Class 12 Chemistry Notes Chapter 10 (Chapter 10) – Examplar Problems (Hindi) Book

Examplar Problems (Hindi)
प्रिय विद्यार्थियों,

आज हम रसायन विज्ञान के अध्याय 10 'हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन' का विस्तृत अध्ययन करेंगे, जो आपकी सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस अध्याय में हम इन कार्बनिक यौगिकों के परिचय, वर्गीकरण, नामकरण, विरचन की विधियों, भौतिक व रासायनिक गुणधर्मों और कुछ महत्वपूर्ण पॉलीहैलोजन यौगिकों पर चर्चा करेंगे।


अध्याय 10: हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन (Haloalkanes and Haloarenes)

1. परिचय (Introduction)

  • हैलोऐल्केन (Haloalkanes): ये वे कार्बनिक यौगिक हैं जिनमें ऐलिफैटिक हाइड्रोकार्बन (जैसे ऐल्केन) के एक या अधिक हाइड्रोजन परमाणु, हैलोजन परमाणुओं (F, Cl, Br, I) द्वारा प्रतिस्थापित होते हैं। इन्हें ऐल्किल हैलाइड (R-X) भी कहते हैं।
    • उदाहरण: CH₃Cl (क्लोरोमेथेन), CH₃CH₂Br (ब्रोमोएथेन)।
  • हैलोऐरीन (Haloarenes): ये वे कार्बनिक यौगिक हैं जिनमें ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (जैसे बेन्जीन) के एक या अधिक हाइड्रोजन परमाणु, हैलोजन परमाणुओं द्वारा सीधे प्रतिस्थापित होते हैं। इन्हें ऐरिल हैलाइड (Ar-X) भी कहते हैं।
    • उदाहरण: C₆H₅Cl (क्लोरोबेन्जीन), C₆H₅Br (ब्रोमोबेन्जीन)।

2. वर्गीकरण (Classification)

A. हैलोजन परमाणुओं की संख्या के आधार पर:

  • मोनो-हैलोजन यौगिक: जिनमें एक हैलोजन परमाणु होता है। (जैसे CH₃CH₂Cl)
  • डाई-हैलोजन यौगिक: जिनमें दो हैलोजन परमाणु होते हैं। (जैसे CH₂Cl₂)
  • ट्राई-हैलोजन यौगिक: जिनमें तीन हैलोजन परमाणु होते हैं। (जैसे CHCl₃)
  • पॉली-हैलोजन यौगिक: जिनमें तीन से अधिक हैलोजन परमाणु होते हैं।

B. C-X आबंध वाले कार्बन परमाणु के संकरण के आधार पर:

  • sp³ संकरित कार्बन से जुड़े यौगिक (C(sp³)-X):

    • ऐल्किल हैलाइड (R-X): हैलोजन परमाणु एक sp³ संकरित कार्बन परमाणु से जुड़ा होता है। इन्हें प्राथमिक (1°), द्वितीयक (2°) या तृतीयक (3°) ऐल्किल हैलाइड में वर्गीकृत किया जाता है, जो इस बात पर निर्भर करता है कि हैलोजन से जुड़ा कार्बन परमाणु कितने अन्य कार्बन परमाणुओं से जुड़ा है।
      • 1°: CH₃CH₂-Cl
      • 2°: (CH₃)₂CH-Cl
      • 3°: (CH₃)₃C-Cl
    • ऐलिलिक हैलाइड: हैलोजन परमाणु कार्बन-कार्बन द्विबंध से अगले sp³ संकरित कार्बन परमाणु से जुड़ा होता है।
      • उदाहरण: CH₂=CH-CH₂-Cl (3-क्लोरोप्रोप-1-ईन)
    • बेन्ज़िलिक हैलाइड: हैलोजन परमाणु ऐरोमैटिक वलय से अगले sp³ संकरित कार्बन परमाणु से जुड़ा होता है।
      • उदाहरण: C₆H₅-CH₂-Cl (क्लोरोफेनिलमेथेन)
  • sp² संकरित कार्बन से जुड़े यौगिक (C(sp²)-X):

    • वाइनिलिक हैलाइड: हैलोजन परमाणु कार्बन-कार्बन द्विबंध के sp² संकरित कार्बन परमाणु से सीधे जुड़ा होता है।
      • उदाहरण: CH₂=CH-Cl (क्लोरोएथीन)
    • ऐरिल हैलाइड: हैलोजन परमाणु सीधे ऐरोमैटिक वलय के sp² संकरित कार्बन परमाणु से जुड़ा होता है।
      • उदाहरण: C₆H₅-Cl (क्लोरोबेन्जीन)

