Class 11 Hindi Notes Chapter 12 (जैनेंद्र कुमार) – Aroh Book

चलिए, आज हम कक्षा 11 की 'आरोह' पुस्तक के अध्याय 12, 'जैनेंद्र कुमार' और उनके द्वारा रचित निबंध 'बाज़ार दर्शन' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय सरकारी परीक्षाओं की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें लेखक के जीवन परिचय, उनकी साहित्यिक विशेषताओं और निबंध के मूल संदेश से जुड़े प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।
विस्तृत नोट्स: जैनेंद्र कुमार (अध्याय - 12)
1. लेखक परिचय: जैनेंद्र कुमार (1905 - 1988)
- जन्म: सन् 1905, कौड़ियागंज, अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश)।
- मूल नाम: आनंदीलाल।
- निधन: सन् 1988।
- प्रमुख रचनाएँ:
- उपन्यास: 'परख', 'सुनीता', 'त्यागपत्र', 'कल्याणी', 'सुखदा', 'विवर्त', 'व्यतीत', 'जयवर्धन', 'मुक्तिबोध'।
- कहानी-संग्रह: 'वातायन', 'एक रात', 'दो चिड़ियाँ', 'फाँसी', 'नीलम देश की राजकन्या', 'पाजेब'।
- निबंध-संग्रह: 'प्रस्तुत प्रश्न', 'जड़ की बात', 'पूर्वोदय', 'साहित्य का श्रेय और प्रेय', 'सोच-विचार', 'समय और हम'।
- प्रमुख सम्मान:
- साहित्य अकादमी पुरस्कार ('मुक्तिबोध' उपन्यास के लिए)।
- भारत-भारती सम्मान।
- पद्म भूषण (भारत सरकार द्वारा)।
- साहित्यिक विशेषताएँ:
- हिंदी साहित्य में प्रेमचंद के बाद सबसे महत्वपूर्ण कथाकार के रूप में प्रतिष्ठित।
- इन्हें 'मनोवैज्ञानिक कथा साहित्य का प्रणेता' माना जाता है। इन्होंने पहली बार हिंदी कथा साहित्य में व्यक्ति के मन की गहराइयों, उसकी उलझनों, और मनोवैज्ञानिक सत्यों को प्रस्तुत किया।
- इनकी रचनाओं पर गांधीवादी विचारधारा का गहरा प्रभाव है।
- भाषा अत्यंत सरल, सहज और अनौपचारिक है, लेकिन उसके भीतर छिपे अर्थ बहुत गहरे और दार्शनिक होते हैं।
2. पाठ का सारांश: 'बाज़ार दर्शन' (निबंध)
'बाज़ार दर्शन' जैनेंद्र कुमार का एक विचारोत्तेजक निबंध है, जिसमें वे बाज़ार, उपभोक्तावाद और पैसे के मनोविज्ञान पर गहरी टिप्पणी करते हैं।
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निबंध का आरंभ: लेखक अपने दो मित्रों के उदाहरण से बात शुरू करते हैं।
- पहला मित्र: बाज़ार में मामूली चीज़ लेने जाता है, लेकिन लौटता है तो उसके हाथ में बहुत से बंडल होते हैं। पूछने पर सारा दोष अपनी पत्नी पर डाल देता है। लेखक के अनुसार, यह पैसे की गर्मी या 'पर्चेजिंग पावर' का प्रदर्शन है।
- दूसरा मित्र: दोपहर में बाज़ार गया और शाम को खाली हाथ लौट आया। कारण पूछने पर बताया कि बाज़ार में सब कुछ लेने योग्य था, पर वह कुछ भी नहीं छोड़ना चाहता था, इसलिए कुछ भी नहीं ले पाया। इसका अर्थ है कि यदि आपको अपनी ज़रूरत का ठीक-ठीक पता नहीं है, तो बाज़ार की चकाचौंध आपको भ्रमित कर देगी।
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बाज़ार का जादू:
- लेखक बाज़ार के आकर्षण को 'जादू' कहते हैं। यह जादू आँखों के रास्ते काम करता है (रूप का जादू)।
- यह जादू तभी असर करता है, जब जेब भरी हो और मन खाली हो। 'मन खाली होने' का अर्थ है, जब हमें यह पता न हो कि हमें क्या खरीदना है। ऐसे में बाज़ार की हर चीज़ हमें ज़रूरी और आकर्षक लगती है।
- इस जादू से बचने का सरल उपाय है कि मन खाली लेकर बाज़ार न जाया जाए। जब मन भरा हो (यानी लक्ष्य निश्चित हो), तो बाज़ार की चकाचौंध आप पर असर नहीं करेगी।
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भगत जी का उदाहरण:
- लेखक अपने पड़ोस में रहने वाले भगत जी का उदाहरण देते हैं, जो चूरन बेचते हैं।
- भगत जी का नियम था कि वे रोज़ाना केवल छह आने की कमाई करते थे। जैसे ही छह आने पूरे हो जाते, वे बचा हुआ चूरन बच्चों में मुफ़्त बाँट देते थे।
