Class 11 Sanskrit Notes Chapter 4 (मानो हि महतां धनम्) – Shashwati Book

नमस्ते विद्यार्थियो!
आज हम कक्षा 11 की संस्कृत पाठ्यपुस्तक 'शाश्वती' के चतुर्थ पाठ 'मानो हि महतां धनम्' का अध्ययन करेंगे। यह पाठ परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, विशेषकर उन परीक्षाओं के लिए जिनमें भारतीय संस्कृति और साहित्य से प्रश्न पूछे जाते हैं। आइए, इसके विस्तृत नोट्स और कुछ बहुविकल्पीय प्रश्नों (MCQs) पर ध्यान केंद्रित करें।
पाठ 4: मानो हि महतां धनम् (विस्तृत नोट्स)
1. पाठ का परिचय एवं स्रोत:
- शीर्षक का अर्थ: "मानो हि महतां धनम्" का अर्थ है - मान (सम्मान, स्वाभिमान) ही महान लोगों का सच्चा धन होता है।
- स्रोत: यह पाठ्यांश महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाकाव्य 'महाभारत' के 'उद्योग पर्व' (अध्याय 29-30) से संकलित किया गया है।
- प्रसंग: यह अंश उस समय का है जब पाण्डवों का अज्ञातवास समाप्त हो चुका है और वे अपना राज्य वापस मांग रहे हैं। कौरवों की ओर से धृतराष्ट्र का संदेश लेकर सञ्जय, पाण्डवों के पास, विशेषकर युधिष्ठिर के पास आते हैं। धृतराष्ट्र युद्ध टालने के लिए पाण्डवों को केवल पाँच गाँव देने का प्रस्ताव रखते हैं। इसी प्रस्ताव पर युधिष्ठिर की प्रतिक्रिया इस पाठ का केन्द्र है।
2. पाठ का सारांश एवं व्याख्या:
- सञ्जय का आगमन: सञ्जय दूत बनकर युधिष्ठिर के पास आते हैं और धृतराष्ट्र का संदेश सुनाते हैं कि कौरव पाण्डवों को केवल पाँच गाँव (अविस्थल, वृकस्थल, माकन्दी, वारणावत और कोई भी एक अन्य) देने को तैयार हैं, ताकि युद्ध टाला जा सके।
- युधिष्ठिर की प्रतिक्रिया: युधिष्ठिर धृतराष्ट्र के इस प्रस्ताव को सुनकर अत्यंत क्षुब्ध और अपमानित महसूस करते हैं। वे सञ्जय से कहते हैं:
- मान का महत्व: युधिष्ठिर स्पष्ट करते हैं कि महान या कुलीन पुरुषों के लिए मान (आत्म-सम्मान) ही सबसे बड़ा धन है। मान की हानि होने पर धन-सम्पत्ति या जीवन का भी कोई मूल्य नहीं रह जाता (
मानो हि महतां धनम्)। वे कहते हैं कि मानहीन होकर जीने से अच्छा मरना है। - अपमानजनक प्रस्ताव: पाँच गाँवों का प्रस्ताव पाण्डवों के क्षात्रधर्म और उनके अधिकार का घोर अपमान है। यह उनके गौरव और प्रतिष्ठा के सर्वथा विरुद्ध है।
- कर्म और पराक्रम पर बल: युधिष्ठिर कहते हैं कि क्षत्रिय के लिए अपने पराक्रम से राज्य प्राप्त करना या युद्ध में वीरगति पाना ही श्रेयस्कर है, न कि अपमानजनक भिक्षा स्वीकार करना। वे कर्मण्यता और पौरुष पर बल देते हैं। वे कहते हैं कि कर्म न करने वाले व्यक्ति की निंदा होती है (
अकर्मण्यं नराधमम्... सर्वे परिभवन्त्युत)। - वृत्ति का प्रश्न: वे तर्क देते हैं कि यदि केवल जीवनयापन (वृत्ति) ही उद्देश्य हो, तो वह भिक्षा मांगकर भी किया जा सकता है, उसके लिए राज्य की आवश्यकता नहीं। परन्तु क्षत्रिय का धर्म भिक्षा मांगना नहीं, अपितु पराक्रम दिखाना है।
