Class 12 Biology Notes Chapter 3 (मानव जनन) – Jeev Vigyan Book

Jeev Vigyan
प्रिय विद्यार्थियों,

आज हम कक्षा 12 जीव विज्ञान के अध्याय 3 'मानव जनन' का विस्तृत अध्ययन करेंगे, जो आपकी सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस अध्याय में मानव जनन तंत्र की संरचना, युग्मक निर्माण की प्रक्रिया, हार्मोनल नियंत्रण, गर्भावस्था और प्रसव जैसी जटिल प्रक्रियाओं को विस्तार से समझाया गया है।


अध्याय 3: मानव जनन (Human Reproduction) - विस्तृत नोट्स

मानव लैंगिक रूप से जनन करने वाला और सजीवप्रजक (viviparous) प्राणी है। जनन घटनाओं में युग्मकजनन (gametogenesis), वीर्यसेचन (insemination), निषेचन (fertilisation), युग्मनज (zygote) का निर्माण, अंतरोपण (implantation), गर्भाधान (gestation) और प्रसव (parturition) शामिल हैं।

1. नर जनन तंत्र (Male Reproductive System)

यह श्रोणि क्षेत्र में स्थित होता है। इसमें निम्नलिखित भाग होते हैं:

  • प्राथमिक लैंगिक अंग:

    • वृषण (Testes):
      • संख्या में दो, उदर गुहा के बाहर वृषण कोष (scrotum) में स्थित होते हैं। वृषण कोष का तापमान शरीर के तापमान से 2-2.5°C कम होता है, जो शुक्राणुजनन (spermatogenesis) के लिए आवश्यक है।
      • प्रत्येक वृषण लगभग 4-5 सेमी लंबा, 2-3 सेमी चौड़ा और 2.5 सेमी मोटा होता है।
      • प्रत्येक वृषण में लगभग 250 वृषण पालिकाएँ (testicular lobules) होती हैं।
      • प्रत्येक पालिका में 1-3 अति कुंडलित शुक्रजनक नलिकाएँ (seminiferous tubules) होती हैं, जहाँ शुक्राणु उत्पन्न होते हैं।
      • शुक्रजनक नलिकाओं के अंदर दो प्रकार की कोशिकाएँ होती हैं:
        • नर जनन कोशिकाएँ/शुक्रप्रसू (Male germ cells/spermatogonia): ये अर्धसूत्री विभाजन द्वारा शुक्राणु बनाती हैं।
        • सर्टोली कोशिकाएँ (Sertoli cells): ये विकासशील शुक्राणुओं को पोषण प्रदान करती हैं।
      • शुक्रजनक नलिकाओं के बाहर अंतराली अवकाश (interstitial spaces) होता है, जिसमें लेडिग कोशिकाएँ (Leydig cells) या अंतराली कोशिकाएँ (interstitial cells) होती हैं। ये पुंजन (androgens) नामक वृषण हार्मोन का संश्लेषण व स्राव करती हैं।
  • सहायक नलिकाएँ (Accessory Ducts):

    • वृषण जालिका (Rete testis): शुक्रजनक नलिकाएँ इसमें खुलती हैं।
    • शुक्रवाहिकाएँ (Vasa efferentia): वृषण जालिका से निकलकर अधिवृषण में खुलती हैं।
    • अधिवृषण (Epididymis): वृषण के पश्च सतह पर स्थित एक कुंडलित संरचना, जहाँ शुक्राणु अस्थायी रूप से संगृहीत होते हैं और परिपक्व होते हैं।
    • शुक्रवाहक (Vas deferens): अधिवृषण से निकलकर उदर की ओर ऊपर चढ़ता है और मूत्राशय के ऊपर एक लूप बनाता है। यह शुक्राशय (seminal vesicle) से आने वाली एक वाहिनी के साथ मिलकर स्खलन वाहिनी (ejaculatory duct) बनाता है।
    • स्खलन वाहिनी मूत्रमार्ग में खुलती है।
  • सहायक ग्रंथियाँ (Accessory Glands):

