Class 12 Accountancy Notes Chapter 2 (साझेदारी लेखांकन आधारभूत अवधारणाएँ) – Lekhashashtra Part-I Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम कक्षा 12 लेखाशास्त्र की पुस्तक 'लेखाशास्त्र पार्ट-I' के अध्याय 2 'साझेदारी लेखांकन आधारभूत अवधारणाएँ' का विस्तृत अध्ययन करेंगे, जो आपकी विभिन्न सरकारी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस अध्याय को ध्यानपूर्वक समझें ताकि आप इसके सैद्धांतिक और व्यावहारिक पहलुओं को आसानी से हल कर सकें।
अध्याय 2: साझेदारी लेखांकन - आधारभूत अवधारणाएँ
1. साझेदारी का अर्थ एवं परिभाषा
साझेदारी भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 की धारा 4 के अनुसार, "साझेदारी उन व्यक्तियों के बीच का संबंध है जिन्होंने ऐसे व्यवसाय के लाभों को बांटने के लिए सहमति दी है जिसे वे सब या उनमें से कोई एक सब की ओर से चलाता है।"
मुख्य विशेषताएँ:
- दो या अधिक व्यक्ति: साझेदारी के लिए न्यूनतम 2 और अधिकतम 50 व्यक्ति (कंपनी अधिनियम, 2013 के अनुसार) होने चाहिए।
- समझौता (Agreement): साझेदारों के बीच लिखित या मौखिक समझौता हो सकता है। लिखित समझौता 'साझेदारी संलेख' कहलाता है।
- व्यवसाय का अस्तित्व: व्यवसाय वैध होना चाहिए और लाभ कमाने के उद्देश्य से चलाया जाना चाहिए।
- लाभ का बँटवारा: साझेदारों के बीच लाभ-हानि का बँटवारा सहमत अनुपात में होता है।
- पारस्परिक एजेंसी (Mutual Agency): प्रत्येक साझेदार स्वामी भी होता है और एजेंट भी। वह अन्य साझेदारों के कार्यों के लिए उत्तरदायी होता है और अन्य साझेदार उसके कार्यों के लिए उत्तरदायी होते हैं।
- असीमित दायित्व: प्रत्येक साझेदार का दायित्व असीमित होता है।
2. साझेदारी संलेख (Partnership Deed)
यह एक लिखित समझौता है जो साझेदारों के अधिकारों, कर्तव्यों और दायित्वों को स्पष्ट करता है। यह साझेदारी के नियमों और शर्तों का एक विस्तृत दस्तावेज है।
साझेदारी संलेख की मुख्य बातें:
- फर्म का नाम और पता।
- साझेदारों के नाम और पते।
- व्यवसाय की प्रकृति और स्थान।
- साझेदारी कब शुरू हुई।
- प्रत्येक साझेदार द्वारा लगाई गई पूंजी की राशि।
- पूंजी पर ब्याज (यदि कोई हो)।
- आहरण (Drawings) और आहरण पर ब्याज (यदि कोई हो)।
- साझेदारों का वेतन/कमीशन (यदि कोई हो)।
- लाभ-हानि विभाजन अनुपात।
- साझेदारों द्वारा दिए गए ऋण पर ब्याज।
- ख्याति का मूल्यांकन।
- नए साझेदार के प्रवेश, पुराने साझेदार की सेवानिवृत्ति या मृत्यु से संबंधित नियम।
- फर्म के विघटन से संबंधित नियम।
- लेखांकन अवधि और खातों का अंकेक्षण।
साझेदारी संलेख की अनुपस्थिति में लागू होने वाले नियम (अत्यंत महत्वपूर्ण):
यदि साझेदारी संलेख नहीं है या उसमें किसी विशेष बिंदु का उल्लेख नहीं है, तो भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 के निम्नलिखित प्रावधान लागू होंगे:
- लाभ-हानि का बँटवारा: लाभ-हानि का बँटवारा बराबर अनुपात में होगा।
- पूंजी पर ब्याज: किसी भी साझेदार को पूंजी पर ब्याज नहीं दिया जाएगा।
- आहरण पर ब्याज: किसी भी साझेदार से आहरण पर ब्याज नहीं लिया जाएगा।
- साझेदार का वेतन/कमीशन: किसी भी साझेदार को वेतन, कमीशन या कोई अन्य पारिश्रमिक नहीं दिया जाएगा।
- साझेदार के ऋण पर ब्याज: यदि किसी साझेदार ने फर्म को ऋण दिया है, तो उसे उस पर 6% प्रति वर्ष की दर से ब्याज दिया जाएगा। यह लाभों पर प्रभार (Charge against profits) होता है।
