Class 11 Political Science Notes Chapter 4 (सामाजिक न्याय) – Rajniti Sidhant Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम कक्षा 11 की राजनीति विज्ञान की पुस्तक 'राजनीति सिद्धांत' के अध्याय 4 'सामाजिक न्याय' पर विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न देखेंगे। यह अध्याय न केवल आपके शैक्षणिक पाठ्यक्रम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, बल्कि सरकारी परीक्षाओं के लिए भी अत्यंत प्रासंगिक है, क्योंकि यह न्याय के मूलभूत सिद्धांतों और भारत में इसके व्यावहारिक अनुप्रयोग को समझने में सहायता करता है।
अध्याय 4: सामाजिक न्याय
1. सामाजिक न्याय का परिचय
- अर्थ: सामाजिक न्याय का तात्पर्य एक ऐसे समाज से है जहाँ सभी व्यक्तियों को समान सम्मान, अवसर और अधिकार प्राप्त हों, और उनके साथ जाति, धर्म, लिंग, नस्ल, आर्थिक स्थिति या किसी अन्य सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर कोई भेदभाव न हो। इसका लक्ष्य समाज के वंचित और हाशिए पर पड़े वर्गों को मुख्यधारा में लाना और उन्हें गरिमापूर्ण जीवन जीने के अवसर प्रदान करना है।
- ऐतिहासिक संदर्भ:
- प्लेटो (प्राचीन यूनान): अपनी प्रसिद्ध कृति 'रिपब्लिक' में प्लेटो ने न्याय को समाज में व्यवस्था और सद्भाव बनाए रखने का सिद्धांत बताया। उनके अनुसार, न्याय तब स्थापित होता है जब समाज के प्रत्येक वर्ग (शासक, सैनिक, उत्पादक) अपने निर्धारित कर्तव्यों का पालन करता है।
- आधुनिक विचार: 18वीं शताब्दी के बाद, न्याय की अवधारणा को स्वतंत्रता, समानता और अधिकारों से जोड़ा गया। 20वीं शताब्दी में, सामाजिक न्याय की अवधारणा ने विशेष महत्व प्राप्त किया, जब समाज में व्याप्त गहरी असमानताओं और भेदभाव को दूर करने की आवश्यकता महसूस की गई।
- महत्व: सामाजिक न्याय एक सुदृढ़, स्थिर और प्रगतिशील समाज की नींव है। यह व्यक्तियों को अपनी क्षमताओं को विकसित करने, अपनी गरिमा बनाए रखने और समाज में सक्रिय रूप से योगदान करने का अवसर प्रदान करता है।
2. न्याय के प्रमुख सिद्धांत
सामाजिक न्याय को समझने के लिए न्याय के तीन मुख्य सिद्धांतों को जानना आवश्यक है:
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क. समान लोगों के प्रति समान बर्ताव (Treating Equals Equally):
- यह न्याय का सबसे मौलिक सिद्धांत है। इसका अर्थ है कि सभी व्यक्तियों को समान अधिकार और अवसर मिलने चाहिए, और कानून के समक्ष सभी समान हैं।
- किसी भी व्यक्ति के साथ उसकी जाति, धर्म, लिंग, नस्ल या वर्ग के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।
- उदाहरण: समान नागरिक अधिकार, समान मताधिकार, समान काम के लिए समान वेतन का अधिकार।
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ख. समानुपातिक न्याय (Proportionate Justice):
- यह सिद्धांत मानता है कि सभी व्यक्तियों के साथ हर स्थिति में बिल्कुल समान व्यवहार करना अन्यायपूर्ण हो सकता है।
- न्याय का अर्थ यह भी है कि लोगों को उनके प्रयास, कौशल, योगदान या योग्यता के अनुपात में पुरस्कृत किया जाना चाहिए।
- उदाहरण: यदि कोई व्यक्ति अधिक मेहनत करता है या अधिक कुशल है, तो उसे अधिक वेतन या पुरस्कार मिलना न्यायसंगत हो सकता है। यह योग्यता आधारित वितरण का समर्थन करता है।
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ग. विशेष ज़रूरतों का विशेष ख़याल (Special Needs, Special Care):
- यह सिद्धांत स्वीकार करता है कि समाज के कुछ वर्ग या व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनकी परिस्थितियाँ इतनी प्रतिकूल होती हैं कि उन्हें केवल समान व्यवहार देने से भी वे दूसरों के समान स्तर पर नहीं आ पाते।
- ऐसे लोगों को विशेष सहायता, सुविधाएँ या अवसर प्रदान करना न्यायपूर्ण है ताकि वे दूसरों के समान स्तर पर आ सकें। इसे "सकारात्मक कार्रवाई" (Affirmative Action) या "भेदभावपूर्ण सकारात्मकता" भी कहते हैं।
