Class 12 Biology Notes Chapter 2 (पुष्पी पादपों में लैंगिक प्रजनन) – Jeev Vigyan Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम कक्षा 12 जीव विज्ञान के अध्याय 2, 'पुष्पी पादपों में लैंगिक प्रजनन' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय आपकी बोर्ड परीक्षाओं के साथ-साथ विभिन्न सरकारी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। हम सभी प्रमुख अवधारणाओं, संरचनाओं और प्रक्रियाओं को गहराई से समझेंगे ताकि कोई भी महत्वपूर्ण जानकारी छूटने न पाए।
अध्याय 2: पुष्पी पादपों में लैंगिक प्रजनन (Sexual Reproduction in Flowering Plants)
पुष्पी पादप (एंजियोस्पर्म) लैंगिक प्रजनन करते हैं, जिसमें पुष्प उनके प्रजनन अंग होते हैं। पुष्प में नर और मादा दोनों प्रजनन संरचनाएं होती हैं।
I. पुष्प: एक आकर्षक अंग
पुष्प रूपांतरित प्ररोह है जिसका कार्य लैंगिक प्रजनन करना है। एक प्रारूपिक पुष्प में चार मुख्य चक्र होते हैं:
- बाह्यदलपुंज (Calyx): हरे रंग के बाह्यदल (sepals) का समूह, जो कली अवस्था में पुष्प की रक्षा करता है।
- दलपुंज (Corolla): रंगीन पंखुड़ियों (petals) का समूह, जो परागणकों को आकर्षित करता है।
- पुमंग (Androecium): नर प्रजनन चक्र, जिसमें पुंकेसर (stamens) होते हैं। प्रत्येक पुंकेसर में एक तंतु (filament) और एक परागकोष (anther) होता है।
- जायांग (Gynoecium): मादा प्रजनन चक्र, जिसमें अंडप (carpels) या स्त्रीकेसर (pistils) होते हैं। प्रत्येक अंडप में एक अंडाशय (ovary), वर्तिका (style) और वर्तिकाग्र (stigma) होता है।
II. पूर्व-निषेचन घटनाएँ: संरचनाएँ एवं घटनाएँ
निषेचन से पहले होने वाली सभी संरचनात्मक और हार्मोनल परिवर्तनों को पूर्व-निषेचन घटनाएँ कहते हैं। इनमें पुंकेसर और स्त्रीकेसर का विकास, युग्मकजनन (gametogenesis) शामिल हैं।
A. पुंकेसर, लघुबीजाणुधानी एवं परागकण
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पुंकेसर (Stamen):
- इसमें एक लंबा पतला तंतु (filament) होता है, जिसका समीपस्थ सिरा पुष्पासन या दल से जुड़ा होता है।
- एक परागकोष (anther) होता है, जो आमतौर पर द्विपालित (bilobed) होता है। प्रत्येक पालि में दो कोष्ठक होते हैं, जिन्हें लघुबीजाणुधानी (microsporangia) कहते हैं। इस प्रकार, एक परागकोष में चार लघुबीजाणुधानियाँ होती हैं (चतुष्कोणीय संरचना)।
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लघुबीजाणुधानी (Microsporangium):
- यह परागकोष के कोने पर स्थित होती है।
- इसकी भित्ति चार परतों से बनी होती है:
- बाह्यत्वचा (Epidermis): सबसे बाहरी सुरक्षात्मक परत।
- अंतस्थीसियम (Endothecium): दूसरी परत, जो स्फुटन (dehiscence) में मदद करती है।
- मध्य परतें (Middle layers): 2-3 परतें।
- टेपीटम (Tapetum): सबसे भीतरी परत, जो विकासशील परागकणों को पोषण प्रदान करती है। इसकी कोशिकाएँ सघन जीवद्रव्य वाली होती हैं और अक्सर एक से अधिक केंद्रक वाली होती हैं।
- जब परागकोष परिपक्व होता है, तो लघुबीजाणुधानियाँ खुल जाती हैं और परागकण मुक्त होते हैं।
