Class 12 Chemistry Notes Chapter 5 (पृष्ठ रसायन) – Rasayan Vigyan Bhag-I Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम रसायन विज्ञान के अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय 'पृष्ठ रसायन' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय विभिन्न सरकारी परीक्षाओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें से कई अवधारणात्मक और तथ्यात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं। आइए, हम इस अध्याय की गहराइयों को समझें और इसे परीक्षा की दृष्टि से तैयार करें।
अध्याय 5: पृष्ठ रसायन (Surface Chemistry)
पृष्ठ रसायन विज्ञान की वह शाखा है जो किसी पदार्थ के पृष्ठ (सतह) पर होने वाली परिघटनाओं से संबंधित है। इसमें अधिशोषण, उत्प्रेरण और कोलॉइड जैसी अवधारणाएँ शामिल हैं।
1. अधिशोषण (Adsorption)
यह एक पृष्ठीय परिघटना है जिसमें किसी पदार्थ (अधिशोष्य) के अणु दूसरे पदार्थ (अधिशोषक) के पृष्ठ पर संचित होते हैं।
- अधिशोष्य (Adsorbate): वह पदार्थ जो अधिशोषक के पृष्ठ पर अधिशोषित होता है (जैसे गैस या विलयन)।
- अधिशोषक (Adsorbent): वह पदार्थ जिसके पृष्ठ पर अधिशोषण होता है (जैसे ठोस)।
अवशोषण (Absorption) और अधिशोषण (Adsorption) में अंतर:
| विशेषता | अधिशोषण (Adsorption) | अवशोषण (Absorption) |
|---|---|---|
| प्रक्रिया | पृष्ठीय परिघटना, सांद्रता पृष्ठ पर अधिक होती है। | स्थूल परिघटना, पदार्थ पूरे स्थूल में समान रूप से वितरित होता है। |
| गति | प्रारंभ में तीव्र, फिर संतुलन पर धीमी हो जाती है। | पूरे स्थूल में समान गति से होती है। |
| उदाहरण | सिलिका जेल द्वारा जल वाष्प का अधिशोषण, कोयले द्वारा गैसों का अधिशोषण। | निर्जल CaCl₂ द्वारा जल वाष्प का अवशोषण, स्पंज द्वारा जल का अवशोषण। |
अधिशोषण की क्रियाविधि:
अधिशोषक के पृष्ठ पर उपस्थित परमाणु या अणु असंतुलित अवशिष्ट बलों (residual forces) के कारण अधिशोष्य के अणुओं को अपनी ओर आकर्षित करते हैं और उन्हें पृष्ठ पर रोक लेते हैं। यह एक ऊष्माक्षेपी (exothermic) प्रक्रिया है, क्योंकि पृष्ठ ऊर्जा में कमी आती है।
अधिशोषण के प्रकार:
-
भौतिक अधिशोषण (Physisorption / Physical Adsorption):
- अधिशोषक और अधिशोष्य के बीच दुर्बल वांडरवाल बल होते हैं।
- विशेषताएँ:
- विशिष्टता का अभाव: कोई विशिष्टता नहीं होती, सभी गैसें किसी भी ठोस पर अधिशोषित हो सकती हैं (बशर्ते वे द्रवित हो सकें)।
- उत्क्रमणीय प्रकृति: यह उत्क्रमणीय प्रक्रिया है। अधिशोषण ⇌ विशोषण।
- अधिशोषण की एन्थैल्पी कम: 20-40 kJ/mol (कम ऊर्जा की आवश्यकता)।
- निम्न ताप पर अनुकूल: निम्न ताप पर अधिक होता है, ताप बढ़ने पर घटता है।
- दाब का प्रभाव: दाब बढ़ने पर अधिशोषण बढ़ता है, दाब घटने पर घटता है।
- बहुपरतीय: अधिशोषक के पृष्ठ पर अधिशोष्य की कई परतें बन सकती हैं।
- सक्रियण ऊर्जा नहीं: सक्रियण ऊर्जा की आवश्यकता नहीं होती।
- पृष्ठ क्षेत्रफल: अधिशोषक का पृष्ठीय क्षेत्रफल बढ़ने पर अधिशोषण बढ़ता है।
-
रासायनिक अधिशोषण (Chemisorption / Chemical Adsorption):
- अधिशोषक और अधिशोष्य के बीच रासायनिक आबंध (सहसंयोजक या आयनिक) बनते हैं।
