उसे 'शीट' कहते हैं।
  • डाइक (Dyke): जब मैग्मा लंबवत रूप से चट्टानों की दरारों में जम जाता है, तो उसे डाइक कहते हैं।

ii. बहिर्वेधी स्थलाकृतियाँ (Extrusive Forms): जब मैग्मा सतह पर आकर ठंडा होता है।

  • शील्ड ज्वालामुखी (Shield Volcanoes): ये बेसाल्टिक लावा से बने होते हैं, जो बहुत तरल होता है और दूर तक फैल जाता है। इनका ढाल मंद होता है और ये चौड़े होते हैं (जैसे हवाई द्वीप के ज्वालामुखी)।
  • मिश्रित ज्वालामुखी (Composite Volcanoes): ये अधिक गाढ़े, अम्लीय लावा और राख के परतों के जमाव से बनते हैं। इनका ढाल तीव्र होता है और ये अधिक विस्फोटक होते हैं (जैसे माउंट फुजी)।
  • सिंडर शंकु (Cinder Cones): ये छोटे शंकु होते हैं जो मुख्य रूप से राख और छोटे चट्टानी टुकड़ों के जमाव से बनते हैं।
  • मध्य महासागरीय कटक ज्वालामुखी (Mid-Ocean Ridge Volcanoes): ये महासागरीय प्लेटों के अपसारी किनारों पर पाए जाते हैं, जहाँ लगातार नया क्रस्ट बन रहा होता है।

5. पृथ्वी की परतें (Layers of the Earth):
भूकंपीय तरंगों के व्यवहार के आधार पर पृथ्वी को मुख्य रूप से तीन संकेंद्रीय परतों में विभाजित किया गया है:

अ. भूपर्पटी (Crust):

  • यह पृथ्वी की सबसे बाहरी और सबसे पतली ठोस परत है।
  • मोटाई: महाद्वीपीय क्षेत्रों में 30-70 किमी (पहाड़ी क्षेत्रों में अधिक, जैसे हिमालय में 70 किमी तक) और महासागरीय तलों पर 5-10 किमी।
  • घनत्व: महाद्वीपीय क्रस्ट का औसत घनत्व 2.7 g/cm³ और महासागरीय क्रस्ट का 3.0 g/cm³।
  • संरचना:
    • महाद्वीपीय भूपर्पटी: मुख्य रूप से ग्रेनाइटिक चट्टानों से बनी है (सिलिका और एल्युमिनियम की अधिकता, इसलिए इसे सियाल (SiAl) भी कहते हैं)।
    • महासागरीय भूपर्पटी: मुख्य रूप से बेसाल्टिक चट्टानों से बनी है (सिलिका और मैग्नीशियम की अधिकता, इसलिए इसे सिमा (SiMa) भी कहते हैं)।
  • मोहरोविकिक असंबद्धता (Moho Discontinuity): भूपर्पटी और मेंटल के बीच की सीमा।

ब. मेंटल (Mantle):

  • यह भूपर्पटी के नीचे स्थित है और पृथ्वी के आयतन का लगभग 84% और द्रव्यमान का 67% हिस्सा है।
  • विस्तार: मोहरोविकिक असंबद्धता से लेकर 2900 किमी की गहराई तक।
  • घनत्व: 3.4 g/cm³ से 5.7 g/cm³ तक बढ़ता है।
  • संरचना: मुख्य रूप से सिलिकेट चट्टानों से बनी है जिसमें लौह और मैग्नीशियम की प्रचुरता होती है।
  • ऊपरी मेंटल:
    • दुर्बलतामंडल (Asthenosphere): यह ऊपरी मेंटल का ऊपरी भाग है (लगभग 400 किमी की गहराई तक)। यह अर्ध-तरल अवस्था में है, जहाँ चट्टानें पिघली हुई अवस्था में होती हैं। प्लेटें इसी के ऊपर तैरती हैं। यह ज्वालामुखी उद्गार के लिए मैग्मा का मुख्य स्रोत है।
  • निचला मेंटल: यह ठोस अवस्था में है।
  • गुटेनबर्ग असंबद्धता (Gutenberg Discontinuity): मेंटल और क्रोड के बीच की सीमा (2900 किमी की गहराई पर)।

स. क्रोड (Core):

