Class 11 Geography Notes Chapter 6 (मृदा) – Bharat Bhautik Paryavaran Book

Bharat Bhautik Paryavaran
नमस्ते विद्यार्थियों,

आज हम कक्षा 11 के भूगोल विषय की पुस्तक 'भारत भौतिक पर्यावरण' के अध्याय 6, 'मृदा' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। चलिए, इसके मुख्य बिंदुओं को विस्तार से समझते हैं।

अध्याय 6: मृदा (Soil)

1. मृदा का परिचय और निर्माण

  • परिभाषा: मृदा पृथ्वी की सबसे ऊपरी परत है, जो चट्टानों के टूटने-फूटने (अपक्षय) और जैविक पदार्थों के सड़ने-गलने से बनती है। यह एक जीवंत और गतिशील तंत्र है जिसमें पौधों को विकसित होने के लिए आवश्यक पोषक तत्व, जल और खनिज पदार्थ मिलते हैं।
  • मृदा निर्माण के कारक (Factors of Soil Formation): मृदा का निर्माण एक बहुत धीमी प्रक्रिया है, जिसे 'पीडोजेनेसिस' (Pedogenesis) कहते हैं। इसके मुख्य कारक हैं:
    1. जनक शैल (Parent Rock): यह मृदा का आधार होती है। इसी से मृदा को खनिज, रंग और रासायनिक गुण प्राप्त होते हैं।
    2. उच्चावच/स्थलाकृति (Relief/Topography): तीव्र ढाल वाले क्षेत्रों में मृदा की परत पतली होती है क्योंकि अपरदन अधिक होता है, जबकि समतल क्षेत्रों में मृदा की मोटी परत पाई जाती है।
    3. जलवायु (Climate): यह मृदा निर्माण का सबसे महत्वपूर्ण कारक है। तापमान और वर्षा अपक्षय और ह्यूमस निर्माण की प्रक्रिया को सीधे प्रभावित करते हैं।
    4. जैविक क्रियाएँ (Biological Activities): वनस्पति, जीव-जंतु और सूक्ष्मजीव ह्यूमस (जैविक पदार्थ) का निर्माण करते हैं, जो मृदा की उर्वरता को बढ़ाता है।
    5. समय (Time): मृदा के एक परिपक्व प्रोफाइल को विकसित होने में हजारों वर्ष लग जाते हैं।

2. मृदा परिच्छेदिका (Soil Profile)

मृदा की सतह से लेकर नीचे जनक चट्टान तक की ऊर्ध्वाधर परतों को मृदा परिच्छेदिका कहते हैं। इसकी मुख्य परतें (संस्तर) हैं:

  • संस्तर 'क' (Horizon 'A' / Topsoil): सबसे ऊपरी परत, जो जैविक पदार्थों और खनिजों से भरपूर होती है। पौधों की जड़ें इसी परत में फैलती हैं। इसे 'जैविक संस्तर' भी कहते हैं।
  • संस्तर 'ख' (Horizon 'B' / Subsoil): यह 'क' संस्तर के नीचे होती है। इसमें ऊपरी परत से निक्षालित (leached) होकर आए खनिज (जैसे आयरन, एल्युमिनियम) जमा होते हैं।
  • संस्तर 'ग' (Horizon 'C' / Parent Material): इसमें अपक्षयित जनक चट्टानी पदार्थ होते हैं। यह मृदा निर्माण की प्रक्रिया का पहला चरण है।
  • आधार शैल (Bedrock): सबसे नीचे की कठोर, अपक्षय-रहित चट्टान।

3. भारत की मृदाओं का वर्गीकरण (Classification of Indian Soils)

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने भारत की मृदाओं को उनकी उत्पत्ति, रंग, संयोजन तथा अवस्थिति के आधार पर निम्नलिखित वर्गों में बाँटा है:

1. जलोढ़ मृदा (Alluvial Soil):

  • विस्तार: यह भारत के सर्वाधिक क्षेत्र (लगभग 40%) पर पाई जाती है। यह उत्तरी मैदानों (पंजाब से असम तक) और तटीय क्षेत्रों में विस्तृत है।
  • निर्माण: नदियों द्वारा लाए गए अवसादों के निक्षेपण से।
  • विशेषताएँ: पोटाश और चूने की प्रचुरता, लेकिन नाइट्रोजन और ह्यूमस की कमी। यह बहुत उपजाऊ होती है।
  • प्रकार:
    • खादर (Khadar): नवीन जलोढ़, जो बाढ़ वाले मैदानों में पाई जाती है। यह बहुत महीन और अधिक उपजाऊ होती है।
    • बांगर (Bangar): पुरानी जलोढ़, जो नदी घाटियों से दूर ऊँचे क्षेत्रों में मिलती है। इसमें कंकड़ पाए जाते हैं और यह खादर से कम उपजाऊ होती है।
  • प्रमुख फसलें: गेहूँ, चावल, गन्ना, दलहन, तिलहन।

2. काली मृदा (Black Soil):

