Class 12 Chemistry Notes Chapter 1 (Chapter 1) – Rasayan Vigyan Bhag-II Book

Rasayan Vigyan Bhag-II
प्रिय विद्यार्थियों,

आज हम रसायन विज्ञान भाग-II के अध्याय 1, "हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन" का विस्तृत अध्ययन करेंगे, जो आपकी सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह अध्याय कार्बनिक रसायन की नींव रखता है और इसमें से कई प्रश्न विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जाते हैं।


अध्याय 1: हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन (Haloalkanes and Haloarenes)

1. परिचय (Introduction)

  • हैलोऐल्केन (Haloalkanes): वे कार्बनिक यौगिक जिनमें ऐलिफैटिक हाइड्रोकार्बन श्रृंखला (ऐल्केन) से एक या अधिक हाइड्रोजन परमाणु, हैलोजन परमाणु (F, Cl, Br, I) द्वारा प्रतिस्थापित होते हैं, हैलोऐल्केन कहलाते हैं। इन्हें ऐल्किल हैलाइड (Alkyl halides) भी कहते हैं। इनका सामान्य सूत्र R-X है, जहाँ R एक ऐल्किल समूह और X एक हैलोजन परमाणु है।
  • हैलोऐरीन (Haloarenes): वे कार्बनिक यौगिक जिनमें ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन वलय (ऐरीन) से एक या अधिक हाइड्रोजन परमाणु, सीधे हैलोजन परमाणु द्वारा प्रतिस्थापित होते हैं, हैलोऐरीन कहलाते हैं। इन्हें ऐरिल हैलाइड (Aryl halides) भी कहते हैं। इनका सामान्य सूत्र Ar-X है, जहाँ Ar एक ऐरिल समूह और X एक हैलोजन परमाणु है।

2. वर्गीकरण (Classification)

A. हैलोजन परमाणुओं की संख्या के आधार पर:

  • मोनो-हैलोजन यौगिक: जिनमें एक हैलोजन परमाणु होता है (जैसे CH₃Cl, C₆H₅Br)।
  • डाई-हैलोजन यौगिक: जिनमें दो हैलोजन परमाणु होते हैं (जैसे CH₂Cl₂, C₆H₄Cl₂)।
  • ट्राई-हैलोजन यौगिक: जिनमें तीन हैलोजन परमाणु होते हैं (जैसे CHCl₃, C₆H₃Cl₃)।
  • पॉली-हैलोजन यौगिक: जिनमें तीन से अधिक हैलोजन परमाणु होते हैं।

B. C-X आबंध की प्रकृति के आधार पर (कार्बन परमाणु के संकरण के आधार पर):

I. sp³ C-X आबंध वाले यौगिक: हैलोजन परमाणु एक sp³ संकरित कार्बन परमाणु से जुड़ा होता है।

  • ऐल्किल हैलाइड (R-X): हैलोजन परमाणु एक ऐल्किल समूह के sp³ संकरित कार्बन से जुड़ा होता है।
    • प्राथमिक (1°): हैलोजन जिस कार्बन से जुड़ा है, वह केवल एक अन्य कार्बन से जुड़ा हो (जैसे CH₃CH₂Cl)।
    • द्वितीयक (2°): हैलोजन जिस कार्बन से जुड़ा है, वह दो अन्य कार्बन से जुड़ा हो (जैसे (CH₃)₂CHCl)।
    • तृतीयक (3°): हैलोजन जिस कार्बन से जुड़ा है, वह तीन अन्य कार्बन से जुड़ा हो (जैसे (CH₃)₃CCl)।
  • ऐलिलिक हैलाइड (Allylic halides): हैलोजन परमाणु एक sp³ संकरित कार्बन परमाणु से जुड़ा होता है, जो स्वयं एक कार्बन-कार्बन द्विआबंध (C=C) से जुड़ा होता है (जैसे CH₂=CH-CH₂-X)।
  • बेन्ज़िलिक हैलाइड (Benzylic halides): हैलोजन परमाणु एक sp³ संकरित कार्बन परमाणु से जुड़ा होता है, जो स्वयं एक ऐरोमैटिक वलय से जुड़ा होता है (जैसे C₆H₅-CH₂-X)।