3. नामकरण (Nomenclature)

  • सामान्य नाम (Common Names): ऐल्किल हैलाइडों के लिए, ऐल्किल समूह के नाम के बाद हैलाइड का नाम लिखते हैं (जैसे मेथिल क्लोराइड, एथिल ब्रोमाइड)। ऐरिल हैलाइडों के लिए, हैलोजन के नाम के बाद ऐरीन का नाम लिखते हैं (जैसे क्लोरोबेन्जीन)।
  • IUPAC नाम (IUPAC Names): हैलोजन को प्रतिस्थापी मानकर नामकरण किया जाता है। हैलोजन परमाणुओं को 'हैलो' (जैसे क्लोरो, ब्रोमो, आयोडो) के रूप में उपसर्ग के रूप में लिखा जाता है।
    • उदाहरण: CH₃CH₂Cl → क्लोरोएथेन
    • उदाहरण: (CH₃)₂CHBr → 2-ब्रोमोप्रोपेन
    • उदाहरण: C₆H₅Cl → क्लोरोबेन्जीन

4. C-X बंध की प्रकृति (Nature of C-X Bond)

  • कार्बन (C) और हैलोजन (X) परमाणुओं की विद्युतऋणात्मकता में अंतर के कारण C-X बंध ध्रुवीय होता है। हैलोजन परमाणु पर आंशिक ऋणात्मक आवेश (δ⁻) और कार्बन परमाणु पर आंशिक धनात्मक आवेश (δ⁺) होता है।
  • C-X बंध की ध्रुवीयता F > Cl > Br > I क्रम में घटती है।
  • C-X बंध की लंबाई C-F < C-Cl < C-Br < C-I क्रम में बढ़ती है।
  • C-X बंध की बंध ऊर्जा C-F > C-Cl > C-Br > C-I क्रम में घटती है।
  • द्विध्रुव आघूर्ण का क्रम CH₃Cl > CH₃F > CH₃Br > CH₃I होता है (CH₃F में उच्च विद्युतऋणात्मकता के बावजूद छोटी बंध लंबाई के कारण CH₃Cl का द्विध्रुव आघूर्ण अधिक होता है)।

5. विरचन की विधियाँ (Methods of Preparation)

A. हैलोऐल्केन का विरचन:

  1. ऐल्कोहॉल से:

    • हाइड्रोजन हैलाइड (HX) से: R-OH + HX → R-X + H₂O (लुकास अभिकर्मक (सांद्र HCl + निर्जल ZnCl₂) का उपयोग 3° ऐल्कोहॉल के लिए तुरंत, 2° के लिए 5-10 मिनट में, 1° के लिए गर्म करने पर)।
    • फॉस्फोरस हैलाइड (PX₃ या PX₅) से:
      • 3ROH + PX₃ → 3RX + H₃PO₃ (जहाँ X = Cl, Br)
      • ROH + PCl₅ → RCl + POCl₃ + HCl
    • थायोनिल क्लोराइड (SOCl₂) से (डार्ज़न विधि): ROH + SOCl₂ → RCl + SO₂↑ + HCl↑ (उत्कृष्ट विधि क्योंकि उपोत्पाद गैसीय होते हैं और आसानी से निकल जाते हैं)।
  2. हाइड्रोकार्बन से:

    • मुक्त मूलक हैलोजनीकरण (ऐल्केन से): CH₄ + Cl₂ (प्रकाश या ऊष्मा) → CH₃Cl + HCl (यह विधि उपयोगी नहीं है क्योंकि यह समावयवी मिश्रण देती है)।
    • ऐल्कीन से:
      • हाइड्रोजन हैलाइड (HX) के संकलन से: CH₂=CH₂ + HBr → CH₃CH₂Br (मार्कोवनिकोव नियम का पालन होता है: H उस कार्बन से जुड़ता है जिस पर अधिक H परमाणु होते हैं, और X उस कार्बन से जिस पर कम H परमाणु होते हैं)।
      • हैलोजन (X₂) के संकलन से: CH₂=CH₂ + Br₂ → CH₂Br-CH₂Br (विसिनल डाईहैलाइड बनते हैं)।
  3. हैलोजन विनिमय (Halogen Exchange):

