Class 12 Chemistry Notes Chapter 6 (Chapter 6) – Rasayan Vigyan Bhag-II Book

Rasayan Vigyan Bhag-II
प्रिय विद्यार्थियों,

आज हम रसायन विज्ञान के अध्याय 6, 'तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धांत एवं प्रक्रम' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय विभिन्न धातुओं को उनके अयस्कों से प्राप्त करने की विधियों और उनमें निहित वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित है। सरकारी परीक्षाओं के लिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण खंड है, जहाँ से सीधे प्रश्न पूछे जाते हैं।


अध्याय 6: तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धांत एवं प्रक्रम
(General Principles and Processes of Isolation of Elements)

धातुओं को उनके अयस्कों से निष्कर्षित करने की पूरी प्रक्रिया को धातु कर्म (Metallurgy) कहते हैं।

1. महत्वपूर्ण पद (Important Terms):

  • खनिज (Minerals): पृथ्वी की भूपर्पटी में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले रासायनिक पदार्थ, जिनमें धातुएँ या उनके यौगिक उपस्थित होते हैं।
  • अयस्क (Ores): वे खनिज जिनसे धातु का निष्कर्षण आर्थिक रूप से लाभदायक और सुविधाजनक होता है। सभी अयस्क खनिज होते हैं, लेकिन सभी खनिज अयस्क नहीं होते।
  • गैंग (Gangue) या अधात्री (Matrix): अयस्क में उपस्थित अवांछित अशुद्धियाँ, जैसे मिट्टी, रेत, चट्टानों के टुकड़े आदि।
  • धातु कर्म (Metallurgy): अयस्कों से धातुओं के निष्कर्षण और उनके शोधन की संपूर्ण वैज्ञानिक तथा प्रौद्योगिक प्रक्रिया।

2. धातु कर्म के चरण (Steps of Metallurgy):

धातु कर्म में मुख्यतः चार चरण होते हैं:
a. अयस्कों का सांद्रण (Concentration of Ores)
b. सांद्रित अयस्क से अपरिष्कृत धातु का निष्कर्षण (Extraction of Crude Metal from Concentrated Ore)
c. अपरिष्कृत धातु का शोधन (Refining of Crude Metal)
d. धातुओं का अनुप्रयोग (Application of Metals)

a. अयस्कों का सांद्रण (Concentration of Ores):
अयस्क से गैंग या अधात्री को हटाने की प्रक्रिया को अयस्क का सांद्रण या ड्रेसिंग कहते हैं। यह निम्न विधियों द्वारा किया जाता है:

  • गुरुत्व पृथक्करण विधि (Hydraulic Washing/Gravity Separation):

    • यह विधि अयस्क और गैंग कणों के विशिष्ट गुरुत्व (घनत्व) में अंतर के सिद्धांत पर आधारित है।
    • बारीक पिसे हुए अयस्क को जल की तेज धारा से धोया जाता है। भारी अयस्क कण नीचे बैठ जाते हैं, जबकि हल्के गैंग कण जल के साथ बह जाते हैं।
    • यह विधि ऑक्साइड अयस्कों (जैसे हेमेटाइट, टिन स्टोन) और मूल धातुओं (जैसे सोना) के लिए उपयुक्त है।
  • चुंबकीय पृथक्करण विधि (Magnetic Separation):

    • यह विधि अयस्क या गैंग में से किसी एक के चुंबकीय गुणों पर आधारित है।
    • बारीक पिसे हुए अयस्क को चुंबकीय रोलर पर घूमती हुई बेल्ट पर डाला जाता है। चुंबकीय पदार्थ (अयस्क या गैंग) चुंबकीय रोलर की ओर आकर्षित होकर अलग ढेर बनाते हैं, जबकि अचुंबकीय पदार्थ दूर गिरते हैं।
    • उपयोग: क्रोमाइट (FeCr₂O₄), पाइरोलुसाइट (MnO₂), टिन स्टोन (SnO₂ - अचुंबकीय गैंग से चुंबकीय अयस्क अलग करना) और लौह अयस्क (हेमेटाइट, मैग्नेटाइट) के लिए।
  • झाग प्लवन विधि (Froth Flotation Method):