II. sp² C-X आबंध वाले यौगिक: हैलोजन परमाणु एक sp² संकरित कार्बन परमाणु से जुड़ा होता है।

  • वाइनिलिक हैलाइड (Vinyl halides): हैलोजन परमाणु एक कार्बन-कार्बन द्विआबंध (C=C) के sp² संकरित कार्बन परमाणु से सीधे जुड़ा होता है (जैसे CH₂=CH-X)।
  • ऐरिल हैलाइड (Aryl halides): हैलोजन परमाणु सीधे ऐरोमैटिक वलय के sp² संकरित कार्बन परमाणु से जुड़ा होता है (जैसे C₆H₅-X)।

3. नामकरण (Nomenclature)

  • सामान्य नाम (Common names): ऐल्किल हैलाइड्स के लिए ऐल्किल समूह के नाम के बाद हैलाइड का नाम लिखा जाता है (जैसे CH₃Cl - मेथिल क्लोराइड)।
  • IUPAC नाम (IUPAC names): हैलोजन परमाणुओं को प्रतिस्थापी माना जाता है और उन्हें 'हैलो' (जैसे क्लोरो, ब्रोमो, आयोडो) के रूप में उपसर्ग के रूप में लिखा जाता है। सबसे लंबी कार्बन श्रृंखला का चयन किया जाता है और प्रतिस्थापियों को न्यूनतम संभव संख्या दी जाती है (जैसे CH₃CH₂Cl - क्लोरोएथेन)।

4. C-X आबंध की प्रकृति (Nature of C-X Bond)

  • हैलोजन परमाणु (X) कार्बन परमाणु (C) की तुलना में अधिक विद्युत ऋणात्मक होता है।
  • इसलिए, C-X आबंध ध्रुवीय होता है, जिसमें कार्बन पर आंशिक धनावेश (δ+) और हैलोजन पर आंशिक ऋणावेश (δ-) होता है।
  • आबंध की ध्रुवता F > Cl > Br > I क्रम में घटती है।
  • C-X आबंध की लंबाई X के आकार के साथ बढ़ती है (C-F < C-Cl < C-Br < C-I)।
  • C-X आबंध की आबंध एन्थैल्पी X के आकार के साथ घटती है (C-F > C-Cl > C-Br > C-I)।

5. विरचन की विधियाँ (Methods of Preparation)

A. हैलोऐल्केन (Haloalkanes) के विरचन की विधियाँ:

  1. ऐल्कोहॉल से (From Alcohols):

    • हाइड्रोजन हैलाइड्स (HX) के साथ: R-OH + HX → R-X + H₂O
      • अभिक्रियाशीलता क्रम: HI > HBr > HCl (लुकास अभिकर्मक: HCl + ZnCl₂)
      • ऐल्कोहॉल की अभिक्रियाशीलता: 3° > 2° > 1°
      • ग्रोव प्रक्रम (Groves process): प्राथमिक और द्वितीयक ऐल्कोहॉल HCl के साथ निर्जल ZnCl₂ की उपस्थिति में अभिक्रिया करते हैं।
    • फॉस्फोरस हैलाइड्स (PX₃ या PX₅) के साथ:
      • 3R-OH + PX₃ → 3R-X + H₃PO₃ (जैसे PCl₃, PBr₃, PI₃)
      • R-OH + PCl₅ → R-Cl + POCl₃ + HCl
    • थायोनिल क्लोराइड (SOCl₂) के साथ (डार्ज़न अभिक्रिया):
      • R-OH + SOCl₂ → R-Cl + SO₂↑ + HCl↑
      • यह हैलोऐल्केन बनाने की सबसे अच्छी विधि है क्योंकि उपोत्पाद गैसीय होते हैं और आसानी से निकल जाते हैं।
  2. हाइड्रोकार्बन से (From Hydrocarbons):

