Class 12 Biology Notes Chapter 16 (पर्यावरण के मुद्दे) – Jeev Vigyan Book

Jeev Vigyan
प्रिय विद्यार्थियों,

आज हम जीव विज्ञान के एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय 'पर्यावरण के मुद्दे' पर विस्तार से चर्चा करेंगे। यह अध्याय न केवल आपकी बोर्ड परीक्षाओं के लिए, बल्कि विभिन्न सरकारी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि पर्यावरण संबंधी जागरूकता और ज्ञान आज के समय की एक बड़ी आवश्यकता है। इस अध्याय में हम उन पर्यावरणीय समस्याओं का अध्ययन करेंगे जिनका सामना मानव जाति कर रही है और उनके संभावित समाधानों पर भी प्रकाश डालेंगे।

आइए, इस अध्याय के महत्वपूर्ण बिंदुओं को विस्तृत रूप से समझते हैं:


अध्याय 16: पर्यावरण के मुद्दे (Environmental Issues)

पर्यावरण के मुद्दे वे समस्याएँ हैं जो मानव गतिविधियों के कारण हमारे प्राकृतिक पर्यावरण को प्रभावित करती हैं। ये समस्याएँ वैश्विक स्तर पर चिंता का विषय हैं और इनके समाधान के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है।

1. वायु प्रदूषण और उसका नियंत्रण (Air Pollution and its Control)

वायु प्रदूषण हवा में अवांछित ठोस या गैसीय कणों की उपस्थिति है जो मनुष्यों, जानवरों और पौधों के लिए हानिकारक होती है।

  • वायु प्रदूषक (Air Pollutants):

    • कणिकीय पदार्थ (Particulate Matter): धूल, धुआँ, कोहरा, स्प्रे। इनका आकार 2.5 माइक्रोमीटर से कम (PM2.5) होने पर ये फेफड़ों में गहराई तक पहुँचकर गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न करते हैं।
    • गैसीय प्रदूषक (Gaseous Pollutants): सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂), नाइट्रोजन के ऑक्साइड (NOₓ), कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), हाइड्रोजन सल्फाइड (H₂S), हाइड्रोकार्बन।
  • प्रदूषण के स्रोत:

    • थर्मल पावर प्लांट (तापीय विद्युत संयंत्र)
    • औद्योगिक चिमनियां
    • वाहन (ऑटोमोबाइल)
    • जंगल की आग, ज्वालामुखी विस्फोट (प्राकृतिक स्रोत)
  • प्रभाव:

    • मनुष्यों पर: श्वसन संबंधी रोग (अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, एम्फिसीमा), आँखों में जलन, सिरदर्द, हृदय रोग, कैंसर।
    • पौधों पर: वृद्धि में कमी, समय से पहले पत्तियां झड़ना, क्लोरोफिल का नष्ट होना।
    • जलवायु पर: अम्ल वर्षा, ग्रीनहाउस प्रभाव।
  • वायु प्रदूषण नियंत्रण के उपाय:

    • इलेक्ट्रोस्टैटिक अवक्षेपित्र (Electrostatic Precipitator - ESP): यह थर्मल पावर प्लांट और उद्योगों से निकलने वाले गैसीय अपशिष्ट में से 99% तक कणिकीय पदार्थों को हटा देता है। यह विद्युत क्षेत्र का उपयोग करके आवेशित कणों को एकत्रित करता है।
    • स्क्रबर (Scrubber): यह गैसीय प्रदूषकों जैसे सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) को हटाने में प्रभावी है। इसमें प्रदूषित हवा को पानी या चूने के स्प्रे से गुजारा जाता है।
    • उत्प्रेरक परिवर्तक (Catalytic Converter): ये वाहनों में लगाए जाते हैं। इनमें प्लैटिनम, पैलेडियम और रोडियम जैसी महंगी धातुएँ उत्प्रेरक के रूप में होती हैं। ये हानिकारक गैसों को कम हानिकारक गैसों में परिवर्तित करते हैं:
      • कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) को कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) में।
      • नाइट्रोजन के ऑक्साइड (NOₓ) को नाइट्रोजन गैस (N₂) में।
      • अजले हाइड्रोकार्बन को कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) और जल (H₂O) में।
      • महत्वपूर्ण: उत्प्रेरक परिवर्तक वाले वाहनों में सीसारहित (unleaded) पेट्रोल का उपयोग करना चाहिए, क्योंकि सीसा उत्प्रेरक को निष्क्रिय कर देता है।
    • ईंधन की गुणवत्ता में सुधार: कम सल्फर वाले ईंधन का उपयोग।
    • दिल्ली का केस स्टडी: दिल्ली में वायु प्रदूषण की गंभीर समस्या को देखते हुए, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 1990 के दशक के अंत में सभी सार्वजनिक परिवहन बसों को संपीड़ित प्राकृतिक गैस (Compressed Natural Gas - CNG) पर चलने का आदेश दिया। CNG पेट्रोल/डीजल से बेहतर है क्योंकि यह सस्ता है, अधिक कुशलता से जलता है और बहुत कम प्रदूषक छोड़ता है।
  • ध्वनि प्रदूषण (Noise Pollution):