    • शुक्राशय (Seminal vesicles): एक जोड़ी ग्रंथियाँ, जो शुक्राशय द्रव (seminal plasma) का स्राव करती हैं। इसमें फ्रक्टोज, कैल्शियम और कुछ एंजाइम होते हैं। यह शुक्राणुओं को पोषण और गतिशीलता प्रदान करता है।
    • प्रोस्टेट ग्रंथि (Prostate gland): एक एकल ग्रंथि, जो एक तरल पदार्थ का स्राव करती है जिसमें सिट्रिक एसिड, फॉस्फेट और कुछ एंजाइम होते हैं। यह शुक्राणुओं को सक्रिय करता है।
    • बल्बोयूरेथ्रल ग्रंथियाँ/काउपर ग्रंथियाँ (Bulbourethral glands/Cowper's glands): एक जोड़ी ग्रंथियाँ, जो एक श्लेष्म (mucus) का स्राव करती हैं। यह शिश्न के स्नेहन में मदद करता है।
    • इन ग्रंथियों के स्राव को शुक्राणु प्लाज्मा (seminal plasma) कहते हैं। शुक्राणु और शुक्राणु प्लाज्मा मिलकर वीर्य (semen) बनाते हैं।
  • बाह्य जननांग (External Genitalia):

    • शिश्न (Penis): यह मैथुन अंग है। यह विशेष ऊतकों से बना होता है जो रक्त भरने पर शिश्न के उत्थान में मदद करते हैं। शिश्न का बढ़ा हुआ अंतिम सिरा शिश्न मुंड (glans penis) कहलाता है, जो एक ढीली त्वचा अग्रत्वचा (foreskin) से ढका होता है।

2. मादा जनन तंत्र (Female Reproductive System)

यह भी श्रोणि क्षेत्र में स्थित होता है। इसमें निम्नलिखित भाग होते हैं:

  • प्राथमिक लैंगिक अंग:

    • अंडाशय (Ovaries):
      • संख्या में दो, उदर के निचले हिस्से में गर्भाशय के दोनों ओर एक-एक स्थित होते हैं।
      • प्रत्येक अंडाशय लगभग 2-4 सेमी लंबा होता है।
      • ये अंडाणु (ovum) उत्पन्न करते हैं और कई स्टेरॉयड हार्मोन (एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन) का स्राव करते हैं।
      • प्रत्येक अंडाशय एक पतली उपकला से ढका होता है जो अंडाशयी स्ट्रोमा (ovarian stroma) को घेरे रहती है। स्ट्रोमा दो क्षेत्रों में बंटा होता है: परिधीय कॉर्टेक्स (peripheral cortex) और आंतरिक मेडुला (inner medulla)।
  • सहायक नलिकाएँ (Accessory Ducts):

    • अंडवाहिनी/फैलोपियन नलिकाएँ (Oviducts/Fallopian tubes):
      • संख्या में दो, प्रत्येक अंडाशय से गर्भाशय तक फैली होती हैं।
      • प्रत्येक अंडवाहिनी के तीन भाग होते हैं:
        • कीपक (Infundibulum): अंडाशय के करीब कीप के आकार का भाग, जिसके किनारों पर अंगुलीनुमा प्रवर्ध झालर (fimbriae) होते हैं, जो अंडोत्सर्ग के बाद अंडाणु को इकट्ठा करने में मदद करते हैं।
        • तुंबिका (Ampulla): कीपक के बाद का चौड़ा भाग, जहाँ निषेचन होता है।
        • संकीर्णपथ (Isthmus): अंडवाहिनी का अंतिम संकरा भाग जो गर्भाशय से जुड़ता है।
    • गर्भाशय (Uterus):
      • एक एकल, खोखला, नाशपाती के आकार का अंग, जिसे बच्चेदानी (womb) भी कहते हैं।
      • यह योनि के माध्यम से गर्भाशय ग्रीवा (cervix) में खुलता है। गर्भाशय ग्रीवा की गुहा को ग्रीवा नाल (cervical canal) कहते हैं।
      • गर्भाशय की दीवार की तीन परतें होती हैं:
        • परिगर्भाशय (Perimetrium): बाहरी पतली झिल्ली।
        • गर्भाशय पेशीस्तर (Myometrium): मध्य की मोटी चिकनी पेशी परत, जो प्रसव के दौरान तीव्र संकुचन करती है।
        • अंतर्गर्भाशय स्तर (Endometrium): आंतरिक ग्रंथिल परत, जो आर्तव चक्र के दौरान चक्रीय परिवर्तनों से गुजरती है और भ्रूण के अंतरोपण के लिए तैयार होती है।
    • योनि (Vagina):
      • गर्भाशय ग्रीवा से लेकर शरीर के बाहर तक फैली एक पेशीय नली। यह मैथुन के दौरान शुक्राणुओं को प्राप्त करती है और प्रसव के दौरान शिशु के लिए जन्म नाल (birth canal) का निर्माण करती है।
  • बाह्य जननांग (External Genitalia) - भग (Vulva):

