Class 11 Hindi Notes Chapter 9 (फ़िराक़ गोरखपुरी: रफ़बाइयाँ; गजल) – Aroh Book

ज़रूर, चलिए हम कक्षा 11 की 'आरोह' पुस्तक के नौवें अध्याय, 'फ़िराक़ गोरखपुरी' की रुबाइयों और गजल का गहन अध्ययन करते हैं। यह अध्याय प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें भाषा, भाव और काव्य-रूप, तीनों का अद्भुत संगम है।
अध्याय 9: फ़िराक़ गोरखपुरी - रुबाइयाँ और ग़ज़ल
कवि परिचय: फ़िराक़ गोरखपुरी (रघुपति सहाय 'फ़िराक़')
- मूल नाम: रघुपति सहाय 'फ़िराक़'। फ़िराक़ उनका तखल्लुस (उपनाम) था।
- जन्म: 28 अगस्त 1896, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश।
- शिक्षा: उनकी शिक्षा रामकृष्ण की कहानियों से शुरू हुई और बाद में उन्होंने अरबी, फ़ारसी और अंग्रेज़ी में शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. किया।
- कार्यक्षेत्र: वे भारतीय सिविल सेवा (PCS और ICS) के लिए चुने गए, लेकिन महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रेरित होकर उन्होंने पद त्याग दिया। बाद में वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी के अध्यापक रहे।
- साहित्यिक विशेषताएँ:
- फ़िराक़ उर्दू शायरी की परंपरा में एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं, लेकिन उनकी शायरी की खास बात यह है कि उसमें भारतीय संस्कृति और लोक-जीवन के रंग गहरे बसे हुए हैं।
- उन्होंने उर्दू शायरी को घरेलू बिंबों (जैसे- माँ, बच्चा, दीवाली, राखी) से जोड़ा, जो पहले बहुत कम देखने को मिलता था।
- उनकी भाषा में हिंदी, उर्दू और लोकभाषा का सहज मिश्रण है, जिसे 'हिन्दुस्तानी' भाषा का आदर्श रूप माना जा सकता है।
- उनकी शायरी में दर्द, प्रेम की कसक और एक रहस्यमयी उदासी के साथ-साथ सामाजिक दुख-दर्द भी झलकता है।
- प्रमुख रचनाएँ: 'गुले-नग्मा', 'बज़्मे-ज़िंदगी', 'रंगे-शायरी', 'उर्दू की इश्किया शायरी'।
- सम्मान: उन्हें 'गुले-नग्मा' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार (1960) और ज्ञानपीठ पुरस्कार (1969) से सम्मानित किया गया। यह बहुत महत्वपूर्ण तथ्य है।
विस्तृत नोट्स: रुबाइयाँ
'रुबाई' उर्दू और फ़ारसी का एक छंद या लेखन-शैली है। इसमें चार पंक्तियाँ होती हैं। इसकी पहली, दूसरी और चौथी पंक्ति में तुक (क़ाफ़िया) मिलाया जाता है, जबकि तीसरी पंक्ति स्वतंत्र होती है। इसका छंद विधान (AABA) होता है।
पहली रुबाई का भावार्थ:
"आँगन में लिए चाँद के टुकड़े को खड़ी..."
- प्रसंग: इस रुबाई में एक माँ अपने प्यारे बच्चे को नहलाकर आँगन में खड़ी है।
- भावार्थ: माँ अपने बच्चे को 'चाँद का टुकड़ा' कहती है। वह उसे अपने हाथों पर झुलाती है। बच्चा खुशी से खिलखिलाता है और उसकी निर्मल हँसी से पूरा घर गूँज उठता है। माँ उसे नए कपड़े पहनाती है और उसके रूप को निहारती रहती है। इसमें माँ का अपने बच्चे के प्रति गहरा वात्सल्य भाव प्रकट हुआ है।
- काव्य सौंदर्य:
- रस: वात्सल्य रस।
- बिंब: दृश्य बिंब (माँ का बच्चे को हाथ पर झुलाना, बच्चे का खिलखिलाना)।
- भाषा: सरल, सहज हिन्दुस्तानी भाषा जिसमें आम बोलचाल के शब्द हैं।
- विशेष: 'चाँद के टुकड़े' में बच्चे के सौंदर्य और माँ के प्रेम की पराकाष्ठा है।
दूसरी रुबाई का भावार्थ:
"नहला के छलके-छलके निर्मल जल से..."