- प्रत्येक साझेदार का व्यवसाय संचालन में भाग लेने का अधिकार।
- प्रत्येक साझेदार को फर्म की पुस्तकों का निरीक्षण करने और उनकी प्रतिलिपि लेने का अधिकार।
3. साझेदारों के पूंजी खाते
साझेदारों के पूंजी खाते रखने की दो मुख्य विधियाँ हैं:
अ) स्थिर पूंजी विधि (Fixed Capital Method):
इस विधि में साझेदारों की पूंजी आमतौर पर स्थिर रहती है। पूंजी से संबंधित सभी समायोजन (जैसे पूंजी पर ब्याज, आहरण पर ब्याज, वेतन, लाभ का हिस्सा) एक अलग खाते 'साझेदारों के चालू खाते' (Partners' Current Accounts) में दर्ज किए जाते हैं।
- पूंजी खाता (Capital Account): इसमें केवल अतिरिक्त पूंजी लगाने या पूंजी निकालने (स्थायी रूप से) के लेनदेन दर्ज होते हैं। इसका शेष हमेशा क्रेडिट होता है।
- चालू खाता (Current Account): इसमें पूंजी पर ब्याज, वेतन, कमीशन, लाभ का हिस्सा (क्रेडिट पक्ष) और आहरण, आहरण पर ब्याज, हानि का हिस्सा (डेबिट पक्ष) दर्ज होते हैं। इसका शेष डेबिट या क्रेडिट कुछ भी हो सकता है।
ब) परिवर्तनशील पूंजी विधि (Fluctuating Capital Method):
इस विधि में केवल एक खाता 'साझेदारों का पूंजी खाता' (Partners' Capital Account) रखा जाता है। पूंजी से संबंधित सभी समायोजन (पूंजी पर ब्याज, आहरण, आहरण पर ब्याज, वेतन, लाभ का हिस्सा आदि) इसी खाते में दर्ज किए जाते हैं।
- इस विधि में पूंजी खाते का शेष वर्ष-प्रति-वर्ष बदलता रहता है। इसका शेष आमतौर पर क्रेडिट होता है, लेकिन बड़े आहरण या हानि के कारण डेबिट भी हो सकता है।
4. लाभ-हानि विनियोग खाता (Profit and Loss Appropriation Account)
यह लाभ-हानि खाते का विस्तार है। इसका उद्देश्य साझेदारों के बीच शुद्ध लाभ के वितरण को दिखाना है। यह एक नाममात्र खाता (Nominal Account) है।
विनियोग खाते में मदें:
- डेबिट पक्ष:
- पूंजी पर ब्याज (Interest on Capital)
- साझेदारों का वेतन/कमीशन (Partners' Salary/Commission)
- संचय में हस्तांतरण (Transfer to Reserve)
- वितरित होने वाला लाभ (Share of Profit distributed to Partners)
- क्रेडिट पक्ष:
- लाभ-हानि खाते से शुद्ध लाभ (Net Profit from P&L Account)
- आहरण पर ब्याज (Interest on Drawings)
- यदि शुद्ध हानि है, तो वह डेबिट पक्ष में आती है।
महत्वपूर्ण अंतर:
- लाभों पर प्रभार (Charge against Profits): ये वे खर्चे हैं जो फर्म को लाभ हो या हानि, चुकाने ही पड़ते हैं। इन्हें लाभ-हानि खाते के डेबिट पक्ष में दिखाया जाता है। उदाहरण: साझेदार के ऋण पर ब्याज, किराया।
- लाभों का विनियोग (Appropriation of Profits): ये लाभ के वितरण से संबंधित मदें हैं और केवल तभी दी जाती हैं जब फर्म को पर्याप्त लाभ हो। इन्हें लाभ-हानि विनियोग खाते के डेबिट पक्ष में दिखाया जाता है। उदाहरण: पूंजी पर ब्याज, साझेदार का वेतन, संचय।
5. पूंजी पर ब्याज (Interest on Capital - IOC)
- यह केवल तभी दिया जाता है जब साझेदारी संलेख में इसका प्रावधान हो।
- यह लाभों का विनियोग है, लाभों पर प्रभार नहीं (जब तक कि संलेख में स्पष्ट रूप से 'प्रभार' न कहा गया हो)।
- इसकी गणना प्रारंभिक पूंजी (Opening Capital) पर की जाती है। यदि प्रारंभिक पूंजी नहीं दी गई है, तो इसे समायोजित करके ज्ञात किया जाता है:
- अंतिम पूंजी + आहरण - वर्ष के दौरान अतिरिक्त पूंजी - लाभ का हिस्सा = प्रारंभिक पूंजी