- उन पर बाज़ार का कोई जादू नहीं चलता था। वे चाँदनी चौक से गुज़रते थे, जहाँ बड़े-बड़े फैंसी स्टोर थे, लेकिन वे सीधे पंसारी की दुकान पर जाते, अपना जीरा और काला नमक खरीदते और वापस आ जाते।
- ऐसा इसलिए था क्योंकि उनका मन भरा हुआ था, उन्हें अपनी ज़रूरत का स्पष्ट पता था। वे संतोष और आत्म-नियंत्रण के प्रतीक हैं।
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पैसे की व्यंग्य-शक्ति:
- लेखक के अनुसार, पैसा एक शक्ति है, जिसे लोग 'पर्चेजिंग पावर' कहते हैं। कुछ लोग इस पावर को दिखाने के लिए अनावश्यक खरीदारी करते हैं और इसमें गर्व महसूस करते हैं।
- जो लोग संयमी होते हैं, वे इस पैसे की शक्ति को समझते हैं और उसे नियंत्रित रखते हैं।
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बाज़ार का सच्चा उद्देश्य और अर्थशास्त्र:
- लेखक के अनुसार, बाज़ार का उद्देश्य ज़रूरत के समय काम आना है।
- लेकिन जब बाज़ार दिखावे, शोषण और छल-कपट का केंद्र बन जाता है, तो वह मानवता के लिए विडंबना बन जाता है। ऐसा बाज़ार अर्थशास्त्र नहीं, बल्कि अनीतिशास्त्र है। यह लोगों में असंतोष, ईर्ष्या और तृष्णा को बढ़ाता है।
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण बिंदु:
- पर्चेजिंग पावर: पैसे की खरीदने की शक्ति, जिसका प्रदर्शन लोग अनावश्यक वस्तुएँ खरीदकर करते हैं।
- बाज़ार का जादू: बाज़ार का आकर्षण जो खाली मन और भरी जेब वाले व्यक्ति पर सर्वाधिक प्रभाव डालता है।
- खाली मन: जब व्यक्ति को अपनी ज़रूरतों का स्पष्ट ज्ञान न हो।
- भरा मन: जब व्यक्ति अपने लक्ष्य और ज़रूरतों के प्रति सचेत हो।
- भगत जी: आत्म-नियंत्रण, संतोष और बाज़ार के जादू से मुक्त व्यक्ति का प्रतीक।
- अर्थशास्त्र बनाम अनीतिशास्त्र: जब बाज़ार आवश्यकता पूर्ति का साधन हो तो वह अर्थशास्त्र है, और जब वह शोषण और कपट का केंद्र बन जाए तो अनीतिशास्त्र है।
अभ्यास हेतु 10 बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
प्रश्न 1: जैनेंद्र कुमार का मूल नाम क्या था?
(क) धनपत राय
(ख) आनंदीलाल
(ग) वैद्यनाथ मिश्र
(घ) प्रभुदयाल
प्रश्न 2: 'बाज़ार दर्शन' पाठ के अनुसार, बाज़ार का जादू किस रास्ते काम करता है?
(क) कान के रास्ते
(ख) नाक के रास्ते
(ग) हाथ के रास्ते
(घ) आँख के रास्ते
प्रश्न 3: लेखक के अनुसार, बाज़ार जाते समय मन कैसा नहीं होना चाहिए?
(क) भरा हुआ
(ख) खाली
(ग) प्रसन्न
(घ) दुखी
प्रश्न 4: पाठ में चूरन बेचने वाले भगत जी प्रतिदिन कितनी कमाई करते थे?
(क) छह रुपये
(ख) छह पैसे
(ग) छह आने
(घ) दस आने
प्रश्न 5: जैनेंद्र कुमार को उनके किस उपन्यास के लिए 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' मिला?
(क) त्यागपत्र
(ख) सुनीता
(ग) परख
(घ) मुक्तिबोध
प्रश्न 6: लेखक ने उस अर्थशास्त्र को क्या कहा है जो शोषण पर आधारित हो?
(क) समाजशास्त्र
(ख) अनीतिशास्त्र
(ग) कुनीतिशास्त्र
(घ) दर्शनशास्त्र
प्रश्न 7: 'पर्चेजिंग पावर' का क्या अर्थ है?
(क) बेचने की शक्ति
(ख) खरीदने की शक्ति
(ग) सोचने की शक्ति
(घ) त्यागने की शक्ति
प्रश्न 8: पाठ के अनुसार, बाज़ार की सार्थकता किसमें है?
(क) ग्राहकों को लुभाने में
(ख) पैसे का प्रदर्शन करने में
(ग) आवश्यकता के समय काम आने में
(घ) महँगी चीज़ें बेचने में
प्रश्न 9: लेखक का पहला मित्र बाज़ार से बहुत सारा सामान खरीदने का दोष किस पर मढ़ता है?
(क) अपनी पत्नी पर
(ख) बच्चों पर
(ग) दुकानदार पर
(घ) बाज़ार के जादू पर
प्रश्न 10: भगत जी का चरित्र किस गुण का प्रतीक है?
(क) लालच और ईर्ष्या
(ख) असंतोष और तृष्णा
(ग) संतोष और आत्म-नियंत्रण
(घ) प्रदर्शन और दिखावा
उत्तरमाला:
- (ख) आनंदीलाल
- (घ) आँख के रास्ते
- (ख) खाली
- (ग) छह आने
- (घ) मुक्तिबोध
- (ख) अनीतिशास्त्र
- (ख) खरीदने की शक्ति
- (ग) आवश्यकता के समय काम आने में
- (क) अपनी पत्नी पर
- (ग) संतोष और आत्म-नियंत्रण