Class 11 Sociology Notes Chapter 5 (भारतीय समाजशास्त्री) – Samaj ka Bodh Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम कक्षा 11 समाजशास्त्र की पुस्तक 'समाज का बोध' के अध्याय 5 'भारतीय समाजशास्त्री' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह आपको भारतीय समाज को समझने के लिए स्वदेशी दृष्टिकोण प्रदान करता है।
अध्याय 5: भारतीय समाजशास्त्री - विस्तृत नोट्स
परिचय:
भारतीय समाजशास्त्रियों ने पश्चिमी अवधारणाओं और सिद्धांतों को भारतीय संदर्भ में लागू करने के बजाय, भारतीय समाज की अनूठी विशेषताओं और परंपराओं को समझने पर जोर दिया। उन्होंने उपनिवेशवाद के प्रभाव, जाति व्यवस्था, ग्रामीण जीवन, राष्ट्रवाद और सामाजिक परिवर्तन जैसे मुद्दों पर गहन शोध किया। इस अध्याय में हम चार प्रमुख भारतीय समाजशास्त्रियों - जी.एस. घुर्ये, डी.पी. मुखर्जी, ए.आर. देसाई और एम.एन. श्रीनिवास - के योगदान पर ध्यान केंद्रित करेंगे।
1. गोविंद सदाशिव घुर्ये (G.S. Ghurye)
(जन्म: 1894, मृत्यु: 1983)
इन्हें अक्सर "भारतीय समाजशास्त्र का जनक" कहा जाता है। उन्होंने मुंबई विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग की स्थापना की और कई महत्वपूर्ण अध्ययनों का नेतृत्व किया।
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प्रमुख योगदान/अवधारणाएँ:
- जाति व्यवस्था: घुर्ये ने जाति को भारतीय समाज की एक मौलिक संस्था के रूप में देखा। उन्होंने इसकी उत्पत्ति, विशेषताओं (जैसे अंतर्विवाह, पदानुक्रम, शुद्धता-अशुद्धता, वंशानुगत व्यवसाय) और भारतीय समाज पर इसके प्रभाव का विस्तृत विश्लेषण किया। उनकी पुस्तक 'Caste and Race in India' इस विषय पर एक क्लासिक मानी जाती है।
- जनजाति (Tribes): उन्होंने जनजातियों को हिंदू समाज के "पिछड़े हिंदू" के रूप में देखा और उनके एकीकरण (assimilation) की वकालत की, जबकि कुछ अन्य विद्वान उनके अलगाव (isolation) का समर्थन करते थे।
- राष्ट्रवाद: घुर्ये ने भारतीय राष्ट्रवाद की प्रकृति और विकास पर भी लिखा।
- धर्म और समाज: उन्होंने भारतीय साधुओं और धार्मिक प्रथाओं का भी अध्ययन किया।
- शहर और सभ्यता: उन्होंने भारतीय शहरों के विकास और उनकी सामाजिक संरचना पर भी ध्यान दिया।
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कार्यप्रणाली (Methodology):
- इंडोलॉजिकल/पाठ्यपुस्तकीय दृष्टिकोण (Indological/Textual Approach): उन्होंने प्राचीन भारतीय ग्रंथों, शास्त्रों, वेदों और साहित्य का उपयोग भारतीय समाज को समझने के लिए किया। यह दृष्टिकोण भारतीय परंपराओं और ऐतिहासिक विकास पर केंद्रित था।
- ऐतिहासिक-तुलनात्मक पद्धति (Historical-Comparative Method): उन्होंने विभिन्न समाजों और ऐतिहासिक अवधियों की तुलना करके भारतीय सामाजिक संस्थाओं को समझने का प्रयास किया।
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प्रमुख कृतियाँ (Major Works):
- Caste and Race in India (1932)
- The Scheduled Tribes (1943)
- Indian Sadhus (1953)
- Cities and Civilization (1962)
- Social Tensions in India (1968)
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महत्व: घुर्ये ने भारतीय समाजशास्त्र को एक अकादमिक अनुशासन के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके कार्यों ने जाति, जनजाति और भारतीय समाज की अन्य प्रमुख संस्थाओं पर शोध के लिए आधार तैयार किया।
2. ध्रुव प्रसाद मुखर्जी (D.P. Mukerji)
(जन्म: 1894, मृत्यु: 1961)
डी.पी. मुखर्जी भारतीय समाजशास्त्र में एक अद्वितीय विचारक थे, जिन्होंने भारतीय परंपराओं के महत्व पर जोर दिया और पश्चिमी अवधारणाओं के अंधानुकरण की आलोचना की।
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प्रमुख योगदान/अवधारणाएँ:
- परंपरा (Tradition): मुखर्जी के लिए परंपरा एक स्थिर या मृत अवधारणा नहीं थी, बल्कि एक गतिशील, जीवित और द्वंद्वात्मक प्रक्रिया थी। उन्होंने तर्क दिया कि भारतीय समाजशास्त्रियों को भारतीय परंपराओं को समझना चाहिए और उन्हें आधुनिकता के साथ रचनात्मक रूप से जोड़ना चाहिए।
