Class 12 Chemistry Notes Chapter 5 (Chapter 5) – Rasayan Vigyan Bhag-II Book

प्रिय विद्यार्थियों,
सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए रसायन विज्ञान के अध्याय 5 'उपसहसंयोजन यौगिक' के विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs) यहाँ दिए गए हैं। यह अध्याय अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसमें से नियमित रूप से प्रश्न पूछे जाते हैं।
अध्याय 5: उपसहसंयोजन यौगिक (Coordination Compounds)
उपसहसंयोजन यौगिक वे यौगिक होते हैं जिनमें एक केंद्रीय धातु परमाणु या आयन (अक्सर एक संक्रमण धातु) लिगेंड नामक आयनों या उदासीन अणुओं से उपसहसंयोजन बंधों द्वारा घिरा होता है। ये यौगिक प्रकृति में और जैविक प्रणालियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
1. परिचय: द्विक लवण और उपसहसंयोजन यौगिक
- द्विक लवण (Double Salts): वे योगात्मक यौगिक जो ठोस अवस्था में स्थायी होते हैं, लेकिन जलीय विलयन में अपने घटक आयनों में पूरी तरह से वियोजित हो जाते हैं और अपने सभी घटक आयनों के परीक्षण देते हैं।
- उदाहरण: कार्नेलाइट (KCl.MgCl₂.6H₂O), मोहर लवण (FeSO₄.(NH₄)₂SO₄.6H₂O), फिटकरी (K₂SO₄.Al₂(SO₄)₃.24H₂O)।
- उपसहसंयोजन यौगिक (Coordination Compounds) या संकुल (Complexes): वे योगात्मक यौगिक जो ठोस और विलयन दोनों अवस्थाओं में अपनी पहचान बनाए रखते हैं। ये केंद्रीय धातु परमाणु/आयन और लिगेंड के बीच उपसहसंयोजन बंधों के कारण बनते हैं। विलयन में ये अपने सभी घटक आयनों का परीक्षण नहीं देते क्योंकि संकुल आयन वियोजित नहीं होता।
- उदाहरण: [Fe(CN)₆]⁴⁻, [Cu(NH₃)₄]²⁺, [Ag(CN)₂]⁻।
2. महत्वपूर्ण पद (Important Terms)
- उपसहसंयोजन सत्ता (Coordination Entity): केंद्रीय धातु परमाणु/आयन और उससे जुड़े लिगेंड से मिलकर बना एक विद्युत आवेशित या उदासीन समूह।
- उदाहरण: [Co(NH₃)₆]³⁺, [Ni(CO)₄]।
- केंद्रीय धातु परमाणु/आयन (Central Metal Atom/Ion): वह परमाणु या आयन जो एक निश्चित संख्या में आयनों या अणुओं (लिगेंड) से उपसहसंयोजन बंधों द्वारा जुड़ा होता है। यह लुईस अम्ल के रूप में कार्य करता है। (जैसे Co³⁺, Ni, Fe²⁺)।
- लिगेंड (Ligands): वे आयन या अणु जो केंद्रीय धातु परमाणु/आयन को इलेक्ट्रॉन युग्म दान करके उपसहसंयोजन बंध बनाते हैं। ये लुईस क्षार के रूप में कार्य करते हैं।
- एकदंती लिगेंड (Monodentate Ligands): एक दाता परमाणु होता है। (जैसे H₂O, NH₃, Cl⁻, CN⁻)।
- द्विदंती लिगेंड (Bidentate Ligands): दो दाता परमाणु होते हैं। (जैसे एथिलीनडाइऐमीन (en), ऑक्सलेटो (ox), ग्लाइसिनेटो (gly))।
- बहुदंती लिगेंड (Polydentate Ligands): दो से अधिक दाता परमाणु होते हैं। (जैसे EDTA⁴⁻ - हेक्सादंती)।
- उभयदंती लिगेंड (Ambidentate Ligands): एक लिगेंड जिसमें दो अलग-अलग दाता परमाणु होते हैं, लेकिन एक समय में केवल एक ही दाता परमाणु केंद्रीय धातु से बंध बनाता है। (जैसे NO₂⁻ (नाइट्राइटो-N या नाइट्राइटो-O), SCN⁻ (थायोसायनेटो-S या थायोसायनेटो-N))।
