Class 12 Biology Notes Chapter 7 (विकास) – Jeev Vigyan Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम जीव विज्ञान के अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय 'विकास' (Evolution) का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय न केवल आपकी बोर्ड परीक्षाओं के लिए, बल्कि विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए भी आधारभूत है। हम यहाँ सभी महत्वपूर्ण अवधारणाओं, सिद्धांतों और तथ्यों को विस्तार से समझेंगे ताकि आपकी तैयारी पुख्ता हो सके।
अध्याय 7: विकास (Evolution)
1. जीवन की उत्पत्ति (Origin of Life)
- ब्रह्मांड की उत्पत्ति (Origin of Universe): लगभग 20 अरब वर्ष पूर्व एक विशाल विस्फोट (बिग बैंग सिद्धांत) के कारण ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई। इससे हाइड्रोजन और हीलियम गैसें बनीं, जो बाद में गुरुत्वाकर्षण के कारण संघनित होकर आकाशगंगाओं (गैलेक्सी) का निर्माण करती हैं।
- पृथ्वी की उत्पत्ति (Origin of Earth): सौरमंडल का निर्माण लगभग 4.5 अरब वर्ष पूर्व हुआ। पृथ्वी का निर्माण भी इसी समय हुआ। प्रारंभ में पृथ्वी पर वायुमंडल नहीं था, सतह पिघली हुई थी।
- आदिम पृथ्वी का वातावरण (Primitive Earth Atmosphere):
- जल वाष्प, मीथेन, अमोनिया और कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसें पिघले हुए द्रव्यमान से निकलीं।
- पराबैंगनी (UV) किरणें जल को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में तोड़ती थीं। हाइड्रोजन हल्की होने के कारण अंतरिक्ष में चली गई।
- ऑक्सीजन अमोनिया और मीथेन के साथ मिलकर जल, CO2 और अन्य यौगिक बनाती थी।
- ओजोन परत नहीं थी, इसलिए UV किरणें सीधे पृथ्वी तक पहुँचती थीं।
- पृथ्वी ठंडी होने पर जल वाष्प संघनित होकर वर्षा के रूप में गिरी, जिससे महासागर बने।
- यह वातावरण अपचायक (reducing) था, क्योंकि इसमें मुक्त ऑक्सीजन (O2) अनुपस्थित थी।
- जीवन की उत्पत्ति के सिद्धांत:
- विशेष सृष्टिवाद (Theory of Special Creation): यह मानता है कि जीवन ईश्वर द्वारा निर्मित है।
- स्वतः जननवाद (Theory of Spontaneous Generation): यह मानता था कि जीवन सड़ते हुए पदार्थों से स्वतः उत्पन्न होता है (जैसे कीचड़ से मेंढक)। लुई पाश्चर ने अपने प्रयोगों से इसे गलत साबित किया।
- ब्रह्मांडीय उत्पत्ति (Cosmozoic Theory/Panspermia): जीवन की इकाइयाँ (बीजाणु) अन्य ग्रहों से पृथ्वी पर आई हैं।
- रासायनिक विकास (Chemical Evolution) - ओपेरिन-हाल्डेन सिद्धांत (Oparin-Haldane Theory):
- यह सबसे स्वीकार्य सिद्धांत है।
- ओपेरिन (रूस) और हाल्डेन (इंग्लैंड) ने स्वतंत्र रूप से प्रस्तावित किया कि जीवन की उत्पत्ति पूर्व-विद्यमान अकार्बनिक अणुओं से रासायनिक विकास के माध्यम से हुई।
- पहले अकार्बनिक पदार्थ, फिर सरल कार्बनिक पदार्थ (जैसे अमीनो अम्ल, शर्करा, नाइट्रोजनी क्षार), फिर जटिल कार्बनिक पदार्थ (जैसे प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल) बने।