- आधुनिकता (Modernity): उन्होंने पश्चिमी आधुनिकता की आलोचना की और भारतीय संदर्भ में आधुनिकता के एक वैकल्पिक मार्ग की वकालत की, जो भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और परंपराओं के साथ सामंजस्य स्थापित करे।
- व्यक्ति और समाज: उन्होंने माना कि भारतीय व्यक्ति अपनी परंपराओं और सामूहिक पहचान से गहराई से जुड़ा हुआ है।
- द्वंद्वात्मक पद्धति (Dialectical Method): उन्होंने भारतीय परंपरा और आधुनिकता के बीच के संबंधों को समझने के लिए द्वंद्वात्मक पद्धति का उपयोग किया, जहाँ दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं और बदलते हैं।
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कार्यप्रणाली (Methodology):
- भारतीय संदर्भ पर जोर: उन्होंने जोर दिया कि भारतीय समाजशास्त्र को भारतीय सामाजिक वास्तविकता के लिए अद्वितीय होना चाहिए, न कि पश्चिमी सिद्धांतों की नकल।
- ऐतिहासिक और दार्शनिक दृष्टिकोण: उन्होंने इतिहास, दर्शनशास्त्र और साहित्य का उपयोग भारतीय समाज को समझने के लिए किया।
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प्रमुख कृतियाँ (Major Works):
- Basic Concepts in Sociology (1932)
- Modern Indian Culture (1942)
- Problems of Indian Youth (1946)
- Diversities (1958)
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महत्व: डी.पी. मुखर्जी ने भारतीय समाजशास्त्र को एक स्वदेशी पहचान दी। उन्होंने भारतीय समाजशास्त्रियों को अपनी जड़ों से जुड़ने और भारतीय परंपराओं के महत्व को समझने के लिए प्रेरित किया।
3. अक्षय रमनलाल देसाई (A.R. Desai)
(जन्म: 1915, मृत्यु: 1994)
ए.आर. देसाई एक प्रमुख मार्क्सवादी समाजशास्त्री थे, जिन्होंने भारतीय समाज का विश्लेषण वर्ग संघर्ष और ऐतिहासिक भौतिकवाद के दृष्टिकोण से किया।
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प्रमुख योगदान/अवधारणाएँ:
- भारतीय राष्ट्रवाद का मार्क्सवादी विश्लेषण: उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति 'Social Background of Indian Nationalism' में उन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद को विभिन्न चरणों में विकसित होते हुए दिखाया और तर्क दिया कि इसका आधार वर्ग हित थे। उन्होंने बताया कि कैसे उपनिवेशवाद ने भारतीय समाज में नए वर्गों को जन्म दिया और कैसे ये वर्ग राष्ट्रवादी आंदोलन में शामिल हुए।
- राज्य और समाज: देसाई ने भारतीय राज्य को एक पूंजीवादी राज्य के रूप में देखा जो पूंजीपति वर्ग के हितों की सेवा करता है। उन्होंने भारत में विकास के पूंजीवादी मॉडल की आलोचना की।
- ग्रामीण समाज और कृषि संघर्ष: उन्होंने भारत में ग्रामीण समाज, कृषि संबंधों और किसानों के आंदोलनों का गहन अध्ययन किया। उन्होंने ग्रामीण गरीबी और शोषण के पीछे के संरचनात्मक कारणों को उजागर किया।
- मानवाधिकार: देसाई मानवाधिकारों के प्रबल समर्थक थे और उन्होंने राज्य द्वारा मानवाधिकारों के उल्लंघन की आलोचना की।
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कार्यप्रणाली (Methodology):
- मार्क्सवादी ऐतिहासिक भौतिकवाद (Marxist Historical Materialism): उन्होंने कार्ल मार्क्स के सिद्धांतों का उपयोग भारतीय इतिहास और समाज को समझने के लिए किया, जिसमें आर्थिक आधार और वर्ग संघर्ष को केंद्रीय महत्व दिया गया।
- आंकड़ों और दस्तावेज़ों का विश्लेषण: उन्होंने अपने विश्लेषण के लिए ऐतिहासिक अभिलेखों, सरकारी रिपोर्टों और आर्थिक आंकड़ों का व्यापक उपयोग किया।
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प्रमुख कृतियाँ (Major Works):
- Social Background of Indian Nationalism (1948)
- Rural Sociology in India (1961)
- State and Society in India (1975)
- Peasant Struggles in India (1979)
