Class 11 Geography Notes Chapter 7 (भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास) – Bhautik Bhugol ke Mool Sidhant Book

प्रिय विद्यार्थियों,
भूगोल विषय के 'भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत' पुस्तक के अध्याय 7 'भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास' पर विस्तृत नोट्स यहाँ दिए गए हैं, जो आपकी सरकारी परीक्षाओं की तैयारी में अत्यंत सहायक सिद्ध होंगे।
अध्याय 7: भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास
यह अध्याय पृथ्वी की सतह पर विभिन्न भू-आकृतियों के निर्माण और उनके विकास की प्रक्रियाओं को समझाता है। भू-आकृतियाँ पृथ्वी की सतह पर पाए जाने वाले छोटे से मध्यम आकार के स्थलखंड होते हैं, जैसे पहाड़, पठार, मैदान, घाटियाँ आदि।
1. भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ (Geomorphic Processes):
ये वे प्राकृतिक बल हैं जो पृथ्वी की सतह को आकार देते हैं। इन्हें मुख्य रूप से दो भागों में बांटा गया है:
- अंतर्जनिक बल (Endogenic Forces): पृथ्वी के आंतरिक भाग से उत्पन्न होने वाले बल, जैसे ज्वालामुखी, भूकंप, प्लेट विवर्तनिकी। ये मुख्य रूप से भू-आकृतियों का निर्माण करते हैं।
- बहिर्जनिक बल (Exogenic Forces): पृथ्वी की सतह पर या उसके निकट काम करने वाले बल, जैसे अपक्षय, वृहत् संचलन, अपरदन और निक्षेपण। ये मुख्य रूप से भू-आकृतियों को संशोधित करते हैं या उनका विनाश करते हैं।
अनाच्छादन (Denudation): यह बहिर्जनिक प्रक्रियाओं का एक सामान्य शब्द है जिसमें अपक्षय, वृहत् संचलन, अपरदन और निक्षेपण शामिल हैं। ये सभी प्रक्रियाएँ पृथ्वी की सतह को समतल करने का कार्य करती हैं।
2. अपक्षय (Weathering):
यह वह प्रक्रिया है जिसमें चट्टानें अपने स्थान पर ही टूटती या विघटित होती हैं। इसमें पदार्थों का स्थानांतरण शामिल नहीं होता। अपक्षय तीन प्रकार का होता है:
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यांत्रिक अपक्षय (Physical/Mechanical Weathering): चट्टानों का भौतिक रूप से छोटे टुकड़ों में टूटना।
- पिंड विच्छेदन (Block Disintegration): तापमान परिवर्तन से चट्टानों का बड़े खंडों में टूटना।
- कणिकामय विच्छेदन (Granular Disintegration): चट्टानों के अलग-अलग खनिजों का छोटे कणों में टूटना।
- अपशल्कन/पपड़ी उतरना (Exfoliation): ऊपरी परत का प्याज के छिलके की तरह उतरना, मुख्य रूप से दाब मुक्ति के कारण।
- तुषार क्रिया (Frost Wedging): चट्टानों की दरारों में पानी जमने और पिघलने से चट्टानों का टूटना।
- लवण अपक्षय (Salt Weathering): चट्टानों की दरारों में लवण क्रिस्टलों के जमने से चट्टानों का टूटना।
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रासायनिक अपक्षय (Chemical Weathering): चट्टानों के रासायनिक संगठन में परिवर्तन।
- विलयन (Solution): खनिजों का पानी में घुलना (जैसे नमक)।
- कार्बोनेशन (Carbonation): कार्बन डाइऑक्साइड युक्त जल द्वारा चट्टानों के खनिजों का घुलना (जैसे चूना पत्थर)।
