Class 12 Chemistry Notes Chapter 11 (Chapter 11) – Examplar Problems (Hindi) Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम रसायन विज्ञान के अध्याय 11, 'ऐल्कोहॉल, फिनॉल एवं ईथर' का विस्तृत अध्ययन करेंगे, जो आपकी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस अध्याय के मुख्य बिंदुओं को ध्यानपूर्वक समझें।
अध्याय 11: ऐल्कोहॉल, फिनॉल एवं ईथर (Alcohols, Phenols and Ethers)
यह अध्याय कार्बनिक यौगिकों के तीन महत्वपूर्ण वर्गों - ऐल्कोहॉल, फिनॉल और ईथर - से संबंधित है। इन यौगिकों में ऑक्सीजन परमाणु होता है और ये दैनिक जीवन तथा उद्योगों में व्यापक रूप से उपयोग किए जाते हैं।
1. ऐल्कोहॉल (Alcohols)
ऐल्कोहॉल वे कार्बनिक यौगिक हैं जिनमें एक या अधिक हाइड्रॉक्सिल (-OH) समूह संतृप्त कार्बन परमाणु से सीधे जुड़े होते हैं। इनका सामान्य सूत्र R-OH होता है।
1.1. वर्गीकरण (Classification):
- हाइड्रॉक्सिल समूहों की संख्या के आधार पर:
- मोनोहाइड्रिक ऐल्कोहॉल: जिनमें एक -OH समूह होता है (जैसे CH₃OH, C₂H₅OH)।
- डाईहाइड्रिक ऐल्कोहॉल (ग्लाइकॉल): जिनमें दो -OH समूह होते हैं (जैसे एथेन-1,2-डाईऑल)।
- ट्राईहाइड्रिक ऐल्कोहॉल (ग्लिसरॉल): जिनमें तीन -OH समूह होते हैं (जैसे प्रोपेन-1,2,3-ट्राईऑल)।
- -OH समूह से जुड़े कार्बन परमाणु की प्रकृति के आधार पर:
- प्राथमिक (1°) ऐल्कोहॉल: -OH समूह प्राथमिक कार्बन (जो एक अन्य कार्बन से जुड़ा हो) से जुड़ा होता है।
- द्वितीयक (2°) ऐल्कोहॉल: -OH समूह द्वितीयक कार्बन (जो दो अन्य कार्बन से जुड़ा हो) से जुड़ा होता है।
- तृतीयक (3°) ऐल्कोहॉल: -OH समूह तृतीयक कार्बन (जो तीन अन्य कार्बन से जुड़ा हो) से जुड़ा होता है।
- संकरण के आधार पर:
- sp³ संकरित कार्बन से जुड़े यौगिक:
- ऐल्किल ऐल्कोहॉल: R-CH₂-OH (जैसे मेथनॉल)।
- ऐलिलिक ऐल्कोहॉल: -OH समूह sp³ संकरित कार्बन से जुड़ा होता है, जो आगे एक कार्बन-कार्बन द्विबंध से जुड़ा होता है (जैसे CH₂=CH-CH₂-OH)।
- बेंज़िलिक ऐल्कोहॉल: -OH समूह sp³ संकरित कार्बन से जुड़ा होता है, जो आगे एक ऐरोमैटिक वलय से जुड़ा होता है (जैसे C₆H₅-CH₂-OH)।
- sp² संकरित कार्बन से जुड़े यौगिक (विनिलिक ऐल्कोहॉल): -OH समूह सीधे कार्बन-कार्बन द्विबंध वाले कार्बन से जुड़ा होता है। ये सामान्यतः अस्थायी होते हैं और टॉटोमेरिज़्म द्वारा ऐल्डिहाइड या कीटोन में परिवर्तित हो जाते हैं।