    • मुक्त मूलक हैलोजनीकरण (Free radical halogenation) (ऐल्केन से):
      • CH₄ + Cl₂ $\xrightarrow{hv}$ CH₃Cl + HCl (बहु-प्रतिस्थापन संभव)
      • चयनशीलता कम होती है, विभिन्न हैलोजनीकृत उत्पाद बनते हैं।
    • ऐल्कीन से (From Alkenes):
      • हाइड्रोजन हैलाइड्स (HX) का योग:
        • CH₂=CH₂ + HBr → CH₃CH₂Br
        • CH₃CH=CH₂ + HBr → CH₃CH(Br)CH₃ (मार्कोनीकॉफ का नियम: H उस कार्बन से जुड़ता है जिस पर पहले से अधिक H हों, और X उस कार्बन से जुड़ता है जिस पर कम H हों)।
        • प्रति-मार्कोनीकॉफ योग (Peroxide effect/Kharasch effect): परऑक्साइड की उपस्थिति में HBr का योग मार्कोनीकॉफ नियम के विपरीत होता है (केवल HBr के लिए)।
          • CH₃CH=CH₂ + HBr $\xrightarrow{परऑक्साइड}$ CH₃CH₂CH₂Br
      • हैलोजन (X₂) का योग:
        • CH₂=CH₂ + Br₂ $\xrightarrow{CCl₄}$ CH₂Br-CH₂Br (विसिनल डाइब्रोमाइड)
        • यह असंतृप्तता का परीक्षण है (ब्रोमीन जल का रंग उड़ जाता है)।
  3. हैलोजन विनिमय (Halogen Exchange):

    • फिन्केलस्टाइन अभिक्रिया (Finkelstein reaction): ऐल्किल क्लोराइड या ब्रोमाइड को सोडियम आयोडाइड (NaI) के साथ शुष्क एसीटोन में गर्म करने पर ऐल्किल आयोडाइड बनता है।
      • R-Cl/Br + NaI $\xrightarrow{एसीटोन, ऊष्मा}$ R-I + NaCl/NaBr (NaCl/NaBr एसीटोन में अविलेय होने के कारण अवक्षेपित हो जाते हैं, जिससे अभिक्रिया अग्र दिशा में बढ़ती है)।
    • स्वार्ट्स अभिक्रिया (Swarts reaction): ऐल्किल क्लोराइड या ब्रोमाइड को धात्विक फ्लोराइड (जैसे AgF, Hg₂F₂, CoF₂, SbF₃) के साथ गर्म करने पर ऐल्किल फ्लोराइड बनता है।
      • CH₃Br + AgF → CH₃F + AgBr

B. हैलोऐरीन (Haloarenes) के विरचन की विधियाँ:

  1. इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन (Electrophilic Substitution):

    • ऐरीन का हैलोजनीकरण (हैलोजन वाहक/लुईस अम्ल की उपस्थिति में):
      • C₆H₆ + Cl₂ $\xrightarrow{निर्जल FeCl₃}$ C₆H₅Cl + HCl
      • C₆H₆ + Br₂ $\xrightarrow{निर्जल FeBr₃}$ C₆H₅Br + HBr
      • आयोडिनीकरण उत्क्रमणीय होता है (C₆H₆ + I₂ $\rightleftharpoons$ C₆H₅I + HI)। HI को हटाने के लिए ऑक्सीकारक (HNO₃ या HIO₄) का उपयोग किया जाता है।
      • फ्लोरोऐरीन इस विधि से नहीं बनाए जा सकते क्योंकि फ्लोरीन बहुत अभिक्रियाशील होता है।
  2. डाइएज़ोनियम लवण से (From Diazonium Salts):

    • सैंडमायर अभिक्रिया (Sandmeyer reaction): ऐनिलीन को NaNO₂/HCl (0-5°C) के साथ अभिकृत करके बेन्ज़ीन डाइएज़ोनियम क्लोराइड बनाते हैं, जिसे फिर Cu₂Cl₂/HCl या Cu₂Br₂/HBr के साथ अभिकृत करने पर हैलोऐरीन बनते हैं।
      • Ar-N₂⁺Cl⁻ $\xrightarrow{Cu₂Cl₂/HCl}$ Ar-Cl + N₂
      • Ar-N₂⁺Cl⁻ $\xrightarrow{Cu₂Br₂/HBr}$ Ar-Br + N₂
    • गाटरमान अभिक्रिया (Gattermann reaction): सैंडमायर अभिक्रिया के समान, लेकिन Cu चूर्ण और HX का उपयोग किया जाता है।
      • Ar-N₂⁺Cl⁻ $\xrightarrow{Cu/HCl}$ Ar-Cl + N₂
      • Ar-N₂⁺Cl⁻ $\xrightarrow{Cu/HBr}$ Ar-Br + N₂
    • आयोडोबेन्ज़ीन का विरचन: डाइएज़ोनियम लवण को पोटेशियम आयोडाइड (KI) के साथ गर्म करके।
      • Ar-N₂⁺Cl⁻ + KI $\xrightarrow{ऊष्मा}$ Ar-I + N₂ + KCl
    • फ्लोरोबेन्ज़ीन का विरचन (बाल्ज़-शीमान अभिक्रिया): डाइएज़ोनियम लवण को HBF₄ के साथ अभिकृत करके, फिर गर्म करने पर।
      • Ar-N₂⁺Cl⁻ + HBF₄ → Ar-N₂⁺BF₄⁻ $\xrightarrow{ऊष्मा}$ Ar-F + BF₃ + N₂