- विशेषताएँ:
- उच्च विशिष्टता: यह अत्यधिक विशिष्ट होता है, केवल वे गैसें रासायनिक अधिशोषण दर्शाती हैं जो अधिशोषक से रासायनिक आबंध बना सकें।
- अनुत्क्रमणीय प्रकृति: यह अनुत्क्रमणीय प्रक्रिया है।
- अधिशोषण की एन्थैल्पी उच्च: 80-240 kJ/mol (उच्च ऊर्जा की आवश्यकता)।
- उच्च ताप पर अनुकूल: पहले ताप बढ़ने पर बढ़ता है (सक्रियण ऊर्जा के कारण), फिर घटता है।
- दाब का प्रभाव: दाब बढ़ने पर अधिशोषण बढ़ता है।
- एकपरतीय: अधिशोषक के पृष्ठ पर अधिशोष्य की केवल एक परत बनती है।
- सक्रियण ऊर्जा: सक्रियण ऊर्जा की आवश्यकता हो सकती है।
- पृष्ठ क्षेत्रफल: अधिशोषक का पृष्ठीय क्षेत्रफल बढ़ने पर अधिशोषण बढ़ता है।
भौतिक और रासायनिक अधिशोषण में अंतर (सारांश):
| विशेषता | भौतिक अधिशोषण | रासायनिक अधिशोषण |
|---|---|---|
| बल | वांडरवाल बल | रासायनिक आबंध |
| एन्थैल्पी | निम्न (20-40 kJ/mol) | उच्च (80-240 kJ/mol) |
| उत्क्रमणीयता | उत्क्रमणीय | अनुत्क्रमणीय |
| ताप | निम्न ताप पर अनुकूल | उच्च ताप पर अनुकूल (पहले बढ़ता है, फिर घटता है) |
| परतें | बहुपरतीय | एकपरतीय |
| विशिष्टता | विशिष्ट नहीं | अत्यधिक विशिष्ट |
| सक्रियण ऊर्जा | आवश्यक नहीं | आवश्यक हो सकती है |
अधिशोषण को प्रभावित करने वाले कारक:
- अधिशोषक का पृष्ठीय क्षेत्रफल: पृष्ठीय क्षेत्रफल बढ़ने पर अधिशोषण बढ़ता है।
- अधिशोष्य की प्रकृति: आसानी से द्रवित होने वाली गैसें (उच्च क्रांतिक ताप वाली) अधिक अधिशोषित होती हैं।
- ताप: भौतिक अधिशोषण ताप बढ़ने पर घटता है, जबकि रासायनिक अधिशोषण पहले बढ़ता है फिर घटता है।
- दाब: दाब बढ़ने पर अधिशोषण बढ़ता है।
अधिशोषण समतापी (Adsorption Isotherms):
स्थिर ताप पर अधिशोषक के प्रति इकाई द्रव्यमान पर अधिशोषित गैस की मात्रा और दाब के बीच संबंध दर्शाने वाले ग्राफ।
-
फ्रेंडलिक अधिशोषण समतापी (Freundlich Adsorption Isotherm):
- $x/m = k \cdot P^{1/n}$ (जहाँ $x$ अधिशोषित गैस की मात्रा, $m$ अधिशोषक का द्रव्यमान, $P$ दाब, $k$ और $n$ स्थिरांक, $n>1$)।
- उच्च दाब पर इसकी सीमाएँ हैं।
- विलयन के लिए: $x/m = k \cdot C^{1/n}$ (जहाँ $C$ साम्यावस्था पर सांद्रता है)।
-
लैंगमुइर अधिशोषण समतापी (Langmuir Adsorption Isotherm):
- यह मानता है कि अधिशोषण केवल एकपरतीय होता है और अधिशोषित अणु एक-दूसरे के साथ अन्योन्य क्रिया नहीं करते।
- $x/m = (aP) / (1 + bP)$ (जहाँ $a$ और $b$ स्थिरांक)।
अधिशोषण के अनुप्रयोग:
- उच्च निर्वात उत्पन्न करना: चारकोल द्वारा शेष गैसों का अधिशोषण।
- गैस मास्क: जहरीली गैसों को अधिशोषित कर शुद्ध हवा प्रदान करना।
- आर्द्रता नियंत्रण: सिलिका जेल और एल्यूमिना जेल द्वारा नमी का अधिशोषण।
- विलयन से रंगीन अशुद्धियों को हटाना: जंतु चारकोल द्वारा।
- विषमांगी उत्प्रेरण: उत्प्रेरक के पृष्ठ पर अभिकारकों का अधिशोषण।
- क्रोमैटोग्राफी: अधिशोषण के सिद्धांत पर आधारित।
- रोगों का उपचार: औषधियाँ रोगाणुओं को अधिशोषित कर उन्हें नष्ट करती हैं।
2. उत्प्रेरण (Catalysis)
वह प्रक्रिया जिसमें एक पदार्थ (उत्प्रेरक) किसी रासायनिक अभिक्रिया की दर को परिवर्तित करता है, लेकिन स्वयं रासायनिक रूप से अपरिवर्तित रहता है।
