Class 11 Psychology Notes Chapter 5 (संवेदी; अवधानिक एवं प्रात्यक्षिक प्रक्रियाएँ) – Manovigyan Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम मनोविज्ञान के एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय, 'संवेदी; अवधानिक एवं प्रात्यक्षिक प्रक्रियाएँ' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय न केवल आपकी वैचारिक समझ को गहरा करेगा, बल्कि विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए भी एक ठोस आधार प्रदान करेगा। इस अध्याय में हम जानेंगे कि कैसे हमारा मस्तिष्क बाहरी दुनिया से प्राप्त सूचनाओं को ग्रहण करता है, उन पर ध्यान केंद्रित करता है और फिर उन्हें अर्थपूर्ण अनुभवों में बदलता है।
चलिए, विस्तार से समझते हैं इन प्रक्रियाओं को:
अध्याय 5: संवेदी; अवधानिक एवं प्रात्यक्षिक प्रक्रियाएँ
यह अध्याय मानव मन की उन आधारभूत प्रक्रियाओं को समझाता है जिनके द्वारा हम अपने पर्यावरण से सूचनाएँ प्राप्त करते हैं, उन पर ध्यान केंद्रित करते हैं और उन्हें अर्थ प्रदान करते हैं।
1. संवेदन (Sensation)
संवेदन वह प्रारंभिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा हमारी इंद्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) बाहरी वातावरण से भौतिक ऊर्जा (जैसे प्रकाश, ध्वनि, दबाव, रसायन) को तंत्रिका आवेगों में परिवर्तित करती हैं। यह एक निष्क्रिय और यांत्रिक प्रक्रिया है।
- परिभाषा: संवेदन वह प्रक्रिया है जिसमें संवेदी ग्राही (sensory receptors) उत्तेजनाओं का पता लगाते हैं और उन्हें तंत्रिका संकेतों में परिवर्तित करते हैं, जो मस्तिष्क तक पहुँचते हैं।
- विशेषताएँ:
- यह एक प्रारंभिक और मूलभूत प्रक्रिया है।
- इसमें इंद्रियों द्वारा सूचनाओं का केवल ग्रहण करना शामिल होता है, उनका अर्थ समझना नहीं।
- यह वस्तुनिष्ठ और सार्वभौमिक होती है।
- संवेदी अंग और उनके कार्य:
- आँखें (दृष्टि): प्रकाश तरंगों को ग्रहण कर रंगों, आकारों और दूरियों का संवेदन।
- कान (श्रवण): ध्वनि तरंगों को ग्रहण कर आवाज़ों, संगीत और भाषण का संवेदन।
- नाक (घ्राण): रासायनिक अणुओं को ग्रहण कर गंध का संवेदन।
- जीभ (स्वाद): रासायनिक अणुओं को ग्रहण कर खट्टा, मीठा, कड़वा, नमकीन और उमामी स्वाद का संवेदन।
- त्वचा (स्पर्श): दबाव, तापमान, दर्द और कंपन का संवेदन।
- संवेदी अनुकूलन (Sensory Adaptation): यह वह प्रक्रिया है जिसमें किसी स्थिर उत्तेजना के प्रति हमारी संवेदनशीलता समय के साथ कम हो जाती है। उदाहरण: अंधेरे कमरे में शुरू में कुछ न दिखना, फिर धीरे-धीरे दिखना।
- संवेदी सीमाएँ (Sensory Thresholds):
- परम सीमा (Absolute Threshold): किसी उत्तेजना की न्यूनतम तीव्रता जिसे कोई व्यक्ति 50% बार पहचान सके।
- अंतर सीमा (Difference Threshold / Just Noticeable Difference - JND): दो उत्तेजनाओं के बीच का न्यूनतम अंतर जिसे कोई व्यक्ति 50% बार पहचान सके।
- वेबर का नियम (Weber's Law): अंतर सीमा उत्तेजना की प्रारंभिक तीव्रता के अनुपात में होती है (ΔI/I = K, जहाँ ΔI अंतर सीमा है, I प्रारंभिक तीव्रता है और K एक स्थिरांक है)।