6. भौतिक गुणधर्म (Physical Properties)

  • क्वथनांक (Boiling Points):
    • समान ऐल्किल समूह के लिए, क्वथनांक का क्रम: R-I > R-Br > R-Cl > R-F (आणविक द्रव्यमान बढ़ने के साथ वांडर वाल्स बल बढ़ते हैं)।
    • समान हैलोजन परमाणु के लिए, ऐल्किल समूह का आकार बढ़ने पर क्वथनांक बढ़ता है।
    • शाखाओं की संख्या बढ़ने पर क्वथनांक घटता है (पृष्ठीय क्षेत्रफल घटने से वांडर वाल्स बल घटते हैं)।
    • हैलोऐरीन के क्वथनांक समान कार्बन परमाणुओं वाले हैलोऐल्केन से अधिक होते हैं।
    • सम-डाइहैलोजनीकृत बेन्ज़ीन के समावयवी में, पैरा-समावयवी का गलनांक ऑर्थो और मेटा समावयवी से अधिक होता है (सममित संरचना के कारण क्रिस्टल जालक में अच्छी तरह से पैक होता है)।
  • घनत्व (Density): ऐल्किल हैलाइड्स का घनत्व R-I > R-Br > R-Cl > R-F क्रम में होता है। जल से भारी होते हैं (विशेषकर पॉलीहैलोजन यौगिक)।
  • विलेयता (Solubility): हैलोऐल्केन और हैलोऐरीन जल में अविलेय या बहुत कम विलेय होते हैं क्योंकि वे जल के साथ हाइड्रोजन आबंध नहीं बना सकते और जल के हाइड्रोजन आबंध को तोड़ने के लिए पर्याप्त ऊर्जा मुक्त नहीं करते। वे कार्बनिक विलायकों में विलेय होते हैं।

7. रासायनिक अभिक्रियाएँ (Chemical Reactions)

A. हैलोऐल्केन (Haloalkanes) की अभिक्रियाएँ:

  • नाभिकरागी प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ (Nucleophilic Substitution Reactions) (SN1 और SN2):

    • C-X आबंध की ध्रुवीय प्रकृति के कारण हैलोजन परमाणु एक नाभिकरागी द्वारा प्रतिस्थापित हो सकता है।
    • SN2 अभिक्रिया (द्वि-अणुक नाभिकरागी प्रतिस्थापन):
      • एक पद में होती है, संक्रमण अवस्था बनती है।
      • नाभिकरागी पीछे से आक्रमण करता है, जिससे विन्यास का प्रतिलोमन (Walden inversion) होता है।
      • अभिक्रिया की दर दोनों अभिकारकों (ऐल्किल हैलाइड और नाभिकरागी) की सांद्रता पर निर्भर करती है।
      • अभिक्रियाशीलता क्रम: CH₃X > 1° > 2° > 3° (त्रिविम बाधा के कारण)।
      • ध्रुवीय अप्रोटिक विलायक (जैसे एसीटोन, DMF, DMSO) अनुकूल होते हैं।
    • SN1 अभिक्रिया (एक-अणुक नाभिकरागी प्रतिस्थापन):
      • दो पदों में होती है। पहले पद में कार्बोकैटायन बनता है (धीमा, दर-निर्धारक पद)।
      • कार्बोकैटायन समतलीय होता है, इसलिए नाभिकरागी दोनों तरफ से आक्रमण कर सकता है, जिससे रेसेमिकरण (racemisation) होता है (यदि काइरल कार्बन हो)।
      • अभिक्रिया की दर केवल ऐल्किल हैलाइड की सांद्रता पर निर्भर करती है।
      • अभिक्रियाशीलता क्रम: 3° > 2° > 1° > CH₃X (कार्बोकैटायन के स्थायित्व के कारण)।
      • ध्रुवीय प्रोटिक विलायक (जैसे जल, ऐल्कोहॉल, एसिटिक अम्ल) अनुकूल होते हैं।
    • विभिन्न नाभिकरागियों के साथ अभिक्रियाएँ:
      • जलीय KOH/NaOH (OH⁻) → ऐल्कोहॉल (R-OH)
      • सोडियम ऐल्कॉक्साइड (RO⁻Na⁺) → ईथर (R-O-R') (विलियमसन ईथर संश्लेषण)
      • KCN (CN⁻) → ऐल्किल सायनाइड (R-CN)
      • AgCN (CN⁻) → ऐल्किल आइसोसायनाइड (R-NC) (AgCN सहसंयोजक होता है, इसलिए N से आक्रमण होता है)
      • KNO₂ (NO₂⁻) → ऐल्किल नाइट्राइट (R-ONO)
      • AgNO₂ (NO₂⁻) → नाइट्रोऐल्केन (R-NO₂) (AgNO₂ सहसंयोजक होता है, इसलिए N से आक्रमण होता है)
      • अमोनिया (NH₃) → प्राथमिक ऐमीन (R-NH₂) (अमोनोलिसिस)
      • R'COO⁻Na⁺ (कार्बोक्सिलेट आयन) → एस्टर (R-O-CO-R')
      • सोडियम थायोऐल्कॉक्साइड (RS⁻Na⁺) → थायोईथर (R-S-R')
  • विलोपन अभिक्रियाएँ (Elimination Reactions) (β-विलोपन या डीहाइड्रोहैलोजनीकरण):

