Class 11 Geography Notes Chapter 6 (भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ) – Bhautik Bhugol ke Mool Sidhant Book

Bhautik Bhugol ke Mool Sidhant
प्रिय विद्यार्थियों,

आज हम कक्षा 11 भूगोल की पाठ्यपुस्तक 'भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत' के अध्याय 6 'भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय विभिन्न सरकारी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह पृथ्वी की सतह पर होने वाले परिवर्तनों और उन्हें संचालित करने वाली शक्तियों की गहरी समझ प्रदान करता है।


अध्याय 6: भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ (Geomorphic Processes)

1. परिचय
हमारी पृथ्वी की सतह स्थिर नहीं है। यह लगातार आंतरिक (पृथ्वी के भीतर से) और बाह्य (पृथ्वी की सतह पर) बलों के कारण बदलती रहती है। ये बल विभिन्न भू-आकृतियों (पहाड़, पठार, मैदान, घाटियाँ आदि) का निर्माण, परिवर्तन और विनाश करते हैं।

  • भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ (Geomorphic Processes): वे प्राकृतिक बल जो पृथ्वी की सतह पर परिवर्तन लाते हैं और भू-आकृतियों के निर्माण व विनाश में सहायक होते हैं।
  • भू-आकृतिक कारक (Geomorphic Agents): वे गतिशील माध्यम (जैसे बहता जल, पवन, हिमनदी, समुद्री तरंगें, भूमिगत जल) जो भू-आकृतिक प्रक्रियाओं को संचालित करते हैं।
  • भू-आकृतियाँ (Landforms): भू-आकृतिक प्रक्रियाओं और कारकों के परिणामस्वरूप पृथ्वी की सतह पर बनने वाली विशिष्ट आकृतियाँ।

2. भू-आकृतिक प्रक्रियाओं के प्रकार
भू-आकृतिक प्रक्रियाओं को उनके उद्गम के आधार पर दो मुख्य श्रेणियों में बांटा गया है:

A. अंतर्जनित प्रक्रियाएँ (Endogenic Processes):
ये प्रक्रियाएँ पृथ्वी के आंतरिक भाग से उत्पन्न ऊर्जा द्वारा संचालित होती हैं। यह ऊर्जा पृथ्वी के अंदर रेडियोधर्मी तत्वों के विघटन, घूर्णन, ज्वारीय घर्षण और आदिम ताप से उत्पन्न होती है।

  • पटल विरूपण (Diastrophism): वे सभी प्रक्रियाएँ जो पृथ्वी की पपड़ी को ऊपर उठाती हैं, नीचे धंसाती हैं, मोड़ती हैं या तोड़ती हैं।
    • पर्वत निर्माणकारी बल (Orogeny): क्षैतिज संचलन के कारण उत्पन्न होते हैं, जिससे चट्टानों में वलन (फोल्डिंग) और भ्रंशन (फॉल्टिंग) होता है। ये बल पर्वतों के निर्माण के लिए जिम्मेदार हैं।
    • महाद्वीप निर्माणकारी बल (Epeirogeny): ऊर्ध्वाधर संचलन के कारण उत्पन्न होते हैं, जिससे महाद्वीपों का उत्थान (उपर उठना) या निमज्जन (नीचे धँसना) होता है।
  • भूकंप (Earthquakes): पृथ्वी की पपड़ी में अचानक होने वाले कंपन जो विवर्तनिक प्लेटों की गति या ज्वालामुखी गतिविधियों के कारण होते हैं।
  • ज्वालामुखी (Volcanism): पृथ्वी के आंतरिक भाग से पिघले हुए पदार्थ (मैग्मा), गैसों और राख का सतह पर आना। इसमें अंतर्वेधी (इंट्रूसिव) और बहिर्वेधी (एक्सट्रूसिव) दोनों प्रकार की ज्वालामुखी गतिविधियाँ शामिल हैं।

B. बहिर्जनित प्रक्रियाएँ (Exogenic Processes):
ये प्रक्रियाएँ पृथ्वी की सतह पर या उसके पास संचालित होती हैं। इनकी ऊर्जा सूर्य से प्राप्त होती है और ये पृथ्वी की सतह को समतल करने (अनाच्छादन) का कार्य करती हैं।