- उत्प्रेरक (Catalyst): वह पदार्थ जो अभिक्रिया की दर को बदलता है।
- उत्प्रेरक वर्धक (Promoter): वह पदार्थ जो उत्प्रेरक की सक्रियता को बढ़ाता है (जैसे हैबर प्रक्रिया में Fe के लिए Mo)।
- उत्प्रेरक विष (Poison): वह पदार्थ जो उत्प्रेरक की सक्रियता को घटाता या नष्ट करता है (जैसे हैबर प्रक्रिया में CO, H₂S)।
उत्प्रेरण के प्रकार:
-
समांगी उत्प्रेरण (Homogeneous Catalysis):
- उत्प्रेरक और अभिकारक एक ही प्रावस्था (गैस या द्रव) में होते हैं।
- उदाहरण:
- लेड चैंबर विधि में SO₂ का SO₃ में ऑक्सीकरण (उत्प्रेरक: NO गैस)।
- एस्टर का जल-अपघटन (उत्प्रेरक: H₂SO₄ द्रव)।
-
विषमांगी उत्प्रेरण (Heterogeneous Catalysis):
- उत्प्रेरक और अभिकारक भिन्न-भिन्न प्रावस्थाओं में होते हैं।
- उदाहरण:
- हैबर विधि में अमोनिया का संश्लेषण (उत्प्रेरक: Fe ठोस, अभिकारक: N₂ और H₂ गैस)।
- ओस्टवाल्ड विधि में HNO₃ का निर्माण (उत्प्रेरक: Pt ठोस, अभिकारक: NH₃ और O₂ गैस)।
- वनस्पति तेलों का हाइड्रोजनीकरण (उत्प्रेरक: Ni ठोस)।
उत्प्रेरण का सिद्धांत:
-
मध्यवर्ती यौगिक निर्माण सिद्धांत (समांगी उत्प्रेरण के लिए):
- उत्प्रेरक एक अभिकारक से अभिक्रिया करके एक अस्थिर मध्यवर्ती यौगिक बनाता है।
- यह मध्यवर्ती यौगिक फिर दूसरे अभिकारक से अभिक्रिया करके उत्पाद बनाता है और उत्प्रेरक पुनः उत्पन्न हो जाता है।
- यह अभिक्रिया के लिए एक वैकल्पिक कम सक्रियण ऊर्जा वाला मार्ग प्रदान करता है।
-
आधुनिक अधिशोषण सिद्धांत (विषमांगी उत्प्रेरण के लिए):
- यह सिद्धांत अधिशोषण और मध्यवर्ती यौगिक निर्माण सिद्धांतों का संयोजन है।
- चरण:
- अभिकारकों का विसरण: अभिकारक उत्प्रेरक के पृष्ठ की ओर विसरित होते हैं।
- अभिकारकों का अधिशोषण: अभिकारक उत्प्रेरक के सक्रिय केंद्रों पर अधिशोषित होते हैं।
- मध्यवर्ती का निर्माण: अधिशोषित अभिकारक अभिक्रिया करके मध्यवर्ती बनाते हैं।
- उत्पादों का विशोषण: उत्पाद उत्प्रेरक के पृष्ठ से विशोषित होते हैं।
- उत्पादों का विसरण: उत्पाद उत्प्रेरक के पृष्ठ से दूर विसरित होते हैं।
उत्प्रेरक की महत्वपूर्ण विशेषताएँ:
- सक्रियता (Activity): उत्प्रेरक की रासायनिक अधिशोषण करने की क्षमता।
- वरणात्मकता (Selectivity): उत्प्रेरक की किसी विशेष अभिक्रिया को एक विशेष उत्पाद की ओर निर्देशित करने की क्षमता।
- उदाहरण: CO और H₂ से विभिन्न उत्प्रेरकों द्वारा विभिन्न उत्पाद:
- CO(g) + 3H₂(g) $\xrightarrow{Ni}$ CH₄(g) + H₂O(g)
- CO(g) + 2H₂(g) $\xrightarrow{CuO/ZnO-Cr₂O₃}$ CH₃OH(g)
- CO(g) + H₂(g) $\xrightarrow{Cu}$ HCHO(g)
- उदाहरण: CO और H₂ से विभिन्न उत्प्रेरकों द्वारा विभिन्न उत्पाद:
एंजाइम उत्प्रेरण (Enzyme Catalysis):
एंजाइम जटिल नाइट्रोजन युक्त कार्बनिक यौगिक होते हैं जो जीवित पौधों और जानवरों द्वारा उत्पादित होते हैं। ये वास्तव में उच्च आणविक द्रव्यमान वाले प्रोटीन अणु होते हैं।
-
विशेषताएँ:
- अत्यधिक दक्ष: अभिक्रिया दर को 10⁸ से 10²⁰ गुना तक बढ़ा सकते हैं।
- अत्यधिक विशिष्ट: प्रत्येक एंजाइम एक विशिष्ट अभिक्रिया या अभिकारक के लिए विशिष्ट होता है।
- इष्टतम ताप: 298-310 K (25-37°C) पर अधिकतम सक्रियता।