    • जघन शैल (Mons pubis): वसीय ऊतकों का एक गद्देदार भाग जो त्वचा और जघन बालों से ढका होता है।
    • वृहत् भगोष्ठ (Labia majora): जघन शैल से नीचे तक फैले ऊतक के बड़े, मांसल वलय, जो योनि द्वार को घेरे रहते हैं।
    • लघु भगोष्ठ (Labia minora): वृहत् भगोष्ठ के नीचे स्थित ऊतक के जोड़े।
    • भगशेफ (Clitoris): लघु भगोष्ठ के ऊपरी जंक्शन पर स्थित एक छोटी, अंगुली जैसी संरचना, जो नर शिश्न के समजात होती है।
    • योनिच्छद (Hymen): योनि के द्वार पर अक्सर एक पतली झिल्ली होती है जिसे योनिच्छद कहते हैं। यह अक्सर पहले मैथुन के दौरान फट जाती है, लेकिन यह अचानक गिरने, खेलकूद आदि से भी फट सकती है।
  • स्तन ग्रंथियाँ (Mammary Glands):

    • सभी मादा स्तनधारियों की एक विशेषता। ये युग्मित संरचनाएँ होती हैं जिनमें ग्रंथिल ऊतक (glandular tissue) और वसा (fat) होती है।
    • प्रत्येक स्तन में 15-20 स्तन पालि (mammary lobes) होते हैं जिनमें कोशिकाओं के गुच्छे कूपिकाएँ (alveoli) होते हैं।
    • कूपिकाओं की कोशिकाएँ दूध का स्राव करती हैं, जो कूपिकाओं की गुहाओं में संगृहीत होता है।
    • कूपिकाएँ स्तन नलिकाओं (mammary tubules) में खुलती हैं, जो मिलकर स्तन वाहिनी (mammary duct) बनाती हैं।
    • कई स्तन वाहिनियाँ मिलकर एक चौड़ी स्तन तुंबिका (mammary ampulla) बनाती हैं, जो दुग्ध वाहिनी (lactiferous duct) से जुड़ी होती है जिससे दूध बाहर निकलता है।

3. युग्मक जनन (Gametogenesis)

यह प्राथमिक लैंगिक अंगों (वृषण और अंडाशय) में युग्मक (gametes) बनने की प्रक्रिया है।

  • शुक्रजनन (Spermatogenesis): वृषण में शुक्राणुओं के निर्माण की प्रक्रिया।

    • यह यौवनारंभ (puberty) में शुरू होती है।
    • शुक्रजनक नलिकाओं में मौजूद शुक्रप्रसू (spermatogonia) समसूत्री विभाजन द्वारा संख्या में बढ़ते हैं।
    • कुछ शुक्रप्रसू प्राथमिक शुक्रकोशिकाएँ (primary spermatocytes) बन जाते हैं।
    • प्रत्येक प्राथमिक शुक्रकोशिका (2n) में पहला अर्धसूत्री विभाजन होता है, जिससे दो समान द्वितीयक शुक्रकोशिकाएँ (secondary spermatocytes) (n) बनती हैं।
    • प्रत्येक द्वितीयक शुक्रकोशिका में दूसरा अर्धसूत्री विभाजन होता है, जिससे दो शुक्राणुप्रसू (spermatids) (n) बनते हैं।
    • इस प्रकार, एक प्राथमिक शुक्रकोशिका से चार शुक्राणुप्रसू बनते हैं।
    • शुक्राणुप्रसू शुक्राणुजनन (spermiogenesis) नामक प्रक्रिया द्वारा शुक्राणुओं (spermatozoa) में रूपांतरित होते हैं।
    • शुक्राणुजनन के बाद, शुक्राणुओं के सिर सर्टोली कोशिकाओं में अंतःस्थापित हो जाते हैं और अंततः नलिकाओं से मुक्त हो जाते हैं, जिसे शुक्रणमोचन (spermiation) कहते हैं।
    • शुक्राणु की संरचना:
      • एक प्लाज्मा झिल्ली से घिरा होता है।
      • इसमें सिर, ग्रीवा, मध्य खंड और पूँछ होती है।
      • सिर: इसमें एक अगुणित केंद्रक होता है। इसके अग्र भाग पर एक टोपी जैसी संरचना एक्रोसोम (acrosome) होती है, जिसमें निषेचन में मदद करने वाले एंजाइम होते हैं।
      • मध्य खंड: इसमें कई माइटोकॉन्ड्रिया होते हैं जो पूँछ की गति के लिए ऊर्जा प्रदान करते हैं।
      • पूँछ: शुक्राणु को गतिशीलता प्रदान करती है।
  • शुक्रजनन का हार्मोनल नियंत्रण:

    • हाइपोथैलेमस गोनैडोट्रोपिन-मोचक हार्मोन (GnRH) स्रावित करता है।
    • GnRH अग्र पीयूष ग्रंथि को LH (ल्यूटिनाइजिंग हार्मोन) और FSH (पुटकोद्दीपिक हार्मोन) स्रावित करने के लिए उत्तेजित करता है।
    • LH: लेडिग कोशिकाओं पर कार्य करके पुंजन (टेस्टोस्टेरोन) के संश्लेषण और स्राव को उत्तेजित करता है। पुंजन शुक्राणुजनन को उत्तेजित करता है।
    • FSH: सर्टोली कोशिकाओं पर कार्य करता है और शुक्राणुजनन को उत्तेजित करने वाले कुछ कारकों के स्राव को प्रेरित करता है।
  • अंडजनन (Oogenesis): अंडाशय में अंडाणु (ovum) के निर्माण की प्रक्रिया।

    • यह भ्रूणीय विकास के दौरान शुरू होती है।
    • भ्रूण के अंडाशय में लाखों अंडजननी (oogonia) कोशिकाएँ बनती हैं।
    • अंडजननी समसूत्री विभाजन द्वारा विभाजित होकर प्राथमिक अंडक (primary oocytes) बनाती हैं।
    • ये प्राथमिक अंडक अर्धसूत्री विभाजन I में प्रवेश करते हैं लेकिन प्रोफेज I में अस्थायी रूप से रुक जाते हैं।
    • प्रत्येक प्राथमिक अंडक बाद में कणिकामय कोशिकाओं (granulosa cells) की एक परत से घिर जाता है और इसे प्राथमिक पुटक (primary follicle) कहते हैं।
    • जन्म से यौवनारंभ तक, बड़ी संख्या में प्राथमिक पुटक नष्ट हो जाते हैं।
    • यौवनारंभ में, केवल 60,000-80,000 प्राथमिक पुटक प्रत्येक अंडाशय में शेष रहते हैं।
    • प्राथमिक पुटक कणिकामय कोशिकाओं की अधिक परतों और एक नए थीका (theca) से घिर जाते हैं और द्वितीयक पुटक (secondary follicle) कहलाते हैं।
    • द्वितीयक पुटक जल्द ही तृतीयक पुटक (tertiary follicle) में बदल जाता है, जिसमें एक द्रव से भरी गुहा एंट्रम (antrum) होती है। थीका आंतरिक थीका इंटर्ना (theca interna) और बाहरी थीका एक्सटर्ना (theca externa) में संगठित हो जाती है।
    • इस चरण में, प्राथमिक अंडक आकार में बढ़ता है और अर्धसूत्री विभाजन I को पूरा करता है, जिसके परिणामस्वरूप एक बड़ा द्वितीयक अंडक (secondary oocyte) (n) और एक छोटा प्रथम ध्रुवीय पिंड (first polar body) (n) बनता है।
    • द्वितीयक अंडक अर्धसूत्री विभाजन II में प्रवेश करता है लेकिन मेटाफेज II में रुक जाता है।
    • तृतीयक पुटक परिपक्व होकर ग्राफी पुटक (Graafian follicle) बनाता है।
    • ग्राफी पुटक फटकर द्वितीयक अंडक (अंडाणु) को अंडाशय से मुक्त करता है, जिसे अंडोत्सर्ग (ovulation) कहते हैं।
    • अंडोत्सर्ग के बाद, द्वितीयक अंडक का अर्धसूत्री विभाजन II तभी पूरा होता है जब शुक्राणु द्वारा उसका निषेचन होता है। इससे एक बड़ा अंडाणु (ovum) और एक छोटा द्वितीय ध्रुवीय पिंड (second polar body) बनता है।