- इन जटिल अणुओं के आपस में जुड़ने से कोएसरवेट्स (coacervates) या माइक्रोस्फीयर (microspheres) जैसी संरचनाएँ बनीं, जो झिल्ली जैसी संरचना से घिरी थीं और उपापचयी क्रियाएँ कर सकती थीं। इन्हें प्रोटोबायोन्ट (protobionts) कहा गया।
- पहला जीवन RNA पर आधारित था (RNA विश्व)।
- मिलर का प्रयोग (Miller's Experiment - 1953):
- स्टेनले मिलर और हेरोल्ड यूरे ने ओपेरिन-हाल्डेन के रासायनिक विकास सिद्धांत को प्रायोगिक रूप से सिद्ध किया।
- उन्होंने एक बंद फ्लास्क में आदिम पृथ्वी के वातावरण की स्थितियों का निर्माण किया:
- तापमान: 800°C
- गैसें: मीथेन (CH4), अमोनिया (NH3), हाइड्रोजन (H2) और जल वाष्प (H2O)।
- ऊर्जा स्रोत: विद्युत विसर्जन (बिजली कड़कने का अनुकरण)।
- एक सप्ताह बाद, उन्होंने फ्लास्क में अमीनो अम्ल, शर्करा, नाइट्रोजनी क्षार और अन्य सरल कार्बनिक यौगिकों का निर्माण देखा।
- यह प्रयोग दर्शाता है कि आदिम पृथ्वी पर रासायनिक विकास संभव था।
- प्रथम कोशिकीय रूप (First Cellular Forms):
- जीवन के पहले कोशिकीय रूप लगभग 3 अरब वर्ष पूर्व प्रकट हुए।
- ये संभवतः अवायवीय (anaerobic) और रसायनपोषी (chemoheterotrophs) थे, क्योंकि तब मुक्त ऑक्सीजन नहीं थी।
- बाद में, प्रकाश संश्लेषण करने वाले जीव विकसित हुए, जिन्होंने ऑक्सीजन मुक्त की, जिससे वातावरण ऑक्सीकारक बना और ओजोन परत का निर्माण हुआ।
2. विकास के प्रमाण (Evidences of Evolution)
- जीवाश्म विज्ञान संबंधी प्रमाण (Paleontological Evidence):
- जीवाश्म (Fossils): चट्टानों में सुरक्षित प्राचीन जीवों के अवशेष या उनके निशान।
- विभिन्न भूवैज्ञानिक कालों की चट्टानों में विभिन्न प्रकार के जीवाश्म मिलते हैं, जो दर्शाते हैं कि समय के साथ जीवन रूपों में परिवर्तन आया है।
- उदाहरण: आर्कियोप्टेरिक्स (Archaeopteryx) सरीसृप और पक्षियों के बीच की योजक कड़ी (connecting link) है।
- तुलनात्मक शरीर रचना विज्ञान और आकारिकी संबंधी प्रमाण (Comparative Anatomy and Morphology):
- समजात अंग (Homologous Organs):
- संरचना में समान (समान मूल योजना), कार्य में भिन्न हो सकते हैं।
- उदाहरण: व्हेल के फ्लिपर, चमगादड़ के पंख, चीते के अग्रपाद और मनुष्य के हाथ - सभी की हड्डियाँ (ह्यूमरस, रेडियस, अल्ना, कार्पल्स, मेटाकार्पल्स, फैलेंजेस) समान पैटर्न में होती हैं।
- यह अपसारी विकास (Divergent Evolution) का परिणाम है, जहाँ समान संरचनाएँ विभिन्न आवश्यकताओं के अनुकूलन के कारण अलग-अलग कार्यों के लिए विकसित होती हैं।
- समवृत्ति अंग (Analogous Organs):
- कार्य में समान, लेकिन संरचना में भिन्न (भिन्न मूल योजना)।
- उदाहरण: कीट के पंख और पक्षी के पंख - दोनों उड़ने का कार्य करते हैं, लेकिन उनकी आंतरिक संरचना पूरी तरह से अलग है।