- उदाहरण: विकलांग व्यक्तियों के लिए विशेष सुविधाएँ, अनुसूचित जाति/जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए शिक्षा और रोज़गार में आरक्षण नीति। इसका उद्देश्य समाज में वास्तविक समानता स्थापित करना है।
3. न्यायपूर्ण वितरण (Just Distribution)
सामाजिक न्याय का एक महत्वपूर्ण पहलू समाज में वस्तुओं, सेवाओं, अवसरों और संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण है।
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क. जॉन रॉल्स का न्याय सिद्धांत (John Rawls' Theory of Justice):
- अमेरिकी दार्शनिक जॉन रॉल्स ने अपनी पुस्तक 'ए थ्योरी ऑफ जस्टिस' (1971) में न्याय का एक प्रभावशाली सिद्धांत प्रस्तुत किया।
- अज्ञान का पर्दा (Veil of Ignorance): रॉल्स ने कल्पना की कि यदि लोग एक "अज्ञान के पर्दे" के पीछे होते, जहाँ उन्हें अपनी सामाजिक स्थिति, जाति, लिंग, योग्यता, आर्थिक स्थिति या भविष्य के बारे में कुछ भी पता नहीं होता, तो वे कैसे समाज के नियमों का चुनाव करते। इस स्थिति को 'मूल स्थिति' (Original Position) कहा गया।
- इस स्थिति में, लोग स्वाभाविक रूप से ऐसे नियम चुनेंगे जो सबसे कमज़ोर व्यक्ति के लिए भी उचित हों, क्योंकि उन्हें नहीं पता कि वे स्वयं उस सबसे कमज़ोर स्थिति में हो सकते हैं।
- रॉल्स के न्याय के दो सिद्धांत:
- समान स्वतंत्रता का सिद्धांत (Principle of Equal Liberty): प्रत्येक व्यक्ति को मूलभूत स्वतंत्रताओं (जैसे भाषण की स्वतंत्रता, मताधिकार, संपत्ति का अधिकार) का समान अधिकार होना चाहिए, जो दूसरों के लिए भी समान स्वतंत्रता के साथ संगत हो।
- भेदभाव का सिद्धांत (Difference Principle): सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को इस प्रकार व्यवस्थित किया जाना चाहिए कि:
- वे सबसे कम सुविधा प्राप्त लोगों के लिए सबसे बड़े लाभ की हों (अधिकतम-न्यूनतम सिद्धांत - Maximin Principle)।
- वे सभी के लिए खुले पदों और स्थितियों से जुड़ी हों, जो अवसर की निष्पक्ष समानता की शर्तों के तहत हों। (अर्थात, योग्यता के आधार पर अवसर उपलब्ध हों, लेकिन पृष्ठभूमि के कारण कोई वंचित न रहे)।
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ख. मुक्त बाज़ार बनाम राज्य का हस्तक्षेप (Free Market vs. State Intervention):
- मुक्त बाज़ार के समर्थक:
- इनका मानना है कि समाज में संसाधनों और अवसरों का वितरण योग्यता, प्रतिभा और प्रतिस्पर्धा के आधार पर होना चाहिए।
- राज्य का हस्तक्षेप न्यूनतम होना चाहिए, ताकि व्यक्ति अपनी क्षमताओं का पूरा उपयोग कर सकें और आर्थिक स्वतंत्रता बनी रहे।
- बाज़ार व्यवस्था स्वतः ही सबसे कुशल और न्यायपूर्ण वितरण सुनिश्चित करती है।
- प्रमुख विचारक: एफ.ए. हायक, मिल्टन फ्रीडमैन, रॉबर्ट नॉज़िक।
- राज्य के हस्तक्षेप के समर्थक:
- इनका मानना है कि मुक्त बाज़ार प्रणाली अक्सर असमानताओं को जन्म देती है और वंचितों को और अधिक हाशिए पर धकेल देती है।
- राज्य को सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और भोजन जैसी बुनियादी आवश्यकताएँ प्रदान करना।
- सकारात्मक कार्रवाई और कल्याणकारी योजनाएँ आवश्यक हैं ताकि सभी को समान अवसर मिल सकें।
- प्रमुख अवधारणा: कल्याणकारी राज्य (Welfare State)।
- मुक्त बाज़ार के समर्थक:
4. सामाजिक न्याय का अनुसरण
सामाजिक न्याय प्राप्त करने के लिए विभिन्न नीतियाँ और उपाय अपनाए जाते हैं:
- क. भेदभाव का उन्मूलन: जाति, लिंग, धर्म, नस्ल या वर्ग के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को कानून द्वारा प्रतिबंधित करना और उसे समाप्त करने के लिए सामाजिक जागरूकता फैलाना।