    • जब ऐल्किल हैलाइड को ऐल्कोहॉलिक KOH के साथ गर्म किया जाता है, तो β-कार्बन से हाइड्रोजन परमाणु और α-कार्बन से हैलोजन परमाणु का विलोपन होता है, जिससे ऐल्कीन बनता है।
    • सेत्ज़ेफ का नियम (Saytzeff's Rule): यदि विलोपन के बाद एक से अधिक ऐल्कीन बन सकते हैं, तो वह ऐल्कीन मुख्य उत्पाद होगा जिसमें द्विआबंध से जुड़े ऐल्किल प्रतिस्थापी अधिक हों (अर्थात् अधिक प्रतिस्थापित ऐल्कीन अधिक स्थायी होता है)।
    • उदाहरण: 2-ब्रोमोब्यूटेन $\xrightarrow{ऐल्कोहॉलिक KOH}$ ब्यूट-2-ईन (मुख्य) + ब्यूट-1-ईन (गौण)
  • धातुओं के साथ अभिक्रियाएँ (Reactions with Metals):

    • मैग्नीशियम के साथ (ग्रिगनार्ड अभिकर्मक का निर्माण):
      • R-X + Mg $\xrightarrow{शुष्क ईथर}$ R-Mg-X (ग्रिगनार्ड अभिकर्मक)
      • ग्रिगनार्ड अभिकर्मक अत्यधिक अभिक्रियाशील होते हैं और जल, ऐल्कोहॉल, ऐमीन आदि प्रोटॉन दाता यौगिकों के साथ अभिक्रिया करके हाइड्रोकार्बन देते हैं।
    • सोडियम के साथ (वुर्ट्ज़ अभिक्रिया):
      • 2R-X + 2Na $\xrightarrow{शुष्क ईथर}$ R-R + 2NaX
      • सम-संख्या वाले कार्बन परमाणुओं वाले ऐल्केन बनाने के लिए उपयोगी।

B. हैलोऐरीन (Haloarenes) की अभिक्रियाएँ:

  1. नाभिकरागी प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ (Nucleophilic Substitution Reactions):