- यदि लाभ पूंजी पर ब्याज के लिए अपर्याप्त हैं, तो ब्याज केवल उपलब्ध लाभों की सीमा तक ही दिया जाता है, और साझेदारों की पूंजी के अनुपात में वितरित किया जाता है।
6. आहरण पर ब्याज (Interest on Drawings - IOD)
- यह केवल तभी लिया जाता है जब साझेदारी संलेख में इसका प्रावधान हो।
- यह फर्म के लिए आय है और लाभ-हानि विनियोग खाते के क्रेडिट पक्ष में दिखाया जाता है।
- गणना के तरीके:
- सामान्य विधि: यदि आहरण की तिथि नहीं दी गई है, तो आमतौर पर 6 महीने का ब्याज लिया जाता है।
- उत्पाद विधि (Product Method): जब आहरण अनियमित हों। प्रत्येक आहरण राशि को आहरण की तिथि से लेखांकन अवधि के अंत तक की अवधि से गुणा करके उत्पादों का योग निकाला जाता है, फिर कुल उत्पादों पर 1 महीने का ब्याज (दर/12) लगाया जाता है।
- औसत अवधि विधि (Average Period Method): जब आहरण नियमित अंतराल पर किए जाते हैं।
- प्रत्येक माह के प्रारंभ में: (कुल आहरण × दर/100 × 6.5/12)
- प्रत्येक माह के मध्य में: (कुल आहरण × दर/100 × 6/12)
- प्रत्येक माह के अंत में: (कुल आहरण × दर/100 × 5.5/12)
- प्रत्येक तिमाही के प्रारंभ में: (कुल आहरण × दर/100 × 7.5/12)
- प्रत्येक तिमाही के मध्य में: (कुल आहरण × दर/100 × 6/12)
- प्रत्येक तिमाही के अंत में: (कुल आहरण × दर/100 × 4.5/12)
7. साझेदारों का वेतन और कमीशन (Salary and Commission to Partners)
- यह केवल तभी दिया जाता है जब साझेदारी संलेख में इसका प्रावधान हो।
- यह लाभों का विनियोग है।
- कमीशन की गणना:
- लाभों पर ऐसे कमीशन से पूर्व: (शुद्ध लाभ × दर/100)
- लाभों पर ऐसे कमीशन के पश्चात्: (शुद्ध लाभ × दर / (100 + दर))
8. संचय में हस्तांतरण (Transfer to Reserve)
- फर्म अपने भविष्य के विस्तार या आकस्मिकताओं के लिए लाभ का एक हिस्सा संचय में हस्तांतरित कर सकती है।
- यह लाभ-हानि विनियोग खाते के डेबिट पक्ष में दिखाया जाता है।
9. लाभ की गारंटी (Guarantee of Profit to a Partner)
कभी-कभी, एक या अधिक साझेदार किसी अन्य साझेदार को न्यूनतम लाभ की गारंटी दे सकते हैं।
- यदि गारंटीशुदा साझेदार का वास्तविक लाभ हिस्सा गारंटी राशि से कम होता है, तो कमी को गारंटी देने वाले साझेदार (या साझेदारों) द्वारा उनके सहमत अनुपात में वहन किया जाता है।
- यह कमी लाभ-हानि विनियोग खाते में समायोजित की जाती है।
10. विगत समायोजन (Past Adjustments)
जब पिछले वर्षों में खातों को अंतिम रूप देने के बाद कुछ त्रुटियाँ या भूलें (जैसे पूंजी पर ब्याज, आहरण पर ब्याज, वेतन, लाभ-हानि अनुपात में त्रुटि) पाई जाती हैं, तो उन्हें वर्तमान वर्ष में एक समायोजन प्रविष्टि (Adjustment Entry) के माध्यम से सुधारा जाता है।
- इसके लिए एक 'समायोजन तालिका' (Adjustment Table) बनाई जाती है, जो यह दर्शाती है कि प्रत्येक साझेदार के खाते में क्या क्रेडिट या डेबिट होना चाहिए था और क्या वास्तव में किया गया।
- शुद्ध प्रभाव के आधार पर, एक साझेदार के चालू/पूंजी खाते को डेबिट किया जाता है और दूसरे के चालू/पूंजी खाते को क्रेडिट किया जाता है।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
-
भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 के अनुसार, साझेदारों के बीच लाभ-हानि का बँटवारा किस अनुपात में होता है यदि साझेदारी संलेख में कोई प्रावधान नहीं है?