- कीलेट लिगेंड (Chelating Ligands): जब एक द्विदंती या बहुदंती लिगेंड केंद्रीय धातु आयन से दो या अधिक दाता परमाणुओं द्वारा जुड़ता है, तो एक वलय जैसी संरचना बनती है। ऐसे लिगेंड को कीलेट लिगेंड और बनने वाले संकुल को कीलेट संकुल कहते हैं। कीलेट संकुल अधिक स्थायी होते हैं (कीलेट प्रभाव)।
- उपसहसंयोजन संख्या (Coordination Number): केंद्रीय धातु परमाणु/आयन से सीधे जुड़े हुए लिगेंड दाता परमाणुओं की संख्या।
- उदाहरण: [Co(NH₃)₆]³⁺ में Co की उपसहसंयोजन संख्या 6 है। [Pt(en)₂]²⁺ में Pt की उपसहसंयोजन संख्या 4 है (क्योंकि en द्विदंती है, 2x2=4)।
- उपसहसंयोजन बहुफलक (Coordination Polyhedron): केंद्रीय धातु परमाणु/आयन के चारों ओर लिगेंड दाता परमाणुओं की त्रिविम व्यवस्था। सामान्य ज्यामितियाँ: अष्टफलकीय (CN=6), वर्ग समतलीय (CN=4), चतुष्फलकीय (CN=4)।
- उपसहसंयोजन मंडल (Coordination Sphere): केंद्रीय धातु परमाणु/आयन और लिगेंड को एक बड़े कोष्ठक [ ] के भीतर लिखा जाता है। यह मंडल विलयन में अविघटित रहता है।
- ऑक्सीकरण संख्या (Oxidation Number): संकुल आयन में केंद्रीय धातु परमाणु पर उपस्थित आवेश, यदि सभी लिगेंड को उनके सामान्य उदासीन अणुओं के रूप में हटा दिया जाए। इसे रोमन अंकों में दर्शाया जाता है।
- उदाहरण: [Co(NH₃)₆]Cl₃ में Co की ऑक्सीकरण संख्या +3 है।
- होमोलेप्टिक संकुल (Homoleptic Complexes): वे संकुल जिनमें केंद्रीय धातु परमाणु/आयन केवल एक प्रकार के लिगेंड से जुड़ा होता है। (जैसे [Co(NH₃)₆]³⁺)।
- हेटेरोलेप्टिक संकुल (Heteroleptic Complexes): वे संकुल जिनमें केंद्रीय धातु परमाणु/आयन एक से अधिक प्रकार के लिगेंड से जुड़ा होता है। (जैसे [Co(NH₃)₄Cl₂]⁺)।
3. उपसहसंयोजन यौगिकों का नामकरण (Nomenclature of Coordination Compounds - IUPAC)
- धनायन का नाम पहले, फिर ऋणायन का नाम: यदि संकुल एक आयन है, तो उसका नामकरण किया जाता है।
- लिगेंड का नाम पहले, फिर धातु का नाम: संकुल आयन के नामकरण में, लिगेंड के नाम पहले वर्णानुक्रम में लिखे जाते हैं, उसके बाद केंद्रीय धातु परमाणु/आयन का नाम।
- लिगेंड के नाम:
- ऋणात्मक लिगेंड के नाम के अंत में '-o' लगाया जाता है (जैसे क्लोरिडो (Cl⁻), साइनो (CN⁻), ऑक्सलेटो (ox²⁻))।
- उदासीन लिगेंड के नाम सामान्य होते हैं, कुछ अपवादों के साथ: एक्वा (H₂O), एम्मीन (NH₃), कार्बोनिल (CO), नाइट्रोसिल (NO)।
- लिगेंड की संख्या दर्शाने के लिए पूर्वलग्न 'डाई', 'ट्राई', 'टेट्रा' आदि का उपयोग किया जाता है। यदि लिगेंड के नाम में पहले से ही 'डाई', 'ट्राई' आदि हैं (जैसे एथिलीनडाइऐमीन), तो 'बिस', 'ट्रिस', 'टेट्राकिस' आदि का उपयोग किया जाता है और लिगेंड का नाम कोष्ठक में रखा जाता है।
- धातु का नाम:
- यदि संकुल धनायनिक या उदासीन है, तो धातु का नाम अपरिवर्तित रहता है (जैसे कोबाल्ट, निकल)।
- यदि संकुल ऋणायनिक है, तो धातु के नाम के अंत में '-एट' प्रत्यय जोड़ा जाता है (जैसे फेरेट (Fe), क्यूप्रेट (Cu), अर्जेंटेट (Ag), ऑरेट (Au))।
- ऑक्सीकरण अवस्था: केंद्रीय धातु परमाणु/आयन की ऑक्सीकरण अवस्था को रोमन अंकों में कोष्ठक में धातु के नाम के तुरंत बाद लिखा जाता है।
- उदाहरण:
- [Co(NH₃)₆]Cl₃: हेक्साएम्मीनकोबाल्ट(III) क्लोराइड
- K₄[Fe(CN)₆]: पोटेशियम हेक्सासाइनोफेरेट(II)
- [Cr(en)₃]³⁺: ट्रिस(एथिलीनडाइऐमीन)क्रोमियम(III) आयन
4. उपसहसंयोजन यौगिकों में समावयवता (Isomerism in Coordination Compounds)
समावयवता तब होती है जब दो या दो से अधिक यौगिकों का रासायनिक सूत्र समान होता है लेकिन उनके परमाणुओं की व्यवस्था भिन्न होती है।
A. संरचनात्मक समावयवता (Structural Isomerism): परमाणुओं के बंधन में अंतर।
- आयनन समावयवता (Ionisation Isomerism): संकुल के अंदर और बाहर के आयनों के आदान-प्रदान से उत्पन्न होती है।
- उदाहरण: [Co(NH₃)₅Br]SO₄ (पेंटाएम्मीनब्रोमिडोकोबाल्ट(III) सल्फेट) और [Co(NH₃)₅SO₄]Br (पेंटाएम्मीनसल्फेटोकोबाल्ट(III) ब्रोमाइड)।
- बंधनी समावयवता (Linkage Isomerism): उभयदंती लिगेंड की उपस्थिति के कारण होती है, जहाँ लिगेंड केंद्रीय धातु से अलग-अलग दाता परमाणुओं के माध्यम से जुड़ सकता है।
- उदाहरण: [Co(NH₃)₅NO₂]Cl₂ (नाइट्राइटो-N) और [Co(NH₃)₅ONO]Cl₂ (नाइट्राइटो-O)।
- उपसहसंयोजन समावयवता (Coordination Isomerism): तब उत्पन्न होती है जब एक संकुल में धनायन और ऋणायन दोनों संकुल आयन होते हैं और लिगेंड का आदान-प्रदान दोनों संकुलों के बीच होता है।
- उदाहरण: [Co(NH₃)₆][Cr(CN)₆] और [Cr(NH₃)₆][Co(CN)₆]।
- विलेयकयोजन समावयवता (Solvate/Hydrate Isomerism): विलेयक अणु (जैसे जल) लिगेंड के रूप में या क्रिस्टलीकरण के जल के रूप में उपस्थित हो सकते हैं।
- उदाहरण: [Cr(H₂O)₆]Cl₃ (बैंगनी) और [Cr(H₂O)₅Cl]Cl₂.H₂O (हरा)।
B. त्रिविम समावयवता (Stereoisomerism): परमाणुओं के त्रिविम व्यवस्था में अंतर।
- ज्यामितीय समावयवता (Geometrical Isomerism): लिगेंड की केंद्रीय धातु के चारों ओर अलग-अलग स्थानिक व्यवस्था के कारण।
- वर्ग समतलीय संकुल (Square Planar Complexes): (जैसे MA₂B₂, MA₂BC, MABCD) - सिस (cis) (समान लिगेंड पास-पास) और ट्रांस (trans) (समान लिगेंड विपरीत दिशा में)।
- अष्टफलकीय संकुल (Octahedral Complexes): (जैसे MA₄B₂, MA₃B₃) - सिस और ट्रांस। MA₃B₃ प्रकार में फेशियल (fac) (समान लिगेंड एक फलक पर) और मेरिडियोनल (mer) (समान लिगेंड एक मेरिडियन पर)।
- चतुष्फलकीय संकुल ज्यामितीय समावयवता प्रदर्शित नहीं करते क्योंकि सभी स्थितियाँ एक-दूसरे के सापेक्ष सन्निहित होती हैं।
- प्रकाशिक समावयवता (Optical Isomerism): जब संकुल यौगिक ध्रुवित प्रकाश के तल को घुमाते हैं और उनके दर्पण प्रतिबिंब एक-दूसरे पर अध्यारोपित नहीं हो सकते (अर्थात, वे किरल होते हैं)। इन्हें एनैन्टियोमर कहते हैं।
- अष्टफलकीय संकुल (जैसे [M(AA)₃]ⁿ⁺, [M(AA)₂B₂]ⁿ⁺, जहाँ AA द्विदंती लिगेंड है) अक्सर प्रकाशिक समावयवता प्रदर्शित करते हैं।
- वर्ग समतलीय संकुल आमतौर पर प्रकाशिक समावयवता प्रदर्शित नहीं करते क्योंकि उनमें समरूपता का तल होता है।
5. उपसहसंयोजन यौगिकों में बंधन (Bonding in Coordination Compounds)
A. वर्नर का उपसहसंयोजन सिद्धांत (Werner's Coordination Theory): (1893)
- केंद्रीय धातु परमाणु दो प्रकार की संयोजकताएँ प्रदर्शित करता है:
- प्राथमिक संयोजकता (Primary Valency): यह धातु की ऑक्सीकरण अवस्था के बराबर होती है, आयनीकृत होती है, और ऋणायनों द्वारा संतुष्ट होती है। इसे डैश लाइन (---) से दर्शाया जाता है।
- द्वितीयक संयोजकता (Secondary Valency): यह धातु की उपसहसंयोजन संख्या के बराबर होती है, अन-आयनीकृत होती है, और लिगेंड द्वारा संतुष्ट होती है। यह धातु के चारों ओर एक निश्चित त्रिविम व्यवस्था निर्धारित करती है। इसे ठोस लाइन (—) से दर्शाया जाता है।
- प्रत्येक धातु द्वितीयक संयोजकता को संतुष्ट करने की प्रवृत्ति रखती है।
- कुछ आयन प्राथमिक और द्वितीयक दोनों संयोजकताओं को संतुष्ट कर सकते हैं।
B. संयोजकता बंध सिद्धांत (Valence Bond Theory - VBT): (पॉलिंग)
- केंद्रीय धातु परमाणु/आयन लिगेंड से इलेक्ट्रॉन युग्म स्वीकार करने के लिए अपने s, p, d कक्षकों का संकरण करता है।
- संकरणित कक्षक लिगेंड के दाता परमाणुओं के साथ अतिव्यापन करके उपसहसंयोजन बंध बनाते हैं।
- संकरण और ज्यामिति:
- sp³: चतुष्फलकीय
- dsp²: वर्ग समतलीय
- d²sp³ या sp³d²: अष्टफलकीय
- चुंबकीय गुण:
- यदि संकुल में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं, तो वह अनुचुंबकीय होता है।
- यदि सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित होते हैं, तो वह प्रतिचुंबकीय होता है।
- आंतरिक कक्षक संकुल (Inner Orbital Complexes): जब (n-1)d कक्षक संकरण में भाग लेते हैं (d²sp³)। ये प्रबल क्षेत्र लिगेंड द्वारा बनते हैं, जिससे इलेक्ट्रॉन युग्मन होता है।
- बाह्य कक्षक संकुल (Outer Orbital Complexes): जब nd कक्षक संकरण में भाग लेते हैं (sp³d²)। ये दुर्बल क्षेत्र लिगेंड द्वारा बनते हैं, जिससे इलेक्ट्रॉन युग्मन नहीं होता।
- सीमाएँ: रंग की व्याख्या नहीं करता, लिगेंड की प्रबलता की मात्रात्मक व्याख्या नहीं करता, ऊष्मागतिक स्थायित्व की व्याख्या नहीं करता।
C. क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत (Crystal Field Theory - CFT):
- यह धातु-लिगेंड बंध को विशुद्ध रूप से आयनिक मानता है। लिगेंड को बिंदु आवेश के रूप में माना जाता है।
- केंद्रीय धातु आयन के d-कक्षकों का ऊर्जा स्तर लिगेंड के विद्युत क्षेत्र में विपाटित (split) हो जाता है।
- d-कक्षकों का विपाटन:
- अष्टफलकीय क्षेत्र (Octahedral Field): पाँच d-कक्षक दो समूहों में विपाटित होते हैं:
- t₂g: तीन कक्षक (dxy, dyz, dzx) - कम ऊर्जा वाले।
- eg: दो कक्षक (dx²-y², dz²) - उच्च ऊर्जा वाले।
- विपाटन ऊर्जा को Δo (या 10 Dq) से दर्शाया जाता है।
- चतुष्फलकीय क्षेत्र (Tetrahedral Field): पाँच d-कक्षक दो समूहों में विपाटित होते हैं:
- e: दो कक्षक (dx²-y², dz²) - कम ऊर्जा वाले।
- t₂: तीन कक्षक (dxy, dyz, dzx) - उच्च ऊर्जा वाले।
- विपाटन ऊर्जा को Δt से दर्शाया जाता है। (Δt ≈ 4/9 Δo)।
- अष्टफलकीय क्षेत्र (Octahedral Field): पाँच d-कक्षक दो समूहों में विपाटित होते हैं:
- क्रिस्टल क्षेत्र स्थिरीकरण ऊर्जा (CFSE): विपाटन के कारण संकुल की ऊर्जा में कमी।