- ख. सकारात्मक कार्रवाई (Affirmative Action) / आरक्षण: समाज के ऐतिहासिक रूप से वंचित और पिछड़े वर्गों को शिक्षा, रोज़गार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में विशेष अवसर प्रदान करना ताकि वे अन्य वर्गों के साथ समानता प्राप्त कर सकें। भारत में इसे 'आरक्षण नीति' के नाम से जाना जाता है।
- ग. न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति: सभी नागरिकों को शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन, आवास और स्वच्छ पेयजल जैसी बुनियादी आवश्यकताएँ उपलब्ध कराना, ताकि कोई भी व्यक्ति अभाव के कारण अपनी क्षमताओं का विकास करने से वंचित न रहे।
5. भारत में सामाजिक न्याय
भारत का संविधान सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर आधारित है और इसे प्राप्त करने के लिए कई महत्वपूर्ण प्रावधान करता है:
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क. संवैधानिक प्रावधान:
- प्रस्तावना: भारतीय संविधान की प्रस्तावना "न्याय-सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक" का लक्ष्य निर्धारित करती है, जो सामाजिक न्याय के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
- मौलिक अधिकार (भाग III):
- अनुच्छेद 14: कानून के समक्ष समानता और कानूनों का समान संरक्षण।
- अनुच्छेद 15: धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध। (इसमें राज्य को महिलाओं, बच्चों और सामाजिक व शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान करने की शक्ति भी दी गई है।)
- अनुच्छेद 16: सार्वजनिक रोज़गार के मामलों में अवसर की समानता। (इसमें राज्य को पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान करने की शक्ति भी दी गई है।)
- अनुच्छेद 17: अस्पृश्यता का अंत और उसका किसी भी रूप में आचरण निषिद्ध है।
- राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत (भाग IV):
- ये सिद्धांत राज्य को ऐसे कानून बनाने और नीतियाँ लागू करने का निर्देश देते हैं जो सामाजिक और आर्थिक न्याय को बढ़ावा दें।
- उदाहरण: अनुच्छेद 38 (कल्याणकारी राज्य की स्थापना), अनुच्छेद 39 (समान काम के लिए समान वेतन, धन के समान वितरण का प्रयास), अनुच्छेद 46 (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य कमज़ोर वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देना)।
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ख. आरक्षण नीति: भारत में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए शिक्षा संस्थानों और सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था है। इसका उद्देश्य इन वर्गों को मुख्यधारा में लाना, ऐतिहासिक अन्याय को दूर करना और सामाजिक समानता स्थापित करना है।
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ग. विभिन्न सरकारी योजनाएँ: भारत सरकार सामाजिक न्याय के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अनेक योजनाएँ चलाती है, जैसे महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (मनरेगा), राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, सर्व शिक्षा अभियान, प्रधानमंत्री आवास योजना, आयुष्मान भारत, प्रधानमंत्री जन धन योजना आदि।
निष्कर्ष: सामाजिक न्याय एक गतिशील अवधारणा है जो समाज की बदलती आवश्यकताओं और चुनौतियों के साथ विकसित होती रहती है। इसका अंतिम लक्ष्य एक ऐसे समाज का निर्माण करना है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति गरिमा, समानता और स्वतंत्रता के साथ जीवन जी सके और अपनी क्षमताओं का पूर्ण विकास कर सके।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
यहाँ अध्याय 'सामाजिक न्याय' पर आधारित 10 बहुविकल्पीय प्रश्न दिए गए हैं:
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प्लेटो ने अपनी किस पुस्तक में न्याय की अवधारणा पर विस्तार से चर्चा की है?