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महत्व: देसाई ने भारतीय समाजशास्त्र में मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य को मजबूती से स्थापित किया। उनके कार्य ने भारतीय समाज में वर्ग, शक्ति और शोषण के संबंधों को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण ढाँचा प्रदान किया।
4. मैसूर नरसिम्हाचार श्रीनिवास (M.N. Srinivas)
(जन्म: 1916, मृत्यु: 1999)
एम.एन. श्रीनिवास भारतीय समाजशास्त्र में क्षेत्र-कार्य (fieldwork) पद्धति के अग्रणी थे। उन्होंने दक्षिण भारत के गांवों का गहन अध्ययन किया और कई महत्वपूर्ण अवधारणाएँ प्रस्तुत कीं।
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प्रमुख योगदान/अवधारणाएँ:
- संस्कृतीकरण (Sanskritization): यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें निचली जाति या जनजाति के सदस्य उच्च जाति (विशेषकर ब्राह्मण) के रीति-रिवाजों, अनुष्ठानों, जीवन शैली और मूल्यों का अनुकरण करके अपनी सामाजिक स्थिति को ऊपर उठाने का प्रयास करते हैं। श्रीनिवास ने इसे सामाजिक गतिशीलता की एक प्रक्रिया के रूप में देखा।
- पश्चिमीकरण (Westernization): यह भारतीय समाज में ब्रिटिश शासन के परिणामस्वरूप हुए परिवर्तनों को संदर्भित करता है, जिसमें पश्चिमी शिक्षा, संस्थाओं, प्रौद्योगिकी, जीवन शैली और मूल्यों को अपनाना शामिल है।
- प्रभु जाति (Dominant Caste): यह एक ऐसी जाति है जो किसी विशेष क्षेत्र में संख्यात्मक रूप से मजबूत होती है, आर्थिक और राजनीतिक शक्ति रखती है, और उच्च अनुष्ठानिक स्थिति (ritual status) रखती है। यह जाति स्थानीय सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन में महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है।
- धर्मनिरपेक्षीकरण (Secularization): यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें धर्म का प्रभाव सार्वजनिक और निजी जीवन से कम होता जाता है।
- ग्राम अध्ययन (Village Studies): श्रीनिवास ने रामपुर गाँव (मैसूर) का विस्तृत अध्ययन किया, जो भारतीय समाज को समझने के लिए क्षेत्र-कार्य आधारित शोध का एक उत्कृष्ट उदाहरण बन गया।
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कार्यप्रणाली (Methodology):
- क्षेत्र-कार्य (Fieldwork): श्रीनिवास ने सहभागी अवलोकन (participant observation) और गहन साक्षात्कार के माध्यम से सीधे लोगों के बीच रहकर डेटा एकत्र करने पर जोर दिया। उनकी पुस्तक 'The Remembered Village' उनके क्षेत्र-कार्य अनुभवों का विस्तृत विवरण देती है।
- अनुभवजन्य शोध (Empirical Research): उन्होंने सैद्धांतिक अनुमानों के बजाय वास्तविक सामाजिक जीवन के अवलोकन पर आधारित अनुभवजन्य शोध को प्राथमिकता दी।
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प्रमुख कृतियाँ (Major Works):
- Religion and Society Among the Coorgs of South India (1952)
- Caste in Modern India and Other Essays (1962)
- The Remembered Village (1976)
- India: Social Structure (1980)
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महत्व: एम.एन. श्रीनिवास ने भारतीय समाजशास्त्र में क्षेत्र-कार्य पद्धति को क्रांति ला दी। उनके अवधारणाओं ने भारतीय समाज में सामाजिक परिवर्तन और गतिशीलता को समझने के लिए महत्वपूर्ण उपकरण प्रदान किए और आज भी व्यापक रूप से उपयोग किए जाते हैं।
निष्कर्ष:
इन भारतीय समाजशास्त्रियों ने अपने विविध दृष्टिकोणों और कार्यप्रणालियों के माध्यम से भारतीय समाज की जटिलताओं को समझने में अमूल्य योगदान दिया। उनके कार्य आज भी भारतीय समाजशास्त्र के अध्ययन की आधारशिला बने हुए हैं और सरकारी परीक्षाओं के लिए भी अत्यंत प्रासंगिक हैं।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
निर्देश: सही विकल्प का चयन करें।
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"Caste and Race in India" नामक पुस्तक के लेखक कौन हैं?