- sp³ संकरित कार्बन से जुड़े यौगिक:
1.2. नामकरण (Nomenclature):
- सामान्य नाम: ऐल्किल समूह के नाम के बाद 'ऐल्कोहॉल' जोड़ा जाता है (जैसे मेथिल ऐल्कोहॉल, एथिल ऐल्कोहॉल)।
- IUPAC नाम: ऐल्केन के 'e' को हटाकर 'ol' जोड़ा जाता है। -OH समूह की स्थिति को संख्या से दर्शाया जाता है। (जैसे मेथनॉल, एथनॉल, प्रोपेन-1-ऑल)।
1.3. विरचन की विधियाँ (Methods of Preparation):
- ऐल्कीन से:
- अम्ल-उत्प्रेरित जल-योजन (Acid-catalysed Hydration): ऐल्कीन पर जल का योग मार्कोवनिकोव नियम के अनुसार होता है।
R-CH=CH₂ + H₂O (H⁺) → R-CH(OH)-CH₃ - हाइड्रोबोरॉनन-ऑक्सीकरण (Hydroboration-Oxidation): ऐल्कीन पर डाइबोरेन (BH₃)₂ का योग, उसके बाद क्षारीय हाइड्रोजन परॉक्साइड (H₂O₂) द्वारा ऑक्सीकरण। यह ऐंटी-मार्कोवनिकोव योग देता है।
R-CH=CH₂ + (BH₃)₂ → (R-CH₂-CH₂)₃B → R-CH₂-CH₂-OH (H₂O₂, OH⁻)
- अम्ल-उत्प्रेरित जल-योजन (Acid-catalysed Hydration): ऐल्कीन पर जल का योग मार्कोवनिकोव नियम के अनुसार होता है।
- कार्बोनिल यौगिकों से:
- ऐल्डिहाइड और कीटोन के अपचयन से:
- LiAlH₄ (लिथियम ऐलुमिनियम हाइड्राइड) या NaBH₄ (सोडियम बोरोहाइड्राइड) जैसे अपचायकों द्वारा।
- ऐल्डिहाइड प्राथमिक ऐल्कोहॉल देते हैं, कीटोन द्वितीयक ऐल्कोहॉल देते हैं।
R-CHO + [H] → R-CH₂-OH (प्राथमिक)
R-CO-R' + [H] → R-CH(OH)-R' (द्वितीयक)
- कार्बोक्सिलिक अम्लों और एस्टर के अपचयन से:
- कार्बोक्सिलिक अम्ल और एस्टर LiAlH₄ द्वारा प्राथमिक ऐल्कोहॉल में अपचयित होते हैं।
R-COOH + LiAlH₄ → R-CH₂-OH
R-COOR' + LiAlH₄ → R-CH₂-OH + R'-OH
- कार्बोक्सिलिक अम्ल और एस्टर LiAlH₄ द्वारा प्राथमिक ऐल्कोहॉल में अपचयित होते हैं।
- ऐल्डिहाइड और कीटोन के अपचयन से:
- ग्रीन्यार अभिकर्मक से (Grignard Reagent):
- फॉर्मेल्डिहाइड + RMgX → प्राथमिक ऐल्कोहॉल
- अन्य ऐल्डिहाइड + RMgX → द्वितीयक ऐल्कोहॉल
- कीटोन + RMgX → तृतीयक ऐल्कोहॉल
1.4. भौतिक गुणधर्म (Physical Properties):
- क्वथनांक: ऐल्कोहॉलों का क्वथनांक संगत ऐल्केन और हैलोऐल्केन की तुलना में अधिक होता है, क्योंकि इनके अणुओं के बीच हाइड्रोजन बंध बनते हैं।
- विलेयता: निम्नतर ऐल्कोहॉल जल में अत्यधिक विलेय होते हैं, क्योंकि वे जल के अणुओं के साथ हाइड्रोजन बंध बना सकते हैं। ऐल्किल समूह का आकार बढ़ने पर विलेयता घटती है।