- यह अभिसारी विकास (Convergent Evolution) का परिणाम है, जहाँ विभिन्न संरचनाएँ समान आवश्यकताओं के अनुकूलन के कारण समान कार्य के लिए विकसित होती हैं।
- समजात अंग (Homologous Organs):
- भ्रूण विज्ञान संबंधी प्रमाण (Embryological Evidence):
- अर्नस्ट हिकल (Ernst Haeckel) ने प्रस्तावित किया कि "व्यक्तिवृत्त जातिवृत्त की पुनरावृत्ति करता है" (Ontogeny recapitulates Phylogeny)। इसका अर्थ है कि एक जीव का भ्रूणीय विकास उसके पूर्वजों के विकासवादी इतिहास को दोहराता है।
- उदाहरण: सभी कशेरुकियों (मछली, सैलामेंडर, कछुआ, मुर्गी, गाय, मनुष्य) के भ्रूण में गलफड़े की दरारें (gill slits) और एक अवशेषी पूँछ होती है, हालाँकि वयस्क अवस्था में ये सभी में नहीं पाई जातीं।
- वॉन बेयर (Von Baer) ने इस सिद्धांत का खंडन किया, क्योंकि भ्रूण कभी भी वयस्क पूर्वजों की अवस्थाओं से नहीं गुजरते, बल्कि वे केवल भ्रूणीय अवस्थाओं से गुजरते हैं।
- जैव-भूगोल संबंधी प्रमाण (Biogeographical Evidence):
- अनुकूली विकिरण (Adaptive Radiation): एक भौगोलिक क्षेत्र में विभिन्न प्रजातियों का एक सामान्य पूर्वज से विकसित होना, जो विभिन्न आवासों और जीवन-शैली के अनुकूल होते हैं।
- उदाहरण:
- डार्विन की फिंचें (Darwin's Finches): गैलापागोस द्वीपों पर डार्विन ने छोटे काले पक्षियों की कई प्रजातियाँ देखीं। ये सभी एक सामान्य बीज-भक्षी पूर्वज से विकसित हुई थीं, लेकिन विभिन्न प्रकार के भोजन (बीज, कीट, कैक्टस) के अनुकूलन के कारण उनकी चोंच के आकार में विविधता आ गई।
- ऑस्ट्रेलियाई मार्सुपियल (Australian Marsupials): ऑस्ट्रेलिया में विभिन्न प्रकार के मार्सुपियल (जैसे कंगारू, कोआला, वोम्बैट, मार्सुपियल चूहा) एक सामान्य मार्सुपियल पूर्वज से विकसित हुए हैं, जो विभिन्न पारिस्थितिक निशों में अनुकूलित हुए हैं।
- आणविक प्रमाण (Molecular Evidence):
- सभी जीवों में आनुवंशिक पदार्थ (DNA/RNA) और प्रोटीन संश्लेषण की क्रियाविधि समान होती है।
- विभिन्न जीवों में कुछ जीनों और प्रोटीन (जैसे साइटोक्रोम-सी) की अमीनो अम्ल अनुक्रमों में समानताएँ उनके सामान्य पूर्वज को दर्शाती हैं। जितनी अधिक समानता, उतना ही निकट का विकासवादी संबंध।
3. विकास के सिद्धांत (Theories of Evolution)
- लैमार्कवाद (Lamarckism) - जीन-बैप्टिस्ट लैमार्क (Jean-Baptiste Lamarck, 1809):
- उपार्जित लक्षणों की वंशागति का सिद्धांत (Inheritance of Acquired Characters):
- लैमार्क ने प्रस्तावित किया कि जीव अपने जीवनकाल में पर्यावरण के प्रभाव से कुछ लक्षण (उपार्जित लक्षण) विकसित करते हैं।
- ये उपार्जित लक्षण अगली पीढ़ी में वंशागत होते हैं।
- उपयोग और अनुपयोग का सिद्धांत (Use and Disuse Principle): जिन अंगों का अधिक उपयोग होता है, वे विकसित होते हैं, और जिनका उपयोग नहीं होता, वे क्षीण हो जाते हैं।