- इष्टतम pH: pH 5-7 पर अधिकतम सक्रियता।
- उत्प्रेरक वर्धक (कोएंजाइम) और विष: कुछ पदार्थ (जैसे विटामिन) एंजाइम की सक्रियता बढ़ाते हैं, जबकि कुछ (जैसे भारी धातु आयन) इसे कम करते हैं।
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एंजाइम उत्प्रेरण की क्रियाविधि (ताला-कुंजी सिद्धांत):
- एंजाइम के पृष्ठ पर कुछ सक्रिय केंद्र (Active sites) होते हैं जिनकी आकृति अभिकारक (सबस्ट्रेट) अणुओं की आकृति के अनुरूप होती है (जैसे ताले में चाबी)।
- सबस्ट्रेट अणु सक्रिय केंद्रों में फिट होकर एंजाइम-सबस्ट्रेट संकुल (ES) बनाते हैं।
- यह संकुल टूटकर उत्पाद बनाता है और एंजाइम पुनः मुक्त हो जाता है।
- E + S → [ES] → P + E
3. कोलॉइड (Colloids)
कोलॉइड ऐसे विषममांगी तंत्र होते हैं जिनमें एक पदार्थ (परिक्षिप्त प्रावस्था) बहुत महीन कणों के रूप में दूसरे पदार्थ (परिक्षेपण माध्यम) में समान रूप से वितरित होता है।
कोलॉइडी कणों का आकार 1 nm से 1000 nm (10⁻⁹ से 10⁻⁶ मीटर) के बीच होता है।
विलयन, कोलॉइड और निलंबन में अंतर:
| गुणधर्म | वास्तविक विलयन (True Solution) | कोलॉइडी विलयन (Colloidal Solution) | निलंबन (Suspension) |
|---|---|---|---|
| कण आकार | < 1 nm | 1 nm - 1000 nm | > 1000 nm |
| प्रकृति | समांगी | विषमांगी | विषमांगी |
| कणों की दृश्यता | अदृश्य | शक्तिशाली सूक्ष्मदर्शी से दृश्य | नग्न आँखों से दृश्य |
| निस्यंदन | सामान्य फिल्टर पेपर से गुजर जाते हैं | सामान्य फिल्टर पेपर से गुजर जाते हैं, लेकिन अतिसूक्ष्म फिल्टर पेपर से नहीं | फिल्टर पेपर पर रुक जाते हैं |
| टिन्डल प्रभाव | नहीं दर्शाते | दर्शाते हैं | कभी-कभी दर्शाते हैं |
| ब्राउनी गति | नहीं दर्शाते | दर्शाते हैं | नहीं दर्शाते |
| उदाहरण | नमक का घोल, चीनी का घोल | दूध, रक्त, पेंट | रेत + जल, चॉक + जल |
कोलॉइडी तंत्र का वर्गीकरण:
- भौतिक अवस्था के आधार पर (परिक्षिप्त प्रावस्था और परिक्षेपण माध्यम):
कुल 8 प्रकार के कोलॉइड संभव हैं (गैस-गैस मिश्रण समांगी होने के कारण कोलॉइड नहीं होता)।
| परिक्षिप्त प्रावस्था | परिक्षेपण माध्यम | कोलॉइड का प्रकार | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| ठोस | ठोस | ठोस सॉल | रंगीन काँच, रत्न, मिश्र धातु |
| ठोस | द्रव | सॉल | पेंट, कोशिका द्रव, कीचड़ |
| ठोस | गैस | एरोसॉल | धुआँ, धूल |
| द्रव | ठोस | जैल | पनीर, मक्खन, जेली |
| द्रव | द्रव | पायस | दूध, बाल क्रीम, दवाएँ |
| द्रव | गैस | एरोसॉल | कोहरा, बादल, कीटनाशक स्प्रे |
| गैस | ठोस | ठोस फोम | प्यूमिस पत्थर, फोम रबर |
| गैस | द्रव | फोम | फेन, साबुन का झाग, व्हीप्ड क्रीम |
-
परिक्षिप्त प्रावस्था और परिक्षेपण माध्यम के बीच अन्योन्य क्रिया के आधार पर:
-
द्रवरागी कोलॉइड (Lyophilic Colloids):
- "द्रव-प्रिय" (solvent loving)।
- परिक्षिप्त प्रावस्था और परिक्षेपण माध्यम के बीच प्रबल आकर्षण होता है।
- विशेषताएँ:
- उत्क्रमणीय प्रकृति (एक बार स्कंदित होने पर फिर से कोलॉइडी विलयन बनाया जा सकता है)।
- अधिक स्थायी।
- आसानी से तैयार होते हैं (बस माध्यम में घोलकर)।
- उच्च सांद्रता पर भी स्थायी।
