Class 11 History Notes Chapter 10 (Chapter 10) – Vishwa Itihas ke Kush Visay Book

Vishwa Itihas ke Kush Visay
प्रिय विद्यार्थियों,

आज हम कक्षा 11 इतिहास की पाठ्यपुस्तक 'विश्व इतिहास के कुछ विषय' के अध्याय 10, 'मूल निवासियों का विस्थापन' पर विस्तार से चर्चा करेंगे। यह अध्याय प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, अतः ध्यानपूर्वक इसका अध्ययन करें। हम इस अध्याय के प्रमुख बिंदुओं को विस्तृत नोट्स के रूप में देखेंगे और अंत में कुछ बहुविकल्पीय प्रश्न भी हल करेंगे।


अध्याय 10: मूल निवासियों का विस्थापन (Displacing Indigenous Peoples)

परिचय:
यह अध्याय उत्तरी अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में यूरोपीय उपनिवेशवादियों द्वारा मूल निवासियों के विस्थापन, शोषण और सांस्कृतिक विनाश की कहानी बताता है। यूरोपीय लोगों ने इन क्षेत्रों को 'नया विश्व' कहा, जबकि ये भूमि हज़ारों वर्षों से मूल निवासियों का घर थी। यूरोपीय लोगों के आगमन से इन समाजों का जीवन, संस्कृति और अर्थव्यवस्था मौलिक रूप से बदल गई।


भाग 1: उत्तरी अमेरिका में मूल निवासियों का विस्थापन

1. उत्तरी अमेरिका के मूल निवासी:

  • विविधता: उत्तरी अमेरिका में हज़ारों वर्षों से विभिन्न जनजातियाँ निवास कर रही थीं, जैसे अल्गोनक्विन, इरोक्वॉइस, चेरोकी, सू, अपाचे, नवाजो, क्रीक आदि। इनकी जीवनशैली, भाषाएँ और संस्कृतियाँ विविध थीं।
  • जीवनशैली: कुछ कृषि करते थे (मक्का, सेम, कद्दू), कुछ शिकारी-संग्राहक थे (विशेषकर भैंस का शिकार), और कुछ मछली पकड़ते थे।
  • भूमि की अवधारणा: मूल निवासी भूमि को साझा संपत्ति मानते थे, न कि व्यक्तिगत स्वामित्व की वस्तु। वे प्रकृति के साथ गहरे आध्यात्मिक संबंध में विश्वास करते थे।
  • यूरोपीय दृष्टिकोण: यूरोपीय उपनिवेशवादियों ने मूल निवासियों को 'असभ्य', 'आलसी' और 'पिछड़ा' माना, जो उनकी भूमि का 'सही' उपयोग नहीं कर रहे थे।

2. यूरोपीय आगमन और प्रारंभिक संपर्क:

  • समय: 17वीं शताब्दी की शुरुआत में, ब्रिटिश, फ्रांसीसी और स्पेनिश उपनिवेशवादी उत्तरी अमेरिका पहुँचे।
  • फर व्यापार: प्रारंभिक संपर्क मुख्य रूप से फर व्यापार के लिए था, जिसमें मूल निवासी यूरोपीय लोगों को फर प्रदान करते थे और बदले में हथियार, बर्तन आदि प्राप्त करते थे।
  • सांस्कृतिक टकराव: यूरोपीय लोगों की भूमि के निजी स्वामित्व की अवधारणा और मूल निवासियों की सामूहिक स्वामित्व की अवधारणा के बीच गहरा टकराव था।

3. पश्चिम की ओर विस्तार और विस्थापन:

  • मैनीफेस्ट डेस्टिनी (Manifest Destiny): 19वीं शताब्दी में संयुक्त राज्य अमेरिका का पश्चिम की ओर तेजी से विस्तार हुआ। यह एक लोकप्रिय विश्वास था कि संयुक्त राज्य अमेरिका का प्रशांत महासागर तक विस्तार करना ईश्वर-प्रदत्त नियति है।
  • भूमि अधिग्रहण: यूरोपीय लोगों ने मूल निवासियों से ज़बरदस्ती या धोखे से भूमि छीनी। कई बार संधियाँ की गईं, लेकिन अक्सर उनका उल्लंघन किया गया।
  • भारतीय निष्कासन अधिनियम (Indian Removal Act, 1830): इस अधिनियम के तहत पूर्वी राज्यों के मूल निवासियों को मिसीसिपी नदी के पश्चिम में 'भारतीय क्षेत्र' (आज का ओक्लाहोमा) में जबरन स्थानांतरित किया गया।
    • आँसुओं का मार्ग (Trail of Tears): 1838-39 में चेरोकी जनजाति को जॉर्जिया से ओक्लाहोमा तक पैदल मार्च करने के लिए मजबूर किया गया, जिसमें हज़ारों लोगों की मौत हुई।
  • आरक्षण (Reservations): मूल निवासियों को छोटे, अनुपजाऊ क्षेत्रों में रहने के लिए मजबूर किया गया, जिन्हें आरक्षण कहा गया।
  • भैंसों का विनाश: यूरोपीय उपनिवेशवादियों ने जानबूझकर भैंसों का बड़े पैमाने पर शिकार किया, जो मैदानी जनजातियों के लिए भोजन, कपड़े और आश्रय का मुख्य स्रोत थीं। इससे उनकी जीवनशैली और संस्कृति बर्बाद हो गई।
  • सोने की होड़: 1849 की कैलिफोर्निया गोल्ड रश और बाद में ब्लैक हिल्स (सू जनजाति की पवित्र भूमि) में सोने की खोज ने मूल निवासियों की भूमि पर और अधिक अतिक्रमण को बढ़ावा दिया।

4. सांस्कृतिक आत्मसात्करण (Cultural Assimilation):

  • बोर्डिंग स्कूल: 19वीं शताब्दी के अंत से, मूल निवासी बच्चों को उनके परिवारों से अलग कर बोर्डिंग स्कूलों में भेजा गया (जैसे कार्लिस्ले इंडियन इंडस्ट्रियल स्कूल)। यहाँ उन्हें अपनी भाषा, धर्म और परंपराओं को त्यागने और यूरोपीय संस्कृति अपनाने के लिए मजबूर किया गया।
  • उनकी भाषाओं और रीति-रिवाजों पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

5. प्रतिरोध और संघर्ष:

  • लिटिल बिघोर्न की लड़ाई (1876): सू और चेयेन जनजातियों ने सिटिंग बुल और क्रेजी हॉर्स के नेतृत्व में अमेरिकी सेना को हराया। यह मूल निवासियों की अंतिम बड़ी जीत थी।
  • वोंडेड नी का नरसंहार (1890): यह अमेरिकी सेना द्वारा सू जनजाति के सैकड़ों निहत्थे लोगों का अंतिम बड़ा नरसंहार था, जिसने सशस्त्र प्रतिरोध को समाप्त कर दिया।

6. 20वीं शताब्दी में बदलाव और अधिकार:

  • डावेस अधिनियम (Dawes Act, 1887): इस अधिनियम ने जनजातीय भूमि के सामूहिक स्वामित्व को समाप्त कर दिया और व्यक्तिगत मूल निवासियों को छोटे भूखंड आवंटित किए, जिससे और अधिक भूमि यूरोपीय लोगों के हाथों में चली गई।
  • भारतीय पुनर्गठन अधिनियम (Indian Reorganization Act, 1934): इसने कुछ हद तक जनजातीय स्वशासन को बहाल किया और भूमि के सामूहिक स्वामित्व को मान्यता दी।
  • रेड पावर आंदोलन (Red Power Movement): 1960 के दशक में नागरिक अधिकार आंदोलन से प्रेरित होकर, मूल निवासियों ने अपने अधिकारों, आत्मनिर्णय और सांस्कृतिक पहचान के लिए आवाज़ उठाई।
  • स्वदेशी अधिकारों की मान्यता: 1970 के दशक से, सरकार ने मूल निवासियों के अधिकारों को मान्यता देना शुरू किया। कई जनजातियों ने अपनी खोई हुई भूमि और मुआवजे के लिए कानूनी लड़ाई जीती।
  • आज, कई जनजातियाँ अपने आरक्षणों पर स्वायत्तता के साथ रहती हैं और अपनी संस्कृति को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रही हैं।