    • फिन्केलस्टाइन अभिक्रिया (Finkelstein Reaction): R-X + NaI (ऐसीटोन) → R-I + NaX (X = Cl, Br)। NaX का ऐसीटोन में अविलेय होना अभिक्रिया को अग्र दिशा में धकेलता है।
    • स्वार्ट्स अभिक्रिया (Swarts Reaction): R-Br/R-Cl + धात्विक फ्लोराइड (AgF, Hg₂F₂, CoF₂, SbF₃) → R-F + धात्विक ब्रोमाइड/क्लोराइड (फ्लोरोऐल्केन बनाने के लिए)।

B. हैलोऐरीन का विरचन:

  1. इलेक्ट्रोफिलिक प्रतिस्थापन (ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन से):

    • बेन्जीन + Cl₂ (निर्जल FeCl₃) → क्लोरोबेन्जीन + HCl (हैलोजनीकरण)
    • टॉलूईन + Cl₂ (निर्जल FeCl₃) → ऑर्थो-क्लोरोटॉलूईन + पैरा-क्लोरोटॉलूईन
  2. डाइऐज़ोनियम लवण से:

    • सैंडमायर अभिक्रिया (Sandmeyer Reaction): ऐनिलीन को NaNO₂ और HCl से उपचारित करके बेन्जीन डाइऐज़ोनियम क्लोराइड बनाते हैं। इसे Cu₂Cl₂/HCl या Cu₂Br₂/HBr के साथ गर्म करने पर क्लोरोबेन्जीन या ब्रोमोबेन्जीन बनता है।
      • Ar-N₂⁺Cl⁻ + Cu₂Cl₂/HCl → Ar-Cl + N₂
      • Ar-N₂⁺Cl⁻ + Cu₂Br₂/HBr → Ar-Br + N₂
    • गाटरमान अभिक्रिया (Gattermann Reaction): सैंडमायर अभिक्रिया के समान, लेकिन Cu चूर्ण और HX का उपयोग करते हैं।
      • Ar-N₂⁺Cl⁻ + Cu/HCl → Ar-Cl + N₂
      • Ar-N₂⁺Cl⁻ + Cu/HBr → Ar-Br + N₂
    • आयोडोबेन्जीन का विरचन: डाइऐज़ोनियम लवण को KI के साथ गर्म करके।
      • Ar-N₂⁺Cl⁻ + KI → Ar-I + N₂ + KCl

6. भौतिक गुणधर्म (Physical Properties)

  • क्वथनांक:
    • ऐल्किल हैलाइडों के क्वथनांक संगत ऐल्केनों से अधिक होते हैं क्योंकि वे अधिक ध्रुवीय होते हैं और उनमें प्रबल वान्डरवाल्स बल (द्विध्रुव-द्विध्रुव आकर्षण) होते हैं।
    • R-I > R-Br > R-Cl > R-F क्रम में क्वथनांक बढ़ते हैं (आणविक द्रव्यमान बढ़ने के कारण)।
    • शाखाएँ बढ़ने पर क्वथनांक घटता है (सतह क्षेत्र घटने के कारण)।
    • हैलोऐरीन के क्वथनांक संगत ऐल्किल हैलाइडों की तुलना में उच्च होते हैं। सम-और-पैरा-डाईहैलोबेन्जीन के गलनांक ऑर्थो-समावयवी से अधिक होते हैं क्योंकि वे क्रिस्टल जालक में अधिक सममित रूप से फिट होते हैं।
  • घनत्व: आयोडाइड, ब्रोमाइड और पॉलीक्लोरो यौगिक जल से भारी होते हैं। घनत्व R-I > R-Br > R-Cl > R-F क्रम में बढ़ता है।
  • विलेयता: हैलोऐल्केन जल में बहुत कम विलेय होते हैं क्योंकि वे जल के साथ हाइड्रोजन बंध नहीं बना पाते और जल-जल हाइड्रोजन बंधों को तोड़ने के लिए पर्याप्त ऊर्जा मुक्त नहीं करते। वे कार्बनिक विलायकों में विलेय होते हैं।

7. रासायनिक अभिक्रियाएँ (Chemical Reactions)

A. हैलोऐल्केन की अभिक्रियाएँ:

  1. नाभिकरागी प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ (Nucleophilic Substitution Reactions, SN):