- दो ही मार्ग: युधिष्ठिर स्पष्ट करते हैं कि अब उनके सामने दो ही रास्ते हैं - या तो उन्हें उनका न्यायोचित सम्पूर्ण राज्य वापस मिले (
राज्यं वा निखिलं लभेय) या फिर वे युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हों (निहतो वा रणे शयेय)। बीच का कोई अपमानजनक समझौता उन्हें स्वीकार नहीं है। - धृतराष्ट्र को संदेश: वे सञ्जय से कहते हैं कि जाकर धृतराष्ट्र से कह दें कि युधिष्ठिर किसी भी स्थिति में मान-सम्मान से समझौता नहीं करेंगे और अपने अधिकार के लिए युद्ध करने को भी तैयार हैं।
- मान का महत्व: युधिष्ठिर स्पष्ट करते हैं कि महान या कुलीन पुरुषों के लिए मान (आत्म-सम्मान) ही सबसे बड़ा धन है। मान की हानि होने पर धन-सम्पत्ति या जीवन का भी कोई मूल्य नहीं रह जाता (
3. पाठ का उद्देश्य एवं संदेश:
- यह पाठ स्वाभिमान और आत्म-सम्मान के महत्व को रेखांकित करता है।
- यह सिखाता है कि भौतिक संपत्ति या जीवन से भी बढ़कर व्यक्ति का मान-सम्मान होता है।
- यह क्षत्रिय धर्म के आदर्शों (पराक्रम, न्याय के लिए संघर्ष) को प्रस्तुत करता है।
- यह अन्याय और अपमान के सामने न झुकने की प्रेरणा देता है।
- यह दर्शाता है कि महान व्यक्ति विषम परिस्थितियों में भी अपने मूल्यों और सिद्धांतों पर अडिग रहते हैं।
4. प्रमुख पात्र:
- युधिष्ठिर: धर्मराज, पाण्डवों में ज्येष्ठ, सत्यवादी, न्यायप्रिय, परन्तु अपने मान-सम्मान के प्रति अत्यंत सजग।
- सञ्जय: धृतराष्ट्र के मंत्री और सारथी, जिन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त थी, यहाँ दूत की भूमिका में हैं।
- धृतराष्ट्र: कौरवों के पिता, हस्तिनापुर के नेत्रहीन राजा, पुत्रमोह में ग्रस्त। (परोक्ष रूप से उपस्थित)
5. महत्वपूर्ण शब्दावली:
- मानः: सम्मान, इज्जत, स्वाभिमान
- महताम्: महान लोगों का/के लिए
- धनम्: सम्पत्ति, दौलत
- उद्योग पर्व: महाभारत का पाँचवाँ पर्व
- धृतराष्ट्रः: कौरवों के पिता
- युधिष्ठिरः: पाण्डवों में ज्येष्ठ
- सञ्जयः: दूत, मंत्री
- क्षात्रधर्मः: क्षत्रिय का कर्तव्य
- वृत्तिः: जीविका, पेशा
- अकिञ्चनता: दरिद्रता, गरीबी
- पराक्रमः: वीरता, शौर्य
- सन्धिविग्रहौ: संधि और युद्ध
- पञ्चग्रामान्: पाँच गाँव
- परिभवन्ति: अपमान करते हैं, तिरस्कार करते हैं
- स्पृहयन्ति: इच्छा करते हैं, चाहते हैं
6. परीक्षा हेतु महत्व:
यह पाठ महाभारत के एक महत्वपूर्ण नैतिक और राजनीतिक द्वंद्व को दर्शाता है। इससे युधिष्ठिर के चरित्र की दृढ़ता और स्वाभिमान का पता चलता है। परीक्षा में इस पाठ से श्लोकों की व्याख्या, पात्रों का चरित्र-चित्रण, पाठ के संदेश और महाभारत के प्रसंग से संबंधित प्रश्न पूछे जा सकते हैं।
अभ्यास हेतु बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs):
प्रश्न 1: 'मानो हि महतां धनम्' यह पाठ्यांश महाभारत के किस पर्व से लिया गया है?