1.5. रासायनिक अभिक्रियाएँ (Chemical Reactions):
ऐल्कोहॉल दो प्रकार की अभिक्रियाएँ देते हैं:
- O-H बंध के विदलन के कारण:
- अम्लीय प्रकृति: ऐल्कोहॉल दुर्बल अम्ल होते हैं, जो सक्रिय धातुओं (Na, K, Al) से अभिक्रिया कर ऐल्कॉक्साइड बनाते हैं और H₂ गैस मुक्त करते हैं।
2R-OH + 2Na → 2R-O⁻Na⁺ + H₂ - एस्टरीकरण (Esterification): कार्बोक्सिलिक अम्लों या अम्ल व्युत्पन्नों के साथ अभिक्रिया कर एस्टर बनाते हैं।
R-COOH + R'-OH (H⁺) ⇌ R-COOR' + H₂O
- अम्लीय प्रकृति: ऐल्कोहॉल दुर्बल अम्ल होते हैं, जो सक्रिय धातुओं (Na, K, Al) से अभिक्रिया कर ऐल्कॉक्साइड बनाते हैं और H₂ गैस मुक्त करते हैं।
- C-O बंध के विदलन के कारण:
- हैलोजन अम्लों (HX) से अभिक्रिया: लुकास अभिकर्मक (सांद्र HCl + निर्जल ZnCl₂) का उपयोग 1°, 2°, 3° ऐल्कोहॉलों में अंतर करने के लिए किया जाता है।
R-OH + HX → R-X + H₂O
(3° > 2° > 1° अभिक्रियाशीलता का क्रम) - फॉस्फोरस ट्राइहैलाइड (PX₃) से अभिक्रिया:
3R-OH + PX₃ → 3R-X + H₃PO₃ - थायोनिल क्लोराइड (SOCl₂) से अभिक्रिया:
R-OH + SOCl₂ → R-Cl + SO₂ + HCl (डार्जन अभिक्रिया) - निर्जलीकरण (Dehydration): सांद्र H₂SO₄ या Al₂O₃ की उपस्थिति में ऐल्कीन बनाते हैं।
R-CH₂-CH₂-OH (H₂SO₄/170°C) → R-CH=CH₂ + H₂O
(3° > 2° > 1° निर्जलीकरण का क्रम)
- हैलोजन अम्लों (HX) से अभिक्रिया: लुकास अभिकर्मक (सांद्र HCl + निर्जल ZnCl₂) का उपयोग 1°, 2°, 3° ऐल्कोहॉलों में अंतर करने के लिए किया जाता है।
- ऑक्सीकरण अभिक्रियाएँ:
- प्राथमिक ऐल्कोहॉल: PCC (पिरीडीनियम क्लोरोक्रोमेट) द्वारा ऐल्डिहाइड में, और प्रबल ऑक्सीकारकों (जैसे अम्लीय KMnO₄, CrO₃) द्वारा कार्बोक्सिलिक अम्ल में ऑक्सीकृत होते हैं।
R-CH₂-OH (PCC) → R-CHO
R-CH₂-OH (प्रबल ऑक्सीकारक) → R-COOH - द्वितीयक ऐल्कोहॉल: कीटोन में ऑक्सीकृत होते हैं।
R-CH(OH)-R' (CrO₃) → R-CO-R' - तृतीयक ऐल्कोहॉल: सामान्यतः ऑक्सीकृत नहीं होते हैं, लेकिन प्रबल परिस्थितियों में C-C बंध विदलन द्वारा ऐल्कीन और फिर कार्बोक्सिलिक अम्ल देते हैं।
- प्राथमिक ऐल्कोहॉल: PCC (पिरीडीनियम क्लोरोक्रोमेट) द्वारा ऐल्डिहाइड में, और प्रबल ऑक्सीकारकों (जैसे अम्लीय KMnO₄, CrO₃) द्वारा कार्बोक्सिलिक अम्ल में ऑक्सीकृत होते हैं।