    • हैलोऐल्केन में C-X बंध ध्रुवीय होता है, जिससे कार्बन पर आंशिक धनात्मक आवेश आता है। नाभिकरागी (Nu⁻) इस इलेक्ट्रॉन-न्यून कार्बन पर आक्रमण करता है और हैलोजन परमाणु (X⁻, लिविंग ग्रुप) को विस्थापित कर देता है।

    • SN1 अभिक्रिया (एकाण्विक नाभिकरागी प्रतिस्थापन):

      • दो चरणों में होती है।
      • प्रथम चरण में कार्बोकैटायन बनता है (धीमा, दर-निर्धारक चरण)।
      • अभिक्रिया की दर केवल ऐल्किल हैलाइड की सांद्रता पर निर्भर करती है।
      • क्रियाशीलता का क्रम: 3° > 2° > 1° > CH₃X (कार्बोकैटायन के स्थायित्व के कारण)।
      • ध्रुवीय प्रोटिक विलायक (जैसे जल, ऐल्कोहॉल) अभिक्रिया को बढ़ावा देते हैं।
      • त्रिविम रसायन: रेसेमीकरण होता है (यदि काइरल कार्बन हो)।
    • SN2 अभिक्रिया (द्विआण्विक नाभिकरागी प्रतिस्थापन):

      • एक ही चरण में होती है (संक्रमण अवस्था बनती है)।
      • नाभिकरागी पीछे से आक्रमण करता है और हैलोजन परमाणु निकलता है।
      • अभिक्रिया की दर ऐल्किल हैलाइड और नाभिकरागी दोनों की सांद्रता पर निर्भर करती है।
      • क्रियाशीलता का क्रम: CH₃X > 1° > 2° > 3° (त्रिविम बाधा के कारण)।
      • ध्रुवीय अप्रोटिक विलायक (जैसे ऐसीटोन, DMF) अभिक्रिया को बढ़ावा देते हैं।
      • त्रिविम रसायन: विन्यास का व्युत्क्रमण (वाल्डेन व्युत्क्रमण) होता है।
    • विभिन्न नाभिकरागी द्वारा प्रतिस्थापन:

      • जलीय KOH/NaOH: R-OH (ऐल्कोहॉल)
      • H₂O: R-OH (ऐल्कोहॉल)
      • RO⁻Na⁺ (सोडियम ऐल्कॉक्साइड): R-O-R' (ईथर, विलियमसन संश्लेषण)
      • KCN: R-CN (ऐल्किल सायनाइड)
      • AgCN: R-NC (ऐल्किल आइसोसायनाइड)
      • KNO₂: R-ONO (ऐल्किल नाइट्राइट)
      • AgNO₂: R-NO₂ (नाइट्रोऐल्केन)
      • NH₃ (ऐल्कोहॉलिक): R-NH₂ (प्राथमिक ऐमीन)
      • R'NH₂: R-NH-R' (द्वितीयक ऐमीन)
      • R'R''NH: R-NR'R'' (तृतीयक ऐमीन)
      • R-C≡C⁻Na⁺ (सोडियम ऐल्काइनाइड): R-C≡C-R' (ऐल्काइन)
      • RCOO⁻Ag⁺ (सिल्वर कार्बोक्सिलेट): R-COO-R' (एस्टर)
  2. विलोपन अभिक्रियाएँ (Elimination Reactions, E):

    • बीटा-विलोपन (β-elimination) या डीहाइड्रोहैलोजनीकरण: जब ऐल्किल हैलाइड को ऐल्कोहॉलिक KOH के साथ गर्म किया जाता है, तो β-कार्बन से हाइड्रोजन परमाणु और α-कार्बन से हैलोजन परमाणु निकलता है, जिससे एक ऐल्कीन बनती है।
    • सेत्जेफ नियम (Saytzeff's Rule): यदि एक से अधिक ऐल्कीन बनने की संभावना हो, तो वह ऐल्कीन मुख्य उत्पाद होती है जिसमें द्विबंध से जुड़े कार्बन परमाणुओं पर अधिक ऐल्किल समूह होते हैं (अर्थात अधिक प्रतिस्थापित ऐल्कीन)।
  3. धातुओं के साथ अभिक्रियाएँ (Reactions with Metals):