- जलयोजन (Hydration): खनिजों द्वारा जल का अवशोषण, जिससे उनका आयतन बढ़ता है और वे कमजोर पड़ते हैं।
- ऑक्सीकरण-न्यूनीकरण (Oxidation-Reduction): ऑक्सीजन के साथ खनिजों की प्रतिक्रिया (जैसे लोहे में जंग लगना)।
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जैविक अपक्षय (Biological Weathering): जीवों (पौधों, जानवरों, सूक्ष्मजीवों) द्वारा चट्टानों का टूटना।
अपक्षय का महत्व:
- यह अपरदन और वृहत् संचलन के लिए मार्ग प्रशस्त करता है।
- मृदा निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- खनिजों के संवर्धन में सहायक।
3. वृहत् संचलन (Mass Movements):
गुरुत्वाकर्षण बल के सीधे प्रभाव से चट्टान और मिट्टी के बड़े द्रव्यमान का ढाल के सहारे नीचे की ओर खिसकना। इसमें कोई बहिर्जनिक कारक (जल, पवन, हिमनद) सीधे तौर पर शामिल नहीं होता।
- धीमा संचलन (Slow Movements):
- मृदा सर्पण (Soil Creep): ढाल पर मिट्टी का धीरे-धीरे नीचे खिसकना।
- मृदा प्रवाह (Solifluction): संतृप्त मिट्टी का ढाल पर धीरे-धीरे खिसकना (विशेषकर पर्माफ्रॉस्ट क्षेत्रों में)।
- तीव्र संचलन (Rapid Movements):
- पंक प्रवाह (Mudflow): जल संतृप्त मिट्टी का तेजी से नीचे बहना।
- मलबा अवधाव (Debris Avalanche): चट्टान, मिट्टी और वनस्पति का तेजी से नीचे गिरना।
- भूस्खलन (Landslides): चट्टानों का अचानक और तेजी से ढाल से नीचे खिसकना।
- शैल स्खलन (Rockfall): चट्टानों का स्वतंत्र रूप से गिरना।
- मलबा स्खलन (Debris Slide): असंगठित मलबे का खिसकना।
- सर्पण (Slump): मिट्टी या चट्टान के एक खंड का घुमावदार सतह के साथ खिसकना।
4. अपरदन और निक्षेपण (Erosion and Deposition):
- अपरदन (Erosion): भू-पदार्थों का गतिशील कारकों (बहता जल, हिमनद, पवन, समुद्री तरंगें, भूमिगत जल) द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरण।
- निक्षेपण (Deposition): अपरदित पदार्थों का गतिहीन होने पर या गति मंद होने पर जमाव।
अपरदन और निक्षेपण दोनों ही विभिन्न भू-आकृतियों का निर्माण करते हैं।
विभिन्न भू-आकृतिक कारकों द्वारा निर्मित भू-आकृतियाँ:
A. बहते जल (नदी) द्वारा निर्मित भू-आकृतियाँ (Fluvial Landforms):
नदियाँ युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था से गुजरती हैं, जिनमें अलग-अलग भू-आकृतियाँ बनती हैं।
- अपरदनात्मक भू-आकृतियाँ:
- V-आकार की घाटी (V-shaped Valley): नदी की युवावस्था में तीव्र अधोमुखी कटाव से बनती है।
- गॉर्ज (Gorges): गहरी, संकरी घाटी जिसकी दीवारें खड़ी होती हैं।
- कैनियन (Canyons): गॉर्ज का बड़ा रूप, बहुत गहरी और चौड़ी।
- जलप्रपात (Waterfalls): नदी का अचानक ऊँचाई से नीचे गिरना।
- जल गर्तिकाएँ (Potholes): नदी तल में अपरदन से बनी छोटी, गोलाकार गहराइयाँ।
- नदी वेदिकाएँ (River Terraces): पुराने बाढ़ के मैदानों के अवशेष जो नदी के अधोमुखी कटाव के कारण ऊपर उठ जाते हैं।