    • हैलोऐरीन, हैलोऐल्केन की तुलना में नाभिकरागी प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं के प्रति बहुत कम क्रियाशील होते हैं। इसके कारण हैं:
      • अनुनाद प्रभाव: हैलोजन परमाणु का एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म बेन्ज़ीन वलय के साथ अनुनाद में होता है, जिससे C-X आबंध में आंशिक द्विआबंध गुण आ जाता है। यह आबंध को छोटा और मजबूत बनाता है, जिससे इसे तोड़ना मुश्किल होता है।
      • C-X आबंध में कार्बन का संकरण: हैलोऐरीन में हैलोजन परमाणु sp² संकरित कार्बन से जुड़ा होता है, जबकि हैलोऐल्केन में sp³ संकरित कार्बन से। sp² संकरित कार्बन अधिक विद्युत ऋणात्मक होता है और इलेक्ट्रॉन युग्म को अधिक मजबूती से पकड़ता है, जिससे C-X आबंध छोटा और मजबूत होता है।
      • फेनिल धनायन की अस्थिरता: SN1 अभिक्रिया में बनने वाला फेनिल धनायन अनुनाद द्वारा स्थायी नहीं हो पाता, इसलिए SN1 अभिक्रिया संभव नहीं होती।
      • इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षण: नाभिकरागी इलेक्ट्रॉन-समृद्ध ऐरोमैटिक वलय द्वारा प्रतिकर्षित होता है।
    • कठोर परिस्थितियों में नाभिकरागी प्रतिस्थापन:
      • क्लोरोबेन्ज़ीन $\xrightarrow{NaOH, 623K, 300 atm}$ सोडियम फिनॉक्साइड $\xrightarrow{H⁺}$ फीनॉल (डाऊ प्रक्रम)
      • इलेक्ट्रॉन-अपकर्षी समूह (जैसे -NO₂) की ऑर्थो और पैरा स्थिति पर उपस्थिति नाभिकरागी प्रतिस्थापन को आसान बनाती है क्योंकि यह मध्यवर्ती कार्बेनायन को स्थायी करता है।
        • उदाहरण: p-नाइट्रोक्लोरोबेन्ज़ीन $\xrightarrow{NaOH, 443K}$ p-नाइट्रोफीनॉल।
        • 2,4,6-ट्राईनाइट्रोक्लोरोबेन्ज़ीन $\xrightarrow{H₂O, ऊष्मा}$ पिकरिक अम्ल।
  2. इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ (Electrophilic Substitution Reactions):

    • हैलोजन परमाणु ऑर्थो-पैरा निर्देशक होते हैं लेकिन निष्क्रियकारी होते हैं (अनुनाद के माध्यम से इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ाते हैं, लेकिन -I प्रभाव के कारण वलय को निष्क्रिय करते हैं)।
    • हैलोजनीकरण: क्लोरोबेन्ज़ीन + Cl₂ $\xrightarrow{निर्जल FeCl₃}$ 1,4-डाइक्लोरोबेन्ज़ीन (मुख्य) + 1,2-डाइक्लोरोबेन्ज़ीन
    • नाइट्रीकरण: क्लोरोबेन्ज़ीन + Conc. HNO₃/Conc. H₂SO₄ $\xrightarrow{ऊष्मा}$ 1-क्लोरो-4-नाइट्रोबेन्ज़ीन (मुख्य) + 1-क्लोरो-2-नाइट्रोबेन्ज़ीन
    • सल्फोनीकरण: क्लोरोबेन्ज़ीन + Conc. H₂SO₄ $\xrightarrow{ऊष्मा}$ 4-क्लोरोबेन्ज़ीनसल्फोनिक अम्ल (मुख्य) + 2-क्लोरोबेन्ज़ीनसल्फोनिक अम्ल
    • फ्रीडेल-क्राफ्ट्स अभिक्रियाएँ:
      • ऐल्किलीकरण: क्लोरोबेन्ज़ीन + CH₃Cl $\xrightarrow{निर्जल AlCl₃}$ 1-क्लोरो-4-मेथिलबेन्ज़ीन (मुख्य) + 1-क्लोरो-2-मेथिलबेन्ज़ीन
      • ऐसिलिकरण: क्लोरोबेन्ज़ीन + CH₃COCl $\xrightarrow{निर्जल AlCl₃}$ 4-क्लोरोऐसीटोफीनोन (मुख्य) + 2-क्लोरोऐसीटोफीनोन
  3. धातुओं के साथ अभिक्रियाएँ (Reactions with Metals):

    • वुर्ट्ज़-फिटिग अभिक्रिया (Wurtz-Fittig reaction): ऐरिल हैलाइड और ऐल्किल हैलाइड को सोडियम के साथ शुष्क ईथर में अभिकृत करने पर ऐल्किलऐरीन बनता है।
      • Ar-X + R-X + 2Na $\xrightarrow{शुष्क ईथर}$ Ar-R + 2NaX
    • फिटिग अभिक्रिया (Fittig reaction): दो ऐरिल हैलाइड अणुओं को सोडियम के साथ शुष्क ईथर में अभिकृत करने पर बाईफेनिल बनता है।
      • 2Ar-X + 2Na $\xrightarrow{शुष्क ईथर}$ Ar-Ar + 2NaX
    • उल्मान अभिक्रिया (Ullmann reaction): आयोडोबेन्ज़ीन को कॉपर चूर्ण के साथ गर्म करने पर बाईफेनिल बनता है।
      • 2C₆H₅I + 2Cu $\xrightarrow{ऊष्मा}$ C₆H₅-C₆H₅ + 2CuI