4. आर्तव चक्र (Menstrual Cycle)

यह मादा प्राइमेट्स (बंदर, वानर और मनुष्य) में होने वाले चक्रीय परिवर्तन हैं।

  • यह यौवनारंभ (लगभग 11-13 वर्ष की आयु) में शुरू होता है और इसे रजोदर्शन (menarche) कहते हैं।
  • यह लगभग 28-29 दिनों का होता है।
  • यह 45-50 वर्ष की आयु में बंद हो जाता है, जिसे रजोनिवृत्ति (menopause) कहते हैं।
  • आर्तव चक्र की घटनाएँ:
    • आर्तव प्रावस्था (Menstrual phase):
      • लगभग 3-5 दिनों तक चलती है।
      • गर्भाशय का अंतर्गर्भाशय स्तर टूट जाता है, जिससे रक्त, ऊतक और श्लेष्म का स्राव होता है।
      • यह तब होता है जब निषेचन नहीं होता है और प्रोजेस्टेरोन का स्तर कम हो जाता है।
    • पुटकीय/प्रचुरोद्भवन प्रावस्था (Follicular/Proliferative phase):
      • आर्तव के बाद (लगभग 5-13 दिन)।
      • प्राथमिक पुटक अंडाशय में पूर्ण परिपक्व ग्राफी पुटक में विकसित होते हैं।
      • गर्भाशय का अंतर्गर्भाशय स्तर हार्मोन (एस्ट्रोजन) के प्रभाव में पुनर्निर्मित होता है।
      • पीयूष ग्रंथि से FSH और LH का स्राव बढ़ता है। FSH पुटक विकास को उत्तेजित करता है और पुटक कोशिकाओं द्वारा एस्ट्रोजन के स्राव को प्रेरित करता है।
    • अंडोत्सर्ग प्रावस्था (Ovulatory phase):
      • चक्र के मध्य में (लगभग 14वें दिन)।
      • LH का स्तर तेजी से बढ़ता है (LH सर्ज), जिससे ग्राफी पुटक फट जाता है और अंडाणु मुक्त हो जाता है।
    • पीतपिंड/स्रावी प्रावस्था (Luteal/Secretory phase):
      • अंडोत्सर्ग के बाद (लगभग 15-28 दिन)।
      • फटा हुआ ग्राफी पुटक पीतपिंड (corpus luteum) में बदल जाता है।
      • पीतपिंड बड़ी मात्रा में प्रोजेस्टेरोन का स्राव करता है, जो अंतर्गर्भाशय स्तर को बनाए रखने और गर्भावस्था के लिए तैयार करने के लिए आवश्यक है।
      • यदि निषेचन नहीं होता है, तो पीतपिंड का क्षरण होता है, प्रोजेस्टेरोन का स्तर गिरता है, और अंतर्गर्भाशय स्तर टूट जाता है, जिससे अगला आर्तव चक्र शुरू होता है।
      • यदि निषेचन होता है, तो पीतपिंड गर्भावस्था के दौरान बना रहता है और प्रोजेस्टेरोन का स्राव करता रहता है।

5. निषेचन और अंतरोपण (Fertilisation and Implantation)

  • निषेचन (Fertilisation):

    • यह अंडवाहिनी के तुंबिका-संकीर्णपथ संधि (ampullary-isthmic junction) पर होता है।
    • मैथुन के दौरान, शिश्न द्वारा वीर्य योनि में मुक्त किया जाता है (वीर्यसेचन)।
    • शुक्राणु गर्भाशय ग्रीवा से होते हुए गर्भाशय में प्रवेश करते हैं और अंडवाहिनी के तुंबिका क्षेत्र तक पहुँचते हैं।
    • अंडाणु भी अंडाशय से अंडोत्सर्ग के बाद तुंबिका क्षेत्र में पहुँचता है।
    • शुक्राणु अंडाणु के जोना पेलुसिडा (zona pellucida) परत के संपर्क में आता है और झिल्ली में परिवर्तन प्रेरित करता है जो अन्य शुक्राणुओं के प्रवेश को रोकता है।
    • एक्रोसोम के स्राव शुक्राणु को अंडाणु के कोशिकाद्रव्य में प्रवेश करने में मदद करते हैं।
    • यह द्वितीयक अंडक में अर्धसूत्री विभाजन II को पूरा करने के लिए प्रेरित करता है, जिससे एक अंडाणु (ovum) और द्वितीय ध्रुवीय पिंड बनता है।
    • शुक्राणु और अंडाणु के अगुणित केंद्रक संलयित होकर एक द्विगुणित युग्मनज (zygote) बनाते हैं।
  • अंतरोपण (Implantation):