- अधःकर्तित विसर्प (Incised Meanders): जब नदी अपने पुराने विसर्प को कठोर चट्टानों में गहराई तक काटती है।
- निक्षेपात्मक भू-आकृतियाँ:
- जलोढ़ पंख (Alluvial Fans): पर्वतीय क्षेत्रों से निकलकर मैदानी क्षेत्रों में प्रवेश करने पर नदी द्वारा जमा किए गए अवसादों से बनी पंखे के आकार की संरचना।
- डेल्टा (Deltas): नदी के मुहाने पर अवसादों के जमाव से बनी त्रिभुजाकार आकृति।
- बाढ़ के मैदान (Floodplains): नदी के बाढ़ के दौरान अवसादों के जमाव से बने समतल मैदान।
- प्राकृतिक तटबंध (Natural Levees): बाढ़ के दौरान नदी के किनारों पर जमा अवसादों से बनी ऊँची दीवारें।
- विसर्प (Meanders): नदी का घुमावदार मार्ग, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था में बनता है।
- गोखुर झीलें (Ox-bow Lakes): नदी के विसर्प का मुख्य धारा से कटकर अलग हो जाने से बनी घोड़े की नाल जैसी झीलें।
B. भूमिगत जल द्वारा निर्मित भू-आकृतियाँ (Karst Landforms):
ये भू-आकृतियाँ चूना पत्थर या डोलोमाइट जैसी घुलनशील चट्टानों वाले क्षेत्रों में भूमिगत जल की रासायनिक क्रिया (कार्बोनेशन) से बनती हैं। इसे कार्स्ट स्थलाकृति कहते हैं।
- अपरदनात्मक भू-आकृतियाँ:
- लैपीज (Lapies): चूना पत्थर की सतह पर बनी अनियमित खाँचें और कटकें।
- घोल रंध्र (Sinkholes): चूना पत्थर की सतह पर बने गोलाकार या अंडाकार गड्ढे।
- डोलाइन (Doline): छोटे से मध्यम आकार के घोल रंध्र।
- युवाला (Uvala): कई डोलाइन के मिलने से बनी बड़ी घाटीनुमा संरचना।
- पोनोर (Ponor): घोल रंध्रों के नीचे की ओर खुलने वाले मार्ग जो भूमिगत कंदराओं से जुड़ते हैं।
- कंदराएँ (Caves): भूमिगत जल द्वारा चट्टानों में बनी बड़ी गुफाएँ।
- निक्षेपात्मक भू-आकृतियाँ (कंदराओं के भीतर):
- स्टैलेग्माइट (Stalagmite): कंदरा की फर्श से ऊपर की ओर बढ़ने वाले स्तंभ, छत से टपकते पानी में घुले खनिजों के जमाव से बनते हैं।
- स्टैलेक्टाइट (Stalactite): कंदरा की छत से नीचे लटकने वाले स्तंभ, छत से टपकते पानी में घुले खनिजों के जमाव से बनते हैं।
- कंदरा स्तंभ (Cave Pillars): स्टैलेग्माइट और स्टैलेक्टाइट के आपस में मिल जाने से बनी संरचना।
C. हिमनद द्वारा निर्मित भू-आकृतियाँ (Glacial Landforms):
हिमनद (ग्लेशियर) धीमी गति से चलने वाली बर्फ की नदियाँ हैं, जो मुख्य रूप से उच्च अक्षांशों और उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाती हैं।
- अपरदनात्मक भू-आकृतियाँ:
- सर्क (Cirque): हिमनद के शीर्ष पर बनी आराम कुर्सी के आकार की गहरी, कटोरेनुमा घाटी।
- अरीट (Arete): दो सर्क के बीच की संकरी, दाँतेदार कटक।
- हॉर्न (Horn): तीन या अधिक सर्क के मिलन से बनी नुकीली चोटी (जैसे मैटरहॉर्न)।
- U-आकार की घाटी (U-shaped Valley): हिमनद द्वारा अपरदित घाटी का विशिष्ट आकार।
- लटकती घाटी (Hanging Valley): मुख्य हिमनद घाटी से ऊँचाई पर स्थित सहायक हिमनद घाटी।
- फियोर्ड (Fiords): हिमनद द्वारा अपरदित गहरी, संकरी तटीय घाटी जो समुद्र में डूब जाती है।
