Class 12 Biology Notes Chapter 6 (वंशागति का आणविक आधार) – Jeev Vigyan Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम जीव विज्ञान के अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय 'वंशागति का आणविक आधार' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय आनुवंशिकी के उन मूलभूत सिद्धांतों को उजागर करता है जो जीवन के सभी रूपों में आनुवंशिक जानकारी के भंडारण, अभिव्यक्ति और संचरण को नियंत्रित करते हैं। सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए यह अध्याय विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, अतः हम प्रत्येक बिंदु को गहराई से समझेंगे।
अध्याय 6: वंशागति का आणविक आधार (Molecular Basis of Inheritance)
यह अध्याय आनुवंशिक पदार्थ की प्रकृति, उसकी संरचना, प्रतिकृति, और जीन अभिव्यक्ति की प्रक्रियाओं (अनुलेखन तथा अनुवादन) पर केंद्रित है। साथ ही, यह जीन नियमन, मानव जीनोम परियोजना और DNA फिंगरप्रिंटिंग जैसे आधुनिक अवधारणाओं को भी समाहित करता है।
1. आनुवंशिक पदार्थ की खोज (Search for Genetic Material)
प्रारंभ में, यह स्पष्ट नहीं था कि प्रोटीन आनुवंशिक पदार्थ है या DNA। कई प्रयोगों ने इस रहस्य को सुलझाने में मदद की।
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फ्रेडरिक ग्रिफिथ का रूपांतरण सिद्धांत (1928):
- ग्रिफिथ ने स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनी बैक्टीरिया पर प्रयोग किए, जिसके दो प्रभेद (strain) होते हैं:
- S-प्रभेद (चिकना): रोगजनक (virulent), निमोनिया उत्पन्न करता है। इसकी कोशिका भित्ति पर पॉलीसैकराइड का आवरण होता है।
- R-प्रभेद (खुरदुरा): अरोगजनक (non-virulent), निमोनिया उत्पन्न नहीं करता।
- प्रयोग:
- R-प्रभेद → चूहे जीवित।
- S-प्रभेद → चूहे मर गए।
- ताप-मृत S-प्रभेद → चूहे जीवित।
- ताप-मृत S-प्रभेद + R-प्रभेद → चूहे मर गए।
- निष्कर्ष: ग्रिफिथ ने निष्कर्ष निकाला कि R-प्रभेद बैक्टीरिया ने ताप-मृत S-प्रभेद से कुछ 'रूपांतरण सिद्धांत' (transforming principle) को अवशोषित किया, जिसने उसे रोगजनक बना दिया। हालांकि, वे इस सिद्धांत की रासायनिक प्रकृति नहीं बता पाए।
- ग्रिफिथ ने स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनी बैक्टीरिया पर प्रयोग किए, जिसके दो प्रभेद (strain) होते हैं:
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एवरी, मैक्लिओड और मैक्कार्टी का बायोकेमिकल लक्षण वर्णन (1933-44):
- इन्होंने ग्रिफिथ के रूपांतरण सिद्धांत की जैव-रासायनिक प्रकृति का पता लगाने के लिए प्रयोग किए।
- इन्होंने ताप-मृत S-प्रभेद से DNA, RNA और प्रोटीन को शुद्ध किया।
- जब DNA को R-प्रभेद में मिलाया गया, तो R-प्रभेद रूपांतरित होकर S-प्रभेद में बदल गया।
- जब DNA को DNAase (DNA को पचाने वाला एंजाइम) से उपचारित किया गया और फिर R-प्रभेद में मिलाया गया, तो रूपांतरण नहीं हुआ।
- निष्कर्ष: उन्होंने सिद्ध किया कि DNA ही वह आनुवंशिक पदार्थ है जो रूपांतरण का कारण बनता है।
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हर्शे और चेज़ का प्रयोग (1952) - DNA ही आनुवंशिक पदार्थ है:
- यह प्रयोग निर्णायक था, जिसने स्पष्ट रूप से स्थापित किया कि DNA ही आनुवंशिक पदार्थ है, प्रोटीन नहीं।
- इन्होंने बैक्टीरियोफेज (एक वायरस जो बैक्टीरिया को संक्रमित करता है) पर प्रयोग किया।
- विधि:
- कुछ वायरसों को रेडियोधर्मी फॉस्फोरस ($^{32}$P) वाले माध्यम में उगाया गया। DNA में फॉस्फोरस होता है, प्रोटीन में नहीं। अतः इन वायरसों का DNA रेडियोधर्मी हो गया।