  • अन्य नाम: रेगुर मृदा, कपास मृदा।
  • विस्तार: दक्कन का पठार (महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश)।
  • निर्माण: ज्वालामुखी लावा (बेसाल्ट चट्टानों) के अपक्षय से।
  • विशेषताएँ: क्ले (चीका) की अधिकता, नमी धारण करने की उच्च क्षमता, सूखने पर दरारें पड़ जाती हैं। इसमें लोहा, चूना, कैल्शियम और मैग्नीशियम की प्रचुरता होती है, लेकिन नाइट्रोजन और फास्फोरस की कमी होती है।
  • प्रमुख फसलें: कपास (मुख्य), गन्ना, मूंगफली, तम्बाकू।

3. लाल और पीली मृदा (Red and Yellow Soil):

  • विस्तार: दक्कन पठार के पूर्वी और दक्षिणी भागों में, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ और मध्य गंगा के मैदानों के दक्षिणी भागों में।
  • निर्माण: रवेदार आग्नेय और रूपांतरित चट्टानों के अपक्षय से।
  • विशेषताएँ: लोहे के ऑक्साइड (Iron Oxide) की उपस्थिति के कारण इसका रंग लाल होता है। जब यह जल के संपर्क में आती है (जलयोजित रूप में), तो पीली दिखाई देती है। यह कम उपजाऊ होती है, लेकिन उर्वरकों के उपयोग से खेती की जा सकती है।
  • प्रमुख फसलें: बाजरा, दालें, तम्बाकू, मोटे अनाज।

4. लैटेराइट मृदा (Laterite Soil):

  • निर्माण: उच्च तापमान और भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में तीव्र निक्षालन (intense leaching) की प्रक्रिया से बनती है। सिलिका और चूना बह जाते हैं और लोहे व एल्युमिनियम के ऑक्साइड शेष रह जाते हैं।
  • विस्तार: पश्चिमी घाट, पूर्वी घाट, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और उत्तर-पूर्वी राज्यों के पहाड़ी क्षेत्रों में।
  • विशेषताएँ: यह अम्लीय (acidic) होती है और इसमें ह्यूमस की कमी होती है। यह ईंट बनाने के लिए उपयुक्त है।
  • प्रमुख फसलें: काजू, चाय, कॉफी, रबर।

5. शुष्क मृदा (Arid Soil):

  • विस्तार: पश्चिमी राजस्थान, दक्षिणी हरियाणा, पंजाब और गुजरात के कच्छ क्षेत्र।
  • विशेषताएँ: बलुई प्रकृति, लवण की मात्रा अधिक, नमी और ह्यूमस की कमी। नीचे की परतों में चूने (कंकड़) की परत पाई जाती है। सिंचाई की सहायता से इसे कृषि योग्य बनाया जा सकता है।
  • प्रमुख फसलें: बाजरा, ज्वार, सरसों, मोटे अनाज।

6. लवण मृदा (Saline Soil):

  • अन्य नाम: ऊसर मृदा।
  • विस्तार: शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों, नहर सिंचित क्षेत्रों (पंजाब, हरियाणा) और तटीय क्षेत्रों में।
  • विशेषताएँ: सोडियम, पोटेशियम और मैग्नीशियम की अधिकता के कारण यह अनुर्वर होती है।

7. पीटमय मृदा (Peaty Soil):

  • विस्तार: भारी वर्षा और उच्च आर्द्रता वाले क्षेत्र जैसे केरल, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल।
  • विशेषताएँ: जैविक पदार्थों की अधिकता (40-50%), भारी और गहरे काले रंग की, अत्यधिक अम्लीय।

8. वन मृदा (Forest Soil):

  • विस्तार: हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में।
  • विशेषताएँ: घाटियों में दोमट और सिल्टी, ऊपरी ढालों पर मोटे कणों वाली। ह्यूमस की अधिकता, लेकिन पोटाश, फास्फोरस और चूने की कमी।

4. मृदा अवकर्षण और संरक्षण (Soil Degradation and Conservation)

  • मृदा अवकर्षण: मृदा की उर्वरता में कमी आना। इसके मुख्य कारण हैं - मृदा अपरदन, वनों की कटाई, अत्यधिक चराई, रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग।
  • मृदा अपरदन (Soil Erosion): प्राकृतिक कारकों (जल, पवन) द्वारा मृदा की ऊपरी परत का हटना।
    • परत अपरदन (Sheet Erosion): जब जल एक विस्तृत क्षेत्र पर परत के रूप में मृदा को बहा ले जाता है।
    • अवनालिका अपरदन (Gully Erosion): जब तीव्र बहता जल गहरी नालियाँ बना देता है। चंबल के बीहड़ इसका प्रमुख उदाहरण हैं।
  • मृदा संरक्षण के उपाय:
    1. वनारोपण (Afforestation): अधिक से अधिक पेड़ लगाना।
    2. समोच्चरेखीय जुताई (Contour Ploughing): पहाड़ी ढलानों पर समोच्च रेखाओं के समानांतर जुताई करना।
    3. सीढ़ीदार खेती (Terrace Farming): तीव्र ढलानों पर सीढ़ियाँ बनाकर खेती करना।
    4. फसल चक्रण (Crop Rotation): एक ही खेत में अलग-अलग फसलें बारी-बारी से उगाना।
    5. रोक बाँध (Check Dams): अवनालिकाओं में छोटे-छोटे बाँध बनाकर जल के वेग को कम करना।
    6. मल्चिंग (Mulching): पौधों के बीच की खाली जमीन को जैविक पदार्थ की परत से ढकना।