- कम श्यानता, कम पृष्ठ तनाव।
- विद्युत-अपघट्य की थोड़ी मात्रा से स्कंदित नहीं होते।
- कणों पर आवेश कम या नहीं होता।
- टिन्डल प्रभाव कम दर्शाते हैं।
- उदाहरण: गोंद, स्टार्च, प्रोटीन, जिलेटिन, रबर।
-
द्रवविरोधी कोलॉइड (Lyophobic Colloids):
- "द्रव-घृणा" (solvent hating)।
- परिक्षिप्त प्रावस्था और परिक्षेपण माध्यम के बीच बहुत कम आकर्षण होता है।
- विशेषताएँ:
- अनुत्क्रमणीय प्रकृति (एक बार स्कंदित होने पर फिर से कोलॉइडी विलयन बनाना मुश्किल)।
- कम स्थायी।
- विशेष विधियों द्वारा तैयार किए जाते हैं।
- कम सांद्रता पर भी अस्थिर।
- श्यानता और पृष्ठ तनाव माध्यम के समान।
- विद्युत-अपघट्य की थोड़ी मात्रा से आसानी से स्कंदित हो जाते हैं।
- कणों पर हमेशा आवेश होता है।
- टिन्डल प्रभाव स्पष्ट दर्शाते हैं।
- उदाहरण: धातु सॉल (Au, Ag), धातु सल्फाइड सॉल (As₂S₃), धातु हाइड्रॉक्साइड सॉल (Fe(OH)₃)।
-
-
कोलॉइडी कणों के प्रकार के आधार पर:
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बहुआण्विक कोलॉइड (Multimolecular Colloids):
- कई परमाणु या छोटे अणु (1 nm से कम व्यास वाले) मिलकर कोलॉइडी आकार के कण बनाते हैं।
- इन कणों को वांडरवाल बल एक साथ रखते हैं।
- उदाहरण: गोल्ड सॉल (Au के कई परमाणु मिलकर), सल्फर सॉल (S₈ अणु मिलकर)।
-
बृहदआण्विक कोलॉइड (Macromolecular Colloids):
- उच्च आणविक द्रव्यमान वाले बड़े अणु (जैसे प्रोटीन, स्टार्च, सेलूलोज, नायलॉन, पॉलीथीन) स्वयं ही कोलॉइडी आकार के होते हैं।
- ये वास्तविक विलयन के समान व्यवहार करते हैं लेकिन आकार में कोलॉइडी होते हैं।
- उदाहरण: स्टार्च, सेलूलोज, प्रोटीन, एंजाइम, संश्लेषित बहुलक।
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संगुणित कोलॉइड (Associated Colloids) / मिसेल (Micelles):
- ये ऐसे पदार्थ होते हैं जो कम सांद्रता पर सामान्य विद्युत-अपघट्य की तरह व्यवहार करते हैं, लेकिन एक निश्चित सांद्रता से ऊपर कोलॉइडी व्यवहार दर्शाते हैं।
- इस सांद्रता को क्रांतिक मिसेल सांद्रता (Critical Micelle Concentration, CMC) कहते हैं।
- CMC से ऊपर, ये अणु (जैसे साबुन या अपमार्जक) संगुणित होकर मिसेल बनाते हैं।
- मिसेल निर्माण एक निश्चित ताप से ऊपर होता है जिसे क्राफ्ट ताप (Kraft Temperature, Tk) कहते हैं।
- मिसेल निर्माण की क्रियाविधि: साबुन (जैसे सोडियम स्टीयरेट, C₁₇H₃₅COONa) में एक लंबी हाइड्रोकार्बन श्रृंखला (जलविरोधी पूँछ) और एक ध्रुवीय -COO⁻Na⁺ समूह (जलरागी शीर्ष) होता है। CMC से ऊपर, जलविरोधी पूँछें अंदर की ओर और जलरागी शीर्ष बाहर की ओर व्यवस्थित होकर एक गोलाकार संरचना (मिसेल) बनाते हैं।
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कोलॉइड बनाने की विधियाँ:
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रासायनिक विधियाँ (संक्षेपण विधियाँ):
- द्वि-अपघटन: As₂O₃ + 3H₂S → As₂S₃ (सॉल) + 3H₂O
- ऑक्सीकरण: 2H₂S + SO₂ → 3S (सॉल) + 2H₂O
- अपचयन: 2AuCl₃ + 3HCHO + 3H₂O → 2Au (सॉल) + 3HCOOH + 6HCl
- जल-अपघटन: FeCl₃ + 3H₂O → Fe(OH)₃ (सॉल) + 3HCl
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ब्रेडिग आर्क विधि (Bredig's Arc Method):