- उदाहरण: जिराफ की लंबी गर्दन - लैमार्क के अनुसार, जिराफों ने ऊँचे पेड़ों की पत्तियों तक पहुँचने के लिए अपनी गर्दन को लगातार खींचा, जिससे वह लंबी हो गई और यह लक्षण अगली पीढ़ियों में वंशागत हुआ।
- आलोचना: यह सिद्धांत गलत साबित हुआ, क्योंकि उपार्जित लक्षण (जो दैहिक कोशिकाओं में होते हैं) वंशागत नहीं होते। (अगस्त वीज़मैन ने चूहों की पूँछ काटकर कई पीढ़ियों तक यह सिद्ध किया कि पूँछ का कटना वंशागत नहीं होता)।
- उपार्जित लक्षणों की वंशागति का सिद्धांत (Inheritance of Acquired Characters):
- डार्विनवाद (Darwinism) - चार्ल्स डार्विन (Charles Darwin, 1859):
- प्राकृतिक वरण का सिद्धांत (Theory of Natural Selection):
- डार्विन ने HMS बीगल नामक जहाज पर विश्व यात्रा की और गैलापागोस द्वीपों पर अध्ययन किया।
- अल्फ्रेड रसेल वैलेस (Alfred Russel Wallace) ने भी स्वतंत्र रूप से प्राकृतिक वरण के समान निष्कर्ष निकाले।
- डार्विन के सिद्धांत के मुख्य बिंदु:
- अति-उत्पादन (Overproduction/Prodigality of Production): जीव अपनी जनसंख्या को तेजी से बढ़ाने की क्षमता रखते हैं।
- जीवन के लिए संघर्ष (Struggle for Existence): सीमित संसाधनों (भोजन, आवास, साथी) के कारण जीवों के बीच जीवित रहने के लिए संघर्ष होता है। यह अंतरा-प्रजातीय, अंतः-प्रजातीय और पर्यावरणीय हो सकता है।
- विभिन्नताएँ (Variations): किसी भी जनसंख्या के सदस्यों के बीच कुछ विभिन्नताएँ होती हैं। ये विभिन्नताएँ वंशागत होती हैं।
- योग्यतम की उत्तरजीविता (Survival of the Fittest): वे जीव जिनमें अनुकूल विभिन्नताएँ होती हैं, वे संघर्ष में सफल होते हैं और जीवित रहते हैं।
- प्राकृतिक वरण (Natural Selection): प्रकृति उन जीवों का चयन करती है जो अपने पर्यावरण के लिए सबसे उपयुक्त होते हैं।
- नई प्रजातियों का निर्माण (Origin of New Species): समय के साथ, अनुकूल विभिन्नताएँ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जमा होती जाती हैं, जिससे नई प्रजातियों का निर्माण होता है।
- उदाहरण: औद्योगिक अतिकृष्णता (Industrial Melanism) - इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति के बाद, पेड़ों पर कालिख जमने से सफेद मॉथ की संख्या कम हो गई और गहरे रंग के मॉथ की संख्या बढ़ गई, क्योंकि गहरे रंग के मॉथ शिकारियों से छिपने में बेहतर थे। प्रदूषण कम होने पर फिर से सफेद मॉथ की संख्या बढ़ने लगी।
- प्राकृतिक वरण का सिद्धांत (Theory of Natural Selection):
- उत्परिवर्तन सिद्धांत (Mutation Theory) - ह्यूगो डी व्रीस (Hugo de Vries):
- डी व्रीस ने इवनिंग प्रिमरोज़ (Oenothera lamarckiana) पर काम करते हुए उत्परिवर्तन (अचानक, बड़े और दिशाहीन परिवर्तन) को विकास का आधार बताया।
- डार्विन की विभिन्नताएँ छोटी और दिशात्मक थीं, जबकि डी व्रीस के उत्परिवर्तन बड़े और दिशाहीन (यादृच्छिक) थे।
- उन्होंने साल्टेशन (Saltation) शब्द का प्रयोग किया, जिसका अर्थ है एक ही चरण में बड़े उत्परिवर्तन द्वारा प्रजातीकरण।