- फेचनर का नियम (Fechner's Law): संवेदन की तीव्रता उत्तेजना की तीव्रता के लघुगणक के अनुपात में बढ़ती है (S = k log I)।
2. अवधान (Attention)
अवधान वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा हम अपने संवेदी अनुभवों के एक विशिष्ट पहलू पर ध्यान केंद्रित करते हैं और अन्य पहलुओं की उपेक्षा करते हैं। यह चेतना की एक चयनात्मक अवस्था है।
- परिभाषा: अवधान वह मानसिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा हम कई उपलब्ध उत्तेजनाओं में से कुछ विशिष्ट उत्तेजनाओं का चयन करते हैं और उन पर अपनी मानसिक ऊर्जा केंद्रित करते हैं।
- प्रकार:
- चयनात्मक अवधान (Selective Attention): एक समय में कई उत्तेजनाओं में से केवल एक पर ध्यान केंद्रित करना।
- फ़िल्टर मॉडल (Filter Model - ब्रॉडबेंट): यह मॉडल बताता है कि सभी संवेदी सूचनाएँ एक संवेदी बफर में प्रवेश करती हैं, और फिर एक 'फ़िल्टर' केवल महत्वपूर्ण सूचनाओं को उच्च-स्तरीय प्रसंस्करण के लिए आगे बढ़ने देता है।
- क्षीणन मॉडल (Attenuation Model - ट्रीसमैन): यह मॉडल सुझाव देता है कि फ़िल्टर पूरी तरह से अनुपयोगी सूचनाओं को ब्लॉक नहीं करता, बल्कि उनकी तीव्रता को कम कर देता है, जिससे वे पृष्ठभूमि में बनी रहती हैं।
- देर से चयन मॉडल (Late Selection Model - डॉयश एंड डॉयश): यह मॉडल मानता है कि सभी सूचनाओं का अर्थपूर्ण स्तर तक प्रसंस्करण होता है, और फिर बाद में चयन होता है कि किस पर प्रतिक्रिया देनी है।
- विभाजित अवधान (Divided Attention): एक ही समय में एक से अधिक कार्यों या उत्तेजनाओं पर ध्यान देना। यह तब संभव होता है जब कार्य स्वचालित या अच्छी तरह से सीखे हुए हों।
- सतत अवधान (Sustained Attention) / सतर्कता (Vigilance): लंबे समय तक किसी एक कार्य या उत्तेजना पर ध्यान बनाए रखना, विशेषकर जब उत्तेजनाएँ अनियमित या दुर्लभ हों।
- चयनात्मक अवधान (Selective Attention): एक समय में कई उत्तेजनाओं में से केवल एक पर ध्यान केंद्रित करना।
- अवधान के निर्धारक (Determinants of Attention):
- वस्तुनिष्ठ/बाह्य निर्धारक (Objective/External Factors): उत्तेजना की विशेषताएँ।
- तीव्रता (Intensity): तेज़ आवाज़, चमकदार रोशनी।
- आकार (Size): बड़ी वस्तुएँ।
- नवीनता (Novelty): नई या असामान्य वस्तुएँ।
- गति (Movement): हिलती हुई वस्तुएँ।
- परिवर्तन (Change): अचानक बदलाव।
- पुनरावृत्ति (Repetition): बार-बार दोहराई जाने वाली उत्तेजनाएँ।
- रंग (Colour): चमकीले रंग।
- व्यक्तिनिष्ठ/आंतरिक निर्धारक (Subjective/Internal Factors): व्यक्ति की आंतरिक अवस्थाएँ।
- रुचि (Interest): जिस विषय में रुचि हो।
- अभिप्रेरणा (Motivation): आवश्यकताएँ और लक्ष्य।
- मानसिक स्थिति (Mental Set): व्यक्ति की अपेक्षाएँ या पूर्व-निर्धारित विचार।
- पूर्व अनुभव (Past Experience): परिचित वस्तुएँ या घटनाएँ।
- भावनात्मक स्थिति (Emotional State): भावनाएँ अवधान को प्रभावित करती हैं।