- भेड़पीठ शैल (Roche Moutonnée): हिमनद द्वारा चिकनी और खुरदरी की गई चट्टानें।
- निक्षेपात्मक भू-आकृतियाँ (हिमोढ़/मोरेन - Moraines): हिमनद द्वारा बहाकर लाए गए और जमा किए गए अवसाद।
- अंत्य हिमोढ़ (Terminal Moraine): हिमनद के अग्र भाग पर जमा अवसाद।
- पार्श्विक हिमोढ़ (Lateral Moraine): हिमनद घाटी के किनारों पर जमा अवसाद।
- मध्यस्थ हिमोढ़ (Medial Moraine): दो हिमनदों के मिलने से उनकी पार्श्विक हिमोढ़ों के बीच बनने वाली हिमोढ़।
- तलस्थ हिमोढ़ (Ground Moraine): हिमनद के तल पर जमा अवसाद।
- ड्रम्लिन (Drumlins): हिमनद द्वारा जमा किए गए अंडे के आकार के टीले, जिनका ढाल हिमनद के प्रवाह की दिशा में होता है।
- एस्कर (Eskers): हिमनद के भीतर बहने वाली नदियों द्वारा जमा किए गए सर्पिलाकार कटक।
- केम (Kames): हिमनद के किनारों पर या दरारों में जमा अवसादों से बनी अनियमित पहाड़ियाँ।
- हिमानी धौत मैदान (Outwash Plains): हिमनद के पिघलने से निकलने वाले जल द्वारा जमा किए गए अवसादों से बने मैदान।
D. पवन द्वारा निर्मित भू-आकृतियाँ (Aeolian Landforms):
ये भू-आकृतियाँ मुख्य रूप से शुष्क और अर्द्ध-शुष्क (मरुस्थलीय) क्षेत्रों में पवन की अपरदन और निक्षेपण क्रियाओं से बनती हैं।
- अपरदनात्मक भू-आकृतियाँ:
- अपवाहन गर्त (Deflation Hollows): पवन द्वारा धूल और रेत को उड़ा ले जाने से बने गड्ढे।
- पेडीमेंट (Pediments): मरुस्थलीय पर्वतों के आधार पर बनी कम ढाल वाली चट्टानी सतहें।
- इन्सेलबर्ग (Inselbergs): अपरदन प्रतिरोधी चट्टानों के बचे हुए अवशेष, जो मैदान में एकाकी पहाड़ियों के रूप में खड़े होते हैं।
- छत्रक शैल (Mushroom Rocks/Gour): पवन द्वारा चट्टान के निचले हिस्से को अधिक अपरदित करने से बनी छत्रक के आकार की शैल।
- यारदांग (Yardangs): पवन द्वारा नरम चट्टानों को अपरदित करने से बनी कटकें और खाँचें।
- जूजेन (Zuegen): कठोर और नरम चट्टानों की क्षैतिज परतों वाले क्षेत्रों में पवन द्वारा अपरदन से बनी मेजनुमा संरचनाएँ।
- निक्षेपात्मक भू-आकृतियाँ:
- बालू के टीले (Sand Dunes): पवन द्वारा रेत के जमाव से बनी पहाड़ियाँ।
- बरखान (Barchans): अर्धचंद्राकार टीले, जिनकी भुजाएँ पवन की दिशा में होती हैं।
- अनुदैर्ध्य टीले (Longitudinal Dunes): पवन की दिशा के समानांतर बने टीले।
- अनुप्रस्थ टीले (Transverse Dunes): पवन की दिशा के समकोण पर बने टीले।
- परवलयिक टीले (Parabolic Dunes): बरखान के विपरीत, जिनकी भुजाएँ पवन की विपरीत दिशा में होती हैं (वनस्पति युक्त)।
- लोएस (Loess): पवन द्वारा उड़ाकर लाई गई महीन गाद (silt) के जमाव से बने विस्तृत मैदान।
- बालू के टीले (Sand Dunes): पवन द्वारा रेत के जमाव से बनी पहाड़ियाँ।
E. समुद्री तरंगों द्वारा निर्मित भू-आकृतियाँ (Coastal Landforms):
ये भू-आकृतियाँ समुद्री तरंगों, धाराओं और ज्वार-भाटा की अपरदन और निक्षेपण क्रियाओं से बनती हैं।
- अपरदनात्मक भू-आकृतियाँ:
- भृगु (Cliffs): समुद्र की ओर खड़े ढाल वाली चट्टानी दीवारें।