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लघुबीजाणुजनन (Microsporogenesis):
- लघुबीजाणुधानी के अंदर लघुबीजाणु मातृ कोशिकाएँ (Microspore Mother Cells - MMC) होती हैं, जो द्विगुणित (2n) होती हैं।
- प्रत्येक MMC अर्धसूत्री विभाजन (meiosis) द्वारा चार अगुणित लघुबीजाणु (microspores) का एक चतुष्क (tetrad) बनाती है।
- जैसे ही परागकोष परिपक्व होता है, लघुबीजाणु एक-दूसरे से अलग होकर परागकणों में विकसित हो जाते हैं।
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परागकण (Pollen Grain):
- यह नर युग्मकोद्भिद् (male gametophyte) का प्रतिनिधित्व करता है।
- यह गोलाकार होता है और इसका व्यास 25-50 माइक्रोमीटर होता है।
- इसकी दोहरी भित्ति होती है:
- बाह्यचोल (Exine): बाहरी कठोर परत, जो स्पोरोपोलेनिन (sporopollenin) नामक अत्यंत प्रतिरोधी कार्बनिक पदार्थ से बनी होती है। स्पोरोपोलेनिन उच्च तापमान, प्रबल अम्ल और क्षार का प्रतिरोध करता है, और इसे किसी भी एंजाइम द्वारा अपघटित नहीं किया जा सकता। इसी कारण परागकण जीवाश्म के रूप में संरक्षित रहते हैं। बाह्यचोल में कुछ स्थानों पर छिद्र होते हैं, जिन्हें जनन छिद्र (germ pores) कहते हैं, जहाँ स्पोरोपोलेनिन अनुपस्थित होता है।
- अंतःचोल (Intine): भीतरी पतली और सतत परत, जो पेक्टिन और सेलुलोज से बनी होती है।
- परागकण के अंदर दो कोशिकाएँ होती हैं:
- कायिक कोशिका (Vegetative cell): बड़ी, अनियमित केंद्रक वाली, प्रचुर खाद्य भंडार वाली।
- जनन कोशिका (Generative cell): छोटी, कायिक कोशिका के जीवद्रव्य में तैरती हुई, तर्कु-आकार (spindle-shaped) की, सघन जीवद्रव्य और एक केंद्रक वाली।
- लगभग 60% एंजियोस्पर्म में, परागकण दो-कोशिकीय अवस्था (कायिक और जनन कोशिका) में झड़ते हैं। शेष 40% में, जनन कोशिका समसूत्री विभाजन द्वारा दो नर युग्मक बनाती है, और परागकण तीन-कोशिकीय अवस्था में झड़ते हैं।
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परागकणों के महत्व:
- पराग एलर्जी (Pollen allergy): कुछ पौधों (जैसे गाजर घास/पार्थेनियम) के परागकण गंभीर एलर्जी और श्वास संबंधी विकार (दमा, ब्रोंकाइटिस) पैदा कर सकते हैं।
- पोषक पूरक (Nutritional supplements): परागकण पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं और इन्हें टैबलेट या सिरप के रूप में उपयोग किया जाता है, खासकर धावकों और घोड़ों के प्रदर्शन को बढ़ाने के लिए।
- जीवनक्षमता (Viability): परागकणों की जीवनक्षमता कुछ मिनटों से लेकर कई महीनों तक भिन्न होती है (जैसे गेहूं, चावल में 30 मिनट; रोज़ेसी, लेग्यूमिनोसी, सोलेनेसी में कई महीने)। इन्हें द्रव नाइट्रोजन (-196°C) में पराग बैंक (pollen banks) में संग्रहीत किया जा सकता है।
B. स्त्रीकेसर, गुरुबीजाणुधानी (बीजांड) एवं भ्रूणकोष
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स्त्रीकेसर (Pistil/Carpel):
- यह मादा प्रजनन अंग है।
- इसमें एक या अधिक अंडप हो सकते हैं।
- यदि एक अंडप हो तो एकांडपी (monocarpellary)।
- यदि एक से अधिक अंडप हों तो बहुअंडपी (multicarpellary)।