- वस्तुनिष्ठ/बाह्य निर्धारक (Objective/External Factors): उत्तेजना की विशेषताएँ।
3. प्रत्यक्षण (Perception)
प्रत्यक्षण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा हम संवेदी सूचनाओं को व्यवस्थित करते हैं, उनकी व्याख्या करते हैं और उन्हें अर्थ प्रदान करते हैं। यह संवेदन से अधिक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें मस्तिष्क की सक्रिय भागीदारी होती है।
- परिभाषा: प्रत्यक्षण वह प्रक्रिया है जिसमें संवेदी सूचनाओं को संगठित, व्याख्यायित और अर्थपूर्ण अनुभव में बदला जाता है।
- संवेदन और प्रत्यक्षण में अंतर:
- संवेदन: कच्ची संवेदी सूचनाओं को ग्रहण करना (जैसे प्रकाश तरंगें)। यह एक शारीरिक प्रक्रिया है।
- प्रत्यक्षण: उन कच्ची सूचनाओं को अर्थ देना (जैसे प्रकाश तरंगों को 'लाल सेब' के रूप में पहचानना)। यह एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है।
- प्रत्यक्षण के सिद्धांत:
- गेस्टाल्ट सिद्धांत (Gestalt Principles of Perceptual Organization): ये सिद्धांत बताते हैं कि हम उत्तेजनाओं को अलग-अलग टुकड़ों के बजाय संपूर्ण पैटर्न या आकृतियों के रूप में कैसे देखते हैं।
- आकृति-पृष्ठभूमि (Figure-Ground): हम किसी वस्तु (आकृति) को उसके आसपास के वातावरण (पृष्ठभूमि) से अलग करके देखते हैं।
- समीपता (Proximity): जो वस्तुएँ एक-दूसरे के करीब होती हैं, उन्हें हम एक समूह के रूप में देखते हैं।
- समानता (Similarity): जो वस्तुएँ एक-दूसरे के समान होती हैं (रंग, आकार, बनावट में), उन्हें हम एक समूह के रूप में देखते हैं।
- निरंतरता (Continuity): हम उन तत्वों को एक साथ समूहबद्ध करते हैं जो एक चिकनी, निरंतर रेखा या पैटर्न बनाते हैं।
- संवरक/पूर्णता (Closure): हम अधूरी आकृतियों को पूरा करके देखते हैं ताकि वे अर्थपूर्ण लगें।
- समरूपता (Symmetry): सममित तत्वों को एक समूह के रूप में देखा जाता है।
- सामान्य नियति (Common Fate): जो वस्तुएँ एक ही दिशा में एक साथ चलती हैं, उन्हें हम एक समूह के रूप में देखते हैं।
- गेस्टाल्ट सिद्धांत (Gestalt Principles of Perceptual Organization): ये सिद्धांत बताते हैं कि हम उत्तेजनाओं को अलग-अलग टुकड़ों के बजाय संपूर्ण पैटर्न या आकृतियों के रूप में कैसे देखते हैं।
- प्रत्यक्षण में अन्य कारक:
- प्रत्यक्षणात्मक स्थिरता (Perceptual Constancy): यह वस्तुओं को उनके बदलते संवेदी इनपुट के बावजूद स्थिर रूप से देखने की प्रवृत्ति है।
- आकार स्थिरता (Size Constancy): किसी वस्तु को उसकी दूरी बदलने पर भी उसी आकार का देखना।
- चमक स्थिरता (Brightness Constancy): किसी वस्तु को अलग-अलग रोशनी में भी उसकी चमक में कोई बदलाव न देखना।
- रंग स्थिरता (Colour Constancy): किसी वस्तु को अलग-अलग प्रकाश स्थितियों में भी उसके रंग को समान देखना।
- गहराई प्रत्यक्षण (Depth Perception): यह तीन आयामों (लंबाई, चौड़ाई, गहराई) में दुनिया को देखने की क्षमता है, भले ही हमारी रेटिना पर छवि द्वि-आयामी हो।
- एकनेत्रीय संकेत (Monocular Cues): ये संकेत केवल एक आँख से उपलब्ध होते हैं।