- धातुओं (Au, Ag, Pt) के सॉल बनाने के लिए।
- धातु के इलेक्ट्रोड को परिक्षेपण माध्यम (बर्फ के पानी में) में डुबोकर विद्युत आर्क उत्पन्न किया जाता है। उत्पन्न तीव्र ऊष्मा से धातु वाष्पीकृत होती है और फिर संघनित होकर कोलॉइडी कण बनाती है।
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पेप्टीकरण (Peptization):
- ताजे बने अवक्षेप को परिक्षेपण माध्यम में विद्युत-अपघट्य की थोड़ी मात्रा (पेप्टिकारक) मिलाकर कोलॉइडी अवस्था में परिवर्तित करने की प्रक्रिया।
- अवक्षेप विद्युत-अपघट्य के एक आयन को अधिशोषित करता है, जिससे उस पर आवेश आ जाता है और वह छोटे कणों में टूटकर कोलॉइड बनाता है।
- उदाहरण: Fe(OH)₃ अवक्षेप में FeCl₃ मिलाने पर Fe(OH)₃ सॉल बनता है।
कोलॉइड का शुद्धिकरण:
कोलॉइडी विलयनों में अक्सर विद्युत-अपघट्य और अन्य विलेय अशुद्धियाँ होती हैं, जो कोलॉइड को अस्थिर कर सकती हैं।
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अपोहन (Dialysis):
- एक अर्धपारगम्य झिल्ली (जैसे पार्चमेंट पेपर या सेल्युलोज शीट) का उपयोग करके कोलॉइडी विलयन से विलेय अशुद्धियों को हटाने की प्रक्रिया।
- अशुद्ध कोलॉइडी विलयन को झिल्ली के बैग में रखकर शुद्ध जल में डुबोया जाता है। छोटे आयन और अणु झिल्ली से बाहर विसरित हो जाते हैं, जबकि कोलॉइडी कण अंदर रहते हैं।
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विद्युत अपोहन (Electrodialysis):
- अपोहन प्रक्रिया को तेज करने के लिए विद्युत क्षेत्र का उपयोग किया जाता है।
- विद्युत-अपघट्य के आयन विपरीत आवेश वाले इलेक्ट्रोड की ओर तेजी से गति करते हैं।
-
अतिसूक्ष्म निस्यंदन (Ultrafiltration):
- विशेष रूप से तैयार किए गए फिल्टर पेपर (अतिसूक्ष्म फिल्टर) का उपयोग करके कोलॉइडी कणों को अलग करना।
- ये फिल्टर सामान्य फिल्टर पेपर की तुलना में छोटे छिद्र वाले होते हैं और कोलॉइडी कणों को रोक लेते हैं, जबकि विलेय और माध्यम गुजर जाते हैं।
कोलॉइड के गुणधर्म:
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टिन्डल प्रभाव (Tyndall Effect):
- जब प्रकाश की किरण कोलॉइडी विलयन से गुजरती है, तो प्रकाश का प्रकीर्णन होता है और प्रकाश का मार्ग एक चमकीले शंकु (टिन्डल शंकु) के रूप में दिखाई देता है।
- कारण: कोलॉइडी कणों का आकार प्रकाश की तरंगदैर्ध्य के तुलनीय होता है, जिससे वे प्रकाश को प्रकीर्णित करते हैं।
- शर्तें:
- परिक्षिप्त कणों का व्यास प्रयुक्त प्रकाश की तरंगदैर्ध्य से बहुत कम नहीं होना चाहिए।
- परिक्षिप्त प्रावस्था और परिक्षेपण माध्यम के अपवर्तनांकों में पर्याप्त अंतर होना चाहिए।
- अनुप्रयोग: वास्तविक विलयन और कोलॉइडी विलयन में अंतर करने के लिए।
-
ब्राउनी गति (Brownian Movement):
- कोलॉइडी कणों की परिक्षेपण माध्यम में टेढ़ी-मेढ़ी, अनियमित गति।
- कारण: परिक्षेपण माध्यम के अणुओं द्वारा कोलॉइडी कणों पर सभी दिशाओं से असमान बमबारी।
- महत्त्व: कोलॉइडी विलयनों के स्थायित्व का कारण (कणों को गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में नीचे बैठने से रोकती है)।