- युक्तांडपी (Syncarpous): अंडप जुड़े हुए (जैसे सरसों, गुड़हल)।
- वियुक्तांडपी (Apocarpous): अंडप स्वतंत्र (जैसे माइकेलिया, गुलाब)।
- प्रत्येक अंडप के तीन भाग होते हैं:
- वर्तिकाग्र (Stigma): परागकणों के लिए एक ग्राही सतह।
- वर्तिका (Style): वर्तिकाग्र के नीचे एक पतला भाग।
- अंडाशय (Ovary): आधार का फूला हुआ भाग, जिसमें एक या अधिक बीजांड (ovules) होते हैं। बीजांड एक चपटे गद्देदार बीजांडासन (placenta) पर लगे होते हैं।
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गुरुबीजाणुधानी (बीजांड) (Megasporangium/Ovule):
- यह अंडाशय के अंदर बीजांडासन से जुड़ा होता है।
- एक प्रारूपिक बीजांड की संरचना:
- बीजांडवृंत (Funicle): बीजांड को बीजांडासन से जोड़ने वाला डंठल।
- नाभिका (Hilum): बीजांडवृंत और बीजांड का संधि स्थल।
- अध्यावरण (Integuments): एक या दो सुरक्षात्मक आवरण, जो बीजांड को घेरे रहते हैं।
- बीजांडद्वार (Micropyle): अध्यावरणों द्वारा घिरा एक छोटा छिद्र, जहां अध्यावरण अनुपस्थित होते हैं।
- चलाजा (Chalaza): बीजांडद्वार के ठीक विपरीत, बीजांड का आधारी भाग।
- बीजांडकाय (Nucellus): अध्यावरणों से घिरा कोशिकाओं का एक पिंड, जिसमें प्रचुर मात्रा में आरक्षित खाद्य पदार्थ होते हैं। इसके अंदर भ्रूणकोष (embryo sac) या मादा युग्मकोद्भिद् विकसित होता है।
- सबसे सामान्य प्रकार का बीजांड प्रतीप बीजांड (anatropous ovule) होता है, जिसमें बीजांडवृंत के पास बीजांडद्वार होता है।
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गुरुबीजाणुजनन (Megasporogenesis):
- बीजांडकाय के बीजांडद्वार सिरे की ओर स्थित एक एकल गुरुबीजाणु मातृ कोशिका (Megaspore Mother Cell - MMC) होती है। यह द्विगुणित (2n) होती है।
- MMC अर्धसूत्री विभाजन द्वारा चार अगुणित गुरुबीजाणु (megaspores) बनाती है।
- अधिकांश पुष्पी पादपों में, इन चार गुरुबीजाणुओं में से केवल एक कार्यात्मक होता है, जबकि अन्य तीन अपहसित हो जाते हैं।
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मादा युग्मकोद्भिद् (भ्रूणकोष) (Female Gametophyte/Embryo Sac):
- एक कार्यात्मक गुरुबीजाणु से भ्रूणकोष का विकास होता है। इसे एकबीजाणुज विकास (monosporic development) कहते हैं।
- कार्यात्मक गुरुबीजाणु का केंद्रक समसूत्री विभाजन द्वारा दो केंद्रक बनाता है, जो विपरीत ध्रुवों पर चले जाते हैं। फिर दो और समसूत्री विभाजन होते हैं, जिससे प्रत्येक ध्रुव पर चार केंद्रक बन जाते हैं।
- इन आठ केंद्रकों में से, प्रत्येक ध्रुव से एक केंद्रक केंद्र में आकर ध्रुवीय केंद्रक (polar nuclei) बनाता है, जो मिलकर द्वितीयक केंद्रक (secondary nucleus) बनाते हैं।
- कोशिका भित्ति के निर्माण के बाद, एक प्रारूपिक परिपक्व भ्रूणकोष 7-कोशिकीय और 8-केंद्रकीय (7-celled, 8-nucleate) होता है।
- भ्रूणकोष की संरचना:
- बीजांडद्वार सिरा:
- अंड उपकरण (Egg apparatus): इसमें एक अंड कोशिका (egg cell) और दो सहायक कोशिकाएँ (synergids) होती हैं।