- आधुनिक संश्लेषणात्मक सिद्धांत (Modern Synthetic Theory of Evolution):
- यह डार्विन के प्राकृतिक वरण के सिद्धांत को आनुवंशिकी (उत्परिवर्तन, आनुवंशिक पुनर्संयोजन), जीन प्रवाह, आनुवंशिक बहाव और पृथक्करण के साथ जोड़ता है।
- विकास की इकाई व्यक्ति नहीं, बल्कि जनसंख्या है।
- यह वर्तमान में सबसे स्वीकार्य विकासवादी सिद्धांत है।
4. प्राकृतिक वरण के प्रकार (Types of Natural Selection)
प्राकृतिक वरण जनसंख्या में लक्षणों की आवृत्ति को तीन तरीकों से प्रभावित कर सकता है:
- स्थिरीकरण (Stabilizing Selection): यह औसत या मध्यवर्ती लक्षणों वाले व्यक्तियों का पक्षधर होता है और चरम लक्षणों को समाप्त करता है। इससे जनसंख्या में विभिन्नता कम होती है।
- दिशात्मक वरण (Directional Selection): यह किसी एक चरम लक्षण वाले व्यक्तियों का पक्षधर होता है, जिससे जनसंख्या का औसत लक्षण एक दिशा में बदल जाता है। (जैसे औद्योगिक अतिकृष्णता में गहरे रंग के मॉथ का बढ़ना)।
- विघटनकारी वरण (Disruptive Selection): यह दोनों चरम लक्षणों वाले व्यक्तियों का पक्षधर होता है और मध्यवर्ती लक्षणों को समाप्त करता है। इससे जनसंख्या दो अलग-अलग उप-जनसंख्याओं में विभाजित हो सकती है, जो अंततः नई प्रजातियों को जन्म दे सकती हैं।
5. हार्डी-वीनबर्ग सिद्धांत (Hardy-Weinberg Principle)
- इस सिद्धांत के अनुसार, एक बड़ी, यादृच्छिक रूप से मैथुन करने वाली जनसंख्या में, यदि कोई विकासवादी बल (जैसे उत्परिवर्तन, चयन, जीन प्रवाह, आनुवंशिक बहाव) कार्य नहीं कर रहा है, तो जीन आवृत्तियाँ और जीनोटाइप आवृत्तियाँ पीढ़ियों तक स्थिर रहती हैं।
- यह आनुवंशिक संतुलन की स्थिति है।
- सूत्र: p² + 2pq + q² = 1
- p = एक एलील की आवृत्ति (जैसे एलील A)
- q = दूसरे एलील की आवृत्ति (जैसे एलील a)
- p² = समयुग्मजी प्रभावी जीनोटाइप की आवृत्ति (AA)
- q² = समयुग्मजी अप्रभावी जीनोटाइप की आवृत्ति (aa)
- 2pq = विषमयुग्मजी जीनोटाइप की आवृत्ति (Aa)
- हार्डी-वीनबर्ग संतुलन को प्रभावित करने वाले कारक (विकासवादी बल):
- जीन प्रवाह (Gene Flow): एक जनसंख्या से दूसरी जनसंख्या में जीनों का स्थानांतरण।
- आनुवंशिक बहाव (Genetic Drift): संयोगवश एलील आवृत्तियों में यादृच्छिक परिवर्तन, खासकर छोटी जनसंख्या में।
- संस्थापक प्रभाव (Founder Effect): जब एक छोटी जनसंख्या मुख्य जनसंख्या से अलग होकर एक नया क्षेत्र बसाती है, तो नई जनसंख्या में एलील आवृत्तियाँ मूल जनसंख्या से भिन्न हो सकती हैं।
- बॉटलनेक प्रभाव (Bottleneck Effect): जब किसी प्राकृतिक आपदा या अन्य घटना के कारण जनसंख्या का आकार अचानक बहुत कम हो जाता है, तो बची हुई जनसंख्या में एलील आवृत्तियाँ मूल जनसंख्या से भिन्न हो सकती हैं।
- उत्परिवर्तन (Mutation): DNA अनुक्रम में अचानक परिवर्तन, जो नए एलील उत्पन्न कर सकता है।
- आनुवंशिक पुनर्संयोजन (Genetic Recombination): अर्धसूत्रीविभाजन के दौरान जीनों का पुनर्संयोजन।