    • परिभाषा: अवांछित उच्च ध्वनि जो असहजता और तनाव पैदा करती है।
    • स्रोत: जेट विमान, लाउडस्पीकर, औद्योगिक मशीनें, वाहन, पटाखे।
    • प्रभाव: नींद न आना, हृदय गति बढ़ना, श्वसन पैटर्न में बदलाव, सुनने की क्षमता का स्थायी या अस्थायी नुकसान।
    • नियंत्रण: ध्वनि अवशोषक सामग्री का उपयोग, साइलेंसर का उपयोग, पेड़ों की कतारें लगाना (ध्वनि अवरोधक)।

2. जल प्रदूषण और उसका नियंत्रण (Water Pollution and its Control)

जल प्रदूषण जल निकायों (नदियाँ, झीलें, महासागर) में हानिकारक पदार्थों का मिलना है, जिससे जल उपयोग के लिए अनुपयुक्त हो जाता है।

  • घरेलू वाहित मल (Domestic Sewage):
    • यह शहरों और कस्बों से निकलने वाला अपशिष्ट जल है। इसमें मुख्य रूप से मानव मल, कार्बनिक पदार्थ और रोगजनक सूक्ष्मजीव होते हैं।
    • BOD (जैव रासायनिक ऑक्सीजन मांग - Biochemical Oxygen Demand): यह जल में मौजूद कार्बनिक पदार्थों को विघटित करने के लिए सूक्ष्मजीवों द्वारा आवश्यक ऑक्सीजन की मात्रा है। BOD का उच्च मान जल में उच्च कार्बनिक प्रदूषण को दर्शाता है।
    • प्रभाव:
      • कार्बनिक पदार्थों के अपघटन के लिए ऑक्सीजन की खपत से जलीय जीवों (मछलियों) की मृत्यु।
      • रोगजनक सूक्ष्मजीवों के कारण जल-जनित रोग (जैसे टाइफाइड, पीलिया, पेचिश)।
      • सुपोषण (Eutrophication): जल निकायों में पोषक तत्वों (नाइट्रोजन, फास्फोरस) की अत्यधिक वृद्धि।
        • प्राकृतिक सुपोषण: झीलों का प्राकृतिक रूप से वृद्ध होना।
        • त्वरित सुपोषण (Accelerated Eutrophication): मानव गतिविधियों (कृषि अपवाह, औद्योगिक अपशिष्ट) के कारण पोषक तत्वों की तेजी से वृद्धि। इससे शैवाल प्रस्फुटन (Algal Bloom) होता है, जो जल की गुणवत्ता को खराब करता है और जलीय जीवों के लिए हानिकारक होता है।
        • जलकुंभी (Water Hyacinth - Eichhornia crassipes): इसे "बंगाल का आतंक" (Terror of Bengal) कहा जाता है। यह विश्व के सबसे समस्याग्रस्त जलीय खरपतवारों में से एक है, जो जल निकायों को तेजी से ढक लेता है, ऑक्सीजन स्तर को कम करता है और जलीय जीवन को खतरे में डालता है।
  • औद्योगिक अपशिष्ट: भारी धातुएँ (पारा, कैडमियम), कार्बनिक रसायन, तेल, अम्ल।
  • कृषि अपशिष्ट: उर्वरक (नाइट्रेट, फॉस्फेट), कीटनाशक।
  • जैविक आवर्धन (Biomagnification):
    • परिभाषा: खाद्य श्रृंखला में हानिकारक गैर-अपघटनीय (non-degradable) प्रदूषकों (जैसे DDT, पारा) की सांद्रता का उत्तरोत्तर बढ़ना।
    • उदाहरण: DDT की सांद्रता जल में 0.003 ppb (पार्ट्स पर बिलियन) से शुरू होकर जलीय पौधों, छोटी मछलियों, बड़ी मछलियों और अंततः पक्षियों में कई गुना बढ़ जाती है (जैसे पक्षियों में 25 ppm तक)।
    • प्रभाव: पक्षियों में कैल्शियम उपापचय को प्रभावित करता है, जिससे अंडे के कवच पतले हो जाते हैं और समय से पहले टूट जाते हैं। मनुष्यों में कैंसर, प्रजनन संबंधी समस्याएँ।
  • जल प्रदूषण नियंत्रण के उपाय:
    • एकीकृत अपशिष्ट जल उपचार (Integrated Waste Water Treatment):
      • आर्केटा शहर का उदाहरण (कैलिफोर्निया): हम्बोल्ट स्टेट यूनिवर्सिटी के जीवविज्ञानी और आर्केटा शहर के निवासियों ने मिलकर एक एकीकृत अपशिष्ट जल उपचार प्रणाली विकसित की। इसमें दो चरण थे:
        1. पारंपरिक अवसादन, छानना और क्लोरीन उपचार: इससे प्रदूषक हटते हैं।
        2. छह जुड़े हुए दलदली क्षेत्र (marshlands) की श्रृंखला: इन दलदली क्षेत्रों में कवक, शैवाल और बैक्टीरिया का एक मिश्रण होता है जो प्रदूषकों को निष्क्रिय, अवशोषित और आत्मसात करता है। ये दलदली क्षेत्र एक अभयारण्य के रूप में भी कार्य करते हैं, जहाँ मछलियाँ और वन्यजीव रहते हैं।
    • पारिस्थितिक स्वच्छता (Ecological Sanitation - Ecosan): यह मानव मल के निपटान का एक स्थायी तरीका है, जिसमें शुष्क शौचालयों का उपयोग किया जाता है। यह जल-रहित होता है और मानव मल को खाद में बदल देता है, जिससे जल प्रदूषण से बचा जा सकता है।