- सहायक कोशिकाओं में बीजांडद्वार सिरे पर एक विशिष्ट तंतुरूप समुच्चय (filiform apparatus) होता है, जो पराग नलिका को भ्रूणकोष में प्रवेश करने के लिए निर्देशित करता है।
- चलाजा सिरा:
- तीन प्रतिध्रुवी कोशिकाएँ (antipodal cells) होती हैं।
- केंद्रीय कोशिका (Central cell): सबसे बड़ी कोशिका, जिसमें दो ध्रुवीय केंद्रक होते हैं, जो बाद में संलयित होकर द्वितीयक केंद्रक बनाते हैं।
- बीजांडद्वार सिरा:
III. परागण (Pollination)
परागकणों का परागकोष से निकलकर वर्तिकाग्र तक पहुँचने की प्रक्रिया को परागण कहते हैं।
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परागण के प्रकार:
- स्वपरागण (Autogamy): एक ही पुष्प के परागकणों का उसी पुष्प के वर्तिकाग्र पर स्थानांतरण।
- उदाहरण: वायोला (पेंसी), ऑक्सैलिस, कोमेलीना। इनमें दो प्रकार के पुष्प होते हैं:
- उन्मील परागणी (Chasmogamous): खुले हुए पुष्प, जिनमें परागकोष और वर्तिकाग्र अनावृत होते हैं।
- अनुन्मील्य परागणी (Cleistogamous): बंद पुष्प, जो कभी नहीं खुलते। इनमें अनिवार्य रूप से स्वपरागण होता है।
- उदाहरण: वायोला (पेंसी), ऑक्सैलिस, कोमेलीना। इनमें दो प्रकार के पुष्प होते हैं:
- सजातपुष्पी परागण (Geitonogamy): एक ही पादप के एक पुष्प के परागकणों का उसी पादप के दूसरे पुष्प के वर्तिकाग्र पर स्थानांतरण। यह आनुवंशिक रूप से स्वपरागण के समान है, लेकिन पारिस्थितिक रूप से परपरागण है क्योंकि इसमें परागण कारक की आवश्यकता होती है।
- परनिषेचन/परपरागण (Xenogamy/Cross-pollination): एक पादप के पुष्प के परागकणों का दूसरे पादप के पुष्प के वर्तिकाग्र पर स्थानांतरण। यह आनुवंशिक रूप से भिन्न परागकणों को लाता है।
- स्वपरागण (Autogamy): एक ही पुष्प के परागकणों का उसी पुष्प के वर्तिकाग्र पर स्थानांतरण।
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परागण के कारक (Agents of Pollination):
- अजैविक कारक (Abiotic agents):
- वायु परागण (Anemophily):
- सामान्य, जैसे घास में।
- परागकण हल्के, अ-चिपचिपे होते हैं ताकि आसानी से हवा में उड़ सकें।
- वर्तिकाग्र बड़े, पंखनुमा या रोमिल होते हैं ताकि हवा में परागकणों को आसानी से पकड़ सकें।
- पुष्प प्रायः छोटे, अरंगीन, गंधहीन होते हैं और मकरंद नहीं बनाते।
- परागकोष सुविकसित होते हैं।
- जल परागण (Hydrophily):
- अपेक्षाकृत दुर्लभ (लगभग 30 वंशों तक सीमित, अधिकतर एकबीजपत्री)।
- उदाहरण: वैलिसनेरिया, हाइड्रिला, ज़ोस्टेरा (समुद्री घास)।
- जलकुंभी (water hyacinth) और जल लिली (water lily) जैसे जलीय पौधों में परागण कीटों या हवा द्वारा होता है।
- वैलिसनेरिया में मादा पुष्प जल की सतह पर आते हैं, और नर पुष्प/परागकण जल की सतह पर तैरते हुए मादा पुष्प तक पहुँचते हैं।
- समुद्री घास (ज़ोस्टेरा) में परागकण लंबे, रिबन जैसे होते हैं और जल के अंदर ही परागण होता है।
- जल-परागित पुष्पों के परागकणों को गीला होने से बचाने के लिए श्लेष्म आवरण होता है।
- वायु परागण (Anemophily):
- जैविक कारक (Biotic agents):
- अधिकांश पुष्पी पादप परागण के लिए जानवरों (कीट, पक्षी, चमगादड़, आदि) का उपयोग करते हैं।