अ) पूंजी अनुपात में
ब) बराबर अनुपात में
स) 2:1 के अनुपात में
द) साझेदारों की संख्या के आधार पर -
साझेदारों के चालू खाते किस विधि के अंतर्गत खोले जाते हैं?
अ) परिवर्तनशील पूंजी विधि
ब) स्थिर पूंजी विधि
स) दोनों विधियों में
द) इनमें से कोई नहीं -
यदि साझेदारी संलेख में पूंजी पर ब्याज के संबंध में कोई प्रावधान नहीं है, तो साझेदारों को पूंजी पर ब्याज:
अ) 6% प्रति वर्ष की दर से दिया जाएगा
ब) 12% प्रति वर्ष की दर से दिया जाएगा
स) नहीं दिया जाएगा
द) लाभ के अनुपात में दिया जाएगा -
साझेदार के ऋण पर ब्याज, यदि साझेदारी संलेख में कोई प्रावधान नहीं है, तो किस दर से दिया जाता है?
अ) 5% प्रति वर्ष
ब) 6% प्रति वर्ष
स) 10% प्रति वर्ष
द) कोई ब्याज नहीं -
लाभ-हानि विनियोग खाता एक _______ खाता है।
अ) वास्तविक
ब) व्यक्तिगत
स) नाममात्र
द) पूंजी -
यदि कोई साझेदार प्रत्येक माह के प्रारंभ में निश्चित राशि का आहरण करता है, तो आहरण पर ब्याज की गणना के लिए औसत अवधि क्या होगी?
अ) 5.5 महीने
ब) 6 महीने
स) 6.5 महीने
द) 7.5 महीने -
निम्न में से कौन-सी मद लाभों पर प्रभार है?
अ) पूंजी पर ब्याज
ब) साझेदार का वेतन
स) साझेदार के ऋण पर ब्याज
द) संचय में हस्तांतरण -
स्थिर पूंजी विधि में, साझेदारों के पूंजी खाते का शेष सामान्यतः कैसा होता है?
अ) डेबिट
ब) क्रेडिट
स) शून्य
द) डेबिट या क्रेडिट कुछ भी हो सकता है -
यदि किसी साझेदार को कमीशन 'शुद्ध लाभ पर ऐसे कमीशन के पश्चात्' दिया जाना है, तो कमीशन की गणना का सूत्र क्या होगा?
अ) शुद्ध लाभ × दर / 100
ब) शुद्ध लाभ × दर / (100 - दर)
स) शुद्ध लाभ × दर / (100 + दर)
द) शुद्ध लाभ × 100 / दर -
साझेदारी फर्म में अधिकतम साझेदारों की संख्या कितनी हो सकती है?
अ) 20
ब) 10
स) 50
द) कोई सीमा नहीं
उत्तरमाला:
- ब)
- ब)
- स)
- ब)
- स)
- स)
- स)
- ब)
- स)
- स)
यह नोट्स आपको इस अध्याय की गहरी समझ प्रदान करेंगे और सरकारी परीक्षाओं में पूछे जाने वाले प्रश्नों को हल करने में सहायक होंगे। शुभकामनाएँ!