  • अनाच्छादन (Denudation): यह एक सामूहिक शब्द है जिसमें अपक्षय (Weathering), वृहत् संचलन (Mass Movements), अपरदन (Erosion) और निक्षेपण (Deposition) शामिल हैं। इसका शाब्दिक अर्थ है "नग्न करना" या "अनावृत करना"।
  • गुरुत्वाकर्षण बल (Gravitational Force): सभी बहिर्जनित प्रक्रियाओं का मूल चालक बल गुरुत्वाकर्षण है। यह ढलान पर पदार्थों को नीचे की ओर खींचता है, जिससे वृहत् संचलन और अपरदन होता है।

3. अनाच्छादन प्रक्रियाएँ (Denudational Processes):

i. अपक्षय (Weathering):
यह वह प्रक्रिया है जिसमें चट्टानें अपने स्थान पर ही टूटती-फूटती हैं या रासायनिक रूप से विघटित होती हैं, लेकिन उनका परिवहन नहीं होता। यह अपरदन के लिए सामग्री तैयार करता है।

  • यांत्रिक/भौतिक अपक्षय (Physical Weathering): चट्टानों का भौतिक रूप से छोटे टुकड़ों में टूटना।
    • तापमान में परिवर्तन (Temperature Changes): दिन में चट्टानों का गर्म होकर फैलना और रात में ठंडा होकर सिकुड़ना, जिससे उनमें दरारें पड़ जाती हैं (तापीय प्रतिबल)।
    • तुषार क्रिया (Frost Wedging/Action): चट्टानों की दरारों में पानी का जमना और पिघलना। जमने पर पानी का आयतन बढ़ता है, जिससे चट्टानें टूटती हैं। यह ठंडे और आर्द्र क्षेत्रों में प्रभावी है।
    • दाब मुक्ति (Pressure Release/Exfoliation): ऊपरी चट्टानों के हट जाने से नीचे की चट्टानों पर दाब कम होता है, जिससे वे फैलती हैं और प्याज के छिलके की तरह परतें उतरने लगती हैं।
    • लवण क्रिस्टलीकरण (Salt Crystallization): चट्टानों की दरारों में घुले हुए लवणों का वाष्पीकरण के कारण क्रिस्टल के रूप में जमना, जिससे आयतन बढ़ता है और चट्टानें टूटती हैं।
  • रासायनिक अपक्षय (Chemical Weathering): चट्टानों के रासायनिक संगठन में परिवर्तन।
    • विलयन (Solution): खनिजों का जल में घुलना (जैसे चूना पत्थर का घुलना)।
    • कार्बोनेशन (Carbonation): कार्बन डाइऑक्साइड युक्त जल (कार्बनिक अम्ल) द्वारा खनिजों का विघटन (जैसे चूना पत्थर पर कार्बनिक अम्ल की क्रिया)।
    • जलयोजन (Hydration): खनिजों का जल के साथ मिलकर नए, नरम खनिजों का निर्माण करना (जैसे फेल्सपार का मिट्टी में बदलना)।
    • ऑक्सीकरण (Oxidation): खनिजों का ऑक्सीजन के साथ प्रतिक्रिया करना (जैसे लोहे का जंग लगना)।
    • अपचयन (Reduction): ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में खनिजों का विघटन (दलदली क्षेत्रों में)।
  • जैविक अपक्षय (Biological Weathering): जीवों (पौधे, जानवर, सूक्ष्मजीव, मानव) द्वारा चट्टानों का टूटना या रासायनिक परिवर्तन।
    • पौधों की जड़ें चट्टानों की दरारों में घुसकर उन्हें तोड़ती हैं।
    • जानवर बिल खोदकर चट्टानों को ढीला करते हैं।
    • सूक्ष्मजीव रासायनिक परिवर्तन करते हैं।

ii. वृहत् संचलन (Mass Movements):
गुरुत्वाकर्षण बल के प्रत्यक्ष प्रभाव में, बिना किसी गतिशील माध्यम (जैसे जल, पवन) के, ढलान के सहारे चट्टानों और मिट्टी के मलबे का नीचे की ओर खिसकना।