    • यह विधि सल्फाइड अयस्कों (जैसे गैलेना PbS, जिंक ब्लेंड ZnS, कॉपर पाइराइट CuFeS₂) के लिए उपयोग की जाती है।
    • यह अयस्क कणों और गैंग कणों की जल में भीगने की प्रवृत्ति (wettability) में अंतर के सिद्धांत पर आधारित है। सल्फाइड अयस्क कण तेल से, जबकि गैंग कण जल से भीगते हैं।
    • बारीक पिसे हुए अयस्क को जल से भरे टैंक में डाला जाता है। इसमें चीड़ का तेल (पाइन ऑयल) या यूकेलिप्टस का तेल (झाग कारक/कलेक्टर) और पोटैशियम एथिल जैन्थेट (फेन स्थायिकारक/स्टेबलाइजर) जैसे पदार्थ मिलाए जाते हैं।
    • वायु को तीव्र गति से प्रवाहित करने पर झाग बनता है। तेल से भीगे हुए अयस्क कण झाग के साथ ऊपर आ जाते हैं, जिसे अलग कर लिया जाता है। गैंग कण नीचे बैठ जाते हैं।
    • अवनमक (Depressants): कुछ अयस्कों में दो सल्फाइड होते हैं (जैसे ZnS और PbS)। अवनमक (जैसे NaCN) का उपयोग एक सल्फाइड को झाग बनाने से रोकने के लिए किया जाता है, जिससे दूसरे सल्फाइड को अलग किया जा सके। (NaCN, ZnS के साथ अभिक्रिया करके Na₂[Zn(CN)₄] बनाता है, जिससे ZnS झाग में नहीं आता)।
  • निक्षालन (Leaching):

    • यह एक रासायनिक विधि है जिसमें अयस्क को एक उपयुक्त विलायक में घोला जाता है, जिससे अयस्क घुल जाता है और गैंग अघुलनशील रह जाता है।
    • बॉक्साइट (Al₂O₃.nH₂O) का निक्षालन (बेयर प्रक्रम): बॉक्साइट को सांद्र NaOH विलयन के साथ 473-523 K पर 35-36 bar दाब पर गर्म किया जाता है।
      Al₂O₃(s) + 2NaOH(aq) + 3H₂O(l) → 2NaAl(OH)₄ (सोडियम मेटा-एलुमिनेट)
      सोडियम मेटा-एलुमिनेट विलयन को छानकर अशुद्धियों को हटा दिया जाता है। फिर इसे जल से तनु करके एल्यूमीनियम हाइड्रॉक्साइड के ताजे अवक्षेप से बीजन (सीडिंग) किया जाता है।
      2NaAl(OH)₄ + 2H₂O(l) → Al₂(OH)₆(s) ↓ + 2NaOH(aq) (या Al(OH)₃)
      Al(OH)₃ अवक्षेप को छानकर, धोकर और गर्म करके शुद्ध एल्यूमिना (Al₂O₃) प्राप्त किया जाता है।
      2Al(OH)₃(s) $\xrightarrow{1470 K}$ Al₂O₃(s) + 3H₂O(g)
    • सोने और चाँदी का निक्षालन: इन धातुओं को वायु की उपस्थिति में NaCN या KCN के तनु विलयन से निक्षालित किया जाता है।
      4M(s) + 8CN⁻(aq) + 2H₂O(aq) + O₂(g) → 4[M(CN)₂]⁻(aq) + 4OH⁻(aq) (M = Ag या Au)
      धातु को [M(CN)₂]⁻ से जिंक द्वारा विस्थापित किया जाता है (जिंक अधिक क्रियाशील है)।
      2[M(CN)₂]⁻(aq) + Zn(s) → [Zn(CN)₄]²⁻(aq) + 2M(s)

b. सांद्रित अयस्क से अपरिष्कृत धातु का निष्कर्षण:
इसमें दो मुख्य चरण होते हैं:
i. धातु को उसके ऑक्साइड में परिवर्तित करना।
ii. धातु ऑक्साइड का अपचयन करके धातु प्राप्त करना।

i. धातु को उसके ऑक्साइड में परिवर्तित करना:

  • निस्तापन (Calcination):

    • अयस्क को उसके गलनांक से कम तापमान पर वायु की अनुपस्थिति या सीमित आपूर्ति में गर्म करना।
    • उद्देश्य: वाष्पशील अशुद्धियों (जैसे CO₂, H₂O) को दूर करना, कार्बोनेट अयस्कों को ऑक्साइड में बदलना, हाइड्रेटेड अयस्कों से जल निकालना।
    • उदाहरण:
      Fe₂O₃.xH₂O(s) $\xrightarrow{\Delta}$ Fe₂O₃(s) + xH₂O(g)
      ZnCO₃(s) $\xrightarrow{\Delta}$ ZnO(s) + CO₂(g)
      CaCO₃.MgCO₃(s) $\xrightarrow{\Delta}$ CaO(s) + MgO(s) + 2CO₂(g)
  • भर्जन (Roasting):

    • अयस्क को उसके गलनांक से कम तापमान पर वायु की अधिकता में गर्म करना।
    • उद्देश्य: सल्फाइड अयस्कों को ऑक्साइड में बदलना, आर्सेनिक, सल्फर, फॉस्फोरस जैसी अशुद्धियों को उनके वाष्पशील ऑक्साइड (As₂O₃, SO₂, P₄O₁₀) के रूप में दूर करना।
    • उदाहरण:
      2ZnS(s) + 3O₂(g) $\xrightarrow{\Delta}$ 2ZnO(s) + 2SO₂(g)
      2PbS(s) + 3O₂(g) $\xrightarrow{\Delta}$ 2PbO(s) + 2SO₂(g)
      2CuFeS₂(s) + O₂(g) $\xrightarrow{\Delta}$ Cu₂S(s) + 2FeS(s) + SO₂(g) (कॉपर पाइराइट का भर्जन)

ii. धातु ऑक्साइड का अपचयन (Reduction of Metal Oxide):
धातु ऑक्साइड को अपचायक (जैसे कार्बन, CO, अन्य धातुएँ, विद्युत) का उपयोग करके धातु में अपचयित किया जाता है।

  • प्रगलन (Smelting):

    • यह वह प्रक्रिया है जिसमें अयस्क को अपचायक (जैसे कोक) और गालक (Flux) के साथ उच्च तापमान पर गर्म किया जाता है।
    • गालक (Flux): यह अयस्क में उपस्थित अगलनीय गैंग अशुद्धियों के साथ अभिक्रिया करके गलनीय पदार्थ (धातुमल/Slag) बनाता है, जिसे आसानी से अलग किया जा सकता है।
      • अम्लीय गालक (Acidic Flux): SiO₂ (जब गैंग क्षारीय हो, जैसे FeO, CaO, MgO)।
        FeO + SiO₂ $\rightarrow$ FeSiO₃ (धातुमल)
      • क्षारीय गालक (Basic Flux): CaO, CaCO₃, MgCO₃ (जब गैंग अम्लीय हो, जैसे SiO₂)।
        SiO₂ + CaO $\rightarrow$ CaSiO₃ (धातुमल)
    • उदाहरण: आयरन का निष्कर्षण (ब्लास्ट फर्नेस)
  • एलिंगम आरेख (Ellingham Diagram):