अभ्यास हेतु बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

प्रश्न 1. 'रेगुर' मृदा का दूसरा नाम क्या है?
(क) जलोढ़ मृदा
(ख) काली मृदा
(ग) लाल मृदा
(घ) लैटेराइट मृदा

प्रश्न 2. भारत के सर्वाधिक क्षेत्रफल पर किस प्रकार की मृदा का विस्तार पाया जाता है?
(क) काली मृदा
(ख) लाल मृदा
(ग) जलोढ़ मृदा
(घ) लैटेराइट मृदा

प्रश्न 3. कपास की खेती के लिए सर्वाधिक उपयुक्त मृदा कौन-सी है?
(क) जलोढ़ मृदा
(ख) लैटेराइट मृदा
(ग) लाल मृदा
(घ) काली मृदा

प्रश्न 4. नवीन जलोढ़ मृदा को अन्य किस नाम से जाना जाता है?
(क) बांगर
(ख) खादर
(ग) रेगुर
(घ) कल्लर

प्रश्न 5. लैटेराइट मृदा का निर्माण निम्नलिखित में से किस प्रक्रिया द्वारा होता है?
(क) निक्षेपण
(ख) अपक्षय
(ग) निक्षालन (Leaching)
(घ) यांत्रिक अपक्षय

प्रश्न 6. मृदा की किस परत में ह्यूमस की मात्रा सर्वाधिक होती है?
(क) संस्तर 'क'
(ख) संस्तर 'ख'
(ग) संस्तर 'ग'
(घ) आधार शैल

प्रश्न 7. लौह ऑक्साइड की उपस्थिति के कारण किस मृदा का रंग लाल होता है?
(क) काली मृदा
(ख) जलोढ़ मृदा
(ग) लाल और पीली मृदा
(घ) वन मृदा

प्रश्न 8. चंबल घाटी में बनने वाले बीहड़ (Ravines) किस प्रकार के मृदा अपरदन का परिणाम हैं?
(क) परत अपरदन
(ख) अवनालिका अपरदन
(ग) वायु अपरदन
(घ) हिमानी अपरदन

प्रश्न 9. चाय, कॉफी और काजू की खेती के लिए कौन-सी मृदा सबसे उपयुक्त मानी जाती है?
(क) काली मृदा
(ख) जलोढ़ मृदा
(ग) शुष्क मृदा
(घ) लैटेराइट मृदा

प्रश्न 10. पहाड़ी ढलानों पर मृदा संरक्षण के लिए कौन-सी विधि सबसे प्रभावी है?
(क) फसल चक्रण
(ख) रक्षक मेखला (Shelter Belts)
(ग) समोच्चरेखीय जुताई
(घ) मल्चिंग


उत्तरमाला:

  1. (ख) काली मृदा - काली मृदा को 'रेगुर' या 'कपास मृदा' भी कहते हैं।
  2. (ग) जलोढ़ मृदा - यह भारत के लगभग 40% भू-भाग पर फैली है।
  3. (घ) काली मृदा - इसकी उच्च जल धारण क्षमता इसे कपास के लिए आदर्श बनाती है।
  4. (ख) खादर - नदियों द्वारा प्रतिवर्ष लाई जाने वाली नई जलोढ़ को 'खादर' कहते हैं।
  5. (ग) निक्षालन (Leaching) - भारी वर्षा के कारण पोषक तत्वों के नीचे की परतों में चले जाने की प्रक्रिया को निक्षालन कहते हैं।
  6. (क) संस्तर 'क' - यह सबसे ऊपरी परत होती है और जैविक पदार्थों (ह्यूमस) से भरपूर होती है।
  7. (ग) लाल और पीली मृदा - इसमें मौजूद आयरन ऑक्साइड के कारण इसका रंग लाल होता है।
  8. (ख) अवनालिका अपरदन - तेज बहता पानी जब गहरी नालियाँ बना देता है, तो उसे अवनालिका अपरदन कहते हैं।
  9. (घ) लैटेराइट मृदा - यह अम्लीय मृदा बागानी फसलों जैसे चाय, कॉफी और काजू के लिए उपयुक्त है।
  10. (ग) समोच्चरेखीय जुताई - यह ढलान पर जल के बहाव की गति को कम करती है और अपरदन रोकती है।

इन नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्नों का अच्छी तरह से अध्ययन करें। यह आपकी परीक्षा की तैयारी में बहुत सहायक होगा। शुभकामनाएँ

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