  • धीमी गति के संचलन:
    • विसर्पण (Creep): मिट्टी या ढीले मलबे का बहुत धीमी गति से ढलान के सहारे नीचे खिसकना। यह अदृश्य होता है लेकिन पेड़ों के झुकाव या बाड़ के मुड़ने से पता चलता है।
    • मृदा प्रवाह (Solifluction): संतृप्त मिट्टी या मलबे का ढलान के सहारे धीमी गति से बहना, विशेषकर ठंडे क्षेत्रों में जहाँ पर्माफ्रॉस्ट (स्थायी रूप से जमी हुई मिट्टी) होता है।
  • तीव्र गति के संचलन:
    • भूस्खलन (Landslides): अपेक्षाकृत शुष्क पदार्थों का तेजी से ढलान से नीचे गिरना।
      • स्खलन (Slides): चट्टानों या मलबे का एक स्पष्ट भंजन सतह (fault plane) के सहारे नीचे खिसकना।
      • प्रवाह (Flows): जल-संतृप्त मलबे का तरल अवस्था में बहना (जैसे कीचड़ प्रवाह, मलबा प्रवाह)।
      • पतन (Falls): चट्टानों के टुकड़ों का सीधे खड़ी ढलान से नीचे गिरना (जैसे चट्टान पतन)।
    • कारण: ढाल की अस्थिरता, जल संतृप्ति, भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट, मानव गतिविधियाँ (सड़क निर्माण, खनन)।

iii. अपरदन (Erosion):
भू-आकृतिक कारकों (बहता जल, हिमनदी, पवन, समुद्री तरंगें, भूमिगत जल) द्वारा चट्टानों और मिट्टी का कटाव, परिवहन और स्थानांतरण। यह एक गतिशील प्रक्रिया है।

  • अपरदन के कारक (Agents of Erosion):
    • बहता जल (Running Water): नदियाँ और धाराएँ।
    • हिमनदी (Glaciers): बर्फ की विशाल गतिशील चादरें।
    • पवन (Wind): शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में।
    • समुद्री तरंगें (Sea Waves): तटीय क्षेत्रों में।
    • भूमिगत जल (Groundwater): चूना पत्थर क्षेत्रों में (कार्स्ट स्थलाकृति)।

iv. निक्षेपण (Deposition):
अपरदित पदार्थों (तलछट) का भू-आकृतिक कारकों द्वारा परिवहन के बाद किसी स्थान पर जमाव। जब कारकों की ऊर्जा कम हो जाती है, तो वे अपने साथ लाए गए पदार्थों को छोड़ देते हैं। निक्षेपण से विभिन्न निक्षेपित भू-आकृतियाँ बनती हैं।

4. भू-आकृतिक कारक और भू-आकृतियाँ
प्रत्येक भू-आकृतिक कारक अपरदन, परिवहन और निक्षेपण के माध्यम से विशिष्ट भू-आकृतियों का निर्माण करता है।

  • नदी (बहता जल): V-आकार की घाटी, गॉर्ज, कैनियन, जलप्रपात, जलोढ़ पंख, बाढ़ का मैदान, प्राकृतिक तटबंध, विसर्प (meanders), गोखुर झील, डेल्टा।
  • हिमनदी (Glacier): U-आकार की घाटी, सर्क, हॉर्न, एरेट, लटकती घाटी, हिमोढ़ (moraines), ड्रमलिन, एस्कर।
  • पवन (Wind): छत्रक शिला, इन्सेलबर्ग, वातगर्त, बालू के टीले (बरखान, अनुदैर्ध्य टीले), लोएस।
  • समुद्री तरंगें (Sea Waves): समुद्री भृगु (क्लिफ), तरंग घर्षित मंच, समुद्री गुफा, स्टैक, मेहराब, पुलिन (बीच), रोधिका (बार), लैगून।
  • भूमिगत जल (Groundwater): घोल रंध्र, डोलाइन, युवाला, पोनोर, कंदरा (गुफा), स्टैलेक्टाइट, स्टैलेग्माइट, कंदरा स्तंभ।