(क) आदि पर्व
(ख) सभा पर्व
(ग) वन पर्व
(घ) उद्योग पर्व
प्रश्न 2: धृतराष्ट्र का संदेश लेकर पाण्डवों के पास कौन गया था?
(क) विदुर
(ख) भीष्म
(ग) सञ्जय
(घ) द्रोणाचार्य
प्रश्न 3: धृतराष्ट्र ने पाण्डवों को युद्ध टालने के लिए कितने गाँव देने का प्रस्ताव रखा?
(क) दस
(ख) सात
(ग) पाँच
(घ) एक भी नहीं
प्रश्न 4: पाठ के अनुसार, महान लोगों का वास्तविक धन क्या है?
(क) स्वर्ण
(ख) राज्य
(ग) मान (सम्मान)
(घ) बल
प्रश्न 5: युधिष्ठिर के अनुसार, मान-सम्मान की रक्षा के लिए क्या स्वीकार्य है?
(क) अपमानजनक संधि
(ख) मृत्यु
(ग) पलायन
(घ) भिक्षावृत्ति
प्रश्न 6: "अकर्मण्यं नराधमम्... सर्वे परिभवन्त्युत" - इस पंक्ति का क्या अर्थ है?
(क) कर्म करने वाले का सभी सम्मान करते हैं।
(ख) कर्म न करने वाले नीच व्यक्ति का सभी तिरस्कार करते हैं।
(ग) कर्म का फल अवश्य मिलता है।
(घ) राजा का सभी सम्मान करते हैं।
प्रश्न 7: युधिष्ठिर ने सञ्जय से धृतराष्ट्र को क्या कहने के लिए कहा?
(क) वे पाँच गाँव स्वीकार करते हैं।
(ख) वे युद्ध नहीं चाहते।
(ग) वे या तो पूरा राज्य लेंगे या युद्ध में मारे जाएँगे।
(घ) वे वन में ही रहेंगे।
प्रश्न 8: 'महताम्' पद में कौन सी विभक्ति और वचन है?
(क) प्रथमा, एकवचन
(ख) षष्ठी, बहुवचन
(ग) द्वितीया, बहुवचन
(घ) सप्तमी, एकवचन
प्रश्न 9: इस पाठ्यांश में मुख्य रूप से किसके स्वाभिमान पर बल दिया गया है?
(क) सञ्जय
(ख) धृतराष्ट्र
(ग) युधिष्ठिर
(घ) श्रीकृष्ण
प्रश्न 10: युधिष्ठिर के अनुसार, क्षत्रिय के लिए कौन सा मार्ग श्रेयस्कर नहीं है?
(क) पराक्रम से राज्य प्राप्त करना
(ख) युद्ध में वीरगति पाना
(ग) अपमानजनक जीवन जीना
(घ) न्याय के लिए संघर्ष करना
उत्तरमाला:
1 - (घ), 2 - (ग), 3 - (ग), 4 - (ग), 5 - (ख), 6 - (ख), 7 - (ग), 8 - (ख), 9 - (ग), 10 - (ग)
इन नोट्स को ध्यानपूर्वक पढ़ें और प्रश्नों का अभ्यास करें। यह पाठ न केवल परीक्षा के लिए उपयोगी है, बल्कि जीवन में स्वाभिमान के महत्व को भी दर्शाता है। शुभकामनाएँ!