- विहाइड्रोजनीकरण (Dehydrogenation): गर्म कॉपर (573 K) पर ऐल्कोहॉल को गुजारने पर।
- प्राथमिक ऐल्कोहॉल → ऐल्डिहाइड
- द्वितीयक ऐल्कोहॉल → कीटोन
- तृतीयक ऐल्कोहॉल → ऐल्कीन
2. फिनॉल (Phenols)
फिनॉल वे यौगिक हैं जिनमें हाइड्रॉक्सिल (-OH) समूह सीधे बेंजीन वलय से जुड़ा होता है।
2.1. वर्गीकरण और नामकरण:
- मोनोहाइड्रिक, डाईहाइड्रिक, ट्राईहाइड्रिक फिनॉल।
- सामान्य नाम: फिनॉल, रिसोर्सिनॉल, कैटेकॉल, क्विनॉल।
- IUPAC नाम: बेंजीनॉल।
2.2. विरचन की विधियाँ (Methods of Preparation):
- हैलोजनऐरीन से (डाऊ प्रक्रम): क्लोरोबेंजीन को NaOH के साथ उच्च ताप और दाब पर गर्म करने पर सोडियम फिनॉक्साइड बनता है, जिसका अम्लीकरण करने पर फिनॉल प्राप्त होता है।
C₆H₅-Cl + NaOH (623K, 300 atm) → C₆H₅-ONa → C₆H₅-OH - बेंजीन सल्फोनिक अम्ल से: बेंजीन को सल्फोनीकृत करके बेंजीन सल्फोनिक अम्ल बनाया जाता है, जिसे NaOH के साथ गर्म करने पर फिनॉल मिलता है।
C₆H₅-SO₃H + NaOH → C₆H₅-ONa → C₆H₅-OH - डाईएजोनियम लवण से: ऐनिलीन से बेंजीन डाईएजोनियम क्लोराइड बनाकर, उसे गर्म जल के साथ अभिक्रिया कराने पर फिनॉल प्राप्त होता है।
C₆H₅-N₂⁺Cl⁻ + H₂O (गर्म) → C₆H₅-OH + N₂ + HCl - क्यूमीन से (औद्योगिक विधि): क्यूमीन (आइसोप्रोपिलबेंजीन) का वायु द्वारा ऑक्सीकरण करने पर क्यूमीन हाइड्रोपरॉक्साइड बनता है, जिसका अम्लीय जल-अपघटन करने पर फिनॉल और एसीटोन प्राप्त होते हैं।
2.3. भौतिक गुणधर्म:
- फिनॉल रंगहीन क्रिस्टलीय ठोस होते हैं, लेकिन वायु और प्रकाश के संपर्क में आने पर ऑक्सीकरण के कारण गुलाबी या भूरे हो जाते हैं।
- इनका क्वथनांक ऐल्कोहॉलों की तरह हाइड्रोजन बंध के कारण उच्च होता है।
- जल में कम विलेय होते हैं।
2.4. रासायनिक अभिक्रियाएँ (Chemical Reactions):
- अम्लीय प्रकृति: फिनॉल ऐल्कोहॉलों की तुलना में अधिक अम्लीय होते हैं, क्योंकि फिनॉक्साइड आयन अनुनाद द्वारा स्थायी होता है।
- इलेक्ट्रॉन-आकर्षक समूह (जैसे -NO₂, -X) अम्लीयता बढ़ाते हैं।
- इलेक्ट्रॉन-मोचक समूह (जैसे -CH₃, -OCH₃) अम्लीयता घटाते हैं।
- फिनॉल दुर्बल अम्ल होते हैं, जो NaOH से अभिक्रिया करते हैं लेकिन NaHCO₃ से नहीं।
- इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ: -OH समूह ऑर्थो (o-) और पैरा (p-) दिशिक होता है और वलय को सक्रिय करता है।