- अन्य वायरसों को रेडियोधर्मी सल्फर ($^{35}$S) वाले माध्यम में उगाया गया। प्रोटीन में सल्फर होता है, DNA में नहीं। अतः इन वायरसों का प्रोटीन रेडियोधर्मी हो गया।
- इन रेडियोधर्मी वायरसों को ई. कोलाई बैक्टीरिया को संक्रमित करने दिया गया।
- संक्रमण के बाद, ब्लेंडिंग (मिश्रण) और सेंट्रीफ्यूगेशन (अपकेंद्रण) द्वारा वायरल कोट को बैक्टीरिया से अलग किया गया।
- परिणाम:
- जो बैक्टीरिया $^{32}$P-लेबल वाले वायरस से संक्रमित थे, वे रेडियोधर्मी पाए गए। इसका मतलब है कि DNA बैक्टीरिया में प्रवेश कर गया।
- जो बैक्टीरिया $^{35}$S-लेबल वाले वायरस से संक्रमित थे, वे रेडियोधर्मी नहीं पाए गए। रेडियोधर्मिता माध्यम में ही रही। इसका मतलब है कि प्रोटीन बैक्टीरिया में प्रवेश नहीं कर पाया।
- निष्कर्ष: DNA ही वह पदार्थ है जो वायरस से बैक्टीरिया में प्रवेश करता है और आनुवंशिक जानकारी को नियंत्रित करता है। अतः, DNA ही आनुवंशिक पदार्थ है।
2. न्यूक्लिक अम्ल (Nucleic Acids)
न्यूक्लिक अम्ल दो प्रकार के होते हैं: DNA (डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक अम्ल) और RNA (राइबोन्यूक्लिक अम्ल)।
A. DNA (डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक अम्ल)
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संरचना:
- DNA एक पॉली न्यूक्लियोटाइड है, जो न्यूक्लियोटाइड की कई इकाइयों से मिलकर बना होता है।
- प्रत्येक न्यूक्लियोटाइड में तीन घटक होते हैं:
- नाइट्रोजनी क्षार: प्यूरीन (एडेनिन - A, गुआनिन - G) और पिरिमिडीन (साइटोसिन - C, थाइमिन - T)।
- पेंटोज शर्करा: डीऑक्सीराइबोज।
- फॉस्फेट समूह: (PO$_4^{3-}$)।
- न्यूक्लियोसाइड = नाइट्रोजनी क्षार + पेंटोज शर्करा।
- न्यूक्लियोटाइड = नाइट्रोजनी क्षार + पेंटोज शर्करा + फॉस्फेट समूह।
- न्यूक्लियोटाइड 3'-5' फॉस्फोडाइएस्टर बंध द्वारा जुड़कर पॉली न्यूक्लियोटाइड श्रृंखला बनाते हैं।
- वाटसन और क्रिक मॉडल (1953): इन्होंने DNA की द्विकुंडलिनी (double helix) संरचना प्रस्तावित की।
- DNA दो पॉली न्यूक्लियोटाइड श्रृंखलाओं से बना होता है जो एक-दूसरे के प्रति-समांतर (antiparallel) होती हैं (एक 5'→3' दिशा में और दूसरी 3'→5' दिशा में)।
- शर्करा-फॉस्फेट बैकबोन बाहर की ओर होता है, और नाइट्रोजनी क्षार अंदर की ओर होते हैं।
- क्षार युग्मन (Base pairing): A हमेशा T से दो हाइड्रोजन बंधों (A=T) द्वारा जुड़ता है, और G हमेशा C से तीन हाइड्रोजन बंधों (G≡C) द्वारा जुड़ता है।
- कुंडलिनी दक्षिणावर्त (right-handed) होती है।
- प्रत्येक घुमाव (turn) में लगभग 10 क्षार युग्म होते हैं, और एक घुमाव की लंबाई 3.4 nm (34 Å) होती है।
- दो क्षार युग्मों के बीच की दूरी 0.34 nm (3.4 Å) होती है।
- कुंडलिनी का व्यास 2 nm (20 Å) होता है।
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चारगाफ का नियम (Chargaff's Rule):
- एक द्विकुंडलिनी DNA अणु में, एडेनिन (A) की मात्रा थाइमिन (T) की मात्रा के बराबर होती है, और गुआनिन (G) की मात्रा साइटोसिन (C) की मात्रा के बराबर होती है।
- अर्थात, A/T = 1 और G/C = 1।
- साथ ही, (A+G) = (C+T) या (A+G)/(C+T) = 1।
- हालांकि, (A+T)/(G+C) का अनुपात विभिन्न प्रजातियों में भिन्न होता है।
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DNA पैकेजिंग (DNA Packaging):
- मानव कोशिका में DNA की लंबाई लगभग 2.2 मीटर होती है, जिसे एक बहुत छोटे नाभिक (लगभग 10$^{-6}$ मीटर व्यास) में पैक करना होता है।
- प्रोकेरियोट्स में: DNA एक लूप (loop) के रूप में होता है, जिसे न्यूक्लियोइड (nucleoid) कहते हैं। यह कुछ प्रोटीन द्वारा स्थिर होता है।
- यूकेरियोट्स में:
- DNA धनावेशित हिस्टोन प्रोटीन के चारों ओर लिपटा होता है। हिस्टोन प्रोटीन (H2A, H2B, H3, H4) के आठ अणुओं का एक कोर (अष्टक) होता है।
- DNA का एक खंड (लगभग 200 क्षार युग्म) हिस्टोन अष्टक के चारों ओर लिपटकर एक संरचना बनाता है जिसे न्यूक्लियोसोम कहते हैं।
- दो न्यूक्लियोसोम को जोड़ने वाले DNA को लिंकर DNA कहते हैं, जिस पर H1 हिस्टोन प्रोटीन पाया जाता है।
- न्यूक्लियोसोम की यह श्रृंखला एक 'मनके की माला' (beads-on-string) जैसी संरचना बनाती है।
- ये न्यूक्लियोसोम आगे संघनित होकर क्रोमेटिन फाइबर बनाते हैं, जो अंततः क्रोमोसोम में संघनित होते हैं।
- यूक्रोमेटिन: शिथिल रूप से पैक किया गया क्रोमेटिन, जो अनुलेखन सक्रिय होता है।
- हेटरोक्रोमेटिन: सघन रूप से पैक किया गया क्रोमेटिन, जो अनुलेखन निष्क्रिय होता है।
B. RNA (राइबोन्यूक्लिक अम्ल)
- RNA आमतौर पर एक एकल-स्ट्रैंडेड पॉली न्यूक्लियोटाइड श्रृंखला होती है।
- DNA और RNA में अंतर:
- शर्करा: RNA में राइबोज शर्करा होती है, जबकि DNA में डीऑक्सीराइबोज शर्करा होती है।
- नाइट्रोजनी क्षार: RNA में थाइमिन (T) के स्थान पर यूरेसिल (U) होता है। (A, G, C, U)।
- संरचना: RNA आमतौर पर एकल-स्ट्रैंडेड होता है, जबकि DNA द्विकुंडलिनी होता है।
- कार्य: DNA आनुवंशिक जानकारी का भंडारण करता है, जबकि RNA आनुवंशिक जानकारी की अभिव्यक्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- RNA के प्रकार:
- संदेशवाहक RNA (mRNA): DNA से आनुवंशिक जानकारी को राइबोसोम तक ले जाता है, जहाँ प्रोटीन संश्लेषण होता है।
- स्थानांतरण RNA (tRNA): अमीनो अम्ल को राइबोसोम तक ले जाता है और mRNA पर कोडॉन को पहचानता है। इसे अनुकूलक अणु (adaptor molecule) भी कहते हैं।
- राइबोसोमल RNA (rRNA): राइबोसोम का संरचनात्मक घटक है और उत्प्रेरक के रूप में कार्य करता है (राइबोजाइम)।
3. आनुवंशिक पदार्थ के गुण (Properties of Genetic Material)
एक पदार्थ को आनुवंशिक पदार्थ के रूप में कार्य करने के लिए निम्नलिखित गुणों को पूरा करना चाहिए:
- प्रतिकृति बनाने की क्षमता (Ability to replicate): यह अपनी प्रतिकृति (exact copy) बनाने में सक्षम होना चाहिए।
- रासायनिक और संरचनात्मक रूप से स्थिर (Chemically and structurally stable): इसे कोशिका के जीवन चक्र के विभिन्न चरणों में स्थिर रहना चाहिए। DNA RNA की तुलना में अधिक स्थिर है क्योंकि इसमें 2'-OH समूह नहीं होता और थाइमिन होता है (जो यूरेसिल की तुलना में अधिक स्थिर है)।
- उत्परिवर्तन की संभावना (Scope for mutation): इसे धीमी गति से उत्परिवर्तन (परिवर्तन) करने में सक्षम होना चाहिए, जो विकास के लिए आवश्यक है।
- मेंडेलियन लक्षणों के रूप में स्वयं को व्यक्त करने की क्षमता (Ability to express itself in the form of Mendelian characters): इसे फीनोटाइपिक लक्षणों के रूप में स्वयं को व्यक्त करने में सक्षम होना चाहिए।
4. DNA प्रतिकृति (DNA Replication)
DNA प्रतिकृति वह प्रक्रिया है जिसमें DNA अपनी सटीक प्रतियाँ बनाता है।
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अर्ध-संरक्षी प्रतिकृति (Semi-conservative Replication):
- वाटसन और क्रिक ने प्रस्तावित किया कि DNA प्रतिकृति अर्ध-संरक्षी होती है, जिसका अर्थ है कि प्रत्येक नए DNA अणु में एक पैतृक (पुराना) स्ट्रैंड और एक नया संश्लेषित स्ट्रैंड होता है।
- मेसेल्सन और स्टाल का प्रयोग (1958): इन्होंने ई. कोलाई पर प्रयोग करके अर्ध-संरक्षी प्रतिकृति को सिद्ध किया।
- इन्होंने बैक्टीरिया को भारी नाइट्रोजन ($^{15}$N) वाले माध्यम में कई पीढ़ियों तक उगाया, जिससे बैक्टीरिया का DNA $^{15}$N-लेबल वाला हो गया।
- फिर, इन बैक्टीरिया को हल्के नाइट्रोजन ($^{14}$N) वाले माध्यम में स्थानांतरित किया गया।