8. पॉलीहैलोजन यौगिक (Polyhalogen Compounds)

  • डाइक्लोरोमेथेन (मेथिलीन क्लोराइड, CH₂Cl₂):
    • उपयोग: पेंट रिमूवर, प्रोपेलेंट, धातु की सफाई, औषधियों का विलायक।
    • हानिकारक प्रभाव: केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को नुकसान, चक्कर आना, मतली, यकृत को क्षति।
  • ट्राईक्लोरोमेथेन (क्लोरोफॉर्म, CHCl₃):
    • विरचन: ऐल्कोहॉल या एसीटोन का विरंजक चूर्ण (ब्लीचिंग पाउडर) के साथ अभिक्रिया।
    • उपयोग: पहले निश्चेतक के रूप में, अब विलायक के रूप में, फ्रेऑन के उत्पादन में।
    • हानिकारक प्रभाव: वायु और प्रकाश की उपस्थिति में फॉस्जीन (COCl₂, विषैली गैस) बनाता है। यकृत और गुर्दे को क्षति।
    • भंडारण: गहरे रंग की बोतलों में, मुंह तक भरकर, थोड़ी मात्रा में ऐथेनॉल (0.6-1%) मिलाकर (जो फॉस्जीन को डाइएथिल कार्बोनेट में बदल देता है)।
  • ट्राईआयोडोमेथेन (आयोडोफॉर्म, CHI₃):
    • विरचन: ऐथेनॉल या एसीटोन को आयोडीन और NaOH के साथ गर्म करने पर (आयोडोफॉर्म अभिक्रिया)।
    • उपयोग: एंटीसेप्टिक (आयोडोफॉर्म की गंध के कारण नहीं, बल्कि मुक्त I₂ के कारण)।
  • टेट्राक्लोरोमेथेन (कार्बन टेट्राक्लोराइड, CCl₄):
    • उपयोग: अग्निशामक (पाइरीन), विलायक, रेफ्रिजरेंट और एरोसोल के लिए प्रोपेलेंट के निर्माण में।
    • हानिकारक प्रभाव: ओजोन परत का क्षरण, यकृत कैंसर, चक्कर आना, कोमा।
  • फ्रेऑन (Freons): क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) जैसे CCl₂F₂ (फ्रेऑन-12)।
    • उपयोग: रेफ्रिजरेंट, एयर कंडीशनिंग, एरोसोल प्रोपेलेंट।
    • हानिकारक प्रभाव: समतापमंडल में ओजोन परत का क्षरण।
  • DDT (डाइक्लोरो-डाइफेनिल-ट्राईक्लोरोएथेन):
    • विरचन: क्लोरल (CCl₃CHO) की क्लोरोबेन्ज़ीन के साथ सांद्र H₂SO₄ की उपस्थिति में अभिक्रिया।
    • उपयोग: शक्तिशाली कीटनाशक।
    • हानिकारक प्रभाव: जैव-आवर्धन (bio-magnification) के कारण पर्यावरण में जमा होता है, मनुष्यों और वन्यजीवों के लिए विषाक्त। कई देशों में प्रतिबंधित।

बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions - MCQs)

निर्देश: प्रत्येक प्रश्न के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुनें।

  1. निम्नलिखित में से कौन-सा यौगिक SN1 अभिक्रिया के प्रति सबसे अधिक क्रियाशील होगा?
    a) CH₃CH₂Br
    b) (CH₃)₂CHBr
    c) (CH₃)₃CBr
    d) CH₃Br

  2. फिन्केलस्टाइन अभिक्रिया का उपयोग किसके संश्लेषण के लिए किया जाता है?
    a) ऐल्किल फ्लोराइड
    b) ऐल्किल क्लोराइड
    c) ऐल्किल ब्रोमाइड
    d) ऐल्किल आयोडाइड

