Class 11 Sociology Notes Chapter 4 (पाश्चात्य समाजशास्त्री-एक परिचय) – Samaj ka Bodh Book

Samaj ka Bodh
प्रिय विद्यार्थियों,

आज हम समाजशास्त्र के आधारभूत स्तंभों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय 'पाश्चात्य समाजशास्त्री-एक परिचय' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय आपको समाजशास्त्र के उद्भव और उसके प्रारंभिक विचारकों की गहरी समझ प्रदान करेगा, जो न केवल आपकी कक्षा 11 की परीक्षाओं के लिए बल्कि विभिन्न सरकारी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।


अध्याय 4: पाश्चात्य समाजशास्त्री-एक परिचय (विस्तृत नोट्स)

यह अध्याय समाजशास्त्र के तीन प्रमुख संस्थापकों – कार्ल मार्क्स, एमिल दुर्खीम और मैक्स वेबर – के विचारों और योगदानों पर केंद्रित है। इनके सिद्धांतों ने समाजशास्त्र को एक विशिष्ट अनुशासन के रूप दिया और आज भी सामाजिक विश्लेषण के लिए आधार प्रदान करते हैं।

1. समाजशास्त्र का उदय: ऐतिहासिक संदर्भ

समाजशास्त्र का जन्म 18वीं और 19वीं शताब्दी में यूरोप में हुए बड़े सामाजिक और बौद्धिक परिवर्तनों के परिणामस्वरूप हुआ। इन परिवर्तनों ने समाज के पारंपरिक ढांचे को चुनौती दी और नए विचारों को जन्म दिया।

  • ज्ञानोदय (Enlightenment): 18वीं शताब्दी में तर्क और अनुभवजन्य अवलोकन पर जोर दिया गया। इसने धार्मिक और पारंपरिक विचारों के बजाय वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समाज को समझने का मार्ग प्रशस्त किया।
  • फ्रांसीसी क्रांति (French Revolution - 1789): इसने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के विचारों को बढ़ावा दिया। इसने राजशाही और सामंती व्यवस्था को चुनौती दी, जिससे समाज में अराजकता और अव्यवस्था का दौर भी आया। समाजशास्त्रियों ने इस सामाजिक विघटन के कारणों और समाधानों को समझने का प्रयास किया।
  • औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution - 18वीं-19वीं शताब्दी): इसने उत्पादन के तरीकों में क्रांतिकारी परिवर्तन लाए।
    • पूंजीवाद का उदय: कारखानों और बड़े पैमाने पर उत्पादन ने पूंजीवादी व्यवस्था को जन्म दिया, जिसमें पूंजीपति (बुर्जुआ) और श्रमिक (सर्वहारा) वर्ग प्रमुख थे।
    • शहरीकरण: लोग ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर पलायन करने लगे, जिससे शहरों में भीड़भाड़, गरीबी, अपराध और नई सामाजिक समस्याएं उत्पन्न हुईं।
    • सामाजिक संबंध: पारंपरिक समुदाय टूट रहे थे और नए, अधिक अवैयक्तिक सामाजिक संबंधों का उदय हो रहा था।
  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास: प्राकृतिक विज्ञानों की सफलता से प्रेरित होकर, समाज को भी वैज्ञानिक पद्धति से समझने का विचार प्रबल हुआ।

इन परिवर्तनों ने समाजशास्त्रियों को समाज के नए स्वरूप, उसकी समस्याओं और उसके कार्यप्रणाली को व्यवस्थित रूप से समझने के लिए प्रेरित किया।

2. कार्ल मार्क्स (Karl Marx: 1818-1883)

कार्ल मार्क्स एक जर्मन दार्शनिक, अर्थशास्त्री, इतिहासकार, पत्रकार और क्रांतिकारी समाजवादी थे। उनके विचारों ने समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान पर गहरा प्रभाव डाला।

  • प्रमुख अवधारणाएँ:

    • द्वंद्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism): मार्क्स ने हीगल के द्वंद्ववाद (विचारों के संघर्ष से विकास) को भौतिकवादी आधार दिया। उनके अनुसार, समाज का विकास विचारों के नहीं, बल्कि भौतिक (आर्थिक) परिस्थितियों में मौजूद अंतर्विरोधों (जैसे उत्पादन के साधनों और उत्पादन संबंधों के बीच) के कारण होता है।
    • ऐतिहासिक भौतिकवाद (Historical Materialism): यह सिद्धांत बताता है कि इतिहास का विकास आर्थिक कारकों (उत्पादन के तरीके) द्वारा निर्धारित होता है। समाज के प्रत्येक युग की अपनी विशिष्ट आर्थिक संरचना होती है, जो उसके सामाजिक, राजनीतिक और बौद्धिक जीवन को आकार देती है।
    • वर्ग संघर्ष (Class Struggle): मार्क्स के अनुसार, इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है। पूंजीवादी समाज में, यह संघर्ष मुख्य रूप से दो प्रमुख वर्गों के बीच होता है:
      • बुर्जुआ (Bourgeoisie): पूंजीपति वर्ग, जो उत्पादन के साधनों (कारखानों, भूमि) का मालिक होता है।
      • सर्वहारा (Proletariat): श्रमिक वर्ग, जिसके पास बेचने के लिए केवल अपना श्रम होता है।
      • यह संघर्ष शोषण और असमानता पर आधारित है, और मार्क्स का मानना था कि यह अंततः सर्वहारा क्रांति की ओर ले जाएगा।
    • पूंजीवाद (Capitalism): मार्क्स ने पूंजीवाद को एक ऐसी व्यवस्था के रूप में देखा जो श्रमिकों का शोषण करती है। पूंजीपति वर्ग श्रमिकों से अधिशेष मूल्य (Surplus Value) निकालता है, यानी श्रमिकों को उनके द्वारा उत्पादित मूल्य से कम भुगतान करता है।
    • अलगाव/विछिन्नता (Alienation): पूंजीवादी व्यवस्था में श्रमिक कई स्तरों पर अलगाव का अनुभव करते हैं:
      • उत्पाद से अलगाव (श्रमिक अपने उत्पाद पर नियंत्रण नहीं रखते)।
      • उत्पादन की प्रक्रिया से अलगाव (कार्य नीरस और दोहराव वाला होता है)।
      • अपनी मानवीय क्षमता से अलगाव (रचनात्मकता का अभाव)।
      • अन्य मनुष्यों से अलगाव (प्रतिस्पर्धा और शत्रुता)।
    • अधोसंरचना और अधिरचना (Infrastructure and Superstructure): मार्क्स के अनुसार, समाज की आर्थिक संरचना (उत्पादन के संबंध और बल) अधोसंरचना का निर्माण करती है। इस अधोसंरचना पर ही अधिरचना (कानून, राजनीति, धर्म, शिक्षा, संस्कृति, विचारधारा) खड़ी होती है। अधिरचना का उद्देश्य अधोसंरचना को बनाए रखना और पूंजीवादी हितों की सेवा करना है।
    • कम्युनिस्ट समाज (Communist Society): मार्क्स ने एक वर्गविहीन, शोषणविहीन समाज की कल्पना की, जहाँ उत्पादन के साधनों पर सामूहिक स्वामित्व होगा और प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार काम करेगा और अपनी आवश्यकता के अनुसार प्राप्त करेगा।
  • प्रमुख कृतियाँ:

    • दास कैपिटल (Das Kapital): पूंजीवादी व्यवस्था का विस्तृत विश्लेषण।
    • कम्युनिस्ट घोषणापत्र (The Communist Manifesto): फ्रेडरिक एंगेल्स के साथ मिलकर लिखा गया, जिसमें वर्ग संघर्ष और कम्युनिस्ट क्रांति का आह्वान किया गया।

3. एमिल दुर्खीम (Émile Durkheim: 1858-1917)

एमिल दुर्खीम एक फ्रांसीसी समाजशास्त्री थे, जिन्हें समाजशास्त्र को एक अकादमिक अनुशासन के रूप में स्थापित करने का श्रेय दिया जाता है। उन्होंने समाजशास्त्र को एक विशिष्ट वैज्ञानिक पद्धति प्रदान करने पर जोर दिया।

  • प्रमुख अवधारणाएँ:

    • सामाजिक तथ्य (Social Facts): दुर्खीम के अनुसार, समाजशास्त्र का अध्ययन विषय सामाजिक तथ्य हैं। ये वे विचार, भावनाएँ और क्रियाएँ हैं जो व्यक्ति के बाहर मौजूद होती हैं, व्यक्ति पर बाध्यकारी होती हैं और सामूहिक चेतना का हिस्सा होती हैं। उदाहरण: कानून, नैतिकता, रीति-रिवाज, भाषा।
    • श्रम विभाजन (Division of Labour): दुर्खीम ने समाज में एकजुटता के दो प्रकार बताए, जो श्रम विभाजन के स्तर से संबंधित हैं:
      • यांत्रिक एकजुटता (Mechanical Solidarity): यह सरल समाजों में पाई जाती है जहाँ श्रम विभाजन कम होता है। लोग समान जीवन शैली, विश्वासों और मूल्यों को साझा करते हैं। सामूहिक चेतना प्रबल होती है।
      • सावयवी एकजुटता (Organic Solidarity): यह जटिल, आधुनिक समाजों में पाई जाती है जहाँ श्रम विभाजन अत्यधिक विकसित होता है। लोग अपनी विशिष्ट भूमिकाओं और एक-दूसरे पर निर्भरता के कारण एकजुट होते हैं। सामूहिक चेतना कमजोर होती है, लेकिन व्यक्तिगत भिन्नताएँ अधिक होती हैं।
    • सामूहिक चेतना (Collective Conscience): यह किसी समाज के सदस्यों द्वारा साझा किए गए विश्वासों, विचारों और नैतिक दृष्टिकोणों का कुल योग है। यह समाज को एक साथ बांधे रखती है।
    • धर्म का समाजशास्त्र (Sociology of Religion): दुर्खीम ने धर्म को समाज का एक प्रतिबिंब माना। उन्होंने पवित्र (Sacred) और अपवित्र (Profane) के बीच अंतर किया। धर्म सामूहिक चेतना को मजबूत करता है और सामाजिक एकजुटता बनाए रखता है।
    • आत्महत्या का सिद्धांत (Theory of Suicide): अपनी पुस्तक 'आत्महत्या' में, दुर्खीम ने दिखाया कि आत्महत्या एक व्यक्तिगत कार्य होने के बावजूद, इसके सामाजिक कारण होते हैं। उन्होंने सामाजिक एकीकरण और विनियमन के आधार पर आत्महत्या के चार प्रकार बताए:
      • अहंवादी आत्महत्या (Egoistic Suicide): जब व्यक्ति समाज से अत्यधिक विच्छेदित महसूस करता है (कम सामाजिक एकीकरण)।
      • परार्थवादी आत्महत्या (Altruistic Suicide): जब व्यक्ति समाज में अत्यधिक एकीकृत होता है और समूह के लिए खुद का बलिदान करता है (अत्यधिक सामाजिक एकीकरण)।
      • विसंगतिपूर्ण/एनोमी आत्महत्या (Anomic Suicide): जब समाज के नियम और मूल्य टूट जाते हैं या अस्पष्ट हो जाते हैं, जिससे व्यक्ति दिशाहीन महसूस करता है (कम सामाजिक विनियमन)।
      • भाग्यवादी आत्महत्या (Fatalistic Suicide): जब व्यक्ति अत्यधिक विनियमन और दमनकारी परिस्थितियों के कारण आशाहीन महसूस करता है (अत्यधिक सामाजिक विनियमन)।
    • एनोमी/विसंगति (Anomie): यह एक ऐसी स्थिति है जहाँ समाज के नैतिक नियम और मानदंड कमजोर या अनुपस्थित हो जाते हैं, जिससे व्यक्तियों में दिशाहीनता और उद्देश्यहीनता की भावना आती है।
  • प्रमुख कृतियाँ:

    • समाजशास्त्रीय पद्धति के नियम (The Rules of Sociological Method): समाजशास्त्र को एक वैज्ञानिक अनुशासन के रूप में स्थापित करने का प्रयास।
    • श्रम विभाजन (The Division of Labour in Society): सामाजिक एकजुटता पर श्रम विभाजन के प्रभावों का विश्लेषण।
    • आत्महत्या (Suicide): सामाजिक कारकों और आत्महत्या के बीच संबंध का अध्ययन।
    • धर्म का प्रारंभिक स्वरूप (The Elementary Forms of Religious Life): धर्म के सामाजिक आधारों का विश्लेषण।

4. मैक्स वेबर (Max Weber: 1864-1920)

मैक्स वेबर एक जर्मन समाजशास्त्री, दार्शनिक, न्यायविद् और राजनीतिक अर्थशास्त्री थे। उन्होंने समाजशास्त्र को 'सामाजिक क्रिया' के अध्ययन के रूप में परिभाषित किया और व्याख्यात्मक समझ (Verstehen) पर जोर दिया।

