Class 11 Sociology Notes Chapter 1 (समाज में सामाजिक संरचना; स्तरीकरण और सामाजिक प्रक्रियाएँ) – Samaj ka Bodh Book

नमस्ते विद्यार्थियों।
आज हम कक्षा 11 की समाजशास्त्र की पुस्तक 'समाज का बोध' के पहले अध्याय 'समाज में सामाजिक संरचना, स्तरीकरण और सामाजिक प्रक्रियाएँ' का गहन अध्ययन करेंगे। यह अध्याय समाजशास्त्र की नींव है और प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। चलिए, इसे विस्तार से समझते हैं।
अध्याय 1: समाज में सामाजिक संरचना, स्तरीकरण और सामाजिक प्रक्रियाएँ - विस्तृत नोट्स
इस अध्याय को हम तीन मुख्य भागों में बांटकर समझेंगे:
- सामाजिक संरचना (Social Structure)
- सामाजिक स्तरीकरण (Social Stratification)
- सामाजिक प्रक्रियाएँ (Social Processes)
भाग 1: सामाजिक संरचना (Social Structure)
अर्थ और परिभाषा:
सामाजिक संरचना का तात्पर्य समाज में मौजूद व्यवस्थित और प्रतिमानित (patterned) सामाजिक संबंधों के जाल से है। यह एक अमूर्त (abstract) अवधारणा है, जिसे हम सीधे देख नहीं सकते, लेकिन इसके प्रभाव को महसूस कर सकते हैं। जैसे एक इमारत का ढाँचा ईंट, सीमेंट से बनता है, वैसे ही समाज का ढाँचा सामाजिक संस्थाओं, समूहों, भूमिकाओं और प्रतिमानों से बनता है।
- एमिल दुर्खीम (Émile Durkheim) के अनुसार, सामाजिक संरचना व्यक्ति से बाहरी होती है और व्यक्ति पर दबाव डालती है। यह व्यक्ति के व्यवहार को नियंत्रित और निर्देशित करती है।
- कार्ल मार्क्स (Karl Marx) ने सामाजिक संरचना को आर्थिक आधार (उत्पादन प्रणाली) पर टिका हुआ माना, जिसे वे 'अधोसंरचना' (Base) कहते हैं। इसी पर समाज की 'अधिसंरचना' (Superstructure) जैसे- कानून, धर्म, राजनीति, संस्कृति आदि टिकी होती है।
सामाजिक संरचना की विशेषताएँ:
- अमूर्तता: यह भौतिक वस्तु नहीं है, बल्कि संबंधों का एक पैटर्न है।
- अपेक्षाकृत स्थायी: यह धीरे-धीरे बदलती है, लेकिन इसमें एक प्रकार की स्थिरता होती है। उदाहरण के लिए, परिवार नामक संस्था सदियों से मौजूद है, भले ही उसके स्वरूप में बदलाव आया हो।
- बाह्यता और दबावकारी: यह व्यक्ति की चेतना से बाहर होती है और उसके व्यवहार को सामाजिक नियमों के अनुसार ढालने के लिए दबाव बनाती है।
- विभिन्न इकाइयों से निर्मित: यह संस्थाओं (परिवार, विवाह, धर्म), समूहों (जाति, वर्ग), भूमिकाओं (पिता, शिक्षक, डॉक्टर) और सामाजिक प्रतिमानों से मिलकर बनती है।
परीक्षा की दृष्टि से महत्व: सामाजिक संरचना यह समझने में मदद करती है कि हमारा व्यक्तिगत जीवन भी व्यापक सामाजिक शक्तियों द्वारा कैसे आकार लेता है।
भाग 2: सामाजिक स्तरीकरण (Social Stratification)
अर्थ और परिभाषा:
सामाजिक स्तरीकरण का अर्थ है समाज में समूहों के बीच संरचनात्मक असमानताओं (structured inequalities) का अस्तित्व। यह समाज को विभिन्न स्तरों या 'स्तरों' (strata) में विभाजित करने की एक व्यवस्था है, जिसमें कुछ लोगों के पास दूसरों की तुलना में अधिक धन, शक्ति और प्रतिष्ठा होती है। यह असमानता व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक होती है।
सामाजिक स्तरीकरण के चार प्रमुख सिद्धांत:
- यह समाज की एक विशेषता है: यह व्यक्तिगत भिन्नताओं का परिणाम नहीं, बल्कि समाज की संरचना का हिस्सा है।
- यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता है: माता-पिता की सामाजिक स्थिति बच्चों को विरासत में मिलती है, जिसे 'सामाजिक गतिशीलता' (Social Mobility) के माध्यम से बदला जा सकता है, लेकिन यह मुश्किल होता है।
- यह सार्वभौमिक है पर स्वरूप में भिन्न है: स्तरीकरण हर समाज में पाया जाता है, लेकिन इसका आधार (जाति, वर्ग, लिंग आदि) और स्वरूप अलग-अलग हो सकता है।
- इसमें केवल असमानता ही नहीं, बल्कि विश्वास और विचारधारा भी शामिल है: हर स्तरीकरण प्रणाली में यह विश्वास दिलाया जाता है कि यह व्यवस्था उचित और न्यायपूर्ण है।
स्तरीकरण के प्रमुख स्वरूप:
- दासता (Slavery): एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति की संपत्ति समझा जाता है। यह स्तरीकरण का सबसे चरम रूप है।
- जाति (Caste): यह एक बंद व्यवस्था है, जिसमें व्यक्ति की सामाजिक स्थिति उसके जन्म से निर्धारित होती है। इसमें व्यवसाय, विवाह और सामाजिक संपर्क के कठोर नियम होते हैं। यह पारंपरिक भारतीय समाज की मुख्य विशेषता रही है।
- एस्टेट या जागीर (Estate): यह सामंती यूरोप की व्यवस्था थी, जिसमें समाज तीन प्रमुख श्रेणियों में बंटा था - पादरी, अभिजात वर्ग (सरदार) और सामान्य जन।
- वर्ग (Class): यह एक खुली व्यवस्था है, जो मुख्य रूप से आर्थिक कारकों (आय, संपत्ति, व्यवसाय) पर आधारित होती है। इसमें सामाजिक गतिशीलता की संभावना जाति व्यवस्था से अधिक होती है।
दृष्टिकोण:
- प्रकार्यात्मक दृष्टिकोण (Functionalist Perspective): डेविस और मूर जैसे विचारकों का मानना है कि स्तरीकरण समाज के लिए आवश्यक है। यह सुनिश्चित करता है कि सबसे महत्वपूर्ण पदों पर सबसे योग्य व्यक्ति ही पहुँचें, जिसके लिए उन्हें अधिक पुरस्कार (धन, प्रतिष्ठा) दिया जाता है।
- संघर्ष दृष्टिकोण (Conflict Perspective): कार्ल मार्क्स के अनुसार, स्तरीकरण शोषण पर आधारित है। पूँजीवादी समाज में दो प्रमुख वर्ग हैं - बुर्जुआ (पूँजीपति) और सर्वहारा (श्रमिक), जिनके हितों में टकराव होता है। मैक्स वेबर ने इसमें 'स्थिति' (Status) और 'शक्ति' (Power) को भी जोड़ा।
भाग 3: सामाजिक प्रक्रियाएँ (Social Processes)
अर्थ और परिभाषा:
सामाजिक प्रक्रियाएँ वे तरीके हैं जिनसे व्यक्ति और समूह एक-दूसरे के साथ अंतःक्रिया करते हैं और संबंध स्थापित करते हैं। ये समाज के गतिशील पहलू हैं। इन्हें मुख्यतः दो भागों में बांटा जा सकता है:
1. सहयोगी सामाजिक प्रक्रियाएँ (Associative Social Processes):
- सहयोग (Cooperation): किसी समान लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए मिलकर काम करना। यह समाज के अस्तित्व और संगठन का आधार है। उदाहरण: परिवार के सदस्यों का मिलकर घर चलाना, एक टीम का मैच जीतना।
- व्यवस्थापन/समायोजन (Accommodation): यह संघर्ष को रोकने या कम करने के लिए किया जाने वाला समझौता है। इसमें विरोधी पक्ष एक-दूसरे के साथ काम करने के लिए कुछ नियमों पर सहमत होते हैं। उदाहरण: दो देशों के बीच शांति समझौता।
- सात्मीकरण (Assimilation): वह प्रक्रिया जिसमें एक अल्पसंख्यक समूह धीरे-धीरे बहुसंख्यक समूह की संस्कृति, मूल्यों और व्यवहारों को अपना लेता है और अपनी अलग पहचान खो देता है।
2. असहयोगी सामाजिक प्रक्रियाएँ (Dissociative Social Processes):
- प्रतिस्पर्धा (Competition): सीमित संसाधनों या लक्ष्यों (जैसे नौकरी, पद, पुरस्कार) को प्राप्त करने की होड़। यह आमतौर पर अवैयक्तिक होती है और नियमों के तहत चलती है। यह समाज में नवाचार और प्रगति को बढ़ावा दे सकती है।
- संघर्ष (Conflict): जब प्रतिस्पर्धा व्यक्तिगत हो जाती है और विरोधी को नुकसान पहुँचाने, उसे रास्ते से हटाने या समाप्त करने का प्रयास किया जाता है, तो यह संघर्ष कहलाता है। यह हिंसात्मक या अहिंसात्मक हो सकता है। उदाहरण: युद्ध, दंगे, राजनीतिक दलों में टकराव।
प्रतिस्पर्धा और संघर्ष में अंतर:
| आधार | प्रतिस्पर्धा (Competition) | संघर्ष (Conflict) |
|---|---|---|
| स्वरूप | अवैयक्तिक (Impersonal) | वैयक्तिक (Personal) |
| लक्ष्य | लक्ष्य प्राप्त करना | प्रतिद्वंद्वी को हराना या नुकसान पहुँचाना |
| नियम | नियमों से बंधी होती है | अक्सर नियमों का उल्लंघन होता है |
| चेतना | प्रतिद्वंद्वी पर ध्यान कम, लक्ष्य पर अधिक | प्रतिद्वंद्वी पर ध्यान केंद्रित होता है |
| निरंतरता | निरंतर चलने वाली प्रक्रिया | रुक-रुक कर होने वाली प्रक्रिया |
अभ्यास हेतु बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
प्रश्न 1: समाजशास्त्र में, सामाजिक संरचना की अवधारणा को व्यक्ति से 'बाहरी' और 'दबावकारी' शक्ति के रूप में किसने वर्णित किया?
