Class 12 Accountancy Notes Chapter 3 (साझेदारी फर्म का पुनर्गठन साझेदार का प्रवेश) – Lekhashashtra Part-I Book

Lekhashashtra Part-I
प्रिय विद्यार्थियों,

आज हम आपके लेखाशास्त्र विषय की पुस्तक 'लेखाशास्त्र - भाग I' के अध्याय 3, 'साझेदारी फर्म का पुनर्गठन - साझेदार का प्रवेश' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय सरकारी परीक्षाओं के साथ-साथ आपके बोर्ड परीक्षाओं के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। हम इसमें निहित प्रत्येक अवधारणा और उसके लेखांकन उपचार को गहराई से समझेंगे।


अध्याय 3: साझेदारी फर्म का पुनर्गठन - साझेदार का प्रवेश

I. परिचय (Introduction)

1. साझेदारी का पुनर्गठन (Reconstitution of Partnership):
साझेदारी फर्म के साझेदारों के मध्य विद्यमान समझौते में किसी भी प्रकार के परिवर्तन को साझेदारी का पुनर्गठन कहते हैं। इस परिवर्तन के परिणामस्वरूप फर्म का मौजूदा समझौता समाप्त हो जाता है और एक नया समझौता अस्तित्व में आता है। फर्म का व्यवसाय जारी रहता है, केवल उसके आंतरिक संबंधों में बदलाव आता है।

2. पुनर्गठन के कारण (Reasons for Reconstitution):
साझेदारी का पुनर्गठन निम्नलिखित परिस्थितियों में हो सकता है:

  • लाभ-विभाजन अनुपात में परिवर्तन: जब मौजूदा साझेदार अपने लाभ-विभाजन अनुपात को बदलने का निर्णय लेते हैं।
  • नए साझेदार का प्रवेश: जब फर्म में किसी नए व्यक्ति को साझेदार के रूप में प्रवेश दिया जाता है।
  • साझेदार की सेवानिवृत्ति (अवकाश ग्रहण): जब कोई मौजूदा साझेदार फर्म छोड़ देता है।
  • साझेदार की मृत्यु: जब किसी साझेदार का निधन हो जाता है।
  • दो या दो से अधिक फर्मों का एकीकरण: जब दो या दो से अधिक साझेदारी फर्म मिलकर एक नई फर्म बनाती हैं।

इस अध्याय में हम मुख्य रूप से 'नए साझेदार के प्रवेश' पर ध्यान केंद्रित करेंगे।

II. साझेदार का प्रवेश (Admission of a Partner)

1. अर्थ और आवश्यकता (Meaning and Need):
जब कोई नया व्यक्ति साझेदारी फर्म में साझेदार के रूप में शामिल होता है, तो इसे साझेदार का प्रवेश कहते हैं। इसकी आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से हो सकती है:

  • पूंजी की आवश्यकता: व्यवसाय के विस्तार या अतिरिक्त कार्यशील पूंजी के लिए।
  • प्रबंधकीय सहायता: किसी अनुभवी व्यक्ति की सेवाओं का लाभ उठाने के लिए।
  • ख्याति का लाभ: किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति की ख्याति का लाभ उठाने के लिए।
  • प्रतिस्पर्धा से निपटने के लिए: किसी प्रतिद्वंद्वी को साझेदार बनाकर प्रतिस्पर्धा कम करने के लिए।

2. प्रवेश के प्रावधान (Provisions for Admission):
भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 की धारा 31(1) के अनुसार:

  • किसी भी व्यक्ति को फर्म में साझेदार के रूप में तब तक प्रवेश नहीं दिया जा सकता, जब तक कि सभी मौजूदा साझेदार इसके लिए सहमत न हों, या
  • साझेदारी समझौते में इसके संबंध में कोई विशेष प्रावधान न हो।

नया साझेदार फर्म में प्रवेश करते समय सामान्यतः दो मुख्य राशियाँ लाता है:

  • पूंजी का हिस्सा: फर्म की संपत्तियों में अपना हिस्सा प्राप्त करने के लिए।
  • ख्याति का प्रीमियम: फर्म के भविष्य के लाभों में हिस्सा प्राप्त करने के लिए, जिसके लिए पुराने साझेदारों ने अतीत में मेहनत की है।

III. साझेदार के प्रवेश पर आवश्यक समायोजन (Adjustments Required on Admission of a Partner)

नए साझेदार के प्रवेश पर निम्नलिखित लेखांकन समायोजन आवश्यक होते हैं:

1. नया लाभ-विभाजन अनुपात और त्याग अनुपात की गणना (Calculation of New Profit Sharing Ratio and Sacrificing Ratio):

  • नया लाभ-विभाजन अनुपात (New Profit Sharing Ratio): यह वह अनुपात है जिसमें सभी साझेदार (पुराने और नया) भविष्य के लाभों को साझा करेंगे। इसकी गणना विभिन्न परिस्थितियों में अलग-अलग तरीके से की जाती है।

    • स्थिति 1: जब नया साझेदार अपना हिस्सा पुराने साझेदारों से उनके पुराने अनुपात में प्राप्त करता है (या जब कोई विशेष जानकारी नहीं दी गई हो):
      • फर्म के कुल लाभ को 1 मानकर, नए साझेदार का हिस्सा घटाया जाता है। शेष लाभ को पुराने साझेदार अपने पुराने अनुपात में बांटते हैं।
    • स्थिति 2: जब नया साझेदार अपना हिस्सा पुराने साझेदारों से एक विशिष्ट अनुपात में प्राप्त करता है:
      • पुराने साझेदारों के पुराने हिस्से में से त्याग किए गए हिस्से को घटाकर उनका नया हिस्सा निकाला जाता है।
    • स्थिति 3: जब पुराने साझेदार अपने हिस्से का कुछ भाग नए साझेदार के लिए त्याग करते हैं (उदाहरण: 'अपने हिस्से का' 1/5 या 'अपने हिस्से में से' 1/5):
      • 'अपने हिस्से का' का अर्थ है पुराने हिस्से का एक निश्चित भिन्न भाग।
      • 'अपने हिस्से में से' का अर्थ है पुराने हिस्से से एक निश्चित भिन्न भाग सीधे घटाना।
  • त्याग अनुपात (Sacrificing Ratio): यह वह अनुपात है जिसमें पुराने साझेदार नए साझेदार के पक्ष में अपने लाभ के हिस्से का त्याग करते हैं।

    • सूत्र: त्याग अनुपात = पुराना अनुपात - नया अनुपात
    • महत्व: यह अनुपात ख्याति के प्रीमियम को पुराने साझेदारों के बीच वितरित करने के लिए उपयोग किया जाता है।

2. ख्याति का लेखांकन उपचार (Accounting Treatment of Goodwill):

ख्याति एक अमूर्त संपत्ति है जो फर्म को उसकी प्रतिष्ठा, स्थान, ग्राहक संबंध आदि के कारण अतिरिक्त लाभ अर्जित करने में मदद करती है। नए साझेदार को प्रवेश के समय ख्याति के लिए प्रीमियम लाना होता है, क्योंकि वह भविष्य के लाभों में हिस्सा प्राप्त करेगा, जिसके लिए पुराने साझेदारों ने अतीत में प्रयास किए हैं।

  • ख्याति के मूल्यांकन की विधियाँ (संक्षिप्त संदर्भ): औसत लाभ विधि, अधिलाभ विधि, पूंजीकरण विधि। (इनका विस्तृत अध्ययन अगले अध्याय में है)

  • ख्याति के लेखांकन व्यवहार की विधियाँ:

    • A. प्रीमियम विधि (Premium Method): जब नया साझेदार ख्याति की राशि नकद लाता है।

      • स्थिति 1: जब नया साझेदार ख्याति की राशि नकद लाता है और ख्याति की राशि को व्यवसाय में रखा जाता है:
        • जर्नल प्रविष्टि:
          • बैंक/नकद खाता Dr. (पूंजी + ख्याति प्रीमियम)
            साझेदारों के पूंजी खाते Cr. (नए साझेदार की पूंजी)
            ख्याति प्रीमियम खाता Cr. (ख्याति की राशि)
          • ख्याति प्रीमियम खाता Dr.
            पुराने साझेदारों के पूंजी/चालू खाते Cr. (त्याग अनुपात में)
      • स्थिति 2: जब नया साझेदार ख्याति की राशि नकद लाता है और पुराने साझेदार ख्याति की राशि निकाल लेते हैं:
        • जर्नल प्रविष्टि:
          • उपरोक्त स्थिति 1 की दोनों प्रविष्टियाँ।
          • पुराने साझेदारों के पूंजी/चालू खाते Dr.
            बैंक/नकद खाता Cr. (निकाली गई राशि)
      • स्थिति 3: जब नया साझेदार ख्याति की राशि नकद नहीं लाता है या आंशिक रूप से लाता है:
        • जर्नल प्रविष्टि (जब नकद नहीं लाता):
          • नए साझेदार का चालू खाता Dr. (या पूंजी खाता यदि पूंजी स्थिर नहीं है)
            पुराने साझेदारों के पूंजी/चालू खाते Cr. (त्याग अनुपात में)
        • जर्नल प्रविष्टि (जब आंशिक रूप से नकद लाता है):
          • बैंक/नकद खाता Dr. (जितनी राशि नकद लाया)
          • नए साझेदार का चालू खाता Dr. (शेष राशि के लिए)
            पुराने साझेदारों के पूंजी/चालू खाते Cr. (त्याग अनुपात में कुल ख्याति)
    • B. गुप्त ख्याति (Hidden Goodwill):