  • प्रमुख अवधारणाएँ:

    • सामाजिक क्रिया (Social Action): वेबर के अनुसार, समाजशास्त्र का केंद्रीय विषय सामाजिक क्रिया है। सामाजिक क्रिया वह क्रिया है जिसका कर्ता (व्यक्ति) अपनी क्रिया के साथ एक व्यक्तिपरक अर्थ जोड़ता है और जो दूसरों की क्रियाओं से प्रभावित होती है। वेबर ने सामाजिक क्रिया के चार आदर्श प्रकार बताए:
      • तार्किक क्रिया (Rational Action): लक्ष्य-उन्मुख, साधनों और लक्ष्यों का तार्किक मूल्यांकन।
      • मूल्यांकनात्मक क्रिया (Value-Rational Action): किसी नैतिक, धार्मिक या सौंदर्यवादी मूल्य में विश्वास के कारण की गई क्रिया, परिणामों की परवाह किए बिना।
      • भावात्मक क्रिया (Affective Action): भावनाओं या आवेगों से प्रेरित क्रिया।
      • परंपरागत क्रिया (Traditional Action): आदतों, रीति-रिवाजों या परंपराओं के कारण की गई क्रिया।
    • आदर्श प्रारूप (Ideal Type): यह एक विश्लेषणात्मक उपकरण है, एक वैचारिक निर्माण जो सामाजिक घटनाओं की प्रमुख विशेषताओं को अतिरंजित करके प्रस्तुत करता है। यह वास्तविक दुनिया की जटिलताओं को समझने और तुलना करने में मदद करता है, न कि किसी आदर्श स्थिति का वर्णन करने में। उदाहरण: नौकरशाही का आदर्श प्रारूप।
    • सत्ता के प्रकार (Types of Authority): वेबर ने प्रभुत्व (Domination) या सत्ता के तीन शुद्ध प्रकार बताए:
      • तार्किक-विधिक सत्ता (Rational-Legal Authority): नियमों, कानूनों और प्रक्रियाओं पर आधारित (जैसे आधुनिक नौकरशाही)।
      • परंपरागत सत्ता (Traditional Authority): स्थापित परंपराओं, रीति-रिवाजों और इतिहास पर आधारित (जैसे राजशाही)।
      • करिश्माई सत्ता (Charismatic Authority): किसी व्यक्ति के असाधारण गुणों, वीरता या पवित्रता में विश्वास पर आधारित (जैसे महात्मा गांधी, मार्टिन लूथर किंग)।
    • नौकरशाही (Bureaucracy): वेबर ने नौकरशाही को आधुनिक समाज में प्रशासन का सबसे कुशल और तार्किक रूप माना। इसके आदर्श प्रारूप की विशेषताएँ: पदानुक्रम, नियमों का पालन, अवैयक्तिकता, विशेषज्ञता, लिखित दस्तावेज।
    • धर्म और पूंजीवाद (Religion and Capitalism): अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'प्रोटेस्टेंट नीतिशास्त्र और पूंजीवाद की भावना' में, वेबर ने तर्क दिया कि प्रोटेस्टेंट धर्म (विशेषकर केल्विनवाद) की कुछ नैतिक अवधारणाओं (जैसे कठोर परिश्रम, बचत, सांसारिक सफलता को ईश्वर की कृपा का संकेत मानना) ने पूंजीवाद के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
    • तार्किकीकरण (Rationalization): वेबर ने आधुनिक समाज की एक प्रमुख विशेषता के रूप में तार्किकीकरण को देखा, जहाँ तर्क, दक्षता और गणना धीरे-धीरे परंपरा, भावना और मूल्य-आधारित क्रियाओं की जगह ले रहे हैं।
    • मूल्य-निरपेक्षता (Value Neutrality): वेबर ने समाजशास्त्रियों से अपने व्यक्तिगत मूल्यों को अनुसंधान से अलग रखने का आग्रह किया ताकि वस्तुनिष्ठता बनी रहे।
  • प्रमुख कृतियाँ:

    • प्रोटेस्टेंट नीतिशास्त्र और पूंजीवाद की भावना (The Protestant Ethic and the Spirit of Capitalism): धर्म और आर्थिक विकास के बीच संबंध का विश्लेषण।
    • अर्थव्यवस्था और समाज (Economy and Society): समाजशास्त्रीय अवधारणाओं और सिद्धांतों का व्यापक संग्रह।