- नाइट्रीकरण: तनु HNO₃ से फिनॉल ऑर्थो- और पैरा-नाइट्रोफिनॉल देते हैं। सांद्र HNO₃ से 2,4,6-ट्राइनाइट्रोफिनॉल (पिक्रिक अम्ल) बनता है।
- हैलोजेनीकरण: ब्रोमीन जल से 2,4,6-ट्राइब्रोमोफिनॉल का सफेद अवक्षेप बनता है। कम ध्रुवीय विलायक (CS₂) में मोनोब्रोमोफिनॉल बनते हैं।
- रीमर-टीमैन अभिक्रिया (Reimer-Tiemann Reaction): फिनॉल, क्लोरोफॉर्म और NaOH से अभिक्रिया कर ऑर्थो-फॉर्मिलफिनॉल (सैलिसिलऐल्डिहाइड) बनाते हैं।
- कोल्बे अभिक्रिया (Kolbe's Reaction): फिनॉल, NaOH और CO₂ से अभिक्रिया कर सैलिसिलिक अम्ल बनाते हैं।
- फ्रीडल-क्राफ्ट अभिक्रिया: फिनॉल सामान्यतः फ्रीडल-क्राफ्ट ऐल्किलन या एसिलन अभिक्रिया नहीं देते हैं क्योंकि -OH समूह लुईस अम्ल (AlCl₃) के साथ संकुल बनाता है।
- जिंक चूर्ण के साथ अभिक्रिया: फिनॉल को जिंक चूर्ण के साथ गर्म करने पर बेंजीन प्राप्त होती है।
C₆H₅-OH + Zn → C₆H₆ + ZnO - ऑक्सीकरण: फिनॉल का ऑक्सीकरण करने पर क्विनोन बनता है।
3. ईथर (Ethers)
ईथर वे कार्बनिक यौगिक हैं जिनमें एक ऑक्सीजन परमाणु दो ऐल्किल या ऐरिल समूहों से जुड़ा होता है। इनका सामान्य सूत्र R-O-R' होता है।
3.1. वर्गीकरण:
- सममित ईथर: जब दोनों ऐल्किल/ऐरिल समूह समान होते हैं (जैसे CH₃-O-CH₃, C₂H₅-O-C₂H₅)।
- असममित ईथर: जब दोनों ऐल्किल/ऐरिल समूह भिन्न होते हैं (जैसे CH₃-O-C₂H₅)।
3.2. नामकरण:
- सामान्य नाम: दोनों ऐल्किल/ऐरिल समूहों के नाम के बाद 'ईथर' जोड़ा जाता है (जैसे डाइमेथिल ईथर, एथिल मेथिल ईथर)।
- IUPAC नाम: छोटे ऐल्किल समूह को 'ऐल्कॉक्सी' समूह के रूप में बड़े ऐल्केन के साथ जोड़ा जाता है (जैसे मेथोक्सीमेथेन, मेथोक्सीएथेन)।
3.3. विरचन की विधियाँ (Methods of Preparation):
- ऐल्कोहॉलों के निर्जलीकरण से: सांद्र H₂SO₄ की उपस्थिति में ऐल्कोहॉलों को 413 K पर गर्म करने पर सममित ईथर बनते हैं। यह अभिक्रिया SN₂ क्रियाविधि द्वारा होती है।
2R-OH (H₂SO₄/413K) → R-O-R + H₂O
(प्राथमिक ऐल्कोहॉलों के लिए उपयुक्त) - विलियमसन संश्लेषण (Williamson's Synthesis): यह ईथर बनाने की एक महत्वपूर्ण औद्योगिक विधि है। इसमें एक ऐल्किल हैलाइड (प्राथमिक) की सोडियम ऐल्कॉक्साइड या सोडियम फिनॉक्साइड के साथ अभिक्रिया कराई जाती है।
R-X + R'-O⁻Na⁺ → R-O-R' + NaX
(यह SN₂ अभिक्रिया है, इसलिए ऐल्किल हैलाइड प्राथमिक होना चाहिए। यदि तृतीयक ऐल्किल हैलाइड का उपयोग किया जाता है, तो ऐल्कीन बनती है।)