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विद्युत कण संचलन (Electrophoresis) / वैद्युत कण संचलन:
- विद्युत क्षेत्र के प्रभाव में कोलॉइडी कणों का विपरीत आवेश वाले इलेक्ट्रोड की ओर गमन।
- कारण: कोलॉइडी कणों पर आवेश होता है (या तो धनात्मक या ऋणात्मक)।
- अनुप्रयोग: कोलॉइडी कणों पर आवेश की प्रकृति निर्धारित करने के लिए।
- विद्युत परासरण (Electro-osmosis): यदि कोलॉइडी कणों को स्थिर रखा जाए, तो परिक्षेपण माध्यम विपरीत आवेश वाले इलेक्ट्रोड की ओर गति करता है।
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स्कंदन (Coagulation) / अवक्षेपण (Flocculation):
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कोलॉइडी कणों का अवक्षेप के रूप में नीचे बैठना।
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कोलॉइडी कणों का स्थायित्व उनके आवेश के कारण होता है। जब आवेश को हटा दिया जाता है, तो कण एक-दूसरे के पास आकर बड़े कण बनाते हैं और अवक्षेपित हो जाते हैं।
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स्कंदन के तरीके:
- विद्युत कण संचलन द्वारा।
- विद्युत-अपघट्य मिलाकर।
- विपरीत आवेश वाले सॉल मिलाकर।
- क्वथन द्वारा।
- लगातार अपोहन द्वारा।
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हार्डी-शुल्ज़ नियम (Hardy-Schulze Rule):
- कोलॉइडी सॉल के स्कंदन के लिए, विद्युत-अपघट्य का वह आयन प्रभावी होता है जिस पर कोलॉइडी कणों के आवेश के विपरीत आवेश होता है।
- स्कंदन करने वाले आयन (स्कंदक आयन) की स्कंदन शक्ति उसकी संयोजकता (आवेश) बढ़ने के साथ बढ़ती है।
- उदाहरण: ऋणात्मक सॉल (जैसे As₂S₃ सॉल) के लिए, स्कंदन शक्ति का क्रम: Al³⁺ > Ba²⁺ > Na⁺।
- धनात्मक सॉल (जैसे Fe(OH)₃ सॉल) के लिए, स्कंदन शक्ति का क्रम: [Fe(CN)₆]⁴⁻ > PO₄³⁻ > SO₄²⁻ > Cl⁻।
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कोलॉइड का रक्षण (Protection of Colloids):
- द्रवविरोधी सॉल कम स्थायी होते हैं और आसानी से स्कंदित हो जाते हैं।
- द्रवरागी कोलॉइड (जैसे जिलेटिन, गोंद) को द्रवविरोधी सॉल में मिलाने पर, द्रवरागी कोलॉइड द्रवविरोधी कणों के चारों ओर एक सुरक्षात्मक परत बना लेते हैं, जिससे उनकी स्थिरता बढ़ जाती है।
- स्वर्ण संख्या (Gold Number): किसी रक्षी कोलॉइड की मिलीग्राम में वह न्यूनतम मात्रा जो 10 mL मानक गोल्ड सॉल को 1 mL 10% NaCl विलयन द्वारा स्कंदित होने से रोकती है। स्वर्ण संख्या जितनी कम होती है, रक्षी शक्ति उतनी ही अधिक होती है।
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पायस (Emulsions):
ये द्रव-द्रव कोलॉइडी तंत्र होते हैं, जिसमें एक द्रव दूसरे द्रव में महीन बूंदों के रूप में परिक्षिप्त होता है। दोनों द्रव अमिश्रणीय होते हैं।
-
प्रकार:
- तेल में जल (O/W) पायस: तेल परिक्षिप्त प्रावस्था और जल परिक्षेपण माध्यम होता है (जैसे दूध, वैनिशिंग क्रीम)।
- जल में तेल (W/O) पायस: जल परिक्षिप्त प्रावस्था और तेल परिक्षेपण माध्यम होता है (जैसे मक्खन, कोल्ड क्रीम)।
-
पायसीकारक (Emulsifying Agents):
- पायस को स्थायी बनाने के लिए मिलाए जाने वाले पदार्थ (जैसे साबुन, डिटर्जेंट, प्रोटीन, गोंद)।