      • जब नए साझेदार द्वारा लाई गई पूंजी और उसके लाभ के हिस्से के आधार पर फर्म की कुल पूंजी की गणना की जाती है, और यह गणना की गई पूंजी पुराने साझेदारों की समायोजित पूंजी और नए साझेदार की पूंजी के योग से अधिक होती है, तो यह अंतर गुप्त ख्याति कहलाता है।
      • गणना:
        • फर्म की कुल पूंजी = नए साझेदार की पूंजी × उसके हिस्से का व्युत्क्रम (जैसे 1/4 हिस्से के लिए पूंजी लाता है तो कुल पूंजी = पूंजी × 4/1)
        • वास्तविक समायोजित पूंजी = पुराने साझेदारों की समायोजित पूंजी + नए साझेदार की पूंजी
        • गुप्त ख्याति = फर्म की कुल पूंजी - वास्तविक समायोजित पूंजी
      • लेखांकन: गुप्त ख्याति की राशि को नए साझेदार के चालू खाते से डेबिट किया जाता है और पुराने साझेदारों के पूंजी/चालू खातों में त्याग अनुपात में क्रेडिट किया जाता है।
    • C. पुरानी पुस्तकों में विद्यमान ख्याति (Existing Goodwill in old books):

      • यदि नए साझेदार के प्रवेश से पहले ही फर्म की पुस्तकों में ख्याति खाता विद्यमान है, तो उसे नए साझेदार के प्रवेश से पहले पुराने साझेदारों के पुराने लाभ-विभाजन अनुपात में अपलेखित (राइट ऑफ) किया जाता है।
      • जर्नल प्रविष्टि:
        • पुराने साझेदारों के पूंजी/चालू खाते Dr. (पुराने अनुपात में)
          ख्याति खाता Cr.

3. संपत्तियों और दायित्वों का पुनर्मूल्यांकन (Revaluation of Assets and Liabilities):

नए साझेदार के प्रवेश पर संपत्तियों और दायित्वों का पुनर्मूल्यांकन करना आवश्यक है ताकि नए साझेदार को भविष्य में किसी भी लाभ या हानि का बोझ न उठाना पड़े जो उसके प्रवेश से पहले उत्पन्न हुई थी। पुनर्मूल्यांकन से होने वाले लाभ या हानि को पुराने साझेदारों के पुराने लाभ-विभाजन अनुपात में वितरित किया जाता है।

  • पुनर्मूल्यांकन खाता (Revaluation Account) / लाभ-हानि समायोजन खाता (Profit and Loss Adjustment Account):
    • यह एक नाममात्र खाता है।
    • जर्नल प्रविष्टियाँ:
      • संपत्तियों के मूल्य में वृद्धि:
        • संबंधित संपत्ति खाता Dr.
          पुनर्मूल्यांकन खाता Cr.
      • संपत्तियों के मूल्य में कमी:
        • पुनर्मूल्यांकन खाता Dr.
          संबंधित संपत्ति खाता Cr.
      • दायित्वों के मूल्य में वृद्धि:
        • पुनर्मूल्यांकन खाता Dr.
          संबंधित दायित्व खाता Cr.
      • दायित्वों के मूल्य में कमी:
        • संबंधित दायित्व खाता Dr.
          पुनर्मूल्यांकन खाता Cr.
      • अलिखित संपत्ति (Unrecorded Asset):
        • अलिखित संपत्ति खाता Dr.
          पुनर्मूल्यांकन खाता Cr.
      • अलिखित दायित्व (Unrecorded Liability):
        • पुनर्मूल्यांकन खाता Dr.
          अलिखित दायित्व खाता Cr.
    • पुनर्मूल्यांकन पर लाभ/हानि का वितरण:
      • लाभ होने पर:
        • पुनर्मूल्यांकन खाता Dr.
          पुराने साझेदारों के पूंजी/चालू खाते Cr. (पुराने अनुपात में)
      • हानि होने पर:
        • पुराने साझेदारों के पूंजी/चालू खाते Dr.
          पुनर्मूल्यांकन खाता Cr. (पुराने अनुपात में)