- प्रसंग: दीवाली के त्यौहार का वर्णन है।
- भावार्थ: दीवाली की शाम है, घर साफ़-सुथरा और सजा हुआ है। माँ चीनी के बने सुंदर खिलौने (जो दीवाली पर मिलते हैं) बच्चे को देती है। बच्चे का घरौंदा जगमगा रहा है। माँ बच्चे के रूप को और घर की सजावट को देखकर उस पर प्रेम लुटाती है।
- काव्य सौंदर्य:
- रस: वात्सल्य रस।
- बिंब: दृश्य बिंब (चीनी के खिलौने, जगमगाता घरौंदा)।
- विशेष: इस रुबाई के माध्यम से फ़िराक़ ने भारतीय पर्व 'दीवाली' को उर्दू शायरी का हिस्सा बनाया है, जो उनकी विशिष्टता है।
तीसरी रुबाई का भावार्थ:
"आँगन में ठुनक रहा है ज़िदयाया है..."
- प्रसंग: एक बच्चा चाँद को देखकर उसे पाने की ज़िद कर रहा है।
- भावार्थ: बच्चा आँगन में चाँद को देखकर उसे खिलौना समझकर पाने के लिए मचल रहा है। माँ उसे बहलाने के लिए आईना (दर्पण) लाकर उसमें चाँद की परछाई दिखाती है और कहती है, "देखो, चाँद तो यहाँ उतर आया है।" यह माँ की ममता और वात्सल्यपूर्ण चतुराई का सुंदर उदाहरण है।
- काव्य सौंदर्य:
- रस: वात्सल्य रस।
- बिंब: दृश्य बिंब (चाँद, दर्पण, बच्चे का मचलना)।
- विशेष: बाल-हठ और माँ के प्रेम का मनोवैज्ञानिक और सजीव चित्रण है।
चौथी रुबाई का भावार्थ:
"रक्षाबंधन की सुबह रस की पुतली..."
- प्रसंग: रक्षाबंधन के पवित्र त्यौहार का वर्णन।
- भावार्थ: रक्षाबंधन की सुबह है। बहन एक 'रस की पुतली' की तरह छाई हुई है। वह बिजली की तरह चमकती हुई राखी अपने भाई की कलाई पर बाँधती है। यह भाई-बहन के पवित्र और मीठे रिश्ते को दर्शाता है।
- काव्य सौंदर्य:
- रस: वात्सल्य एवं स्नेह।
- बिंब: दृश्य बिंब (चमकती राखी)।
- विशेष: 'रस की पुतली' और 'बिजली की तरह चमकते लच्छे' में सुंदर उपमा और उत्प्रेक्षा का प्रयोग है। फ़िराक़ ने रक्षाबंधन जैसे विशुद्ध भारतीय त्यौहार को अपनी शायरी में स्थान दिया है।
विस्तृत नोट्स: ग़ज़ल
ग़ज़ल का हर शेर अपने आप में एक स्वतंत्र इकाई होता है, लेकिन सभी शेर एक ही रदीफ़ (तुकांत के बाद दोहराया जाने वाला शब्द) और क़ाफ़िया (तुकांत) में बंधे होते हैं।
शेर 1: "नौरस गुंचे पंखुड़ियों की नाज़ुक गिरहें खोलें हैं..."
- भावार्थ: शायर कहता है कि कलियों में जो नया-नया रस भर रहा है, वह धीरे-धीरे अपनी पंखुड़ियों की नाज़ुक गाँठें खोल रहा है। अर्थात, प्रकृति में सौंदर्य धीरे-धीरे प्रकट हो रहा है। तुम भी अपनी आँखों को धीरे-धीरे खोलो और इस सौंदर्य को देखो। यह वसंत के आगमन या प्रेम के प्रस्फुटन का प्रतीक है।
शेर 2: "तारे आँखें झपकावें हैं ज़र्रा-ज़र्रा सोये है..."
- भावार्थ: रात का समय है। तारे भी अब ऊँघने लगे हैं (आँखें झपका रहे हैं) और दुनिया का कण-कण सो चुका है। हे प्रिय, ऐसे में केवल हम ही तुम्हारी याद में जाग रहे हैं। यह विरह की रात का मार्मिक चित्रण है।
शेर 3: "तेरे गम का पासे-अदब है, कुछ दुनिया का खयाल भी है..."
- भावार्थ: शायर कहता है कि मुझे तुम्हारे दिए हुए दुखों का भी सम्मान है और कुछ दुनिया का भी लिहाज़ है। इसलिए, मैं अपने दुखों को सबसे छिपाकर चुपके-चुपके रो लेता हूँ। यह प्रेम में मर्यादा और सामाजिकता के दबाव को दर्शाता है।
शेर 4: "फ़ितरत का कायम है तवाज़ुन आलमे-हुस्नो-इश्क में भी..."
- भावार्थ: शायर कहता है कि प्रकृति में एक संतुलन (तवाज़ुन) है, और यही संतुलन प्रेम और सौंदर्य की दुनिया में भी है। वहाँ भी उतना ही प्रेम मिलता है, जितना हम किसी को देते हैं। अर्थात्, प्रेम में भी कर्म का सिद्धांत लागू होता है।
शेर 5: "आब-ओ-ताब अश्आर न पूछो तुम भी आँखें रक्खो हो..."