- ये दोनों द्रवों के बीच एक अंतरापृष्ठीय फिल्म बनाकर उन्हें अलग होने से रोकते हैं।
-
अनुप्रयोग: दवाएँ, सौंदर्य प्रसाधन, दूध, तेल शोधन।
जैल (Gels):
ये ऐसे कोलॉइड होते हैं जिनमें द्रव परिक्षिप्त प्रावस्था और ठोस परिक्षेपण माध्यम होता है। ये अर्ध-ठोस होते हैं।
उदाहरण: जेली, पनीर, बूट पॉलिश।
पृष्ठ रसायन के अनुप्रयोग (सारांश):
- औद्योगिक प्रक्रियाएँ: उत्प्रेरक का उपयोग (हैबर, ओस्टवाल्ड, संपर्क विधि)।
- जल शोधन: फिटकरी का उपयोग करके निलंबित अशुद्धियों का स्कंदन।
- औषधियाँ: कोलॉइडी दवाएँ अधिक प्रभावी होती हैं (जैसे आर्गायरॉल, कोलॉइडी एंटीमनी)।
- फोटोग्राफिक प्लेट: जिलेटिन में AgBr का पायस।
- रबर उद्योग: रबर लेटेक्स का स्कंदन।
- चमड़ा कमाना (Tanning): ऋणात्मक आवेशित चमड़े के रेशों का धनात्मक आवेशित टैनिन से स्कंदन।
- कृत्रिम वर्षा: विपरीत आवेशित कोलॉइडी धूल के कणों का छिड़काव करके बादलों का स्कंदन।
- धुलाई क्रिया: साबुन और अपमार्जक की मिसेल क्रिया द्वारा।
- धूम्र अवक्षेपण (Cottrell Precipitator): चिमनियों से निकलने वाले धुएँ में उपस्थित कार्बन कणों को आवेशित प्लेटों द्वारा अवक्षेपित करना।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
निर्देश: प्रत्येक प्रश्न के लिए सही विकल्प चुनें।
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निम्नलिखित में से कौन-सा कथन भौतिक अधिशोषण के लिए सही नहीं है?
a) यह उत्क्रमणीय प्रकृति का होता है।
b) अधिशोषण की एन्थैल्पी कम होती है।
c) यह अत्यधिक विशिष्ट होता है।
d) यह निम्न ताप पर अनुकूल होता है। -
कोलॉइडी कणों का आकार किस परास में होता है?
a) < 1 nm
b) 1 nm - 1000 nm
c) > 1000 nm
d) 100 nm - 10000 nm -
हार्डी-शुल्ज़ नियम के अनुसार, ऋणात्मक आवेशित सॉल के स्कंदन के लिए सबसे प्रभावी आयन कौन-सा है?
a) Na⁺
b) Ba²⁺
c) Al³⁺
d) Cl⁻ -
दूध किस प्रकार के कोलॉइडी तंत्र का उदाहरण है?
a) ठोस सॉल
b) फोम
c) पायस
d) जैल -
एंजाइम उत्प्रेरण की क्रियाविधि को समझाने के लिए कौन-सा सिद्धांत दिया गया है?
a) फ्रेंडलिक अधिशोषण समतापी
b) ताला-कुंजी सिद्धांत
c) लैंगमुइर अधिशोषण समतापी
d) मध्यवर्ती यौगिक निर्माण सिद्धांत -
वह प्रक्रिया जिसमें ताजे बने अवक्षेप को परिक्षेपण माध्यम में विद्युत-अपघट्य की थोड़ी मात्रा मिलाकर कोलॉइडी अवस्था में परिवर्तित किया जाता है, कहलाती है:
a) अपोहन
b) स्कंदन
c) पेप्टीकरण
d) विद्युत कण संचलन -
निम्नलिखित में से कौन-सा द्रवरागी कोलॉइड का उदाहरण है?
a) गोल्ड सॉल
b) Fe(OH)₃ सॉल
c) स्टार्च सॉल
d) As₂S₃ सॉल -
वह न्यूनतम सांद्रता जिस पर साबुन के अणु मिसेल बनाना शुरू करते हैं, कहलाती है:
a) क्राफ्ट ताप
b) क्रांतिक मिसेल सांद्रता (CMC)
c) स्वर्ण संख्या
d) स्कंदन मान -
उत्प्रेरक की सक्रियता को बढ़ाने वाले पदार्थ कहलाते हैं:
a) उत्प्रेरक विष
b) उत्प्रेरक वर्धक
c) कोएंजाइम
d) अधिशोषक -
टिन्डल प्रभाव किस परिघटना के कारण होता है?
a) परावर्तन
b) अपवर्तन
c) प्रकाश का प्रकीर्णन
d) प्रकाश का अवशोषण
मुझे आशा है कि यह विस्तृत नोट्स और प्रश्नोत्तर आपकी सरकारी परीक्षाओं की तैयारी में अत्यंत सहायक सिद्ध होंगे। शुभकामनाएँ!