    • मैग्नीशियम (Mg): R-X + Mg (शुष्क ईथर) → R-MgX (ग्रिगनार्ड अभिकर्मक)। ये अत्यंत क्रियाशील होते हैं और प्रोटॉन स्रोतों (जल, ऐल्कोहॉल, ऐमीन) से अभिक्रिया कर हाइड्रोकार्बन बनाते हैं।
    • सोडियम (Na) (वुर्ट्ज़ अभिक्रिया): 2RX + 2Na (शुष्क ईथर) → R-R + 2NaX (सम संख्या में कार्बन परमाणु वाले ऐल्केन बनाने के लिए)।
    • लिथियम (Li): R-X + 2Li → R-Li + LiX (ऐल्किल लिथियम यौगिक)।
    • जिंक (Zn) (फ्रेंकलैंड अभिक्रिया): 2RX + 2Zn → R-R + 2ZnX₂ (वुर्ट्ज़ अभिक्रिया के समान)।

B. हैलोऐरीन की अभिक्रियाएँ:

  1. नाभिकरागी प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ:

    • हैलोऐरीन, हैलोऐल्केन की तुलना में नाभिकरागी प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं के प्रति कम क्रियाशील होते हैं। इसके कारण:
      • अनुनाद प्रभाव: हैलोजन का एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म बेन्जीन वलय के साथ अनुनाद करता है, जिससे C-X बंध में आंशिक द्विबंध गुण आ जाता है और यह अधिक मजबूत हो जाता है।
      • C-X बंध में sp² संकरित कार्बन: हैलोऐरीन में हैलोजन परमाणु sp² संकरित कार्बन से जुड़ा होता है, जो sp³ संकरित कार्बन की तुलना में अधिक विद्युतऋणात्मक होता है। इससे C-X बंध छोटा और मजबूत होता है।
      • फेनिल धनायन की अस्थिरता: SN1 अभिक्रिया के लिए बनने वाला फेनिल धनायन बहुत अस्थिर होता है।
      • इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षण: नाभिकरागी और इलेक्ट्रॉन-समृद्ध ऐरीन वलय के बीच प्रतिकर्षण।
    • कठोर परिस्थितियों में प्रतिस्थापन:
      • डाऊ प्रक्रम (Dow's Process): क्लोरोबेन्जीन को 623 K पर 300 atm दाब पर NaOH के साथ गर्म करने पर फिनॉल बनता है।
      • इलेक्ट्रॉन आकर्षी समूह (जैसे -NO₂) की उपस्थिति में क्रियाशीलता बढ़ती है, खासकर ऑर्थो और पैरा स्थिति पर।
  2. इलेक्ट्रोफिलिक प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ:

    • हैलोजन परमाणु ऑर्थो-पैरा-निर्देशक होते हैं लेकिन वलय को निष्क्रिय करते हैं (इलेक्ट्रॉन घनत्व को कम करते हैं)।
    • हैलोजनीकरण: क्लोरोबेन्जीन + Cl₂ (निर्जल FeCl₃) → 1,4-डाईक्लोरोबेन्जीन (मुख्य) + 1,2-डाईक्लोरोबेन्जीन
    • नाइट्रीकरण: क्लोरोबेन्जीन + सांद्र HNO₃/H₂SO₄ → 1-क्लोरो-4-नाइट्रोबेन्जीन (मुख्य) + 1-क्लोरो-2-नाइट्रोबेन्जीन
    • सल्फोनीकरण: क्लोरोबेन्जीन + सांद्र H₂SO₄ → 4-क्लोरोबेन्जीनसल्फॉनिक अम्ल (मुख्य) + 2-क्लोरोबेन्जीनसल्फॉनिक अम्ल
    • फ्रीडल-क्राफ्ट अभिक्रियाएँ:
      • ऐल्किलीकरण: क्लोरोबेन्जीन + CH₃Cl (निर्जल AlCl₃) → 1-क्लोरो-4-मेथिलबेन्जीन (मुख्य) + 1-क्लोरो-2-मेथिलबेन्जीन
      • ऐसिलीकरण: क्लोरोबेन्जीन + CH₃COCl (निर्जल AlCl₃) → 4-क्लोरोएसीटोफीनोन (मुख्य) + 2-क्लोरोएसीटोफीनोन
  3. धातुओं के साथ अभिक्रियाएँ:

    • वुर्ट्ज़-फिटिग अभिक्रिया: ऐरिल हैलाइड + ऐल्किल हैलाइड + 2Na (शुष्क ईथर) → ऐल्किलऐरीन + 2NaX
    • फिटिग अभिक्रिया: 2 ऐरिल हैलाइड + 2Na (शुष्क ईथर) → डाईफेनिल + 2NaX