4. संचित लाभों, आरक्षित निधियों और हानियों का वितरण (Distribution of Accumulated Profits, Reserves, and Losses):

नए साझेदार के प्रवेश से पहले, फर्म की पुस्तकों में संचित लाभ (जैसे सामान्य संचय, लाभ-हानि खाते का क्रेडिट शेष), आरक्षित निधियाँ (जैसे कर्मचारी क्षतिपूर्ति संचय, निवेश उच्चावचन संचय) और संचित हानियाँ (जैसे लाभ-हानि खाते का डेबिट शेष, विज्ञापन उचंत खाता) हो सकती हैं। ये सभी पुराने साझेदारों के प्रयासों का परिणाम हैं, इसलिए इन्हें नए साझेदार के प्रवेश से पहले पुराने साझेदारों के पुराने लाभ-विभाजन अनुपात में वितरित किया जाता है।

  • जर्नल प्रविष्टियाँ:

    • संचित लाभों/आरक्षित निधियों के लिए:
      • सामान्य संचय खाता Dr.
      • लाभ-हानि खाता (क्रेडिट शेष) Dr.
      • कर्मचारी क्षतिपूर्ति संचय खाता Dr. (अधिशेष)
      • निवेश उच्चावचन संचय खाता Dr. (अधिशेष)
        पुराने साझेदारों के पूंजी/चालू खाते Cr. (पुराने अनुपात में)
    • संचित हानियों के लिए:
      • पुराने साझेदारों के पूंजी/चालू खाते Dr.
        लाभ-हानि खाता (डेबिट शेष) Cr.
        विज्ञापन उचंत खाता Cr. (पुराने अनुपात में)
  • कर्मचारी क्षतिपूर्ति संचय (Workmen's Compensation Reserve - WCR) का विशेष उपचार:

    • स्थिति 1: जब कोई दावा न हो: पूरा संचय पुराने साझेदारों के पूंजी/चालू खातों में पुराने अनुपात में क्रेडिट किया जाता है।
    • स्थिति 2: जब दावे की राशि संचय से कम हो: दावे की राशि को प्रावधान के रूप में रखा जाता है और शेष राशि पुराने साझेदारों के पूंजी/चालू खातों में पुराने अनुपात में क्रेडिट की जाती है।
    • स्थिति 3: जब दावे की राशि संचय के बराबर हो: पूरा संचय दावे के लिए प्रावधान के रूप में रखा जाता है। कोई राशि वितरित नहीं की जाती।
    • स्थिति 4: जब दावे की राशि संचय से अधिक हो: पूरा संचय दावे के लिए प्रावधान के रूप में रखा जाता है, और अतिरिक्त दावे की राशि पुनर्मूल्यांकन खाते के डेबिट पक्ष में दिखाई जाती है (जो पुनर्मूल्यांकन हानि मानी जाएगी)।
  • निवेश उच्चावचन संचय (Investment Fluctuation Reserve - IFR) का विशेष उपचार:

    • स्थिति 1: जब पुस्तक मूल्य और बाजार मूल्य बराबर हों या बाजार मूल्य अधिक हो: पूरा संचय पुराने साझेदारों के पूंजी/चालू खातों में पुराने अनुपात में क्रेडिट किया जाता है।
    • स्थिति 2: जब बाजार मूल्य पुस्तक मूल्य से कम हो:
      • यदि कमी की राशि संचय से कम है: कमी की राशि को निवेश खाते में समायोजित किया जाता है, और शेष संचय पुराने साझेदारों के पूंजी/चालू खातों में पुराने अनुपात में क्रेडिट किया जाता है।
      • यदि कमी की राशि संचय के बराबर है: पूरा संचय निवेश खाते में समायोजित किया जाता है। कोई राशि वितरित नहीं की जाती।
      • यदि कमी की राशि संचय से अधिक है: पूरा संचय निवेश खाते में समायोजित किया जाता है, और अतिरिक्त कमी की राशि पुनर्मूल्यांकन खाते के डेबिट पक्ष में दिखाई जाती है (जो पुनर्मूल्यांकन हानि मानी जाएगी)।