5. भू-आकृतिक प्रक्रियाओं की गति
भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ धीमी गति से (लाखों वर्षों में) या तीव्र गति से (जैसे भूकंप, ज्वालामुखी, भूस्खलन) कार्य कर सकती हैं। अधिकांश प्रक्रियाएँ धीमी होती हैं और निरंतर चलती रहती हैं, जिससे पृथ्वी की सतह पर धीरे-धीरे परिवर्तन आते हैं।


बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs) - अध्याय 6: भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ

1. निम्नलिखित में से कौन-सी प्रक्रिया अंतर्जनित प्रक्रिया का उदाहरण नहीं है?
a) भूकंप
b) ज्वालामुखी
c) पटल विरूपण
d) अपक्षय

2. अनाच्छादन में कौन-सी प्रक्रियाएँ शामिल हैं?
a) केवल अपक्षय और अपरदन
b) अपक्षय, वृहत् संचलन, अपरदन और निक्षेपण
c) केवल अपरदन और निक्षेपण
d) केवल वृहत् संचलन और अपरदन

3. चट्टानों का अपने स्थान पर ही टूटना-फूटना, लेकिन उनका परिवहन न होना, क्या कहलाता है?
a) अपरदन
b) निक्षेपण
c) अपक्षय
d) वृहत् संचलन

4. 'तापीय प्रतिबल' किस प्रकार के अपक्षय से संबंधित है?
a) रासायनिक अपक्षय
b) जैविक अपक्षय
c) यांत्रिक/भौतिक अपक्षय
d) इनमें से कोई नहीं

5. पर्माफ्रॉस्ट (स्थायी रूप से जमी हुई मिट्टी) वाले ठंडे क्षेत्रों में मृदा के धीमी गति से बहने को क्या कहते हैं?
a) भूस्खलन
b) विसर्पण
c) मृदा प्रवाह (सोलिफ्लक्शन)
d) चट्टान पतन

6. निम्नलिखित में से कौन-सा भू-आकृतिक कारक नहीं है?
a) बहता जल
b) हिमनदी
c) गुरुत्वाकर्षण
d) पवन

7. 'ओरोजेनी' (पर्वत निर्माणकारी बल) किस प्रकार के भू-आकृतिक बल से संबंधित है?
a) बहिर्जनित बल
b) अंतर्जनित बल
c) गुरुत्वाकर्षण बल
d) सौर बल

8. चूना पत्थर क्षेत्रों में भूमिगत जल द्वारा निर्मित विशिष्ट स्थलाकृति को क्या कहते हैं?
a) डेल्टा
b) कार्स्ट स्थलाकृति
c) मोरेन
d) छत्रक शिला

9. जब ऊपरी चट्टानों के हट जाने से नीचे की चट्टानों पर दाब कम होता है और वे फैलकर प्याज के छिलके की तरह उतरने लगती हैं, तो इस प्रक्रिया को क्या कहते हैं?
a) तुषार क्रिया
b) ऑक्सीकरण
c) दाब मुक्ति (एक्सफोलिएशन)
d) कार्बोनेशन

10. 'गोखुर झील' का निर्माण किस भू-आकृतिक कारक के अपरदन और निक्षेपण कार्य द्वारा होता है?
a) पवन
b) हिमनदी
c) समुद्री तरंगें
d) बहता जल (नदी)


उत्तरमाला:

  1. d) अपक्षय
  2. b) अपक्षय, वृहत् संचलन, अपरदन और निक्षेपण
  3. c) अपक्षय
  4. c) यांत्रिक/भौतिक अपक्षय
  5. c) मृदा प्रवाह (सोलिफ्लक्शन)
  6. c) गुरुत्वाकर्षण (यह एक बल है, कारक नहीं जो पदार्थ को गति दे)
  7. b) अंतर्जनित बल
  8. b) कार्स्ट स्थलाकृति
  9. c) दाब मुक्ति (एक्सफोलिएशन)
  10. d) बहता जल (नदी)

आशा है कि यह विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपकी सरकारी परीक्षाओं की तैयारी में सहायक होंगे। इस अध्याय को गहराई से समझने के लिए मानचित्रों और आकृतियों का भी अध्ययन करें। शुभकामनाएँ!

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