- पहली पीढ़ी के बाद, DNA का घनत्व मध्यवर्ती पाया गया (न $^{15}$N जितना भारी, न $^{14}$N जितना हल्का), जो यह दर्शाता है कि प्रत्येक DNA अणु में एक $^{15}$N स्ट्रैंड और एक $^{14}$N स्ट्रैंड था।
- दूसरी पीढ़ी के बाद, DNA के दो बैंड मिले: एक मध्यवर्ती घनत्व का और एक हल्के घनत्व का।
- निष्कर्ष: यह प्रयोग स्पष्ट रूप से अर्ध-संरक्षी प्रतिकृति को सिद्ध करता है।
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प्रतिकृति की क्रियाविधि:
- प्रतिकृति 'प्रतिकृति के मूल' (Origin of Replication - Ori) नामक विशिष्ट स्थलों से शुरू होती है।
- एंजाइम:
- हेलिकेस (Helicase): DNA द्विकुंडलिनी को खोलता है और हाइड्रोजन बंधों को तोड़ता है।
- DNA पॉलीमरेज (DNA Polymerase): नए DNA स्ट्रैंड का संश्लेषण करता है। यह केवल 5'→3' दिशा में ही न्यूक्लियोटाइड जोड़ सकता है।
- टोपोआइसोमेरेज (Topoisomerase): DNA को खोलने के दौरान उत्पन्न होने वाले तनाव को कम करता है।
- प्राइमस (Primase): RNA प्राइमर (छोटे RNA खंड) का संश्लेषण करता है, जो DNA पॉलीमरेज के लिए प्रारंभिक बिंदु प्रदान करता है।
- DNA लाइगेस (DNA Ligase): ओकाजाकी खंडों को जोड़ता है।
- प्रक्रिया:
- हेलिकेस Ori पर DNA को खोलता है, जिससे एक 'प्रतिकृति कांटा' (Replication Fork) बनता है।
- DNA पॉलीमरेज नए स्ट्रैंड का संश्लेषण करता है।
- एक स्ट्रैंड (लीडिंग स्ट्रैंड - Leading Strand) का संश्लेषण निरंतर (continuous) रूप से 5'→3' दिशा में होता है।
- दूसरे स्ट्रैंड (लैगिंग स्ट्रैंड - Lagging Strand) का संश्लेषण छोटे-छोटे खंडों में होता है, जिन्हें ओकाजाकी खंड (Okazaki Fragments) कहते हैं। ये खंड भी 5'→3' दिशा में संश्लेषित होते हैं।
- RNA प्राइमर हटा दिए जाते हैं और उनकी जगह DNA न्यूक्लियोटाइड ले लेते हैं।
- DNA लाइगेस ओकाजाकी खंडों को जोड़ता है।
5. अनुलेखन (Transcription)
अनुलेखन वह प्रक्रिया है जिसमें DNA से आनुवंशिक जानकारी RNA में कॉपी की जाती है।
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अनुलेखन इकाई (Transcription Unit): DNA पर एक खंड जो अनुलेखन होता है, उसमें तीन मुख्य भाग होते हैं:
- प्रमोटर (Promoter): RNA पॉलीमरेज के जुड़ने का स्थल। अनुलेखन की शुरुआत को नियंत्रित करता है।
- संरचनात्मक जीन (Structural Gene): वह DNA खंड जिसका अनुलेखन RNA में होता है।
- टर्मिनेटर (Terminator): अनुलेखन के समापन का संकेत देता है।
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टेम्पलेट स्ट्रैंड और कोडिंग स्ट्रैंड:
- DNA के दो स्ट्रैंड में से केवल एक स्ट्रैंड (3'→5' दिशा वाला) अनुलेखन के लिए टेम्पलेट (साँचे) के रूप में कार्य करता है, इसे टेम्पलेट स्ट्रैंड कहते हैं।
- दूसरा स्ट्रैंड (5'→3' दिशा वाला) जिसे कोडिंग स्ट्रैंड कहते हैं, उसका अनुक्रम नए संश्लेषित RNA के समान होता है (केवल T की जगह U होता है)।
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प्रक्रिया (प्रोकेरियोट्स में):
- RNA पॉलीमरेज: प्रोकेरियोट्स में केवल एक प्रकार का RNA पॉलीमरेज सभी प्रकार के RNA (mRNA, tRNA, rRNA) का अनुलेखन करता है।
- प्रारंभन (Initiation): RNA पॉलीमरेज सिग्मा (σ) कारक के साथ मिलकर प्रमोटर से जुड़ता है।
- दीर्घीकरण (Elongation): RNA पॉलीमरेज DNA द्विकुंडलिनी को खोलता है और टेम्पलेट स्ट्रैंड के पूरक न्यूक्लियोटाइड को जोड़कर RNA का संश्लेषण करता है।
- समापन (Termination): जब RNA पॉलीमरेज टर्मिनेटर क्षेत्र तक पहुँचता है, तो रो (ρ) कारक की सहायता से अनुलेखन समाप्त हो जाता है, और नया RNA अणु अलग हो जाता है।