3. ठोस अपशिष्ट (Solid Wastes)

ठोस अपशिष्ट में वे सभी चीजें शामिल हैं जिन्हें हम फेंक देते हैं।

  • प्रकार:
    • नगरपालिका ठोस अपशिष्ट: घरों, कार्यालयों, दुकानों, स्कूलों आदि से निकलने वाला कचरा (कागज, भोजन अपशिष्ट, प्लास्टिक, कांच, धातु, रबर, चमड़ा, कपड़ा)।
    • अस्पताल अपशिष्ट: रोगजनक सूक्ष्मजीवों वाला खतरनाक अपशिष्ट।
    • इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट (e-waste): कंप्यूटर, मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान जो अनुपयोगी हो गए हैं।
  • निपटान के तरीके:
    • भराव क्षेत्र (Sanitary Landfills): कचरे को निचले इलाकों में दबाया जाता है और मिट्टी से ढका जाता है। यह एक स्थायी समाधान नहीं है क्योंकि भूमि की कमी होती है और रिसाव (leachate) भूजल को प्रदूषित कर सकता है।
    • भस्मीकरण (Incineration): कचरे को उच्च तापमान पर जलाया जाता है, जिससे राख बचती है। यह प्रदूषण पैदा कर सकता है।
    • पुनर्चक्रण (Recycling): प्लास्टिक, कागज, धातु, कांच जैसे पदार्थों को पुनः उपयोग के लिए संसाधित करना।
    • ई-अपशिष्ट का निपटान: इसे विकसित देशों में पुनर्चक्रण के लिए विकासशील देशों में निर्यात किया जाता है, जहाँ अक्सर असुरक्षित तरीकों से धातुओं को निकाला जाता है।
    • प्लास्टिक अपशिष्ट का निपटान (अहमद खान का केस स्टडी): बेंगलुरु के अहमद खान ने एक अभिनव समाधान विकसित किया। उन्होंने प्लास्टिक कचरे को "पॉलीब्लेंड" नामक एक महीन पाउडर में परिवर्तित किया। इस पॉलीब्लेंड को बिटुमेन (सड़क बनाने में प्रयुक्त) के साथ मिलाकर सड़कों के निर्माण में उपयोग किया गया, जिससे सड़कों की जल-विकर्षक क्षमता और जीवनकाल बढ़ गया।