- कीट परागण (Entomophily): मधुमक्खी, तितली, भृंग, चींटी, शलभ (moths), पक्षी (हमिंगबर्ड, सनबर्ड), चमगादड़, प्राइमेट्स, वृक्ष-कृंतक (tree-dwelling rodents) आदि।
- पुष्पों की विशेषताएँ:
- कीटों को आकर्षित करने के लिए पुष्प बड़े, रंगीन, सुगंधित और मकरंद से भरपूर होते हैं।
- छोटे पुष्प समूह में गुच्छित होकर बड़े पुष्प की तरह दिखते हैं।
- कुछ पुष्प परागणकों को अंडे देने के लिए सुरक्षित स्थान प्रदान करते हैं (जैसे अमोर्फोफैलस, यूका)।
- पराग लूटने वाले (Pollen robbers): कुछ परागणक मकरंद या पराग का उपभोग करते हैं लेकिन परागण में मदद नहीं करते।
- अजैविक कारक (Abiotic agents):
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बाह्य प्रजनन युक्तियाँ (Outbreeding Devices):
- अधिकांश पुष्पी पादप स्वपरागण को हतोत्साहित करने और परपरागण को बढ़ावा देने के लिए युक्तियाँ विकसित करते हैं।
- परागकणों का परिपक्वन और वर्तिकाग्र की ग्राह्यता में भिन्नता (Dichogamy):
- पुंपूर्वता (Protandry): परागकण वर्तिकाग्र से पहले परिपक्व होते हैं (जैसे सूरजमुखी)।
- स्त्रीपूर्वतता (Protogyny): वर्तिकाग्र परागकणों से पहले परिपक्व होता है (जैसे चंपा)।
- परागकणों का प्रकीर्णन और वर्तिकाग्र की स्थिति में भिन्नता (Herkogamy): परागकोष और वर्तिकाग्र विभिन्न स्थानों पर होते हैं, जिससे स्वपरागण नहीं हो पाता।
- स्व-असंगतता (Self-incompatibility): एक आनुवंशिक तंत्र जो स्व-परागकणों (उसी पुष्प या उसी पादप के अन्य पुष्पों से) को अंकुरित होने या पराग नलिका को अंडाशय में प्रवेश करने से रोकता है।
- एकलिंगी पुष्प (Unisexuality):
- एकलिंगाश्रयी (Monoecious): नर और मादा पुष्प एक ही पादप पर होते हैं (जैसे अरंड, मक्का) - स्वपरागण को रोकते हैं लेकिन सजातपुष्पी परागण को नहीं।
- द्विलिंगाश्रयी (Dioecious): नर और मादा पुष्प अलग-अलग पादपों पर होते हैं (जैसे पपीता, खजूर) - स्वपरागण और सजातपुष्पी परागण दोनों को रोकते हैं।
IV. पराग-स्त्रीकेसर संकर्षण (Pollen-Pistil Interaction)
यह परागकणों के वर्तिकाग्र पर जमा होने से लेकर पराग नलिका के बीजांड में प्रवेश करने तक की सभी घटनाओं को संदर्भित करता है।
- स्त्रीकेसर में यह क्षमता होती है कि वह सही प्रकार के परागकणों (अपनी ही प्रजाति के) को पहचान सके और उन्हें स्वीकार करे, जबकि गलत प्रकार के परागकणों को अस्वीकार कर दे।
- यदि परागकण सही प्रकार का है, तो वर्तिकाग्र उसे स्वीकार करता है और परागकण अंकुरित होकर पराग नलिका बनाता है, जो जनन छिद्र से निकलती है।
- पराग नलिका वर्तिकाग्र और वर्तिका से होते हुए अंडाशय तक पहुँचती है।
- पराग नलिका बीजांडद्वार से बीजांड में प्रवेश करती है और फिर तंतुरूप समुच्चय की मदद से सहायक कोशिकाओं में प्रवेश करती है।
- यदि परागकण दो-कोशिकीय अवस्था में झड़ता है, तो जनन कोशिका पराग नलिका में विभाजित होकर दो नर युग्मक बनाती है।
V. दोहरा निषेचन (Double Fertilisation)
पराग नलिका सहायक कोशिका में प्रवेश करने के बाद, दो नर युग्मकों को मुक्त करती है।