    • यह $\Delta_f G^\circ$ (मानक गिब्स मुक्त ऊर्जा परिवर्तन) बनाम तापमान (T) का आरेख है।
    • यह आरेख विभिन्न धातु ऑक्साइडों के निर्माण के लिए गिब्स ऊर्जा परिवर्तन को दर्शाता है।
    • सिद्धांत:
      • किसी भी अपचयन अभिक्रिया के लिए $\Delta G^\circ$ ऋणात्मक होना चाहिए।
      • एक धातु ऑक्साइड को दूसरे धातु द्वारा अपचयित किया जा सकता है यदि अपचायक धातु के ऑक्साइड के निर्माण के लिए $\Delta G^\circ$ का मान, अपचयित होने वाले धातु ऑक्साइड के निर्माण के $\Delta G^\circ$ मान से कम (अधिक ऋणात्मक) हो।
      • आरेख में, जो रेखा नीचे होती है, वह ऊपर वाली रेखा के ऑक्साइड को अपचयित कर सकती है।
      • तापमान बढ़ने पर धातुओं के ऑक्साइडों के निर्माण की $\Delta G^\circ$ रेखाएँ ऊपर की ओर जाती हैं (कम ऋणात्मक होती हैं), क्योंकि $\Delta S^\circ$ धनात्मक होता है (गैसीय उत्पाद बनते हैं)।
      • CO, C से बेहतर अपचायक है कम तापमान पर, जबकि उच्च तापमान पर C बेहतर अपचायक है।
      • अनुप्रयोग:
        • आयरन का निष्कर्षण (ब्लास्ट फर्नेस):
          • निम्न तापमान (500-800 K): CO, Fe₂O₃ को Fe में अपचयित करता है। (CO + Fe₂O₃ $\rightarrow$ Fe + CO₂)
          • उच्च तापमान (900-1500 K): कार्बन (कोक), FeO को Fe में अपचयित करता है। (C + FeO $\rightarrow$ Fe + CO)
        • जिंक का निष्कर्षण: ZnO को कार्बन द्वारा अपचयित करने के लिए उच्च तापमान (1673 K) की आवश्यकता होती है, क्योंकि ZnO की $\Delta G^\circ$ रेखा C, CO की रेखा से ऊपर होती है।
        • कॉपर का निष्कर्षण: Cu₂O को कार्बन द्वारा आसानी से अपचयित किया जा सकता है, क्योंकि Cu₂O की $\Delta G^\circ$ रेखा C, CO की रेखा से ऊपर होती है।
  • विद्युत अपघटनी अपचयन (Electrolytic Reduction):

    • यह अत्यधिक क्रियाशील धातुओं (जैसे Na, K, Ca, Mg, Al) के निष्कर्षण के लिए उपयोग किया जाता है।
    • धातु के गलित लवण का विद्युत अपघटन किया जाता है।
    • उदाहरण: एल्यूमीनियम का निष्कर्षण (हॉफमैन-हॉल प्रक्रम):
      • शुद्ध एल्यूमिना (Al₂O₃) का गलनांक बहुत अधिक होता है (2323 K)। इसे कम करने और चालकता बढ़ाने के लिए, इसे गलित क्रायोलाइट (Na₃AlF₆) और फ्लूओस्पार (CaF₂) के मिश्रण में घोला जाता है।
      • विद्युत अपघटन 950-970 K पर किया जाता है।
      • कैथोड (ग्रेफाइट): Al³⁺ + 3e⁻ → Al(l)
      • एनोड (ग्रेफाइट): O²⁻ आयन एनोड पर ऑक्सीकृत होकर O₂ गैस देते हैं, जो कार्बन एनोड से अभिक्रिया करके CO और CO₂ बनाती है।
        2O²⁻ → O₂(g) + 4e⁻
        C(s) + O₂(g) → CO₂(g)
        C(s) + 2O²⁻ → CO₂(g) + 4e⁻
      • एनोड लगातार खपत होता रहता है और उसे बदलना पड़ता है।
  • जलधातु कर्म (Hydrometallurgy):