4. कृषि रसायन और उनके प्रभाव (Agrochemicals and their Effects)

  • उर्वरक और कीटनाशक:
    • रासायनिक उर्वरकों (यूरिया, डीएपी) और कीटनाशकों (DDT, BHC) का अत्यधिक उपयोग मृदा और जल प्रदूषण का कारण बनता है।
    • ये भूजल में रिस सकते हैं और सतह के जल निकायों में बह सकते हैं, जिससे सुपोषण और जैविक आवर्धन होता है।
  • कार्बनिक कृषि (Organic Farming):
    • यह रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग के बिना कृषि करने का एक तरीका है। इसमें जैव-उर्वरक, जैव-कीटनाशक और फसल चक्रण का उपयोग किया जाता है।
    • रमेश चंद्र डागर (सोनीपत) का केस स्टडी: उन्होंने एकीकृत कार्बनिक कृषि (Integrated Organic Farming) का मॉडल विकसित किया, जिसमें मधुमक्खी पालन, डेयरी प्रबंधन, जल संचयन, खाद बनाना और कृषि को एक साथ जोड़ा गया। यह एक चक्रीय, शून्य-अपशिष्ट प्रक्रिया है जहाँ एक प्रक्रिया का अपशिष्ट दूसरी प्रक्रिया के लिए संसाधन बन जाता है।

5. रेडियोधर्मी अपशिष्ट (Radioactive Wastes)

  • स्रोत: परमाणु ऊर्जा संयंत्र, परमाणु हथियार परीक्षण।
  • खतरे: रेडियोधर्मी विकिरण उत्परिवर्तन (mutations) का कारण बनता है, जिससे कैंसर, जन्म दोष और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ हो सकती हैं। उच्च खुराक घातक हो सकती है।
  • निपटान: रेडियोधर्मी अपशिष्ट को अत्यंत सावधानी से निपटाया जाना चाहिए। इसे कम से कम 500 मीटर गहरे भूगर्भीय भंडार में दफन किया जाना चाहिए, क्योंकि इसमें हजारों वर्षों तक सक्रिय रहने की क्षमता होती है।

6. ग्रीनहाउस प्रभाव और वैश्विक तापन (Greenhouse Effect and Global Warming)

  • ग्रीनहाउस प्रभाव: यह एक प्राकृतिक घटना है जो पृथ्वी को गर्म रखती है। पृथ्वी की सतह से परावर्तित अवरक्त विकिरण (infrared radiation) को वायुमंडल में मौजूद कुछ गैसें (ग्रीनहाउस गैसें) अवशोषित कर लेती हैं और उन्हें वापस पृथ्वी की ओर उत्सर्जित करती हैं, जिससे पृथ्वी का तापमान बना रहता है।
  • ग्रीनहाउस गैसें (GHGs):
    • कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂): सबसे महत्वपूर्ण GHG (60% योगदान)।
    • मीथेन (CH₄): (20% योगदान)।
    • नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O): (6% योगदान)।
    • क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs): (14% योगदान)।
  • वैश्विक तापन (Global Warming):
    • ग्रीनहाउस गैसों की सांद्रता में वृद्धि (मानव गतिविधियों जैसे जीवाश्म ईंधन जलाना, वनों की कटाई) के कारण पृथ्वी के औसत तापमान में वृद्धि।
    • प्रभाव:
      • ध्रुवीय बर्फ और ग्लेशियरों का पिघलना, जिससे समुद्र का स्तर बढ़ता है।
      • तटीय क्षेत्रों का जलमग्न होना।
      • जलवायु परिवर्तन, जिससे वर्षा पैटर्न में बदलाव, चरम मौसम की घटनाएँ (बाढ़, सूखा) होती हैं।
      • जैव विविधता का नुकसान।
  • नियंत्रण के उपाय:
    • जीवाश्म ईंधन के उपयोग को कम करना।
    • ऊर्जा दक्षता में सुधार।
    • वनरोपण (अधिक पेड़ लगाना)।
    • वनों की कटाई को कम करना।
    • क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) के उत्सर्जन को कम करना।
    • क्योटो प्रोटोकॉल: यह एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता है जिसका उद्देश्य ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करना है।