- युग्मक संलयन (Syngamy): एक नर युग्मक अंड कोशिका के साथ संलयित होकर द्विगुणित युग्मनज (zygote) बनाता है।
- त्रिसंलयन (Triple fusion): दूसरा नर युग्मक केंद्रीय कोशिका में स्थित द्विगुणित द्वितीयक केंद्रक (secondary nucleus) के साथ संलयित होकर त्रिगुणित प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक (Primary Endosperm Nucleus - PEN) बनाता है।
- चूँकि भ्रूणकोष में दो प्रकार के संलयन (युग्मक संलयन और त्रिसंलयन) होते हैं, इसलिए इस घटना को दोहरा निषेचन (Double Fertilisation) कहते हैं। यह पुष्पी पादपों का एक अनूठा लक्षण है।
- इसकी खोज एस.जी. नवास्चिन (S.G. Nawaschin) ने की थी।
- महत्व: यह भ्रूणपोष और भ्रूण दोनों के विकास को सुनिश्चित करता है, जिससे विकासशील भ्रूण को पोषण मिलता है।
VI. निषेचन पश्च घटनाएँ: संरचनाएँ एवं घटनाएँ
दोहरे निषेचन के बाद होने वाली घटनाओं को निषेचन पश्च घटनाएँ कहते हैं। इनमें भ्रूणपोष, भ्रूण, बीज और फल का विकास शामिल है।
A. भ्रूणपोष का विकास (Development of Endosperm):
- प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक (PEN) लगातार विभाजित होकर भ्रूणपोष (endosperm) बनाता है।
- भ्रूणपोष कोशिकाएँ आरक्षित खाद्य पदार्थों से भरी होती हैं और विकासशील भ्रूण को पोषण प्रदान करती हैं।
- प्रकार:
- केंद्रकीय भ्रूणपोष (Nuclear endosperm): PEN के लगातार मुक्त केंद्रकीय विभाजन होते हैं, जिससे एक केंद्रीय रिक्तिका के आसपास कई केंद्रक बनते हैं (जैसे नारियल का पानी)।
- कोशिकीय भ्रूणपोष (Cellular endosperm): प्रत्येक केंद्रकीय विभाजन के बाद कोशिका भित्ति का निर्माण होता है (जैसे नारियल का सफेद गिरी)।
- हीलोबियल भ्रूणपोष (Helobial endosperm): केंद्रकीय और कोशिकीय दोनों प्रकार का मिश्रण।
- कुछ बीजों में (जैसे मटर, सेम, मूंगफली) भ्रूणपोष पूरी तरह से विकासशील भ्रूण द्वारा उपयोग कर लिया जाता है, और बीज अभ्रूणपोषी (non-albuminous) होते हैं।
- कुछ बीजों में (जैसे अरंड, मक्का, गेहूं, नारियल) भ्रूणपोष बचा रहता है, और बीज भ्रूणपोषी (albuminous) होते हैं।
B. भ्रूण का विकास (Embryo Development):
- युग्मनज (zygote) बीजांडद्वार सिरे पर विकसित होता है।
- युग्मनज से भ्रूण के विकास की प्रक्रिया को भ्रूणोद्भव (embryogeny) कहते हैं।
- युग्मनज पहले एक प्राक्भ्रूण (proembryo) बनाता है, फिर गोलाकार (globular), हृदयाकार (heart-shaped) और अंत में एक परिपक्व भ्रूण (mature embryo) में विकसित होता है।
- द्विबीजपत्री भ्रूण (Dicot embryo):
- इसमें एक भ्रूणीय अक्ष (embryonal axis) और दो बीजपत्र (cotyledons) होते हैं।
- बीजपत्रों के ऊपर का भाग बीजांडोपरिक (epicotyl) कहलाता है, जो प्रांकुर (plumule) (भविष्य का प्ररोह) में समाप्त होता है।
- बीजपत्रों के नीचे का भाग बीजांडाधोवृंत (hypocotyl) कहलाता है, जो मूलांकुर (radicle) (भविष्य की जड़) में समाप्त होता है। मूलांकुर एक मूलगोप (root cap) से ढका होता है।
- एकबीजपत्री भ्रूण (Monocot embryo):