- प्राकृतिक वरण (Natural Selection): कुछ एलीलों को दूसरों पर लाभ प्रदान करता है, जिससे उनकी आवृत्ति बढ़ती है।
6. मानव का विकास (Human Evolution)
- मानव का विकास प्राइमेट्स (Primates) से हुआ है।
- लगभग 15 मिलियन वर्ष पूर्व: ड्रायोपिथेकस (Dryopithecus) और रामापिथेकस (Ramapithecus) अस्तित्व में थे।
- ड्रायोपिथेकस अधिक वानर जैसे थे।
- रामापिथेकस अधिक मानव जैसे थे।
- लगभग 3-4 मिलियन वर्ष पूर्व: ऑस्ट्रेलोपिथेकस (Australopithecus) पूर्वी अफ्रीका में पाए गए।
- ये लगभग 4 फीट ऊँचे थे और सीधे चलते थे।
- फल खाते थे।
- मस्तिष्क क्षमता लगभग 400-500 cc थी।
- लगभग 2 मिलियन वर्ष पूर्व: होमो हैबिलिस (Homo habilis) अफ्रीका में प्रकट हुए।
- इन्हें "कुशल मानव" (handy man) कहा जाता था, क्योंकि ये पत्थरों के औजार बनाते थे।
- मस्तिष्क क्षमता 650-800 cc थी।
- मांस नहीं खाते थे।
- लगभग 1.5 मिलियन वर्ष पूर्व: होमो इरेक्टस (Homo erectus) प्रकट हुए।
- ये सीधे खड़े होकर चलते थे (erect)।
- मस्तिष्क क्षमता 900 cc थी।
- मांस खाते थे।
- आग का उपयोग करते थे।
- एशिया (जावा मानव, पेकिंग मानव) और यूरोप में फैले।
- लगभग 1,00,000 - 40,000 वर्ष पूर्व: निएंडरथल मानव (Neanderthal man) पूर्वी और मध्य एशिया में रहते थे।
- मस्तिष्क क्षमता 1400 cc थी।
- अपने शरीर को ढँकने के लिए खाल का उपयोग करते थे।
- मृतकों को दफनाते थे।
- लगभग 75,000 - 10,000 वर्ष पूर्व (हिमयुग के दौरान): होमो सेपियन्स (Homo sapiens) अफ्रीका में उत्पन्न हुए और विभिन्न महाद्वीपों में फैल गए।
- आधुनिक मानव।
- मस्तिष्क क्षमता 1350 cc।
- गुफा कला (Cave art) का विकास।
- कृषि और स्थायी बस्तियाँ 10,000 वर्ष पूर्व विकसित हुईं।
7. विकास की क्रियाविधि (Mechanism of Evolution)
विकास की क्रियाविधि में विभिन्न कारक शामिल होते हैं जो जीन आवृत्तियों और जीनोटाइप आवृत्तियों को जनसंख्या में बदलते हैं, जिससे नई प्रजातियाँ बनती हैं:
- उत्परिवर्तन (Mutation): आनुवंशिक पदार्थ में अचानक, यादृच्छिक परिवर्तन।
- पुनर्संयोजन (Recombination): लैंगिक प्रजनन के दौरान जीनों का मिश्रण।
- प्राकृतिक वरण (Natural Selection): पर्यावरण के प्रति सबसे अनुकूल जीवों का जीवित रहना और प्रजनन करना।
- जीन प्रवाह (Gene Flow): एक जनसंख्या से दूसरी जनसंख्या में जीनों का स्थानांतरण।
- आनुवंशिक बहाव (Genetic Drift): छोटी जनसंख्या में संयोगवश एलील आवृत्तियों में परिवर्तन।
- पृथक्करण (Isolation): भौगोलिक या प्रजनन संबंधी बाधाओं के कारण जनसंख्याओं का अलग होना, जिससे जीन प्रवाह रुक जाता है और नई प्रजातियाँ बन सकती हैं।
बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions - MCQs)
-
मिलर के प्रयोग में, आदिम पृथ्वी के वातावरण को दर्शाने के लिए निम्नलिखित में से किन गैसों का उपयोग किया गया था?