- भावार्थ: शायर अपने आलोचकों या पाठकों से कहता है कि मेरी शायरी की चमक-दमक (आब-ओ-ताब) के बारे में मुझसे मत पूछो, तुम्हारे पास भी तो आँखें हैं। जिस तरह मोतियों की चमक खुद दिखती है, वैसे ही मेरी शायरी का सौंदर्य भी स्वतः स्पष्ट है। इसमें शायर को अपनी कला पर गर्व है।
शेर 6: "ऐसे में तू याद आए है अंजुमने-मय में रिंदों को..."
- भावार्थ: शायर कहता है कि शराब की महफिल (अंजुमने-मय) में जब शराबी (रिंद) रात गए आसमान पर फरिश्तों को दुनिया के गुनाहों का लेखा-जोखा करते देखते हैं, तो ऐसे गहन क्षणों में तुम्हारी याद आती है। तुम्हारी याद पवित्र और गहरी है।
शेर 7: "सदके फ़िराक़ एजाज़े-सुखन के कैसे उड़ा ली ये आवाज़..."
- भावार्थ: यह ग़ज़ल का मक़्ता (अंतिम शेर जिसमें शायर का नाम आता है) है। शायर खुद पर न्योछावर होते हुए कहता है कि, ऐ फ़िराक़! तुम्हारी शायरी में यह जादू कहाँ से आ गया? तुम्हारी आवाज़ (शैली) तो महान शायर 'मीर' की ग़ज़लों जैसी लगती है। यहाँ शायर ने विनम्रतापूर्वक अपनी तुलना मीर से की है, जो उर्दू शायरी के शिखर पुरुष माने जाते हैं।
अभ्यास हेतु बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
-
फ़िराक़ गोरखपुरी का मूल नाम क्या था?
(क) धनपत राय
(ख) रघुपति सहाय
(ग) बद्रीनाथ भट्ट
(घ) गया प्रसाद शुक्ल -
रुबाई की कौन-सी पंक्तियों में तुक मिलाया जाता है?
(क) पहली और दूसरी
(ख) पहली, दूसरी और तीसरी
(ग) पहली, दूसरी और चौथी
(घ) सभी चारों पंक्तियों में -
"आँगन में ठुनक रहा है ज़िदयाया है" - इस पंक्ति में बच्चा किस चीज़ के लिए ज़िद कर रहा है?
(क) खिलौने के लिए
(ख) मिठाई के लिए
(ग) दर्पण के लिए
(घ) चाँद के लिए -
फ़िराक़ गोरखपुरी को उनकी किस रचना के लिए 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' मिला?
(क) रंगे-शायरी
(ख) गुले-नग्मा
(ग) बज़्मे-ज़िंदगी
(घ) उर्दू की इश्किया शायरी -
ग़ज़ल के शेर "तारे आँखें झपकावें हैं" में कौन-सा अलंकार प्रमुख है?
(क) उपमा
(ख) रूपक
(ग) यमक
(घ) मानवीकरण -
"फ़ितरत का कायम है तवाज़ुन" - इस पंक्ति में 'तवाज़ुन' शब्द का क्या अर्थ है?
(क) टकराव
(ख) संतुलन
(ग) सौंदर्य
(घ) नियम -
फ़िराक़ की रुबाइयों में किस भारतीय पर्व का उल्लेख नहीं है?
(क) होली
(ख) दीवाली
(ग) रक्षाबंधन
(घ) (क) और (ग) दोनों -
ग़ज़ल के अंतिम शेर (मक़्ता) में फ़िराक़ ने अपनी शायरी की तुलना किस महान शायर से की है?
(क) ग़ालिब
(ख) ज़ौक़
(ग) मीर
(घ) दाग़ -
"चीनी के खिलौने" का बिंब किस त्यौहार से संबंधित है?
(क) ईद
(ख) रक्षाबंधन
(ग) दीवाली
(घ) दशहरा -
फ़िराक़ की शायरी की सबसे बड़ी विशेषता क्या है?
(क) केवल फ़ारसी के कठिन शब्दों का प्रयोग
(ख) विशुद्ध खड़ी बोली हिंदी का प्रयोग
(ग) उर्दू परंपरा में लोक-जीवन और घरेलू बिंबों का प्रयोग
(घ) अंग्रेज़ी साहित्य का प्रभाव
उत्तरमाला:
- (ख) रघुपति सहाय
- (ग) पहली, दूसरी और चौथी
- (घ) चाँद के लिए
- (ख) गुले-नग्मा
- (घ) मानवीकरण
- (ख) संतुलन
- (क) होली
- (ग) मीर
- (ग) दीवाली
- (ग) उर्दू परंपरा में लोक-जीवन और घरेलू बिंबों का प्रयोग
इन नोट्स को अच्छी तरह से पढ़ें और प्रश्नों का अभ्यास करें। आपकी परीक्षा के लिए शुभकामनाएँ