5. पूंजी का समायोजन (Adjustment of Capital):

कभी-कभी साझेदार यह तय करते हैं कि नए साझेदार के प्रवेश के बाद उनकी पूंजी उनके नए लाभ-विभाजन अनुपात में होनी चाहिए। इसके लिए पूंजी का समायोजन किया जाता है।

  • स्थिति 1: नए साझेदार की पूंजी के आधार पर पुराने साझेदारों की पूंजी का समायोजन:

    • नए साझेदार की पूंजी और उसके हिस्से के आधार पर फर्म की कुल पूंजी की गणना करें।
    • इस कुल पूंजी को नए लाभ-विभाजन अनुपात में सभी साझेदारों (पुराने और नए) के बीच विभाजित करें। यह उनकी नई समायोजित पूंजी होगी।
    • प्रत्येक पुराने साझेदार की मौजूदा समायोजित पूंजी (सभी समायोजन के बाद) की तुलना उसकी नई समायोजित पूंजी से करें।
    • यदि मौजूदा पूंजी नई पूंजी से अधिक है, तो साझेदार अतिरिक्त राशि निकाल लेगा (बैंक/नकद Cr.)।
    • यदि मौजूदा पूंजी नई पूंजी से कम है, तो साझेदार अतिरिक्त राशि लाएगा (बैंक/नकद Dr.)।
    • वैकल्पिक रूप से, इन अंतरों को साझेदारों के चालू खातों में स्थानांतरित किया जा सकता है।
  • स्थिति 2: पुराने साझेदारों की पूंजी के आधार पर नए साझेदार की पूंजी का निर्धारण:

    • सभी समायोजन के बाद पुराने साझेदारों की कुल समायोजित पूंजी ज्ञात करें।
    • पुराने साझेदारों के नए लाभ-विभाजन अनुपात के आधार पर उनके संयुक्त हिस्से की गणना करें।
    • कुल फर्म की पूंजी = पुराने साझेदारों की कुल समायोजित पूंजी × (1 / पुराने साझेदारों का संयुक्त हिस्सा)
    • नए साझेदार की पूंजी = कुल फर्म की पूंजी × नए साझेदार का लाभ-विभाजन हिस्सा।

IV. पूंजी खाते और तुलन पत्र तैयार करना (Preparation of Capital Accounts and Balance Sheet)

उपरोक्त सभी समायोजन करने के बाद, साझेदारों के पूंजी खाते और नई फर्म का तुलन पत्र तैयार किया जाता है।

  • साझेदारों के पूंजी खाते (Partners' Capital Accounts):

    • प्रारंभिक शेष (क्रेडिट)।
    • पुनर्मूल्यांकन पर लाभ (क्रेडिट) या हानि (डेबिट)।
    • संचित लाभ/आरक्षित निधियाँ (क्रेडिट) या संचित हानियाँ (डेबिट)।
    • ख्याति प्रीमियम (क्रेडिट)।
    • पुरानी ख्याति का अपलेखन (डेबिट)।
    • पूंजी समायोजन (नकद लाना/निकालना या चालू खाते में स्थानांतरण)।
    • नए साझेदार द्वारा लाई गई पूंजी (क्रेडिट)।
    • अंतिम शेष (क्रेडिट)।
  • नई फर्म का तुलन पत्र (New Firm's Balance Sheet):

    • सभी संपत्तियों और दायित्वों को उनके पुनर्मूल्यांकित मूल्यों पर दिखाया जाता है।
    • कोई भी पुरानी ख्याति, संचित लाभ, आरक्षित निधियाँ या संचित हानियाँ नहीं दिखाई जाती हैं क्योंकि उन्हें पहले ही वितरित/अपलेखित कर दिया गया है।
    • बैंक/नकद शेष को सभी नकद लेनदेन (पूंजी लाना, ख्याति लाना, पूंजी निकालना आदि) के बाद अद्यतन किया जाता है।
    • साझेदारों की पूंजी को उनके अंतिम समायोजित शेष पर दिखाया जाता है।

महत्वपूर्ण बिंदु (Important Points)