- इसमें केवल एक बीजपत्र होता है, जिसे स्कुटेलम (scutellum) कहते हैं, जो भ्रूणीय अक्ष के एक तरफ स्थित होता है।
- भ्रूणीय अक्ष में एक प्रांकुर (plumule) और एक मूलांकुर (radicle) होता है।
- प्रांकुर एक खोखली पत्तीदार संरचना प्रांकुरचोल (coleoptile) से ढका होता है।
- मूलांकुर एक अविभेदित आवरण मूलांकुरचोल (coleorhiza) से ढका होता है।
C. बीज का विकास (Development of Seed):
- निषेचन के बाद, बीजांड एक बीज (seed) में विकसित होता है।
- अध्यावरण बीज आवरण (seed coat) में कठोर हो जाते हैं।
- बीजांडद्वार बीज में एक छोटे छिद्र के रूप में बना रहता है, जो जल अवशोषण और ऑक्सीजन के प्रवेश में मदद करता है।
- बीज के अंदर भ्रूण होता है।
- बीज के परिपक्व होने पर, उसमें जल की मात्रा कम हो जाती है (10-15% नमी)।
- भ्रूण की उपापचयी क्रिया धीमी हो जाती है, और भ्रूण निष्क्रियता की अवस्था में चला जाता है, जिसे प्रसुप्ति (dormancy) कहते हैं।
- अनुकूल परिस्थितियों में (पर्याप्त नमी, ऑक्सीजन, उपयुक्त तापमान), बीज अंकुरित होता है।
D. फल का विकास (Development of Fruit):
- निषेचन के बाद, अंडाशय एक फल (fruit) में विकसित होता है।
- अंडाशय की भित्ति फलभित्ति (pericarp) में विकसित होती है।
- सत्य फल (True fruits): जो फल केवल अंडाशय से विकसित होते हैं (जैसे आम, टमाटर)।
- असत्य फल (False fruits): जिनमें अंडाशय के अलावा पुष्प के अन्य भाग (जैसे पुष्पासन) भी फल के निर्माण में भाग लेते हैं (जैसे सेब, स्ट्रॉबेरी, काजू)।
- अनिषेकफलनी (Parthenocarpy): बिना निषेचन के फल का विकास (जैसे केला)। ऐसे फल बीज रहित होते हैं। इसे हार्मोन के प्रयोग से प्रेरित किया जा सकता है।
VII. असंगजनन एवं बहुभ्रूणता
A. असंगजनन (Apomixis):
- यह लैंगिक प्रजनन की एक विधि है जो बिना निषेचन के बीज का निर्माण करती है।
- यह अलैंगिक प्रजनन का एक प्रकार है जो लैंगिक प्रजनन की नकल करता है।
- उदाहरण: एस्टेरेसी कुल और घासों में।
- कारण:
- कुछ प्रजातियों में, अंड कोशिका बिना निषेचन के भ्रूण में विकसित हो जाती है (अनिषेकजनन)।
- कुछ प्रजातियों में, बीजांडकाय की द्विगुणित कोशिकाएँ विभाजित होकर भ्रूणकोष में विकसित हो जाती हैं और बिना निषेचन के भ्रूण बनाती हैं।
- महत्व: संकर बीजों के उत्पादन में महत्वपूर्ण है। यदि संकर बीजों को असंगजनन द्वारा बनाया जाए, तो किसान हर साल नए संकर बीज खरीदने की बजाय अपनी फसल से बीज बचा सकते हैं, क्योंकि असंगजनन से आनुवंशिक रूप से समान संतति उत्पन्न होती है।
B. बहुभ्रूणता (Polyembryony):
- एक बीज में एक से अधिक भ्रूणों की उपस्थिति को बहुभ्रूणता कहते हैं।
- उदाहरण: नींबू, संतरा, आम।
- कारण:
- एक से अधिक अंड कोशिकाओं का निषेचन।
- बीजांडकाय की कोशिकाओं का भ्रूणकोष में विकसित होना।
- सहायक कोशिकाओं या प्रतिध्रुवी कोशिकाओं का भ्रूण में विकसित होना।
- एक ही भ्रूणकोष में एक से अधिक भ्रूणों का बनना।
बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions - MCQs)
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परागकण की बाह्यचोल किस पदार्थ से बनी होती है?