(क) कार्ल मार्क्स
(ख) मैक्स वेबर
(ग) एमिल दुर्खीम
(घ) अगस्त कॉम्त
प्रश्न 2: सामाजिक स्तरीकरण की वह व्यवस्था जिसमें व्यक्ति की सामाजिक स्थिति पूरी तरह से जन्म पर आधारित होती है, क्या कहलाती है?
(क) वर्ग व्यवस्था
(ख) जाति व्यवस्था
(ग) दासता
(घ) जागीरदारी
प्रश्न 3: निम्नलिखित में से कौन सी एक सहयोगी सामाजिक प्रक्रिया नहीं है?
(क) सहयोग
(ख) संघर्ष
(ग) समायोजन
(घ) सात्मीकरण
प्रश्न 4: कार्ल मार्क्स के अनुसार, सामाजिक संरचना का आधार क्या है?
(क) धर्म और संस्कृति
(ख) राजनीतिक व्यवस्था
(ग) आर्थिक उत्पादन प्रणाली
(घ) पारिवारिक संबंध
प्रश्न 5: जब दो या दो से अधिक व्यक्ति या समूह किसी सीमित लक्ष्य को नियमों के अंतर्गत प्राप्त करने का प्रयास करते हैं, तो उसे क्या कहते हैं?
(क) संघर्ष
(ख) प्रतिस्पर्धा
(ग) सहयोग
(घ) समायोजन
प्रश्न 6: सामाजिक स्तरीकरण के प्रकार्यात्मक सिद्धांत का मुख्य तर्क क्या है?
(क) यह समाज में शोषण को बढ़ावा देता है।
(ख) यह समाज के अस्तित्व और कुशलता के लिए आवश्यक है।
(ग) यह केवल आर्थिक असमानता पर आधारित है।
(घ) यह एक सार्वभौमिक बुराई है।
प्रश्न 7: मैक्स वेबर ने मार्क्स के वर्ग विश्लेषण में किन दो आयामों को जोड़ा?
(क) धर्म और जाति
(ख) स्थिति (Status) और शक्ति (Power)
(ग) लिंग और प्रजाति
(घ) शिक्षा और स्वास्थ्य
प्रश्न 8: वह प्रक्रिया जिसमें एक अल्पसंख्यक समूह प्रमुख समूह की संस्कृति को अपनाकर अपनी पहचान खो देता है, कहलाती है-
(क) समायोजन (Accommodation)
(ख) सहयोग (Cooperation)
(ग) सात्मीकरण (Assimilation)
(घ) प्रतिस्पर्धा (Competition)
प्रश्न 9: 'समाज की अधिसंरचना' (Superstructure) की अवधारणा किससे संबंधित है?
(क) एमिल दुर्खीम
(ख) मैक्स वेबर
(ग) हरबर्ट स्पेंसर
(घ) कार्ल मार्क्स
प्रश्न 10: प्रतिस्पर्धा और संघर्ष के बीच मुख्य अंतर क्या है?
(क) प्रतिस्पर्धा में नियम होते हैं, संघर्ष में नहीं।
(ख) प्रतिस्पर्धा अवैयक्तिक होती है, जबकि संघर्ष वैयक्तिक होता है।
(ग) प्रतिस्पर्धा का लक्ष्य वस्तु प्राप्त करना है, जबकि संघर्ष का लक्ष्य प्रतिद्वंद्वी को नुकसान पहुँचाना है।
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तरमाला:
- (ग) एमिल दुर्खीम
- (ख) जाति व्यवस्था
- (ख) संघर्ष
- (ग) आर्थिक उत्पादन प्रणाली
- (ख) प्रतिस्पर्धा
- (ख) यह समाज के अस्तित्व और कुशलता के लिए आवश्यक है।
- (ख) स्थिति (Status) और शक्ति (Power)
- (ग) सात्मीकरण (Assimilation)
- (घ) कार्ल मार्क्स
- (घ) उपरोक्त सभी।
इन नोट्स को अच्छी तरह से पढ़ें और अपनी समझ को मजबूत करें। शुभकामनाएँ