    • यह उन धातुओं के लिए उपयोग किया जाता है जो अधिक क्रियाशील धातुओं द्वारा उनके लवण विलयन से विस्थापित हो सकती हैं।
    • अयस्क को एक उपयुक्त अभिकर्मक में घोला जाता है, और फिर अधिक क्रियाशील धातु का उपयोग करके लक्ष्य धातु को विस्थापित किया जाता है।
    • उदाहरण: चाँदी और सोने का निक्षालन (ऊपर वर्णित) के बाद जिंक द्वारा विस्थापन।

c. अपरिष्कृत धातु का शोधन (Refining of Crude Metal):
अपचयन के बाद प्राप्त धातु में अभी भी अशुद्धियाँ होती हैं, जिन्हें हटाने के लिए शोधन किया जाता है।

  • आसवन (Distillation):

    • यह उन धातुओं के लिए उपयोग किया जाता है जिनका क्वथनांक कम होता है (जैसे Zn, Cd, Hg)।
    • अशुद्ध धातु को गर्म करके वाष्पीकृत किया जाता है, और फिर वाष्प को ठंडा करके शुद्ध धातु प्राप्त की जाती है। अशुद्धियाँ पीछे रह जाती हैं।
  • द्रवण (Liquation):

    • यह उन धातुओं के लिए उपयोग किया जाता है जिनका गलनांक कम होता है (जैसे Sn, Pb, Bi), जबकि अशुद्धियों का गलनांक अधिक होता है।
    • अशुद्ध धातु को एक ढलान वाली भट्टी पर गर्म किया जाता है। शुद्ध धातु पिघलकर बह जाती है, जबकि अगलनीय अशुद्धियाँ पीछे रह जाती हैं।
  • विद्युत अपघटनी शोधन (Electrolytic Refining):

    • यह कॉपर, जिंक, टिन, निकल, चाँदी, सोना आदि के लिए सबसे व्यापक रूप से उपयोग की जाने वाली विधि है।
    • एनोड: अशुद्ध धातु का मोटा ब्लॉक।
    • कैथोड: शुद्ध धातु की पतली शीट।
    • विद्युत अपघट्य: धातु लवण का विलयन।
    • विद्युत धारा प्रवाहित करने पर, एनोड से शुद्ध धातु आयन विलयन में आते हैं और कैथोड पर जमा हो जाते हैं। अधिक सक्रिय अशुद्धियाँ विलयन में रहती हैं, जबकि कम सक्रिय अशुद्धियाँ एनोड के नीचे एनोड पंक (Anode Mud) के रूप में जमा हो जाती हैं (जैसे Au, Ag, Pt)।
    • उदाहरण (कॉपर का शोधन):
      • एनोड: अशुद्ध Cu
      • कैथोड: शुद्ध Cu
      • विद्युत अपघट्य: अम्लीकृत CuSO₄ विलयन
      • एनोड पर: Cu(s) → Cu²⁺(aq) + 2e⁻ (अशुद्ध Cu घुलता है)
      • कैथोड पर: Cu²⁺(aq) + 2e⁻ → Cu(s) (शुद्ध Cu जमा होता है)
  • मंडल परिष्करण (Zone Refining):

    • यह विधि इस सिद्धांत पर आधारित है कि अशुद्धियाँ गलित अवस्था में ठोस अवस्था की तुलना में अधिक घुलनशील होती हैं।
    • यह अतिशुद्ध धातुओं (जैसे Ge, Si, B, Ga, In) के उत्पादन के लिए उपयोग की जाती है।
    • एक अशुद्ध धातु की छड़ को एक सिरे पर वृत्ताकार गतिमान हीटर द्वारा गर्म किया जाता है, जिससे एक गलित मंडल (Molten Zone) बनता है। हीटर को धीरे-धीरे छड़ के साथ आगे बढ़ाया जाता है।
    • जैसे-जैसे हीटर आगे बढ़ता है, शुद्ध धातु क्रिस्टलीकृत होकर ठोस होती जाती है, जबकि अशुद्धियाँ गलित मंडल में आगे बढ़ती रहती हैं। इस प्रक्रिया को कई बार दोहराया जाता है, जिससे अशुद्धियाँ छड़ के एक सिरे पर केंद्रित हो जाती हैं, जिसे बाद में काट कर हटा दिया जाता है।
  • वाष्प प्रावस्था परिष्करण (Vapour Phase Refining):