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यूकेरियोट्स में अनुलेखन:
- यूकेरियोट्स में तीन प्रकार के RNA पॉलीमरेज होते हैं:
- RNA पॉलीमरेज I: rRNA (28S, 18S, 5.8S) का अनुलेखन करता है।
- RNA पॉलीमरेज II: mRNA के पूर्ववर्ती (hnRNA - हेटेरोजेनस न्यूक्लियर RNA) का अनुलेखन करता है।
- RNA पॉलीमरेज III: tRNA, 5S rRNA और snRNA का अनुलेखन करता है।
- पश्च-अनुलेखन संशोधन (Post-transcriptional Modifications): यूकेरियोट्स में, प्राथमिक अनुलेखन (hnRNA) कार्यात्मक mRNA बनने से पहले कई संशोधनों से गुजरता है।
- कैपिंग (Capping): hnRNA के 5' सिरे पर मिथाइलेटेड गुआनोसिन ट्राइफॉस्फेट (mGppp) जोड़ा जाता है।
- टेलिंग (Tailing): hnRNA के 3' सिरे पर 200-300 एडेनिन अवशेषों की पॉली-ए-टेल (poly-A tail) जोड़ी जाती है।
- स्प्लिसिंग (Splicing): यूकेरियोटिक जीनों में कोडिंग अनुक्रम (एक्सॉन - Exons) और नॉन-कोडिंग अनुक्रम (इंट्रॉन - Introns) होते हैं। स्प्लिसिंग में इंट्रॉन को हटा दिया जाता है और एक्सॉन को एक विशिष्ट क्रम में जोड़ दिया जाता है। यह स्प्लिसियोसोम द्वारा होता है।
- यूकेरियोट्स में तीन प्रकार के RNA पॉलीमरेज होते हैं:
6. आनुवंशिक कूट (Genetic Code)
आनुवंशिक कूट न्यूक्लियोटाइड अनुक्रमों और अमीनो अम्ल अनुक्रमों के बीच संबंध को परिभाषित करता है।
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विशेषताएँ:
- त्रिक कूट (Triplet Code): तीन नाइट्रोजनी क्षार का एक अनुक्रम (कोडॉन) एक विशिष्ट अमीनो अम्ल को कोड करता है। कुल 64 कोडॉन होते हैं (4x4x4=64)।
- सार्वभौमिक (Universal): एक विशिष्ट कोडॉन लगभग सभी जीवों में एक ही अमीनो अम्ल को कोड करता है (कुछ अपवादों को छोड़कर, जैसे माइटोकॉन्ड्रियल कोडॉन)।
- असंदिग्ध (Unambiguous): एक कोडॉन केवल एक विशिष्ट अमीनो अम्ल को कोड करता है।
- अपह्रासित (Degenerate): एक अमीनो अम्ल को एक से अधिक कोडॉन द्वारा कोड किया जा सकता है।
- बिना विराम चिह्न के (Comma-less): कोडॉन के बीच कोई विराम चिह्न नहीं होता है।
- नॉन-ओवरलैपिंग (Non-overlapping): एक क्षार एक समय में केवल एक कोडॉन का हिस्सा होता है।
- प्रारंभक कूट (Initiator Codon): AUG, जो मेथियोनीन (Met) को कोड करता है और प्रोटीन संश्लेषण की शुरुआत करता है।
- समापन कूट (Stop Codons/Nonsense Codons): UAA, UAG, UGA किसी भी अमीनो अम्ल को कोड नहीं करते हैं और प्रोटीन संश्लेषण को समाप्त करते हैं।
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वैज्ञानिकों का योगदान:
- जॉर्ज गैमोव: प्रस्तावित किया कि आनुवंशिक कूट त्रिक होता है।
- हर गोबिंद खुराना: रासायनिक संश्लेषण विधि द्वारा RNA अणुओं को तैयार किया, जिसमें ज्ञात क्षार के संयोजन होते थे।
- मार्शल नीरेनबर्ग: कोशिका-मुक्त प्रणाली में प्रोटीन संश्लेषण को प्रदर्शित किया।
- सेवेरो ओचोआ: पॉली न्यूक्लियोटाइड फॉस्फोराइलेज एंजाइम की खोज की, जो RNA संश्लेषण में मदद करता है।
7. अनुवादन (Translation)
अनुवादन वह प्रक्रिया है जिसमें mRNA पर उपस्थित आनुवंशिक जानकारी का उपयोग करके प्रोटीन का संश्लेषण किया जाता है।
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राइबोसोम: प्रोटीन संश्लेषण के स्थल हैं। इनमें rRNA और प्रोटीन होते हैं। राइबोसोम की बड़ी उप-इकाई में दो स्थल होते हैं: A-स्थल (अमीनोएसिल tRNA) और P-स्थल (पेप्टिडिल tRNA)।
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tRNA (अनुकूलक अणु):
- tRNA में एक एंटीकोडॉन लूप होता है जो mRNA पर कोडॉन को पहचानता है।
- इसमें एक अमीनो अम्ल ग्राही सिरा होता है जहाँ विशिष्ट अमीनो अम्ल जुड़ता है।