- तटीय कंदराएँ (Sea Caves): तरंगों द्वारा भृगु के आधार पर बनी गुफाएँ।
- मेहराब (Arches): जब दो कंदराएँ आपस में मिल जाती हैं या एक कंदरा का ऊपरी भाग गिर जाता है।
- स्टैक (Stacks): मेहराब के ढह जाने के बाद समुद्र में खड़ी चट्टानें।
- स्टम्प (Stumps): स्टैक के और अपरदित होने से बने छोटे अवशेष।
- तरंग घर्षित वेदिका (Wave-cut platforms): तरंगों द्वारा भृगु के आधार पर अपरदित समतल सतह।
- निक्षेपात्मक भू-आकृतियाँ:
- पुलिन (Beaches): समुद्र तट पर तरंगों द्वारा जमा रेत और बजरी।
- शृंगारिका (Bars): तट के समानांतर जलमग्न या जल के ऊपर बनी रेत या बजरी की कटकें।
- रोधिका (Barriers): शृंगारिका का बड़ा रूप, जो खाड़ी के मुहाने को आंशिक या पूर्ण रूप से बंद कर देती है।
- स्पिट (Spits): एक छोर पर तट से जुड़ी और दूसरे छोर पर समुद्र में फैली रेत की पट्टी।
- लूप (Lagoons): रोधिका या स्पिट द्वारा समुद्र से अलग किया गया खारे पानी का निकाय।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs):
-
निम्नलिखित में से कौन-सी प्रक्रिया अनाच्छादन (Denudation) का हिस्सा नहीं है?
a) अपक्षय
b) वृहत् संचलन
c) ज्वालामुखी
d) अपरदन -
'पिंड विच्छेदन' किस प्रकार के अपक्षय का उदाहरण है?
a) रासायनिक अपक्षय
b) यांत्रिक अपक्षय
c) जैविक अपक्षय
d) इनमें से कोई नहीं -
चूना पत्थर क्षेत्रों में भूमिगत जल द्वारा निर्मित घोल रंध्रों (Sinkholes) के बड़े रूप को क्या कहते हैं?
a) लैपीज
b) युवाला
c) स्टैलेक्टाइट
d) पोनोर -
'गोखुर झीलें' किस भू-आकृतिक कारक द्वारा निर्मित निक्षेपात्मक स्थलाकृति हैं?
a) हिमनद
b) पवन
c) बहता जल (नदी)
d) समुद्री तरंगें -
'सर्क' और 'हॉर्न' किस भू-आकृतिक कारक द्वारा निर्मित अपरदनात्मक भू-आकृतियाँ हैं?
a) पवन
b) हिमनद
c) भूमिगत जल
d) समुद्री तरंगें -
मरुस्थलीय क्षेत्रों में पवन द्वारा निर्मित अर्धचंद्राकार बालू के टीलों को क्या कहते हैं?
a) अनुदैर्ध्य टीले
b) लोएस
c) बरखान
d) ड्रम्लिन -
जब स्टैलेग्माइट और स्टैलेक्टाइट आपस में मिल जाते हैं, तो किस संरचना का निर्माण होता है?
a) घोल रंध्र
b) कंदरा स्तंभ
c) लैपीज
d) डोलाइन -
'फियोर्ड' किस प्रकार की घाटी का उदाहरण है जो हिमनद द्वारा अपरदित होती है और समुद्र में डूब जाती है?
a) V-आकार की घाटी
b) U-आकार की घाटी
c) लटकती घाटी
d) गॉर्ज -
'प्राकृतिक तटबंध' किस भू-आकृतिक कारक द्वारा निर्मित निक्षेपात्मक भू-आकृति है?
a) हिमनद
b) पवन
c) समुद्री तरंगें
d) बहता जल (नदी) -
'भूस्खलन' किस प्रकार के वृहत् संचलन का उदाहरण है?
a) धीमा संचलन
b) तीव्र संचलन
c) मृदा सर्पण
d) मृदा प्रवाह
उत्तरमाला:
- c) ज्वालामुखी
- b) यांत्रिक अपक्षय
- b) युवाला
- c) बहता जल (नदी)
- b) हिमनद
- c) बरखान
- b) कंदरा स्तंभ
- b) U-आकार की घाटी
- d) बहता जल (नदी)
- b) तीव्र संचलन
आशा है, यह विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपकी तैयारी में सहायक होंगे। शुभकामनाएँ!