    • इस विधि में धातु को एक वाष्पशील यौगिक में परिवर्तित किया जाता है, जिसे बाद में अपघटित करके शुद्ध धातु प्राप्त की जाती है।
    • शर्तें:
      • धातु को एक उपयुक्त अभिकर्मक के साथ अभिक्रिया करके एक वाष्पशील यौगिक बनाना चाहिए।
      • वाष्पशील यौगिक को आसानी से अपघटित किया जा सके ताकि शुद्ध धातु प्राप्त हो सके।
    • मॉन्ड प्रक्रम (Mond Process) - निकल (Ni) के लिए:
      • अशुद्ध निकल को CO गैस के साथ 330-350 K पर गर्म किया जाता है, जिससे वाष्पशील निकल टेट्राकार्बोनिल बनता है।
        Ni(s) + 4CO(g) $\xrightarrow{330-350 K}$ Ni(CO)₄(g)
      • निकल टेट्राकार्बोनिल को फिर 450-470 K पर गर्म करके अपघटित किया जाता है, जिससे शुद्ध निकल प्राप्त होता है।
        Ni(CO)₄(g) $\xrightarrow{450-470 K}$ Ni(s) + 4CO(g)
    • वॉन आर्केल विधि (Van Arkel Method) - ज़िरकोनियम (Zr) और टाइटेनियम (Ti) के लिए:
      • अशुद्ध धातु को आयोडीन के साथ 870 K पर गर्म किया जाता है, जिससे वाष्पशील धातु आयोडाइड बनता है।
        Zr(s) + 2I₂(g) $\xrightarrow{870 K}$ ZrI₄(g)
      • धातु आयोडाइड वाष्प को एक टंगस्टन फिलामेंट पर प्रवाहित किया जाता है, जिसे 1800 K पर गर्म किया जाता है। आयोडाइड अपघटित होकर शुद्ध धातु को फिलामेंट पर जमा करता है।
        ZrI₄(g) $\xrightarrow{1800 K}$ Zr(s) + 2I₂(g)
  • वर्णलेखिकी विधियाँ (Chromatographic Methods):

    • यह उन तत्वों के लिए उपयोग की जाती है जो बहुत कम मात्रा में मौजूद होते हैं या जब अशुद्धियाँ धातु के रासायनिक गुणों के समान होती हैं।
    • यह विधि स्थिर प्रावस्था पर विभिन्न घटकों के अधिशोषण की विभिन्न क्षमताओं पर आधारित है।

कुछ महत्वपूर्ण धातुओं का निष्कर्षण (Extraction of Some Important Metals):

1. आयरन (Iron) का निष्कर्षण (हेमेटाइट, Fe₂O₃ से):
ब्लास्ट फर्नेस (वात्या भट्टी) में किया जाता है। इसमें अयस्क (Fe₂O₃), कोक (C) और चूना पत्थर (CaCO₃) का मिश्रण डाला जाता है।