- लिगेंड की प्रबलता (Spectrochemical Series): लिगेंड को उनके क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन क्षमता के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित करना।
- I⁻ < Br⁻ < S²⁻ < SCN⁻ < Cl⁻ < NO₃⁻ < F⁻ < OH⁻ < C₂O₄²⁻ < H₂O < NCS⁻ < EDTA⁴⁻ < NH₃ < en < CN⁻ < CO
- दुर्बल क्षेत्र लिगेंड (Weak Field Ligands): कम विपाटन करते हैं (जैसे हैलाइड्स, H₂O)। इलेक्ट्रॉन युग्मन नहीं होता (उच्च चक्रण संकुल)।
- प्रबल क्षेत्र लिगेंड (Strong Field Ligands): अधिक विपाटन करते हैं (जैसे CN⁻, CO, NH₃)। इलेक्ट्रॉन युग्मन होता है (निम्न चक्रण संकुल)।
- रंग की व्याख्या: संकुल का रंग d-d संक्रमण के कारण होता है। जब दृश्य प्रकाश संकुल पर पड़ता है, तो इलेक्ट्रॉन निम्न ऊर्जा t₂g (या e) कक्षक से उच्च ऊर्जा eg (या t₂) कक्षक में उत्तेजित होते हैं। यह प्रकाश के एक निश्चित रंग को अवशोषित करता है और उसके पूरक रंग को उत्सर्जित करता है, जो हमें दिखाई देता है।
- चुंबकीय गुण: अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या के आधार पर CFT चुंबकीय गुणों की भी व्याख्या करता है।
- सीमाएँ: लिगेंड को बिंदु आवेश मानता है, सहसंयोजक प्रकृति की व्याख्या नहीं करता, π-बंधन की व्याख्या नहीं करता।
6. उपसहसंयोजन यौगिकों का महत्व और अनुप्रयोग (Importance and Applications)
- जैविक प्रणालियों में:
- हीमोग्लोबिन: Fe²⁺ का संकुल, ऑक्सीजन परिवहन में सहायक।
- क्लोरोफिल: Mg²⁺ का संकुल, प्रकाश संश्लेषण में महत्वपूर्ण।
- विटामिन B₁₂ (साइनोकोबालामिन): Co³⁺ का संकुल, लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण में।
- एंजाइम: कई एंजाइमों में धातु आयन सक्रिय स्थल के रूप में होते हैं।
- विश्लेषणात्मक रसायन में:
- EDTA (एथिलीनडाइऐमीनटेट्राएसीटेट): कठोर जल में Ca²⁺ और Mg²⁺ आयनों के आकलन में, धातु आयनों के निष्कर्षण में।
- AgCl का अमोनिया में घुलना ([Ag(NH₃)₂]⁺ बनने के कारण)।
- धातु निष्कर्षण में:
- गोल्ड (Au) और सिल्वर (Ag) का निष्कर्षण उनके [Au(CN)₂]⁻ और [Ag(CN)₂]⁻ संकुलों के रूप में।
- निकल का शोधन मॉन्ड प्रक्रम द्वारा [Ni(CO)₄] संकुल के रूप में।
- उत्प्रेरक के रूप में:
- विल्किंसन उत्प्रेरक: [RhCl(PPh₃)₃], एल्कीनों के हाइड्रोजनीकरण में।
- जिग्लर-नाटा उत्प्रेरक (TiCl₄ + Al(C₂H₅)₃) पॉलीथीन के उत्पादन में।
- औषधि विज्ञान में:
- सिस-प्लेटिन (cis-Pt(NH₃)₂Cl₂): कैंसर के उपचार में कीमोथेरेपी एजेंट के रूप में।
- EDTA का उपयोग लेड विषाक्तता के उपचार में।
- इलेक्ट्रोप्लेटिंग: सोने और चांदी की इलेक्ट्रोप्लेटिंग उनके संकुल आयनों ([Au(CN)₂]⁻, [Ag(CN)₂]⁻) से की जाती है ताकि एक समान और टिकाऊ परत मिल सके।
- फोटोग्राफी: सिल्वर ब्रोमाइड (AgBr) का उपयोग, जो प्रकाश के संपर्क में आने पर Ag में अपचयित होता है। अन-अपचयित AgBr को थायोसल्फेट विलयन ([Ag(S₂O₃)₂]³⁻) में घोलकर हटाया जाता है।
बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions - MCQs)
निर्देश: प्रत्येक प्रश्न के लिए सही विकल्प चुनें।
-
निम्नलिखित में से कौन सा उभयदंती लिगेंड का उदाहरण है?