7. ओजोन अवक्षय (Ozone Depletion)

  • ओजोन परत (Ozone Layer): यह समताप मंडल (stratosphere) में स्थित है और सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी (UV) विकिरण को अवशोषित करके पृथ्वी पर जीवन की रक्षा करती है।
  • ओजोन अवक्षय के कारण: मुख्य रूप से क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) जैसे ओजोन-अवक्षयकारी पदार्थ (Ozone Depleting Substances - ODS)।
  • तंत्र: CFCs समताप मंडल में UV विकिरण द्वारा टूटते हैं और क्लोरीन (Cl) परमाणु मुक्त करते हैं। एक क्लोरीन परमाणु लाखों ओजोन अणुओं (O₃) को तोड़ सकता है।
    • Cl + O₃ → ClO + O₂
    • ClO + O → Cl + O₂
  • ओजोन छिद्र (Ozone Hole): अंटार्कटिका क्षेत्र में ओजोन परत की मोटाई में उल्लेखनीय कमी को "ओजोन छिद्र" कहा जाता है।
  • प्रभाव:
    • मनुष्यों में त्वचा कैंसर (मेलानोमा), मोतियाबिंद, प्रतिरक्षा प्रणाली को नुकसान।
    • पौधों और प्लवक को नुकसान।
  • नियंत्रण:
    • मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (Montreal Protocol): 1987 में हस्ताक्षरित एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता, जिसका उद्देश्य ओजोन-अवक्षयकारी पदार्थों (CFCs) के उत्पादन और उपयोग को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करना है।

8. अनुचित संसाधन उपयोग और रखरखाव द्वारा अवनयन (Degradation by Improper Resource Utilization and Maintenance)

  • मृदा अपरदन और मरुस्थलीकरण (Soil Erosion and Desertification):
    • कारण: वनों की कटाई, अत्यधिक चराई, अनुचित कृषि पद्धतियाँ, जल अपरदन, पवन अपरदन।
    • परिणाम: उपजाऊ ऊपरी मिट्टी का नुकसान, भूमि का बंजर होना, मरुस्थलीकरण।
  • जल भराव और मृदा लवणता (Waterlogging and Soil Salinity):
    • कारण: अनुचित सिंचाई, जल निकासी की खराब व्यवस्था।
    • परिणाम: मृदा में लवणों का जमाव, पौधों की वृद्धि में बाधा, कृषि उत्पादकता में कमी।

9. वनों की कटाई (Deforestation)

  • परिभाषा: वनों को गैर-वन उद्देश्यों के लिए स्थायी रूप से परिवर्तित करना।
  • कारण:
    • कृषि भूमि का विस्तार।
    • लकड़ी की मांग (ईंधन, फर्नीचर)।
    • शहरीकरण और औद्योगीकरण।
    • झूम खेती (slash and burn agriculture)।
  • परिणाम:
    • कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) की वायुमंडलीय सांद्रता में वृद्धि (वैश्विक तापन)।
    • जैव विविधता का नुकसान।
    • मृदा अपरदन और मरुस्थलीकरण।
    • जल चक्र में व्यवधान।
  • वनरोपण (Reforestation): काटे गए वनों को फिर से लगाना।
  • वन संरक्षण में लोगों की भागीदारी:
    • बिश्नोई आंदोलन (Bishnoi Movement): 1731 में राजस्थान के खेजड़ली गाँव में, अमृता देवी बिश्नोई ने खेजड़ी पेड़ों को बचाने के लिए अपने और 363 अन्य बिश्नोई समुदाय के सदस्यों के साथ अपने जीवन का बलिदान दिया।
    • चिपको आंदोलन (Chipko Movement): 1970 के दशक में गढ़वाल हिमालय में स्थानीय महिलाओं द्वारा पेड़ों को काटने से बचाने के लिए शुरू किया गया। वे पेड़ों से चिपक जाती थीं।
    • संयुक्त वन प्रबंधन (Joint Forest Management - JFM): 1980 के दशक में भारत सरकार द्वारा शुरू किया गया, जिसमें स्थानीय समुदायों को वनों के प्रबंधन और संरक्षण में शामिल किया जाता है, और बदले में उन्हें वन उत्पादों का लाभ मिलता है।