8. पॉलीहैलोजन यौगिक (Polyhalogen Compounds)

  • डाईक्लोरोमेथेन (CH₂Cl₂, मेथिलीन क्लोराइड):
    • उपयोग: पेंट उतारने वाले, प्रणोदक, धातु की सफाई करने वाले।
    • स्वास्थ्य प्रभाव: तंत्रिका तंत्र को नुकसान।
  • ट्राईक्लोरोमेथेन (CHCl₃, क्लोरोफॉर्म):
    • विरचन: एथेनॉल या ऐसीटोन के हैलोजनीकरण से।
    • उपयोग: पहले निश्चेतक के रूप में, अब विलायक के रूप में।
    • स्वास्थ्य प्रभाव: यकृत को नुकसान, वायुमंडल में ऑक्सीकृत होकर जहरीली फॉस्जीन (COCl₂) गैस बनाता है। इसे गहरे रंग की बोतलों में, मुंह तक भरकर, थोड़ी मात्रा में एथेनॉल मिलाकर रखते हैं ताकि फॉस्जीन बनने से रोका जा सके।
  • ट्राईआयोडोमेथेन (CHI₃, आयोडोफॉर्म):
    • उपयोग: पूतिरोधी (एंटीसेप्टिक) के रूप में (आयोडोफॉर्म की गंध के कारण अब कम उपयोग)।
  • टेट्राक्लोरोमेथेन (CCl₄, कार्बन टेट्राक्लोराइड):
    • उपयोग: अग्निशामक (पाइरीन), विलायक, प्रशीतक के विरचन में।
    • स्वास्थ्य प्रभाव: यकृत कैंसर, तंत्रिका तंत्र को नुकसान, ओजोन परत का क्षरण।
  • फ्रीऑन (Freons): क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) जैसे CCl₂F₂ (फ्रीऑन-12)।
    • उपयोग: प्रशीतक, प्रणोदक।
    • पर्यावरणीय प्रभाव: समतापमंडल में ओजोन परत का गंभीर क्षरण।
  • DDT (डाईक्लोरो-डाईफेनिल-ट्राईक्लोरोएथेन):
    • विरचन: क्लोरल (CCl₃CHO) की क्लोरोबेन्जीन के साथ अभिक्रिया से।
    • उपयोग: शक्तिशाली कीटनाशक।
    • पर्यावरणीय प्रभाव: जैव-आवर्धन (बायोमैग्निफिकेशन), पक्षियों और मछलियों के लिए विषाक्त, पर्यावरण में आसानी से अपघटित नहीं होता।

9. पर्यावरणीय प्रभाव (Environmental Effects)

  • कई पॉलीहैलोजन यौगिक (जैसे CFCs, DDT, CCl₄) पर्यावरण के लिए हानिकारक हैं। वे ओजोन परत का क्षरण करते हैं, जैव-आवर्धन का कारण बनते हैं और मनुष्यों तथा वन्यजीवों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।

बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions - MCQs)

1. निम्न में से कौन-सी अभिक्रिया हैलोऐल्केन बनाने की सबसे अच्छी विधि है?
a) ROH + HX
b) ROH + SOCl₂
c) ROH + PX₃
d) ऐल्केन का मुक्त मूलक हैलोजनीकरण
सही उत्तर: b) ROH + SOCl₂
(थायोनिल क्लोराइड विधि में गैसीय उपोत्पाद (SO₂ और HCl) बनते हैं जो आसानी से अभिक्रिया मिश्रण से निकल जाते हैं, जिससे शुद्ध ऐल्किल क्लोराइड प्राप्त होता है।)

2. SN1 अभिक्रिया में क्रियाशीलता का सही क्रम क्या है?
a) 1° > 2° > 3°
b) 3° > 2° > 1°
c) CH₃X > 1° > 2°
d) 2° > 1° > 3°
सही उत्तर: b) 3° > 2° > 1°
(SN1 अभिक्रिया में कार्बोकैटायन बनता है, और 3° कार्बोकैटायन सबसे अधिक स्थायी होता है।)