भाग 2: ऑस्ट्रेलिया में मूल निवासियों का विस्थापन

1. ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासी:

  • प्राचीन इतिहास: ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासी (एबोरिजिनल्स और टोरेस स्ट्रेट आइलैंडर्स) हज़ारों वर्षों से यहाँ निवास कर रहे थे, कुछ अनुमानों के अनुसार 40,000 से 65,000 वर्षों से।
  • जीवनशैली: वे शिकारी-संग्राहक थे, जिनकी जीवनशैली प्रकृति के साथ गहरी जुड़ी हुई थी। उनकी विविध भाषाएँ, कला और आध्यात्मिक मान्यताएँ थीं।
  • जनसंख्या: यूरोपीय आगमन से पहले उनकी जनसंख्या लगभग 3.5 लाख से 7 लाख थी।

2. यूरोपीय आगमन और उपनिवेशीकरण:

  • कैप्टन जेम्स कुक (1770): ब्रिटिश नाविक कैप्टन जेम्स कुक ने ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तट की खोज की और उसे ब्रिटिश क्षेत्र घोषित किया।
  • दंड कॉलोनी (1788): 1788 में, सिडनी में पहली ब्रिटिश दंड कॉलोनी स्थापित की गई, जहाँ ब्रिटेन के अपराधियों को भेजा गया।
  • टेरा नलियस (Terra Nullius): ब्रिटिश सरकार ने यह कानूनी अवधारणा अपनाई कि ऑस्ट्रेलिया की भूमि 'टेरा नलियस' (किसी की नहीं) थी, यानी यह खाली भूमि थी और इस पर कोई मालिक नहीं था, जबकि हज़ारों वर्षों से मूल निवासी वहाँ रह रहे थे।

3. विस्थापन और शोषण:

  • भूमि अधिग्रहण: यूरोपीय उपनिवेशवादियों ने मूल निवासियों की भूमि पर कब्ज़ा कर लिया।
  • हिंसा और नरसंहार: यूरोपीय लोगों और मूल निवासियों के बीच संघर्ष हुए, जिसमें कई नरसंहार हुए।
  • बीमारियाँ: यूरोपीय लोगों द्वारा लाई गई चेचक, खसरा जैसी बीमारियों ने मूल निवासियों की आबादी को भारी नुकसान पहुँचाया, क्योंकि उनके पास इन बीमारियों से लड़ने की प्रतिरक्षा नहीं थी।
  • शराब और शोषण: मूल निवासियों को शराब का आदी बनाया गया और उन्हें सस्ते श्रम के लिए इस्तेमाल किया गया।

4. आत्मसात्करण की नीतियाँ:

  • चोरी की पीढ़ियाँ (Stolen Generations): 19वीं शताब्दी के अंत से लेकर 1970 के दशक तक, ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने मूल निवासी बच्चों को उनके परिवारों से जबरन अलग कर श्वेत परिवारों या मिशनरियों द्वारा चलाए जा रहे संस्थानों में पाला। इसका उद्देश्य उन्हें श्वेत संस्कृति में आत्मसात करना था।
  • उन्हें अपनी भाषा और संस्कृति सीखने से रोका गया।

5. अधिकारों के लिए संघर्ष और मान्यता:

  • 1967 का जनमत संग्रह: इस जनमत संग्रह में ऑस्ट्रेलियाई लोगों ने भारी बहुमत से मूल निवासियों को जनगणना में शामिल करने और संघीय सरकार को उनके लिए कानून बनाने का अधिकार देने के पक्ष में मतदान किया।
  • **माबो केस (Mabo Case, 1

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