    • युग्मनज अंडवाहिनी से गर्भाशय की ओर बढ़ते हुए समसूत्री विभाजन (विदलन/cleavage) से गुजरता है।
    • कोशिकाएँ विभाजित होकर 2, 4, 8, 16 बेटी कोशिकाएँ बनाती हैं जिन्हें कोरकखंड (blastomeres) कहते हैं।
    • 8-16 कोरकखंड वाले भ्रूण को तूतक (morula) कहते हैं।
    • तूतक आगे विभाजित होकर कोरकपुटी (blastocyst) में बदल जाता है।
    • कोरकपुटी में एक बाहरी परत पोषणकोरक (trophoblast) और एक आंतरिक कोशिका समूह अंतर्कोशिकीय समूह (inner cell mass) होता है।
    • पोषणकोरक कोशिकाएँ गर्भाशय के अंतर्गर्भाशय स्तर से जुड़ जाती हैं।
    • अंतर्कोशिकीय समूह भ्रूण के रूप में विकसित होता है।
    • कोरकपुटी का गर्भाशय भित्ति से जुड़ना अंतरोपण कहलाता है, और इसके बाद गर्भावस्था शुरू होती है।

6. गर्भावस्था और भ्रूणीय परिवर्धन (Pregnancy and Embryonic Development)

  • अंतरोपण के बाद, पोषणकोरक कोशिकाएँ अंगुलीनुमा प्रवर्ध बनाती हैं जिन्हें कोरियोनिक अंकुरक (chorionic villi) कहते हैं।
  • कोरियोनिक अंकुरक और गर्भाशय ऊतक एक साथ मिलकर अपरा (placenta) बनाते हैं।
  • अपरा (Placenta):
    • भ्रूण और मातृ शरीर के बीच एक संरचनात्मक और कार्यात्मक इकाई।
    • कार्य:
      • भ्रूण को ऑक्सीजन और पोषक तत्वों की आपूर्ति।
      • भ्रूण द्वारा उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड और उत्सर्जी पदार्थों को हटाना।
      • हार्मोन का स्राव: मानव कोरियोनिक गोनैडोट्रोपिन (hCG), मानव अपरा लैक्टोजन (hPL), एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरोन। गर्भावस्था के बाद के चरण में, अंडाशय द्वारा रिलैक्सिन (relaxin) भी स्रावित होता है।
    • hCG, hPL और रिलैक्सिन केवल गर्भावस्था के दौरान उत्पन्न होते हैं।
  • भ्रूणीय विकास:
    • अंतर्कोशिकीय समूह तीन प्राथमिक जनन परतों (एक्टोडर्म, एंडोडर्म, मेसोडर्म) में विभेदित होता है, जिनसे सभी ऊतक और अंग बनते हैं।
    • गर्भावस्था की अवधि लगभग 9 महीने होती है।
    • पहला महीना: भ्रूण का हृदय बनता है।
    • दूसरा महीना: हाथ-पैर और अंगुलियाँ विकसित होती हैं।
    • तीसरा महीना (पहली तिमाही के अंत तक): अधिकांश प्रमुख अंग प्रणालियाँ बन जाती हैं (जैसे हाथ-पैर, बाह्य जननांग)।
    • पाँचवाँ महीना: भ्रूण की पहली गति और सिर पर बाल दिखाई देते हैं।
    • छठा महीना (दूसरी तिमाही के अंत तक): शरीर पर महीन बाल, पलकें अलग, पलकें बनती हैं।
    • नौवाँ महीना: भ्रूण पूरी तरह से विकसित हो जाता है और प्रसव के लिए तैयार होता है।

7. प्रसव और दुग्धस्रवण (Parturition and Lactation)

  • प्रसव (Parturition):