- अमीनोएसिल tRNA सिंथेटेज (Aminoacyl tRNA Synthetase): यह एंजाइम विशिष्ट अमीनो अम्ल को उसके संबंधित tRNA से जोड़ता है। इस प्रक्रिया को tRNA का चार्जिंग या अमीनोएसिलेशन कहते हैं।
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प्रक्रिया:
- प्रारंभन (Initiation):
- राइबोसोम की छोटी उप-इकाई mRNA से जुड़ती है।
- प्रारंभक tRNA (जो मेथियोनीन वहन करता है और AUG कोडॉन को पहचानता है) P-स्थल पर mRNA के AUG कोडॉन से जुड़ता है।
- राइबोसोम की बड़ी उप-इकाई छोटी उप-इकाई से जुड़ती है।
- दीर्घीकरण (Elongation):
- अगला अमीनोएसिल tRNA A-स्थल पर संबंधित कोडॉन से जुड़ता है।
- P-स्थल पर मौजूद अमीनो अम्ल और A-स्थल पर मौजूद अमीनो अम्ल के बीच पेप्टाइड बंध बनता है। यह पेप्टाइड बंध राइबोजाइम (23S rRNA) द्वारा उत्प्रेरित होता है।
- राइबोसोम mRNA पर एक कोडॉन आगे बढ़ता है (ट्रांसलोकेशन), जिससे P-स्थल पर मौजूद tRNA A-स्थल पर आ जाता है, और A-स्थल खाली हो जाता है।
- यह प्रक्रिया तब तक दोहराई जाती है जब तक समापन कोडॉन नहीं आ जाता।
- समापन (Termination):
- जब A-स्थल पर एक समापन कोडॉन (UAA, UAG, UGA) आता है, तो कोई tRNA इससे नहीं जुड़ता।
- रिलीज कारक (release factors) A-स्थल से जुड़ते हैं, जिससे पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला राइबोसोम से मुक्त हो जाती है।
- राइबोसोम की उप-इकाइयाँ mRNA से अलग हो जाती हैं।
- प्रारंभन (Initiation):
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पॉलीसोम (Polysome): एक mRNA अणु से एक साथ कई राइबोसोम जुड़कर प्रोटीन का संश्लेषण कर सकते हैं, जिससे पॉलीसोम या पॉलीराइबोसोम बनते हैं। यह दक्षता बढ़ाता है।
8. जीन अभिव्यक्ति का नियमन (Regulation of Gene Expression)
जीन अभिव्यक्ति का नियमन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोशिकाएँ अपने जीनों की अभिव्यक्ति को नियंत्रित करती हैं, ताकि सही समय पर और सही मात्रा में सही प्रोटीन का उत्पादन हो सके।
- लैक ओपेरॉन (Lac Operon) - जैकब और मोनोड मॉडल:
- यह ई. कोलाई में जीन नियमन का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
- लैक ओपेरॉन लैक्टोज के उपापचय में शामिल जीनों के समूह को नियंत्रित करता है।
- घटक:
- नियामक जीन (i-gene): यह दमनकारी प्रोटीन (repressor protein) का संश्लेषण करता है।
- प्रमोटर (P): RNA पॉलीमरेज के जुड़ने का स्थल।
- ऑपरेटर (O): दमनकारी प्रोटीन के जुड़ने का स्थल।
- संरचनात्मक जीन:
- lac Z: β-गैलेक्टोसिडेज एंजाइम को कोड करता है, जो लैक्टोज को ग्लूकोज और गैलेक्टोज में तोड़ता है।
- lac Y: परमीएस (permease) एंजाइम को कोड करता है, जो लैक्टोज को कोशिका में प्रवेश करने में मदद करता है।
- lac A: ट्रांसएसिटाइलेज (transacetylase) एंजाइम को कोड करता है।
- नियमन:
- प्रेरक की अनुपस्थिति में (लैक्टोज अनुपस्थित): नियामक जीन द्वारा संश्लेषित दमनकारी प्रोटीन ऑपरेटर से जुड़ जाता है। यह RNA पॉलीमरेज को प्रमोटर से संरचनात्मक जीनों तक जाने से रोकता है, जिससे अनुलेखन रुक जाता है।
- प्रेरक की उपस्थिति में (लैक्टोज उपस्थित): लैक्टोज (या इसका एक आइसोमर, एलोलैक्टोज) दमनकारी प्रोटीन से जुड़कर उसे निष्क्रिय कर देता है। निष्क्रिय दमनकारी प्रोटीन ऑपरेटर से नहीं जुड़ पाता। RNA पॉलीमरेज प्रमोटर से जुड़ता है और संरचनात्मक जीनों का अनुलेखन करता है, जिससे लैक्टोज के उपापचय के लिए आवश्यक एंजाइम बनते हैं।
- लैक ओपेरॉन एक प्रेरणीय ओपेरॉन (inducible operon) का उदाहरण है, जहाँ एक पदार्थ (प्रेरक) जीन अभिव्यक्ति को चालू करता है।
9. मानव जीनोम परियोजना (Human Genome Project - HGP)