3. वुर्ट्ज़ अभिक्रिया का उपयोग _______ बनाने के लिए किया जाता है।
a) विषम संख्या वाले कार्बन परमाणु वाले ऐल्केन
b) सम संख्या वाले कार्बन परमाणु वाले ऐल्केन
c) ऐल्कीन
d) ऐल्काइन
सही उत्तर: b) सम संख्या वाले कार्बन परमाणु वाले ऐल्केन
(वुर्ट्ज़ अभिक्रिया में दो ऐल्किल हैलाइड सोडियम के साथ अभिक्रिया करके सममित ऐल्केन बनाते हैं।)

4. क्लोरोफॉर्म को गहरे रंग की बोतलों में, मुंह तक भरकर क्यों रखा जाता है?
a) ऑक्सीकरण को रोकने के लिए
b) अपचयन को रोकने के लिए
c) प्रकाश अपघटन को रोकने के लिए
d) वाष्पीकरण को रोकने के लिए
सही उत्तर: a) ऑक्सीकरण को रोकने के लिए
(क्लोरोफॉर्म प्रकाश और वायु की उपस्थिति में ऑक्सीकृत होकर विषैली फॉस्जीन गैस बनाता है।)

5. निम्न में से कौन-सा यौगिक नाभिकरागी प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं के प्रति सबसे कम क्रियाशील है?
a) CH₃CH₂Cl
b) (CH₃)₃CCl
c) C₆H₅Cl
d) CH₂=CH-CH₂Cl
सही उत्तर: c) C₆H₅Cl
(हैलोऐरीन (क्लोरोबेन्जीन) अनुनाद के कारण C-Cl बंध में आंशिक द्विबंध गुण होने से नाभिकरागी प्रतिस्थापन के प्रति कम क्रियाशील होते हैं।)

6. फिनकेलस्टाइन अभिक्रिया का उपयोग _______ बनाने के लिए किया जाता है।
a) ऐल्किल फ्लोराइड
b) ऐल्किल क्लोराइड
c) ऐल्किल ब्रोमाइड
d) ऐल्किल आयोडाइड
सही उत्तर: d) ऐल्किल आयोडाइड
(यह हैलोजन विनिमय अभिक्रिया है जिसमें ऐल्किल क्लोराइड या ब्रोमाइड को सोडियम आयोडाइड के साथ अभिक्रिया कराकर ऐल्किल आयोडाइड बनाया जाता है।)

7. DDT का पूरा नाम क्या है?
a) डाईक्लोरो-डाईफेनिल-ट्राईमेथिलएथेन
b) डाईक्लोरो-डाईफेनिल-ट्राईक्लोरोएथेन
c) डाईब्रोमो-डाईफेनिल-ट्राईक्लोरोएथेन
d) डाईक्लोरो-डाईफेनिल-टेट्राक्लोरोएथेन
सही उत्तर: b) डाईक्लोरो-डाईफेनिल-ट्राईक्लोरोएथेन

8. जब 2-ब्रोमोप्रोपेन को ऐल्कोहॉलिक KOH के साथ गर्म किया जाता है, तो मुख्य उत्पाद क्या होगा?
a) प्रोपेन
b) प्रोपीन
c) प्रोपेनॉल
d) प्रोपाइन
सही उत्तर: b) प्रोपीन
(यह β-विलोपन अभिक्रिया है जिसमें हैलोजन और β-हाइड्रोजन का निष्कासन होता है, जिससे ऐल्कीन बनती है।)

9. ग्रिगनार्ड अभिकर्मक (RMgX) जल के साथ अभिक्रिया करके क्या बनाता है?
a) ऐल्कोहॉल
b) ऐल्कीन
c) ऐल्केन
d) ईथर
सही उत्तर: c) ऐल्केन
(ग्रिगनार्ड अभिकर्मक अत्यधिक क्रियाशील होते हैं और जल जैसे प्रोटॉन स्रोतों से अभिक्रिया करके संगत ऐल्केन बनाते हैं।)

10. निम्न में से कौन-सा यौगिक ओजोन परत के क्षरण के लिए जिम्मेदार है?
a) क्लोरोफॉर्म
b) कार्बन टेट्राक्लोराइड
c) फ्रीऑन
d) आयोडोफॉर्म
सही उत्तर: c) फ्रीऑन
(क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) या फ्रीऑन समतापमंडल में ओजोन परत के क्षरण के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं।)


यह विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपको इस अध्याय की गहन समझ प्रदान करेंगे और आपकी सरकारी परीक्षाओं की तैयारी में सहायक होंगे। शुभकामनाएँ!

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