क) पॉलिटिक्स
ख) रिपब्लिक
ग) द लॉज़
घ) सोफिस्ट
उत्तर: ख) रिपब्लिक -
जॉन रॉल्स ने न्याय के सिद्धांत को प्रतिपादित करने के लिए किस अवधारणा का प्रयोग किया है?
क) सामाजिक अनुबंध
ख) अज्ञान का पर्दा
ग) अधिकतम सुख का सिद्धांत
घ) प्राकृतिक अधिकार
उत्तर: ख) अज्ञान का पर्दा -
न्याय का कौन सा सिद्धांत यह मानता है कि लोगों को उनके प्रयास, कौशल या योगदान के अनुपात में पुरस्कृत किया जाना चाहिए?
क) समान लोगों के प्रति समान बर्ताव
ख) समानुपातिक न्याय
ग) विशेष ज़रूरतों का विशेष ख़याल
घ) वितरणात्मक न्याय
उत्तर: ख) समानुपातिक न्याय -
भारतीय संविधान का कौन सा अनुच्छेद धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध करता है?
क) अनुच्छेद 14
ख) अनुच्छेद 15
ग) अनुच्छेद 16
घ) अनुच्छेद 17
उत्तर: ख) अनुच्छेद 15 -
जॉन रॉल्स के न्याय के सिद्धांतों में से एक 'भेदभाव का सिद्धांत' (Difference Principle) क्या कहता है?
क) सभी को समान रूप से पुरस्कृत किया जाना चाहिए।
ख) सामाजिक और आर्थिक असमानताएँ केवल तभी न्यायसंगत हैं जब वे सबसे कम सुविधा प्राप्त लोगों के लिए सबसे बड़े लाभ की हों।
ग) योग्यता ही एकमात्र मानदंड होना चाहिए।
घ) राज्य को सभी असमानताओं को समाप्त कर देना चाहिए।
उत्तर: ख) सामाजिक और आर्थिक असमानताएँ केवल तभी न्यायसंगत हैं जब वे सबसे कम सुविधा प्राप्त लोगों के लिए सबसे बड़े लाभ की हों। -
'सकारात्मक कार्रवाई' (Affirmative Action) या आरक्षण का मुख्य उद्देश्य क्या है?
क) समाज में नई असमानताएँ पैदा करना।
ख) ऐतिहासिक रूप से वंचित समूहों को मुख्यधारा में लाना।
ग) मुक्त बाज़ार अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना।
घ) केवल योग्यता के आधार पर वितरण सुनिश्चित करना।
उत्तर: ख) ऐतिहासिक रूप से वंचित समूहों को मुख्यधारा में लाना। -
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में किस प्रकार के न्याय का उल्लेख किया गया है?
क) सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक
ख) धार्मिक और सांस्कृतिक
ग) कानूनी और संवैधानिक
घ) नैतिक और व्यक्तिगत
उत्तर: क) सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक -
मुक्त बाज़ार के समर्थक किस बात पर ज़ोर देते हैं?
क) राज्य के व्यापक हस्तक्षेप पर
ख) सामाजिक सुरक्षा जाल पर
ग) योग्यता और प्रतिस्पर्धा पर
घ) सभी के लिए समान परिणाम पर
उत्तर: ग) योग्यता और प्रतिस्पर्धा पर -
भारतीय संविधान का कौन सा अनुच्छेद अस्पृश्यता का अंत करता है?
क) अनुच्छेद 14
ख) अनुच्छेद 15
ग) अनुच्छेद 16
घ) अनुच्छेद 17
उत्तर: घ) अनुच्छेद 17 -
'कल्याणकारी राज्य' (Welfare State) की अवधारणा किस सिद्धांत का समर्थन करती है?
क) मुक्त बाज़ार का
ख) राज्य के न्यूनतम हस्तक्षेप का
ग) सामाजिक न्याय के लिए राज्य के सक्रिय हस्तक्षेप का
घ) योग्यता आधारित वितरण का
उत्तर: ग) सामाजिक न्याय के लिए राज्य के सक्रिय हस्तक्षेप का
मुझे आशा है कि यह विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपकी सरकारी परीक्षाओं की तैयारी में अत्यंत सहायक सिद्ध होंगे। अपनी पढ़ाई जारी रखें और किसी भी अन्य प्रश्न या स्पष्टीकरण के लिए आप पूछ सकते हैं।