HGP एक मेगा-परियोजना थी जिसे 1990 में लॉन्च किया गया था और 2003 में पूरा किया गया। इसका लक्ष्य मानव DNA में सभी जीनों को पहचानना और मानव जीनोम के पूरे DNA अनुक्रम को निर्धारित करना था।
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लक्ष्य:
- मानव DNA में लगभग 20,000-25,000 जीनों की पहचान करना।
- मानव DNA के 3 बिलियन क्षार युग्मों के अनुक्रम को निर्धारित करना।
- जानकारी को डेटाबेस में संग्रहीत करना।
- डेटा विश्लेषण के लिए उपकरण विकसित करना।
- परियोजना से उत्पन्न नैतिक, कानूनी और सामाजिक मुद्दों (ELSI) को संबोधित करना।
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कार्यप्रणाली:
- अभिव्यक्त अनुक्रम टैग (Expressed Sequence Tags - ESTs): उन सभी जीनों की पहचान करना जो RNA के रूप में व्यक्त होते हैं।
- अनुक्रम एनोटेशन (Sequence Annotation): जीनोम के सभी कोडिंग और नॉन-कोडिंग अनुक्रमों का अनुक्रम करना और उनके कार्यों को निर्दिष्ट करना।
- अनुक्रमण के लिए, DNA को छोटे-छोटे खंडों में तोड़ा गया, जिन्हें बैक्टीरियल आर्टिफिशियल क्रोमोसोम (BACs) और यीस्ट आर्टिफिशियल क्रोमोसोम (YACs) जैसे वाहकों में क्लोन किया गया।
- इन खंडों का स्वचालित DNA अनुक्रमकों (sequencers) का उपयोग करके अनुक्रमण किया गया, जो फ्रेडरिक सेंगर द्वारा विकसित सिद्धांत पर आधारित थे।
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मानव जीनोम की मुख्य विशेषताएँ:
- मानव जीनोम में 3164.7 मिलियन क्षार युग्म होते हैं।
- औसत जीन में 3000 क्षार होते हैं, लेकिन सबसे बड़ा ज्ञात मानव जीन डिस्ट्रोफिन (2.4 मिलियन क्षार) है।
- कुल जीनोम का लगभग 99.9% क्षार अनुक्रम सभी मनुष्यों में समान होता है।
- केवल 2% से भी कम जीनोम प्रोटीन को कोड करता है।
- जीनोम का एक बड़ा हिस्सा बार-बार दोहराए जाने वाले अनुक्रमों (repetitive sequences) से बना होता है।
- क्रोमोसोम 1 में सबसे अधिक जीन (2968) होते हैं, और Y क्रोमोसोम में सबसे कम (231) होते हैं।
- लगभग 1.4 मिलियन स्थानों पर एकल क्षार DNA अंतर (Single Nucleotide Polymorphisms - SNPs) पाए जाते हैं, जो व्यक्तिगत भिन्नताओं और बीमारियों के अध्ययन में मदद करते हैं।
10. DNA फिंगरप्रिंटिंग (DNA Fingerprinting)
DNA फिंगरप्रिंटिंग एक ऐसी तकनीक है जो किसी व्यक्ति के DNA अनुक्रमों में अद्वितीय भिन्नताओं की पहचान करके उसकी पहचान करती है। यह एलेक जेफ्रीस द्वारा विकसित की गई थी।
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सिद्धांत:
- मानव DNA का 99.9% हिस्सा सभी व्यक्तियों में समान होता है। केवल 0.1% DNA अनुक्रमों में भिन्नताएँ होती हैं, जो प्रत्येक व्यक्ति के लिए अद्वितीय होती हैं।
- इन भिन्नताओं में से एक महत्वपूर्ण प्रकार दोहराए जाने वाले DNA (repetitive DNA) में पाया जाता है। ये छोटे DNA अनुक्रम होते हैं जो जीनोम में कई बार दोहराए जाते हैं।
- इन दोहराए जाने वाले अनुक्रमों में, VNTRs (Variable Number of Tandem Repeats) सबसे महत्वपूर्ण हैं। VNTRs के दोहराव की संख्या व्यक्ति-दर-व्यक्ति भिन्न होती है, जिससे प्रत्येक व्यक्ति का एक अद्वितीय DNA फिंगरप्रिंट बनता है।
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चरण (सदर्न ब्लॉटिंग तकनीक पर आधारित):
- DNA पृथक्करण (Isolation of DNA): कोशिका से DNA को निकाला जाता है।
- प्रतिबंध एंजाइमों द्वारा पाचन (Digestion by Restriction Enzymes): DNA को प्रतिबंध एंडोन्यूक्लिएज एंजाइमों द्वारा विशिष्ट स्थलों पर काटा जाता है, जिससे विभिन्न लंबाई के DNA खंड (RFLPs - Restriction Fragment Length Polymorphisms) प्राप्त होते हैं।