    • गर्भावस्था के अंत में गर्भाशय के तीव्र संकुचन से शिशु का निष्कासन।
    • यह एक जटिल तंत्रिका-अंतःस्रावी क्रियाविधि द्वारा प्रेरित होता है।
    • पूरी तरह से विकसित भ्रूण और अपरा से उत्पन्न हल्के संकुचन भ्रूण निष्कासन प्रतिवर्त (fetal ejection reflex) को प्रेरित करते हैं।
    • यह मातृ पीयूष ग्रंथि से ऑक्सीटोसिन (oxytocin) के स्राव को उत्तेजित करता है।
    • ऑक्सीटोसिन गर्भाशय की चिकनी पेशियों पर कार्य करके अधिक तीव्र संकुचन का कारण बनता है।
    • ये संकुचन शिशु को गर्भाशय से बाहर निकालते हैं।
  • दुग्धस्रवण (Lactation):

    • गर्भावस्था के अंत में स्तन ग्रंथियों द्वारा दूध का उत्पादन।
    • यह प्रोलैक्टिन हार्मोन द्वारा नियंत्रित होता है।
    • प्रारंभिक दूध को पीयूष/खीस (colostrum) कहते हैं, जिसमें कई एंटीबॉडी (IgA) होते हैं जो नवजात शिशु को प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करते हैं।
    • शिशु को स्तनपान कराना स्वस्थ शिशु के विकास के लिए महत्वपूर्ण है।

10 बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

1. वृषण कोष का तापमान शरीर के तापमान से कितना कम होता है?
a) 1-1.5°C
b) 2-2.5°C
c) 3-3.5°C
d) 4-4.5°C

2. शुक्राणुजनन में विकासशील शुक्राणुओं को पोषण प्रदान करने वाली कोशिकाएँ कौन सी हैं?
a) लेडिग कोशिकाएँ
b) शुक्रप्रसू
c) सर्टोली कोशिकाएँ
d) जनन कोशिकाएँ

3. मादा में निषेचन कहाँ होता है?
a) गर्भाशय
b) अंडाशय
c) योनि
d) अंडवाहिनी की तुंबिका-संकीर्णपथ संधि

4. मानव शुक्राणु के सिर पर टोपी जैसी संरचना जो निषेचन में मदद करती है, क्या कहलाती है?
a) केंद्रक
b) एक्रोसोम
c) माइटोकॉन्ड्रिया
d) ग्रीवा

5. आर्तव चक्र में LH सर्ज किस दिन होता है?
a) 5वें दिन
b) 28वें दिन
c) 14वें दिन
d) 21वें दिन

6. गर्भावस्था के दौरान अपरा द्वारा स्रावित होने वाला हार्मोन कौन सा है जो केवल गर्भावस्था में ही उत्पन्न होता है?
a) एस्ट्रोजन
b) प्रोजेस्टेरोन
c) मानव कोरियोनिक गोनैडोट्रोपिन (hCG)
d) टेस्टोस्टेरोन

7. निम्नलिखित में से कौन सी संरचना नर जनन तंत्र की सहायक ग्रंथि नहीं है?
a) शुक्राशय
b) प्रोस्टेट ग्रंथि
c) बल्बोयूरेथ्रल ग्रंथि
d) अधिवृषण

8. अंतरोपण के बाद, पोषणकोरक कोशिकाएँ अंगुलीनुमा प्रवर्ध बनाती हैं जिन्हें क्या कहते हैं?
a) कोरियोनिक अंकुरक
b) अंतर्कोशिकीय समूह
c) कोरकखंड
d) तूतक

9. प्रसव के लिए कौन सा हार्मोन जिम्मेदार है जो गर्भाशय के तीव्र संकुचन को प्रेरित करता है?
a) प्रोजेस्टेरोन
b) एस्ट्रोजन
c) ऑक्सीटोसिन
d) प्रोलैक्टिन

10. नवजात शिशु को प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करने वाला प्रारंभिक दूध (खीस) में कौन सी एंटीबॉडी प्रचुर मात्रा में होती है?
a) IgE
b) IgG
c) IgA
d) IgM


उत्तर कुंजी:

  1. b)
  2. c)
  3. d)
  4. b)
  5. c)
  6. c)
  7. d)
  8. a)
  9. c)
  10. c)

मुझे आशा है कि यह विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपकी 'मानव जनन' अध्याय की तैयारी में सहायक होंगे। किसी भी अन्य जानकारी के लिए आप पूछ सकते हैं।

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