3.4. भौतिक गुणधर्म:
- ईथर के अणु ध्रुवीय होते हैं, लेकिन हाइड्रोजन बंध नहीं बना सकते। इसलिए इनके क्वथनांक संगत ऐल्कोहॉलों की तुलना में कम होते हैं।
- जल में इनकी विलेयता ऐल्कोहॉलों से कम होती है, लेकिन संगत ऐल्केनों से अधिक होती है।
3.5. रासायनिक अभिक्रियाएँ (Chemical Reactions):
- C-O बंध का विदलन (हैलोजन अम्लों द्वारा): ईथर, HX (HI, HBr, HCl) के साथ अभिक्रिया कर ऐल्किल हैलाइड और ऐल्कोहॉल देते हैं।
R-O-R' + HX → R-X + R'-OH- यदि एक ऐल्किल समूह प्राथमिक/द्वितीयक और दूसरा तृतीयक हो, तो तृतीयक ऐल्किल हैलाइड बनता है।
- यदि दोनों ऐल्किल समूह प्राथमिक/द्वितीयक हों, तो छोटा ऐल्किल समूह हैलाइड बनाता है।
- ऐरिल-ऐल्किल ईथर में, ऐल्किल समूह हैलाइड में परिवर्तित होता है (C-O बंध बेंजीन वलय के साथ अनुनाद के कारण अधिक स्थायी होता है)।
- इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ (ऐरोमैटिक ईथर):
- ऐल्कॉक्सी समूह (-OR) ऑर्थो (o-) और पैरा (p-) दिशिक होता है और वलय को सक्रिय करता है।
- हैलोजेनीकरण: ऐनिसोल (मेथोक्सीबेंजीन) ब्रोमीन से अभिक्रिया कर ऑर्थो- और पैरा-ब्रोमोऐनिसोल देता है।
- फ्रीडल-क्राफ्ट अभिक्रिया: ऐनिसोल मेथिल क्लोराइड या एसिटिल क्लोराइड से अभिक्रिया कर ऑर्थो- और पैरा-मेथोक्सीटॉलूीन या मेथोक्सीऐसीटोफीनोन देता है।
- नाइट्रीकरण: ऐनिसोल सांद्र HNO₃ और H₂SO₄ से अभिक्रिया कर ऑर्थो- और पैरा-नाइट्रोऐनिसोल देता है।
4. कुछ महत्वपूर्ण यौगिकों के उपयोग (Uses of Some Important Compounds):
- मेथनॉल (CH₃OH): विलायक, ऐंटीफ्रीज़, फॉर्मेल्डिहाइड और अन्य रसायनों के निर्माण में। यह अत्यधिक विषैला होता है।
- एथनॉल (C₂H₅OH): पेय पदार्थ, विलायक, ईंधन, पेंट, वार्निश, दवाइयों के निर्माण में।
- फिनॉल (C₆H₅OH): फिनॉल-फॉर्मेल्डिहाइड रेजिन (बैकेलाइट), सैलिसिलिक अम्ल, पिक्रिक अम्ल, डाई और औषधियों के निर्माण में। यह एक कीटाणुनाशक भी है।
- डाईएथिल ईथर (C₂H₅-O-C₂H₅): विलायक, प्रशीतक, निश्चेतक (एनेस्थेटिक)।
बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions - MCQs):
1. निम्न में से कौन सा यौगिक लुकास अभिकर्मक के साथ सबसे तेजी से अभिक्रिया करेगा?
a) ब्यूटेन-1-ऑल
b) ब्यूटेन-2-ऑल
c) 2-मेथिलप्रोपेन-2-ऑल
d) एथनॉल
2. क्यूमीन से फिनॉल के औद्योगिक उत्पादन में सह-उत्पाद क्या है?