- सापेक्ष आकार (Relative Size): दूर की वस्तुएँ छोटी दिखती हैं।
- अंतरावधान (Interposition/Overlap): जो वस्तुएँ दूसरों को ढकती हैं, वे करीब दिखती हैं।
- रैखिक परिप्रेक्ष्य (Linear Perspective): समानांतर रेखाएँ दूरी में मिलती हुई प्रतीत होती हैं।
- वायुमंडलीय परिप्रेक्ष्य (Atmospheric Perspective): दूर की वस्तुएँ धुंधली और नीली दिखती हैं।
- बनावट प्रवणता (Texture Gradient): करीब की वस्तुओं की बनावट स्पष्ट होती है, दूर की धुंधली।
- प्रकाश एवं छाया (Light and Shadow): छायाएँ गहराई का संकेत देती हैं।
- द्विनेत्रीय संकेत (Binocular Cues): ये संकेत दोनों आँखों के समन्वय से उपलब्ध होते हैं।
- दृष्टिपटल विषमता (Retinal Disparity): दोनों आँखों की रेटिना पर एक ही वस्तु की थोड़ी भिन्न छवियाँ। मस्तिष्क इन भिन्नताओं का उपयोग गहराई का अनुमान लगाने के लिए करता है।
- अभिसरण (Convergence): जब हम किसी करीब की वस्तु को देखते हैं, तो हमारी आँखें अंदर की ओर मुड़ती हैं। इन मांसपेशियों की गति का संकेत गहराई का अनुमान लगाने में मदद करता है।
- एकनेत्रीय संकेत (Monocular Cues): ये संकेत केवल एक आँख से उपलब्ध होते हैं।
- प्रत्यक्षणात्मक तत्परता (Perceptual Set): यह किसी व्यक्ति की अपेक्षाओं, अनुभवों या प्रेरणाओं के आधार पर किसी विशेष तरीके से चीजों को देखने की प्रवृत्ति है। यह 'देखने के लिए तैयार' होने जैसा है।
- सामाजिक-सांस्कृतिक कारक: हमारी संस्कृति, भाषा और सामाजिक अनुभव हमारे प्रत्यक्षण को प्रभावित करते हैं।
- प्रत्यक्षणात्मक स्थिरता (Perceptual Constancy): यह वस्तुओं को उनके बदलते संवेदी इनपुट के बावजूद स्थिर रूप से देखने की प्रवृत्ति है।
- भ्रांतियाँ (Illusions): ये वास्तविक संवेदी उत्तेजनाओं की गलत व्याख्याएँ हैं। हमारा मस्तिष्क कभी-कभी संवेदी जानकारी को गलत तरीके से व्यवस्थित या व्याख्या करता है।
- मुलर-लायर भ्रम (Müller-Lyer Illusion): समान लंबाई की रेखाएँ जिनके सिरों पर अलग-अलग कोणों के पंख होते हैं, अलग-अलग लंबाई की प्रतीत होती हैं।
- पोनजो भ्रम (Ponzo Illusion): समानांतर पटरियों पर समान आकार की दो वस्तुएँ, दूर वाली बड़ी दिखती है।
- ऊर्ध्वाधर-क्षैतिज भ्रम (Vertical-Horizontal Illusion): समान लंबाई की ऊर्ध्वाधर रेखा क्षैतिज रेखा से लंबी प्रतीत होती है।
- भ्रम (Illusion) और विभ्रम (Hallucination) में अंतर:
- भ्रम: बाहरी उत्तेजना की गलत व्याख्या। (जैसे रस्सी को साँप समझना)
- विभ्रम: बाहरी उत्तेजना की अनुपस्थिति में भी संवेदी अनुभव होना। (जैसे बिना किसी आवाज़ के आवाज़ें सुनना)
यह विस्तृत नोट्स आपको इस अध्याय की गहन समझ प्रदान करेंगे और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए आपकी तैयारी को मजबूत करेंगे। अब, आइए कुछ बहुविकल्पीय प्रश्नों का अभ्यास करें।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
1. संवेदन की वह प्रक्रिया जिसमें किसी स्थिर उत्तेजना के प्रति हमारी संवेदनशीलता समय के साथ कम हो जाती है, क्या कहलाती है?