a) सेलुलोज
b) पेक्टिन
c) स्पोरोपोलेनिन
d) लिग्निन -
एक प्रारूपिक परिपक्व भ्रूणकोष होता है:
a) 8-कोशिकीय, 7-केंद्रकीय
b) 7-कोशिकीय, 8-केंद्रकीय
c) 6-कोशिकीय, 6-केंद्रकीय
d) 7-कोशिकीय, 7-केंद्रकीय -
पुष्पी पादपों में दोहरा निषेचन की खोज किसने की थी?
a) रॉबर्ट ब्राउन
b) श्लेडेन और श्वान
c) नवास्चिन
d) मेंडल -
पराग नलिका को भ्रूणकोष में प्रवेश करने के लिए निर्देशित करने वाली संरचना है:
a) प्रतिध्रुवी कोशिकाएँ
b) केंद्रीय कोशिका
c) तंतुरूप समुच्चय
d) अंड कोशिका -
बिना निषेचन के फल के विकास को क्या कहते हैं?
a) अनिषेकजनन
b) असंगजनन
c) अनिषेकफलनी
d) बहुभ्रूणता -
निम्न में से कौन सा बीज अभ्रूणपोषी (non-albuminous) है?
a) मक्का
b) अरंड
c) गेहूं
d) मटर -
यदि परागकोष और वर्तिकाग्र विभिन्न समय पर परिपक्व होते हैं, तो इस स्थिति को क्या कहते हैं?
a) स्व-असंगतता
b) एकलिंगी पुष्प
c) डिकोगैमी (Dichogamy)
d) हर्कोगैमी (Herkogamy) -
निम्न में से कौन जल-परागित पादप का उदाहरण है?
a) जलकुंभी
b) जल लिली
c) वैलिसनेरिया
d) सूरजमुखी -
एक बीज में एक से अधिक भ्रूणों की उपस्थिति को क्या कहते हैं?
a) असंगजनन
b) बहुभ्रूणता
c) अनिषेकजनन
d) अनिषेकफलनी -
परागकणों की जीवनक्षमता को द्रव नाइट्रोजन में किस तापमान पर संग्रहीत किया जा सकता है?
a) -100°C
b) -196°C
c) 0°C
d) 4°C
उत्तर कुंजी:
- c) स्पोरोपोलेनिन
- b) 7-कोशिकीय, 8-केंद्रकीय
- c) नवास्चिन
- c) तंतुरूप समुच्चय
- c) अनिषेकफलनी
- d) मटर
- c) डिकोगैमी (Dichogamy)
- c) वैलिसनेरिया
- b) बहुभ्रूणता
- b) -196°C
मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपको इस अध्याय को समझने और सरकारी परीक्षाओं की तैयारी करने में सहायक होंगे। अपनी पढ़ाई जारी रखें और किसी भी संदेह के लिए पूछने में संकोच न करें।