निष्कर्ष

मार्क्स, दुर्खीम और वेबर ने अपने विशिष्ट दृष्टिकोणों से समाज को समझने का प्रयास किया। मार्क्स ने आर्थिक संरचना और वर्ग संघर्ष पर जोर दिया; दुर्खीम ने सामाजिक तथ्यों, एकजुटता और सामूहिक चेतना पर ध्यान केंद्रित किया; जबकि वेबर ने सामाजिक क्रिया, व्याख्यात्मक समझ और तार्किकीकरण को महत्व दिया। इन तीनों विचारकों के योगदान ने समाजशास्त्र को एक समृद्ध और बहुआयामी अनुशासन बनाया है, जो आज भी सामाजिक घटनाओं का विश्लेषण करने के लिए आधारभूत उपकरण प्रदान करता है।


बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

निर्देश: प्रत्येक प्रश्न के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प का चयन करें।

  1. समाजशास्त्र के उद्भव में निम्नलिखित में से किस क्रांति का महत्वपूर्ण योगदान रहा है?
    a) रूसी क्रांति
    b) फ्रांसीसी क्रांति
    c) चीनी क्रांति
    d) अमेरिकी क्रांति

  2. 'दास कैपिटल' नामक प्रसिद्ध कृति के लेखक कौन हैं?
    a) एमिल दुर्खीम
    b) मैक्स वेबर
    c) कार्ल मार्क्स
    d) ऑगस्ट कॉम्ते

  3. कार्ल मार्क्स के अनुसार, पूंजीवादी समाज में मुख्य रूप से कितने वर्ग होते हैं?
    a) एक
    b) दो
    c) तीन
    d) अनेक

  4. 'सामाजिक तथ्य' की अवधारणा किस समाजशास्त्री से संबंधित है?
    a) मैक्स वेबर
    b) कार्ल मार्क्स
    c) एमिल दुर्खीम
    d) हर्बर्ट स्पेंसर

  5. एमिल दुर्खीम द्वारा प्रतिपादित 'यांत्रिक एकजुटता' किस प्रकार के समाजों में पाई जाती है?
    a) जटिल औद्योगिक समाज
    b) सरल, कम श्रम विभाजन वाले समाज
    c) पूंजीवादी समाज
    d) आधुनिक शहरी समाज

  6. मैक्स वेबर ने सामाजिक क्रिया के कितने आदर्श प्रकार बताए हैं?
    a) दो
    b) तीन
    c) चार
    d) पाँच

  7. वह स्थिति जहाँ समाज के नैतिक नियम और मानदंड कमजोर या अनुपस्थित हो जाते हैं, दुर्खीम के अनुसार क्या कहलाती है?
    a) अलगाव
    b) वर्ग संघर्ष
    c) एनोमी (विसंगति)
    d) नौकरशाही

  8. 'प्रोटेस्टेंट नीतिशास्त्र और पूंजीवाद की भावना' (The Protestant Ethic and the Spirit of Capitalism) नामक पुस्तक के लेखक कौन हैं?
    a) कार्ल मार्क्स
    b) एमिल दुर्खीम
    c) मैक्स वेबर
    d) जॉर्ज सिमेल

  9. मैक्स वेबर द्वारा वर्णित सत्ता के तीन प्रकारों में से कौन-सा एक नहीं है?
    a) तार्किक-विधिक सत्ता
    b) परंपरागत सत्ता
    c) करिश्माई सत्ता
    d) आर्थिक सत्ता

  10. कार्ल मार्क्स का कौन-सा सिद्धांत यह बताता है कि इतिहास का विकास आर्थिक कारकों द्वारा निर्धारित होता है?
    a) द्वंद्वात्मक भौतिकवाद
    b) ऐतिहासिक भौतिकवाद
    c) वर्ग संघर्ष का सिद्धांत
    d) अलगाव का सिद्धांत


उत्तर कुंजी (Answer Key):

  1. b) फ्रांसीसी क्रांति
  2. c) कार्ल मार्क्स
  3. b) दो
  4. c) एमिल दुर्खीम
  5. b) सरल, कम श्रम विभाजन वाले समाज
  6. c) चार
  7. c) एनोमी (विसंगति)
  8. c) मैक्स वेबर
  9. d) आर्थिक सत्ता
  10. b) ऐतिहासिक भौतिकवाद

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