a) NH₃
b) H₂O
c) NO₂⁻
d) en -
[Co(NH₃)₄Cl₂]⁺ संकुल में कोबाल्ट की उपसहसंयोजन संख्या और ऑक्सीकरण संख्या क्रमशः क्या है?
a) 6, +3
b) 4, +2
c) 6, +2
d) 4, +3 -
IUPAC नाम पोटेशियम हेक्सासाइनोफेरेट(II) किस सूत्र से संबंधित है?
a) K₃[Fe(CN)₆]
b) K₄[Fe(CN)₆]
c) K₂[Fe(CN)₄]
d) [Fe(CN)₆]⁴⁻ -
निम्नलिखित में से कौन सा संकुल ज्यामितीय समावयवता (cis-trans) प्रदर्शित कर सकता है?
a) [Ni(CO)₄] (चतुष्फलकीय)
b) [Co(NH₃)₅Cl]²⁺ (अष्टफलकीय)
c) Pt(NH₃)₂Cl₂ (वर्ग समतलीय)
d) [Cr(en)₃]³⁺ (अष्टफलकीय) -
[Cr(H₂O)₆]Cl₃ और [Cr(H₂O)₅Cl]Cl₂.H₂O किस प्रकार की समावयवता प्रदर्शित करते हैं?
a) आयनन समावयवता
b) बंधनी समावयवता
c) विलेयकयोजन समावयवता
d) उपसहसंयोजन समावयवता -
संयोजकता बंध सिद्धांत (VBT) के अनुसार, [Ni(CN)₄]²⁻ आयन में निकल परमाणु का संकरण और इसकी ज्यामिति क्या है? (CN⁻ एक प्रबल क्षेत्र लिगेंड है)
a) sp³, चतुष्फलकीय
b) dsp², वर्ग समतलीय
c) sp³d², अष्टफलकीय
d) d²sp³, अष्टफलकीय -
क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत (CFT) के अनुसार, अष्टफलकीय संकुल में d-कक्षकों का विपाटन कैसे होता है?
a) e और t₂ में
b) t₂g और eg में
c) dxy, dyz, dzx और dx²-y², dz² में
d) a और b दोनों -
वह धातु आयन जो हीमोग्लोबिन में उपस्थित होता है और ऑक्सीजन परिवहन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, वह है:
a) Mg²⁺
b) Co³⁺
c) Fe²⁺
d) Cu²⁺ -
निम्नलिखित में से कौन सा लिगेंड स्पेक्ट्रोरसायन श्रेणी में सबसे प्रबल क्षेत्र लिगेंड है?
a) Cl⁻
b) H₂O
c) NH₃
d) CN⁻ -
सिस-प्लेटिन, जिसका उपयोग कैंसर के उपचार में होता है, का रासायनिक सूत्र क्या है?
a) [Pt(NH₃)₄]Cl₂
b) Pt(NH₃)₂Cl₂ (cis-isomer)
c) [PtCl₄]²⁻
d) [Pt(en)₂]Cl₂
MCQs के उत्तर:
- c) NO₂⁻
- a) 6, +3
- b) K₄[Fe(CN)₆]
- c) Pt(NH₃)₂Cl₂ (वर्ग समतलीय संकुल MA₂B₂ प्रकार का)
- c) विलेयकयोजन समावयवता
- b) dsp², वर्ग समतलीय (Ni²⁺ (d⁸), CN⁻ प्रबल क्षेत्र लिगेंड है, इसलिए इलेक्ट्रॉन युग्मित होते हैं)
- b) t₂g और eg में
- c) Fe²⁺
- d) CN⁻
- b) Pt(NH₃)₂Cl₂ (cis-isomer)
आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और प्रश्न आपकी सरकारी परीक्षा की तैयारी में सहायक सिद्ध होंगे। इस अध्याय को ध्यानपूर्वक पढ़ें और सभी अवधारणाओं को समझें। शुभकामनाएँ!