  • नए साझेदार का प्रवेश फर्म के पुनर्गठन का एक तरीका है।
  • भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 की धारा 31(1) के तहत सभी साझेदारों की सहमति आवश्यक है।
  • त्याग अनुपात का उपयोग ख्याति के प्रीमियम को वितरित करने के लिए किया जाता है।
  • पुनर्मूल्यांकन खाता केवल पुराने साझेदारों से संबंधित होता है।
  • संचित लाभ/हानियाँ भी केवल पुराने साझेदारों से संबंधित होती हैं।
  • ख्याति का लेखांकन मानक (AS 26) के अनुसार, आंतरिक रूप से उत्पन्न ख्याति को पुस्तकों में दर्ज नहीं किया जाता है। केवल खरीदी गई ख्याति को ही दर्ज किया जाता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

यहाँ इस अध्याय पर आधारित 10 बहुविकल्पीय प्रश्न दिए गए हैं:

1. साझेदारी फर्म का पुनर्गठन किस स्थिति में होता है?
a) लाभ-विभाजन अनुपात में परिवर्तन
b) नए साझेदार का प्रवेश
c) साझेदार की सेवानिवृत्ति या मृत्यु
d) उपरोक्त सभी

2. भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 की किस धारा के अनुसार, किसी नए साझेदार को फर्म में प्रवेश दिया जा सकता है?
a) धारा 30
b) धारा 31(1)
c) धारा 32
d) धारा 33

3. त्याग अनुपात की गणना का सूत्र क्या है?
a) नया अनुपात - पुराना अनुपात
b) पुराना अनुपात - नया अनुपात
c) कुल लाभ - नए साझेदार का हिस्सा
d) पूंजी अनुपात

4. ख्याति के प्रीमियम को पुराने साझेदारों के बीच किस अनुपात में वितरित किया जाता है?
a) पुराना लाभ-विभाजन अनुपात
b) नया लाभ-विभाजन अनुपात
c) त्याग अनुपात
d) पूंजी अनुपात

**5. यदि नया साझेदार ख्याति की राशि नकद नहीं लाता है, तो उसे डेबिट किया जाता है: **
a) पुनर्मूल्यांकन खाता
b) नए साझेदार का पूंजी खाता या चालू खाता
c) लाभ-हानि समायोजन खाता
d) पुराने साझेदारों का पूंजी खाता

6. संपत्तियों और दायित्वों के पुनर्मूल्यांकन से होने वाले लाभ या हानि को किस खाते में स्थानांतरित किया जाता है?
a) लाभ-हानि खाता
b) नए साझेदार का पूंजी खाता
c) पुनर्मूल्यांकन खाता
d) ख्याति खाता

7. पुनर्मूल्यांकन पर लाभ को पुराने साझेदारों के बीच किस अनुपात में वितरित किया जाता है?
a) नया लाभ-विभाजन अनुपात
b) त्याग अनुपात
c) पुराना लाभ-विभाजन अनुपात
d) पूंजी अनुपात

8. नए साझेदार के प्रवेश पर, फर्म की पुस्तकों में विद्यमान सामान्य संचय को क्या किया जाता है?
a) नए साझेदार के पूंजी खाते में क्रेडिट किया जाता है।
b) पुराने साझेदारों के पूंजी खाते में उनके पुराने अनुपात में क्रेडिट किया जाता है।
c) नई फर्म के तुलन पत्र में दिखाया जाता है।
d) पुनर्मूल्यांकन खाते में स्थानांतरित किया जाता है।

9. यदि कर्मचारी क्षतिपूर्ति संचय ₹50,000 है और दावे की राशि ₹60,000 है, तो ₹10,000 की अतिरिक्त राशि को कहाँ दिखाया जाएगा?
a) पुराने साझेदारों के पूंजी खाते में डेबिट किया जाएगा।
b) पुनर्मूल्यांकन खाते में डेबिट किया जाएगा।
c) नए साझेदार के पूंजी खाते में डेबिट किया जाएगा।
d) लाभ-हानि खाते में क्रेडिट किया जाएगा।

10. गुप्त ख्याति की गणना के लिए, फर्म की कुल पूंजी की तुलना किससे की जाती है?
a) केवल पुराने साझेदारों की समायोजित पूंजी से।
b) केवल नए साझेदार की पूंजी से।
c) पुराने साझेदारों की समायोजित पूंजी और नए साझेदार की पूंजी के योग से।
d) फर्म की कुल संपत्ति से।


उत्तर कुंजी:

  1. d)
  2. b)
  3. b)
  4. c)
  5. b)
  6. c)
  7. c)
  8. b)
  9. b)
  10. c)

मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपको इस अध्याय को समझने और सरकारी परीक्षाओं की तैयारी करने में सहायक होंगे। किसी भी संदेह या प्रश्न के लिए, बेझिझक पूछें।

शुभकामनाएँ!

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