a) एम.एन. श्रीनिवास
b) डी.पी. मुखर्जी
c) जी.एस. घुर्ये
d) ए.आर. देसाई -
'संस्कृतीकरण' की अवधारणा किसने प्रतिपादित की?
a) ए.आर. देसाई
b) एम.एन. श्रीनिवास
c) जी.एस. घुर्ये
d) डी.पी. मुखर्जी -
किस समाजशास्त्री ने भारतीय राष्ट्रवाद का मार्क्सवादी विश्लेषण प्रस्तुत किया?
a) जी.एस. घुर्ये
b) डी.पी. मुखर्जी
c) ए.आर. देसाई
d) एम.एन. श्रीनिवास -
किस समाजशास्त्री ने भारतीय परंपराओं को एक गतिशील और द्वंद्वात्मक प्रक्रिया के रूप में देखा?
a) एम.एन. श्रीनिवास
b) डी.पी. मुखर्जी
c) जी.एस. घुर्ये
d) ए.आर. देसाई -
"The Remembered Village" किस समाजशास्त्री का प्रसिद्ध क्षेत्र-कार्य आधारित अध्ययन है?
a) ए.आर. देसाई
b) जी.एस. घुर्ये
c) एम.एन. श्रीनिवास
d) डी.पी. मुखर्जी -
भारतीय समाजशास्त्र में 'इंडोलॉजिकल' या पाठ्यपुस्तकीय दृष्टिकोण के अग्रणी कौन थे?
a) एम.एन. श्रीनिवास
b) ए.आर. देसाई
c) जी.एस. घुर्ये
d) डी.पी. मुखर्जी -
"Social Background of Indian Nationalism" नामक पुस्तक किसने लिखी?
a) जी.एस. घुर्ये
b) डी.पी. मुखर्जी
c) ए.आर. देसाई
d) एम.एन. श्रीनिवास -
डी.पी. मुखर्जी ने भारतीय समाज को समझने के लिए किस पद्धति पर जोर दिया?
a) क्षेत्र-कार्य पद्धति
b) मार्क्सवादी ऐतिहासिक भौतिकवाद
c) द्वंद्वात्मक पद्धति
d) इंडोलॉजिकल पद्धति -
निम्नलिखित में से किसे "भारतीय समाजशास्त्र का जनक" माना जाता है?
a) एम.एन. श्रीनिवास
b) डी.पी. मुखर्जी
c) जी.एस. घुर्ये
d) ए.आर. देसाई -
'प्रभु जाति' (Dominant Caste) की अवधारणा किसने विकसित की?
a) ए.आर. देसाई
b) जी.एस. घुर्ये
c) एम.एन. श्रीनिवास
d) डी.पी. मुखर्जी
उत्तर कुंजी:
- c) जी.एस. घुर्ये
- b) एम.एन. श्रीनिवास
- c) ए.आर. देसाई
- b) डी.पी. मुखर्जी
- c) एम.एन. श्रीनिवास
- c) जी.एस. घुर्ये
- c) ए.आर. देसाई
- c) द्वंद्वात्मक पद्धति
- c) जी.एस. घुर्ये
- c) एम.एन. श्रीनिवास