  • यह पृथ्वी की सबसे आंतरिक परत है, जो गुटेनबर्ग असंबद्धता से लेकर पृथ्वी के केंद्र तक फैली हुई है।
  • विस्तार: 2900 किमी से 6370 किमी की गहराई तक।
  • घनत्व: 9.5 g/cm³ से 13.6 g/cm³ तक बढ़ता है।
  • संरचना: मुख्य रूप से निकिल (Ni) और लौह (Fe) से बनी है, इसलिए इसे निफे (NiFe) भी कहते हैं।
  • तापमान: अनुमानित तापमान 5000°C से अधिक।
  • बाह्य क्रोड (Outer Core):
    • अवस्था: तरल अवस्था में है (S-तरंगें यहाँ से नहीं गुजर पातीं)।
    • महत्व: पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र की उत्पत्ति का स्रोत माना जाता है, जो संवहन धाराओं के कारण होता है।
  • आंतरिक क्रोड (Inner Core):
    • अवस्था: अत्यधिक दबाव के कारण ठोस अवस्था में है।
  • लेहमैन असंबद्धता (Lehmann Discontinuity): बाह्य क्रोड और आंतरिक क्रोड के बीच की सीमा (लगभग 5150 किमी की गहराई पर)।

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

  1. पृथ्वी की आंतरिक संरचना की जानकारी का सबसे महत्वपूर्ण अप्रत्यक्ष स्रोत कौन सा है?
    a) खनन
    b) ज्वालामुखी उद्गार
    c) भूकंप विज्ञान
    d) उल्कापिंड का अध्ययन

  2. कौन सी भूकंपीय तरंगें केवल ठोस माध्यम से ही गुजर सकती हैं और तरल माध्यम में लुप्त हो जाती हैं?
    a) P-तरंगें
    b) S-तरंगें
    c) L-तरंगें
    d) उपरोक्त सभी

  3. भूकंप के दौरान ऊर्जा के निकलने का बिंदु क्या कहलाता है?
    a) अधिकेंद्र
    b) भूकंप मूल
    c) छाया क्षेत्र
    d) भ्रंश

  4. P-तरंगों का छाया क्षेत्र लगभग कितने डिग्री अक्षांशों के बीच पाया जाता है?
    a) 103° से 103°
    b) 103° से 142°
    c) 142° से 142°
    d) 105° से 105°

  5. पृथ्वी की कौन सी परत अर्ध-तरल अवस्था में है और प्लेटें इसी के ऊपर तैरती हैं?
    a) भूपर्पटी
    b) दुर्बलतामंडल
    c) बाह्य क्रोड
    d) आंतरिक क्रोड

  6. भूपर्पटी और मेंटल के बीच की असंबद्धता को क्या कहते हैं?
    a) गुटेनबर्ग असंबद्धता
    b) लेहमैन असंबद्धता
    c) मोहरोविकिक असंबद्धता
    d) कॉनराड असंबद्धता

  7. पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र की उत्पत्ति किस परत से संबंधित है?
    a) आंतरिक क्रोड
    b) बाह्य क्रोड
    c) मेंटल
    d) भूपर्पटी

  8. जब मैग्मा क्षैतिज रूप से चट्टानों की परतों के बीच जम जाता है, तो बनने वाली अंतर्वेधी स्थलाकृति क्या कहलाती है?
    a) डाइक
    b) लैकोलिथ
    c) सिल
    d) बैथोलिथ

  9. रिक्टर स्केल का उपयोग किसे मापने के लिए किया जाता है?
    a) भूकंप की तीव्रता
    b) भूकंप का परिमाण
    c) ज्वालामुखी की ऊंचाई
    d) सुनामी की लहरों की गति

  10. महाद्वीपीय भूपर्पटी मुख्य रूप से किन तत्वों से बनी होती है, जिसके कारण इसे 'सियाल' भी कहते हैं?
    a) सिलिका और मैग्नीशियम
    b) सिलिका और एल्युमिनियम
    c) निकिल और लौह
    d) एल्युमिनियम और मैग्नीशियम


उत्तरमाला:

  1. c) भूकंप विज्ञान
  2. b) S-तरंगें
  3. b) भूकंप मूल
  4. b) 103° से 142°
  5. b) दुर्बलतामंडल
  6. c) मोहरोविकिक असंबद्धता
  7. b) बाह्य क्रोड
  8. c) सिल
  9. b) भूकंप का परिमाण
  10. b) सिलिका और एल्युमिनियम

मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपको इस अध्याय को गहराई से समझने और सरकारी परीक्षाओं की तैयारी में मदद करेंगे। शुभकामनाएँ!

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