  3. मार्कोनीकॉफ के नियम के अनुसार, प्रोपीन पर HBr के योग का मुख्य उत्पाद क्या है?
    a) 1-ब्रोमोप्रोपेन
    b) 2-ब्रोमोप्रोपेन
    c) 1,2-डाइब्रोमोप्रोपेन
    d) ब्रोमोप्रोपीन

  4. क्लोरोफॉर्म को गहरे रंग की बोतलों में, मुंह तक भरकर और थोड़ी मात्रा में एथेनॉल मिलाकर क्यों रखा जाता है?
    a) इसे अधिक स्थायी बनाने के लिए
    b) इसे फॉस्जीन में बदलने से रोकने के लिए
    c) इसे वायुमंडलीय ऑक्सीजन से बचाने के लिए
    d) उपरोक्त सभी

  5. ऐल्कोहॉलिक KOH के साथ 2-ब्रोमोब्यूटेन की विलोपन अभिक्रिया का मुख्य उत्पाद क्या है?
    a) ब्यूट-1-ईन
    b) ब्यूट-2-ईन
    c) ब्यूटेन
    d) ब्यूटेन-2-ऑल

  6. निम्नलिखित में से कौन-सा हैलोऐरीन नाभिकरागी प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं के प्रति सबसे अधिक क्रियाशील होगा?
    a) क्लोरोबेन्ज़ीन
    b) p-नाइट्रोक्लोरोबेन्ज़ीन
    c) p-मेथिलक्लोरोबेन्ज़ीन
    d) p-मेथॉक्सीक्लोरोबेन्ज़ीन

  7. सैंडमायर अभिक्रिया में, बेन्ज़ीन डाइएज़ोनियम क्लोराइड को Cu₂Cl₂/HCl के साथ अभिकृत करने पर क्या बनता है?
    a) आयोडोबेन्ज़ीन
    b) फ्लोरोबेन्ज़ीन
    c) क्लोरोबेन्ज़ीन
    d) ब्रोमोबेन्ज़ीन

  8. SN2 अभिक्रिया में, उत्पाद के विन्यास में क्या परिवर्तन होता है?
    a) रेसेमिकरण
    b) प्रतिलोमन (Walden inversion)
    c) धारण
    d) कोई परिवर्तन नहीं

  9. ग्रिगनार्ड अभिकर्मक (R-Mg-X) को शुष्क ईथर में क्यों बनाया जाता है?
    a) ईथर एक अच्छा विलायक है
    b) ग्रिगनार्ड अभिकर्मक जल के साथ अभिक्रिया करके हाइड्रोकार्बन देता है
    c) ईथर अभिक्रिया की दर को बढ़ाता है
    d) ईथर एक उत्प्रेरक के रूप में कार्य करता है

  10. DDT का पूरा नाम क्या है और इसका पर्यावरण पर क्या प्रभाव है?
    a) डाइक्लोरो-डाइफेनिल-ट्राईक्लोरोएथेन; ओजोन परत का क्षरण करता है।
    b) डाइक्लोरो-डाइफेनिल-ट्राईक्लोरोएथेन; जैव-आवर्धन का कारण बनता है।
    c) डाइक्लोरो-डाइफेनिल-टेट्राक्लोरोएथेन; ग्रीनहाउस गैस है।
    d) डाइक्लोरो-डाइफेनिल-ट्राईक्लोरोएथेन; मृदा प्रदूषण का कारण बनता है।


उत्तरमाला (Answer Key):

  1. c) (CH₃)₃CBr
  2. d) ऐल्किल आयोडाइड
  3. b) 2-ब्रोमोप्रोपेन
  4. d) उपरोक्त सभी
  5. b) ब्यूट-2-ईन
  6. b) p-नाइट्रोक्लोरोबेन्ज़ीन
  7. c) क्लोरोबेन्ज़ीन
  8. b) प्रतिलोमन (Walden inversion)
  9. b) ग्रिगनार्ड अभिकर्मक जल के साथ अभिक्रिया करके हाइड्रोकार्बन देता है
  10. b) डाइक्लोरो-डाइफेनिल-ट्राईक्लोरोएथेन; जैव-आवर्धन का कारण बनता है।

मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपकी सरकारी परीक्षाओं की तैयारी में सहायक सिद्ध होंगे। इस अध्याय को अच्छी तरह से समझें और नियमित रूप से अभ्यास करें। शुभकामनाएँ!

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