यह विस्तृत नोट्स आपको 'पर्यावरण के मुद्दे' अध्याय की गहन समझ प्रदान करेंगे और सरकारी परीक्षाओं के लिए आपकी तैयारी में सहायक होंगे। अब, आइए इस अध्याय पर आधारित कुछ बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs) देखते हैं।


बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions - MCQs)

  1. निम्नलिखित में से कौन सा ग्रीनहाउस गैस नहीं है?
    a) कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂)
    b) मीथेन (CH₄)
    c) ऑक्सीजन (O₂)
    d) नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O)

  2. "बंगाल का आतंक" (Terror of Bengal) किस जलीय खरपतवार को कहा जाता है?
    a) पिस्टिया (Pistia)
    b) जलकुंभी (Water Hyacinth)
    c) वोल्फिया (Wolffia)
    d) एजोला (Azolla)

  3. उत्प्रेरक परिवर्तक में कौन सी महंगी धातुएँ उत्प्रेरक के रूप में उपयोग की जाती हैं?
    a) सोना, चांदी, तांबा
    b) प्लैटिनम, पैलेडियम, रोडियम
    c) लोहा, निकल, क्रोमियम
    d) एल्यूमीनियम, जिंक, टिन

  4. जैविक आवर्धन (Biomagnification) का क्या अर्थ है?
    a) जीवों के आकार में वृद्धि
    b) खाद्य श्रृंखला में प्रदूषकों की सांद्रता में वृद्धि
    c) जैव विविधता में वृद्धि
    d) जैविक पदार्थों का अपघटन

  5. मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल किससे संबंधित है?
    a) जैव विविधता संरक्षण
    b) ओजोन परत अवक्षय
    c) वैश्विक तापन नियंत्रण
    d) जल प्रदूषण नियंत्रण

  6. BOD (जैव रासायनिक ऑक्सीजन मांग) का उच्च मान क्या दर्शाता है?
    a) जल में उच्च ऑक्सीजन स्तर
    b) जल में निम्न कार्बनिक प्रदूषण
    c) जल में उच्च कार्बनिक प्रदूषण
    d) जल में निम्न सूक्ष्मजीव गतिविधि

  7. अहमद खान ने प्लास्टिक कचरे के निपटान के लिए किस तकनीक का विकास किया?
    a) भस्मीकरण
    b) भराव क्षेत्र
    c) पॉलीब्लेंड का उपयोग करके सड़कें बनाना
    d) पुनर्चक्रण संयंत्र स्थापित करना

  8. बिश्नोई आंदोलन किस राज्य से संबंधित है और इसका मुख्य उद्देश्य क्या था?
    a) उत्तराखंड, वनों की कटाई रोकना
    b) राजस्थान, खेजड़ी पेड़ों का संरक्षण
    c) कर्नाटक, जल संरक्षण
    d) मध्य प्रदेश, वन्यजीव संरक्षण

  9. निम्नलिखित में से कौन सा ई-अपशिष्ट के निपटान का एक तरीका नहीं है?
    a) पुनर्चक्रण
    b) भस्मीकरण
    c) भराव क्षेत्र
    d) जैविक खाद बनाना

  10. समताप मंडल में ओजोन परत के अवक्षय का मुख्य कारण क्या है?
    a) कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂)
    b) मीथेन (CH₄)
    c) क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs)
    d) सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂)


उत्तरमाला:

  1. c) ऑक्सीजन (O₂)
  2. b) जलकुंभी (Water Hyacinth)
  3. b) प्लैटिनम, पैलेडियम, रोडियम
  4. b) खाद्य श्रृंखला में प्रदूषकों की सांद्रता में वृद्धि
  5. b) ओजोन परत अवक्षय
  6. c) जल में उच्च कार्बनिक प्रदूषण
  7. c) पॉलीब्लेंड का उपयोग करके सड़कें बनाना
  8. b) राजस्थान, खेजड़ी पेड़ों का संरक्षण
  9. d) जैविक खाद बनाना
  10. c) क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs)

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