  • तापमान क्षेत्र:
    • दहन क्षेत्र (Combustion Zone) - सबसे नीचे (2170 K): कोक जलकर CO₂ बनाता है, जो ऊष्मा उत्पन्न करता है।
      C(s) + O₂(g) → CO₂(g) ($\Delta H$ = -ve)
    • अपचयन क्षेत्र (Reduction Zone) - मध्य (900-1500 K):
      • CO₂ ऊपर जाकर गर्म कोक से अभिक्रिया करके CO बनाता है, जो मुख्य अपचायक है।
        CO₂(g) + C(s) → 2CO(g)
      • उच्च तापमान (900-1500 K):
        FeO(s) + C(s) → Fe(l) + CO(g)
      • निम्न तापमान (500-800 K):
        3Fe₂O₃(s) + CO(g) → 2Fe₃O₄(s) + CO₂(g)
        Fe₃O₄(s) + 4CO(g) → 3Fe(s) + 4CO₂(g)
        Fe₂O₃(s) + 3CO(g) → 2Fe(s) + 3CO₂(g)
    • धातुमल निर्माण क्षेत्र (Slag Formation Zone) - मध्य (1200 K):
      चूना पत्थर अपघटित होकर CaO बनाता है, जो सिलिका (SiO₂) अशुद्धि के साथ अभिक्रिया करके धातुमल (CaSiO₃) बनाता है।
      CaCO₃(s) $\xrightarrow{\Delta}$ CaO(s) + CO₂(g)
      CaO(s) + SiO₂(s) → CaSiO₃(l) (धातुमल)
  • उत्पाद: पिघला हुआ लोहा (ढलवाँ लोहा/Pig Iron) और धातुमल। ढलवाँ लोहा में 4% कार्बन और कुछ अन्य अशुद्धियाँ (S, P, Si, Mn) होती हैं।

2. कॉपर (Copper) का निष्कर्षण (कॉपर पाइराइट, CuFeS₂ से):

  • सांद्रण: झाग प्लवन विधि।
  • भर्जन: सांद्रित अयस्क को परावर्तनी भट्टी में गर्म किया जाता है।
    2CuFeS₂(s) + O₂(g) $\xrightarrow{\Delta}$ Cu₂S(s) + 2FeS(s) + SO₂(g)
    FeS(s) + O₂(g) $\xrightarrow{\Delta}$ FeO(s) + SO₂(g)
  • प्रगलन (Smelting): भर्जित अयस्क को रेत (SiO₂) और कोक के साथ परावर्तनी भट्टी में गर्म किया जाता है। FeO, SiO₂ के साथ अभिक्रिया करके धातुमल (FeSiO₃) बनाता है।
    FeO(s) + SiO₂(s) → FeSiO₃(l) (धातुमल)
    इस चरण में प्राप्त गलित पदार्थ को मैट (Matte) कहते हैं, जिसमें Cu₂S और FeS होता है।
  • बेसेमरीकरण (Bessemerisation): मैट को बेसेमर परिवर्तक में SiO₂ और वायु के साथ गर्म किया जाता है।
    2FeS(s) + 3O₂(g) → 2FeO(s) + 2SO₂(g)
    FeO(s) + SiO₂(s) → FeSiO₃(l) (धातुमल)
    2Cu₂S(s) + 3O₂(g) → 2Cu₂O(s) + 2SO₂(g)
    Cu₂O(s) + Cu₂S(s) → 6Cu(l) + SO₂(g) (स्व-अपचयन)
    प्राप्त कॉपर को फफोलेदार कॉपर (Blister Copper) कहते हैं, क्योंकि इसमें SO₂ गैस के बुलबुले होते हैं।
  • शोधन: विद्युत अपघटनी शोधन द्वारा।

3. जिंक (Zinc) का निष्कर्षण (जिंक ब्लेंड, ZnS से):

  • सांद्रण: झाग प्लवन विधि।
  • भर्जन: सांद्रित अयस्क को भर्जित किया जाता है।
    2ZnS(s) + 3O₂(g) $\xrightarrow{\Delta}$ 2ZnO(s) + 2SO₂(g)
  • अपचयन: जिंक ऑक्साइड को कोक के साथ 1673 K पर गर्म किया जाता है (एलिंगम आरेख के अनुसार उच्च तापमान आवश्यक है)।
    ZnO(s) + C(s) $\xrightarrow{1673 K}$ Zn(g) + CO(g)
    जिंक वाष्प को ठंडा करके शुद्ध जिंक प्राप्त किया जाता है।
  • शोधन: आसवन या विद्युत अपघटनी शोधन द्वारा।

अभ्यास प्रश्न (Multiple Choice Questions - MCQs):