a) एसीटोन
b) ऐथेनॉल
c) बेंजीन
d) फॉर्मेल्डिहाइड
3. विलियमसन संश्लेषण द्वारा असममित ईथर बनाने के लिए कौन सा ऐल्किल हैलाइड सबसे उपयुक्त है?
a) तृतीयक ऐल्किल हैलाइड
b) द्वितीयक ऐल्किल हैलाइड
c) प्राथमिक ऐल्किल हैलाइड
d) ऐरिल हैलाइड
4. फिनॉल की अम्लीय प्रकृति के लिए कौन सा कारक जिम्मेदार है?
a) -OH समूह का इलेक्ट्रॉन-मोचक प्रभाव
b) फिनॉक्साइड आयन का अनुनाद स्थिरीकरण
c) बेंजीन वलय का इलेक्ट्रॉन-आकर्षक प्रभाव
d) हाइड्रोजन बंध का निर्माण
5. रीमर-टीमैन अभिक्रिया में फिनॉल, क्लोरोफॉर्म और NaOH के साथ अभिक्रिया करके क्या बनाता है?
a) बेंजीन
b) सैलिसिलिक अम्ल
c) सैलिसिलऐल्डिहाइड
d) पिक्रिक अम्ल
6. प्राथमिक ऐल्कोहॉल को ऐल्डिहाइड में ऑक्सीकृत करने के लिए सबसे उपयुक्त अभिकर्मक कौन सा है?
a) अम्लीय KMnO₄
b) K₂Cr₂O₇/H⁺
c) PCC (पिरीडीनियम क्लोरोक्रोमेट)
d) LiAlH₄
7. ऐल्कोहॉलों का क्वथनांक संगत ऐल्केनों की तुलना में अधिक होता है, इसका कारण है:
a) वान्डरवाल बल
b) आयनिक बंध
c) हाइड्रोजन बंध
d) सहसंयोजक बंध
8. जब डाईएथिल ईथर HI के साथ अभिक्रिया करता है, तो उत्पाद क्या होते हैं?
a) एथेनॉल और एथिल आयोडाइड
b) एथिल आयोडाइड और जल
c) एथेनॉल और जल
d) एथिल आयोडाइड
9. निम्न में से कौन सा यौगिक FeCl₃ परीक्षण देता है?
a) एथनॉल
b) डाईएथिल ईथर
c) फिनॉल
d) मेथिल ऐमीन
10. ऐल्कीन से प्राथमिक ऐल्कोहॉल बनाने के लिए एंटी-मार्कोवनिकोव योग नियम का पालन करने वाली विधि कौन सी है?
a) अम्ल-उत्प्रेरित जल-योजन
b) हाइड्रोबोरॉनन-ऑक्सीकरण
c) ऑक्सीमरक्यूरेशन-विमरक्यूरेशन
d) ग्रीन्यार अभिकर्मक के साथ अभिक्रिया
उत्तरमाला:
- c) 2-मेथिलप्रोपेन-2-ऑल (यह एक तृतीयक ऐल्कोहॉल है)
- a) एसीटोन
- c) प्राथमिक ऐल्किल हैलाइड
- b) फिनॉक्साइड आयन का अनुनाद स्थिरीकरण
- c) सैलिसिलऐल्डिहाइड
- c) PCC (पिरीडीनियम क्लोरोक्रोमेट)
- c) हाइड्रोजन बंध
- a) एथेनॉल और एथिल आयोडाइड (यदि HI आधिक्य में न हो)
- c) फिनॉल
- b) हाइड्रोबोरॉनन-ऑक्सीकरण
मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपको इस अध्याय को समझने और सरकारी परीक्षाओं की तैयारी करने में सहायक होंगे। अपनी पढ़ाई जारी रखें और किसी भी संदेह के लिए पूछने में संकोच न करें।