a) ऑक्सीजन, अमोनिया, मीथेन, जल वाष्प
b) हाइड्रोजन, अमोनिया, मीथेन, जल वाष्प
c) नाइट्रोजन, हाइड्रोजन, मीथेन, जल वाष्प
d) कार्बन डाइऑक्साइड, ऑक्सीजन, अमोनिया, मीथेन -
निम्नलिखित में से कौन सा समजात अंगों का उदाहरण है?
a) कीट के पंख और पक्षी के पंख
b) चमगादड़ के पंख और व्हेल के फ्लिपर
c) आलू और शकरकंद
d) मटर के प्रतान और बोगेनविलिया के काँटे -
औद्योगिक अतिकृष्णता (Industrial Melanism) किसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है?
a) उत्परिवर्तन
b) प्राकृतिक वरण
c) आनुवंशिक बहाव
d) अनुकूली विकिरण -
हार्डी-वीनबर्ग सिद्धांत के अनुसार, यदि एक जनसंख्या में अप्रभावी एलील (q) की आवृत्ति 0.3 है, तो विषमयुग्मजी (2pq) जीनोटाइप की आवृत्ति क्या होगी?
a) 0.09
b) 0.42
c) 0.49
d) 0.7 -
"व्यक्तिवृत्त जातिवृत्त की पुनरावृत्ति करता है" यह कथन किस वैज्ञानिक से संबंधित है?
a) चार्ल्स डार्विन
b) जीन-बैप्टिस्ट लैमार्क
c) अर्नस्ट हिकल
d) ह्यूगो डी व्रीस -
डार्विन की फिंचें किसका उदाहरण हैं?
a) अभिसारी विकास
b) अनुकूली विकिरण
c) सह-विकास
d) आनुवंशिक बहाव -
मानव विकास के क्रम में, पत्थरों के औजार बनाने वाला पहला मानव जैसा प्राणी कौन था?
a) होमो इरेक्टस
b) होमो हैबिलिस
c) निएंडरथल मानव
d) ऑस्ट्रेलोपिथेकस -
लैमार्क के विकास के सिद्धांत का मुख्य आधार क्या था?
a) प्राकृतिक वरण
b) उत्परिवर्तन
c) उपार्जित लक्षणों की वंशागति
d) आनुवंशिक बहाव -
निम्नलिखित में से कौन सा कारक हार्डी-वीनबर्ग संतुलन को भंग नहीं करता है?
a) उत्परिवर्तन
b) प्राकृतिक वरण
c) जीन प्रवाह
d) यादृच्छिक मैथुन -
आर्कियोप्टेरिक्स (Archaeopteryx) किन दो समूहों के बीच की योजक कड़ी माना जाता है?
a) उभयचर और सरीसृप
b) सरीसृप और पक्षी
c) पक्षी और स्तनधारी
d) मछली और उभयचर
उत्तर कुंजी:
- b) हाइड्रोजन, अमोनिया, मीथेन, जल वाष्प
- b) चमगादड़ के पंख और व्हेल के फ्लिपर
- b) प्राकृतिक वरण
- b) 0.42 (यदि q = 0.3, तो p = 1 - q = 1 - 0.3 = 0.7। अतः 2pq = 2 * 0.7 * 0.3 = 0.42)
- c) अर्नस्ट हिकल
- b) अनुकूली विकिरण
- b) होमो हैबिलिस
- c) उपार्जित लक्षणों की वंशागति
- d) यादृच्छिक मैथुन
- b) सरीसृप और पक्षी
मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपको अध्याय 'विकास' को गहराई से समझने और आपकी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में सहायक होंगे। शुभकामनाएँ!