  1. निम्नलिखित में से कौन-सी विधि सल्फाइड अयस्कों के सांद्रण के लिए मुख्य रूप से उपयोग की जाती है?
    a) गुरुत्व पृथक्करण
    b) चुंबकीय पृथक्करण
    c) झाग प्लवन विधि
    d) निक्षालन

  2. बॉक्साइट अयस्क के निक्षालन में, एल्यूमिना किस रूप में घुलता है?
    a) Al₂(SO₄)₃
    b) Na[Al(OH)₄]
    c) Al(OH)₃
    d) Na₂AlO₃

  3. मॉन्ड प्रक्रम का उपयोग किसके शोधन के लिए किया जाता है?
    a) जिंक
    b) निकल
    c) कॉपर
    d) एल्यूमीनियम

  4. ब्लास्ट फर्नेस में आयरन ऑक्साइड के अपचयन के लिए निम्न तापमान (500-800 K) पर मुख्य अपचायक कौन है?
    a) कोक (C)
    b) कार्बन मोनोऑक्साइड (CO)
    c) हाइड्रोजन (H₂)
    d) सिलिका (SiO₂)

  5. एलिंगम आरेख के अनुसार, जो धातु ऑक्साइड की $\Delta G^\circ$ रेखा नीचे होती है, वह:
    a) ऊपर वाली रेखा के ऑक्साइड को अपचयित नहीं कर सकती।
    b) ऊपर वाली रेखा के ऑक्साइड को अपचयित कर सकती है।
    c) केवल अपने ऑक्साइड को अपचयित कर सकती है।
    d) किसी भी ऑक्साइड को अपचयित नहीं कर सकती।

  6. कॉपर के विद्युत अपघटनी शोधन में, एनोड पंक में कौन-सी धातुएँ जमा होती हैं?
    a) Zn, Fe
    b) Au, Ag, Pt
    c) Ni, Sn
    d) Al, Mg

  7. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन निस्तापन के लिए सही नहीं है?
    a) यह वायु की सीमित आपूर्ति या अनुपस्थिति में किया जाता है।
    b) इसका उपयोग कार्बोनेट अयस्कों को ऑक्साइड में बदलने के लिए किया जाता है।
    c) इसका उपयोग सल्फाइड अयस्कों को ऑक्साइड में बदलने के लिए किया जाता है।
    d) यह वाष्पशील अशुद्धियों को दूर करता है।

  8. वॉन आर्केल विधि का उपयोग किसके अतिशुद्धिकरण के लिए किया जाता है?
    a) निकल
    b) आयरन
    c) ज़िरकोनियम
    d) कॉपर

  9. ब्लास्ट फर्नेस में धातुमल (Slag) का रासायनिक सूत्र क्या है?
    a) FeSiO₃
    b) CaSiO₃
    c) Al₂O₃
    d) MgSiO₃

  10. निम्नलिखित में से कौन-सी विधि अशुद्धियों के गलित अवस्था में ठोस अवस्था की तुलना में अधिक घुलनशील होने के सिद्धांत पर आधारित है?
    a) आसवन
    b) द्रवण
    c) मंडल परिष्करण
    d) विद्युत अपघटनी शोधन


MCQs के उत्तर:

  1. c) झाग प्लवन विधि
  2. b) Na[Al(OH)₄]
  3. b) निकल
  4. b) कार्बन मोनोऑक्साइड (CO)
  5. b) ऊपर वाली रेखा के ऑक्साइड को अपचयित कर सकती है।
  6. b) Au, Ag, Pt
  7. c) इसका उपयोग सल्फाइड अयस्कों को ऑक्साइड में बदलने के लिए किया जाता है। (यह भर्जन का कार्य है)
  8. c) ज़िरकोनियम
  9. b) CaSiO₃
  10. c) मंडल परिष्करण

मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और अभ्यास प्रश्न आपको इस अध्याय की गहन समझ प्रदान करेंगे और आपकी सरकारी परीक्षाओं की तैयारी में सहायक होंगे। शुभकामनाएँ!

Read more