a) संवेदी अनुकूलन
b) संवेदी संवेदनशीलता
c) संवेदी अवधान
d) संवेदी प्रत्यक्षण
2. वेबर का नियम किससे संबंधित है?
a) परम सीमा
b) अंतर सीमा
c) संवेदी अनुकूलन
d) प्रत्यक्षण स्थिरता
3. जब हम एक ही समय में कई उत्तेजनाओं में से केवल एक पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो यह किस प्रकार का अवधान है?
a) विभाजित अवधान
b) सतत अवधान
c) चयनात्मक अवधान
d) अनैच्छिक अवधान
4. ब्रॉडबेंट का फिल्टर मॉडल किस प्रक्रिया से संबंधित है?
a) प्रत्यक्षण स्थिरता
b) गहराई प्रत्यक्षण
c) चयनात्मक अवधान
d) संवेदी अनुकूलन
5. गेस्टाल्ट मनोविज्ञान के अनुसार, "जो वस्तुएँ एक-दूसरे के करीब होती हैं, उन्हें हम एक समूह के रूप में देखते हैं।" यह सिद्धांत क्या कहलाता है?
a) समानता का नियम
b) निरंतरता का नियम
c) समीपता का नियम
d) संवरक का नियम
6. किसी वस्तु को उसकी दूरी बदलने पर भी उसी आकार का देखना किस प्रकार की प्रत्यक्षणात्मक स्थिरता का उदाहरण है?
a) रंग स्थिरता
b) चमक स्थिरता
c) आकार स्थिरता
d) गहराई स्थिरता
7. कौन सा एकनेत्रीय संकेत है जो गहराई प्रत्यक्षण में मदद करता है?
a) दृष्टिपटल विषमता
b) अभिसरण
c) रैखिक परिप्रेक्ष्य
d) द्विनेत्रीय विषमता
8. मुलर-लायर भ्रम किसका उदाहरण है?
a) विभ्रम
b) प्रत्यक्षणात्मक तत्परता
c) प्रत्यक्षणात्मक भ्रम
d) संवेदी अनुकूलन
9. जब हम किसी बाहरी उत्तेजना की अनुपस्थिति में भी संवेदी अनुभव करते हैं (जैसे बिना किसी आवाज़ के आवाज़ें सुनना), तो इसे क्या कहते हैं?
a) भ्रम
b) विभ्रम
c) प्रत्यक्षणात्मक तत्परता
d) संवेदी अनुकूलन
10. व्यक्ति की अपेक्षाओं, अनुभवों या प्रेरणाओं के आधार पर किसी विशेष तरीके से चीजों को देखने की प्रवृत्ति क्या कहलाती है?
a) प्रत्यक्षणात्मक स्थिरता
b) प्रत्यक्षणात्मक संगठन
c) प्रत्यक्षणात्मक तत्परता
d) प्रत्यक्षणात्मक भ्रम
उत्तरमाला:
- a) संवेदी अनुकूलन
- b) अंतर सीमा
- c) चयनात्मक अवधान
- c) चयनात्मक अवधान
- c) समीपता का नियम
- c) आकार स्थिरता
- c) रैखिक परिप्रेक्ष्य
- c) प्रत्यक्षणात्मक भ्रम
- b) विभ्रम
- c) प्रत्यक्षणात्मक तत्परता
मुझे आशा है कि यह विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपके अध्ययन में सहायक होंगे। अपनी तैयारी जारी रखें और सफलता प्राप्त करें!