- जेल इलेक्ट्रोफोरेसिस (Gel Electrophoresis): DNA खंडों को उनके आकार के अनुसार अलग किया जाता है। छोटे खंड तेजी से और दूर तक चलते हैं।
- सदर्न ब्लॉटिंग (Southern Blotting): जेल से DNA खंडों को नाइट्रोसेलुलोज या नायलॉन झिल्ली पर स्थानांतरित किया जाता है।
- संकरण (Hybridization): रेडियोधर्मी लेबल वाले VNTR प्रोब (जो VNTR अनुक्रमों के पूरक होते हैं) को झिल्ली पर जोड़ा जाता है। प्रोब केवल VNTR खंडों से जुड़ते हैं।
- ऑटोरेडियोग्राफी (Autoradiography): झिल्ली को एक्स-रे फिल्म के संपर्क में लाया जाता है। रेडियोधर्मी प्रोब से जुड़े VNTR खंड फिल्म पर गहरे बैंड के रूप में दिखाई देते हैं, जिससे एक अद्वितीय DNA फिंगरप्रिंट बनता है।
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अनुप्रयोग:
- फोरेंसिक विज्ञान: अपराध स्थल से प्राप्त नमूने (रक्त, वीर्य, बाल) से अपराधी की पहचान करना।
- पितृत्व/मातृत्व विवाद: जैविक माता-पिता की पहचान करना।
- आनुवंशिक रोगों का निदान: कुछ आनुवंशिक रोगों के लिए व्यक्तियों की संवेदनशीलता का पता लगाना।
- जैव विविधता का अध्ययन: विभिन्न प्रजातियों के बीच आनुवंशिक भिन्नता का विश्लेषण।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
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ग्रिफिथ के रूपांतरण प्रयोग में, जब ताप-मृत S-प्रभेद को R-प्रभेद के साथ मिलाया गया, तो चूहों में निमोनिया हो गया। इस प्रयोग से क्या निष्कर्ष निकाला गया?
a) प्रोटीन आनुवंशिक पदार्थ है।
b) DNA आनुवंशिक पदार्थ है।
c) कुछ 'रूपांतरण सिद्धांत' R-प्रभेद को S-प्रभेद में बदल देता है।
d) RNA आनुवंशिक पदार्थ है। -
DNA द्विकुंडलिनी संरचना में, एडेनिन (A) हमेशा किसके साथ युग्मित होता है?
a) साइटोसिन (C)
b) गुआनिन (G)
c) थाइमिन (T)
d) यूरेसिल (U) -
मेसेल्सन और स्टाल का प्रयोग DNA प्रतिकृति के किस मॉडल को सिद्ध करता है?
a) संरक्षी मॉडल
b) अर्ध-संरक्षी मॉडल
c) परिक्षेपी मॉडल
d) निरंतर मॉडल -
यूकेरियोट्स में, hnRNA से कार्यात्मक mRNA बनाने के लिए इंट्रॉन को हटाने की प्रक्रिया क्या कहलाती है?
a) कैपिंग
b) टेलिंग
c) स्प्लिसिंग
d) अनुवादन -
निम्नलिखित में से कौन सा कोडॉन प्रोटीन संश्लेषण के समापन का संकेत देता है?
a) AUG
b) GUG
c) UAA
d) CCC -
लैक ओपेरॉन में, जब लैक्टोज अनुपस्थित होता है, तो दमनकारी प्रोटीन किससे जुड़ता है?
a) प्रमोटर
b) ऑपरेटर
c) संरचनात्मक जीन
d) नियामक जीन -
मानव जीनोम परियोजना का एक प्रमुख लक्ष्य क्या था?
a) सभी मानव प्रोटीन की संरचना निर्धारित करना।
b) मानव DNA में सभी जीनों की पहचान करना।
c) केवल रोग-संबंधी जीनों का अनुक्रमण करना।
d) मानव क्लोनिंग के लिए तकनीक विकसित करना। -
DNA फिंगरप्रिंटिंग में, VNTRs (Variable Number of Tandem Repeats) की पहचान करने के लिए किस तकनीक का उपयोग किया जाता है?
a) PCR
b) ELISA
c) सदर्न ब्लॉटिंग
d) वेस्टर्न ब्लॉटिंग -
DNA प्रतिकृति के दौरान, लैगिंग स्ट्रैंड पर बनने वाले छोटे DNA खंड क्या कहलाते हैं?
a) राइबोजाइम
b) ओकाजाकी खंड
c) प्राइमर
d) इंट्रॉन -
tRNA को 'अनुकूलक अणु' क्यों कहा जाता है?
a) यह DNA से mRNA तक जानकारी ले जाता है।
b) यह राइबोसोम का संरचनात्मक घटक है।
c) यह अमीनो अम्ल को राइबोसोम तक ले जाता है और mRNA कोडॉन को पहचानता है।
d) यह प्रोटीन संश्लेषण को उत्प्रेरित करता है।
उत्तर कुंजी:
- c)
- c)
- b)
- c)
- c)
- b)
- b)
- c)
- b)
- c)
मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और प्रश्न आपकी सरकारी परीक्षाओं की तैयारी में अत्यंत सहायक सिद्ध होंगे। इस अध्याय को बार-बार दोहराएँ और अवधारणाओं को स्पष्ट रूप से समझें। शुभकामनाएँ!