Class 12 Chemistry Notes Chapter 6 (तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धांत एव प्रक्रम) – Rasayan Vigyan Bhag-I Book

प्रिय विद्यार्थियों, आज हम रसायन विज्ञान के एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय 'तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धांत एव प्रक्रम' का विस्तृत अध्ययन करेंगे, जो आपकी सरकारी परीक्षाओं के लिए भी अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा। इस अध्याय में हम जानेंगे कि प्रकृति में पाए जाने वाले अयस्कों से शुद्ध धातुओं को कैसे प्राप्त किया जाता है।
अध्याय 6: तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धांत एव प्रक्रम (General Principles and Processes of Isolation of Elements)
1. परिचय (Introduction)
- खनिज (Minerals): पृथ्वी की पर्पटी में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले रासायनिक पदार्थ, जिनमें धातुएँ या उनके यौगिक उपस्थित होते हैं।
- अयस्क (Ores): वे खनिज जिनसे धातुओं का निष्कर्षण आर्थिक रूप से लाभदायक एवं सुविधाजनक होता है।
- महत्वपूर्ण बिंदु: सभी अयस्क खनिज होते हैं, परंतु सभी खनिज अयस्क नहीं होते।
- गैंग (Gangue) या अधात्री (Matrix): अयस्क में उपस्थित अवांछित अशुद्धियाँ, जैसे मिट्टी, रेत, चूना पत्थर आदि।
- धातु कर्म (Metallurgy): अयस्क से शुद्ध धातु प्राप्त करने की संपूर्ण प्रक्रिया, जिसमें अयस्क का सांद्रण, कच्ची धातु का निष्कर्षण और धातु का शोधन शामिल है।
2. तत्वों का बहुतायत (Abundance of Elements)
पृथ्वी की पर्पटी में सर्वाधिक बहुतायत वाले तत्व (भार के अनुसार):
- ऑक्सीजन (O) - 46.6%
- सिलिकॉन (Si) - 27.7%
- एल्यूमीनियम (Al) - 8.3% (सबसे प्रचुर धातु)
- लोहा (Fe) - 5.1% (दूसरी सबसे प्रचुर धातु)
- कैल्शियम (Ca) - 3.6%
- सोडियम (Na) - 2.8%
- पोटेशियम (K) - 2.6%
- मैग्नीशियम (Mg) - 2.1%
3. धातु कर्म के चरण (Steps in Metallurgy)
धातु कर्म को मुख्य रूप से तीन चरणों में विभाजित किया जा सकता है:
3.1. अयस्कों का सांद्रण (Concentration of Ores) / अयस्क प्रसाधन (Ore Dressing):
यह अयस्क से गैंग (अवांछित अशुद्धियाँ) को हटाने की प्रक्रिया है।
- गुरुत्व पृथक्करण विधि (Hydraulic Washing/Gravity Separation):
- सिद्धांत: अयस्क और गैंग के कणों के घनत्व में अंतर पर आधारित।
- प्रक्रिया: बारीक पिसे हुए अयस्क को जल की तेज धारा से धोया जाता है। हल्के गैंग कण जल के साथ बह जाते हैं, जबकि भारी अयस्क कण नीचे बैठ जाते हैं।
- उपयोग: ऑक्साइड अयस्कों (जैसे हेमेटाइट, टिन स्टोन) और मूल कार्बोनेट अयस्कों के लिए।
- चुंबकीय पृथक्करण विधि (Magnetic Separation):
- सिद्धांत: अयस्क या गैंग में से किसी एक के चुंबकीय गुणों पर आधारित।
- प्रक्रिया: बारीक पिसे हुए अयस्क को चुंबकीय रोलर पर घूमती हुई बेल्ट पर डाला जाता है। चुंबकीय पदार्थ चुंबकीय रोलर की ओर आकर्षित होकर अलग गिरते हैं, जबकि अचुंबकीय पदार्थ दूर गिरते हैं।
- उपयोग: क्रोमाइट (FeCr2O4), पाइरोलुसाइट (MnO2), टिन स्टोन (SnO2 - अचुंबकीय गैंग से चुंबकीय अयस्क को अलग करना), वुल्फ्रामाइट (FeWO4 - चुंबकीय गैंग से अचुंबकीय अयस्क को अलग करना)।
- झाग प्लवन विधि (Froth Flotation Method):
- सिद्धांत: अयस्क कणों और गैंग कणों की जल तथा तेल के प्रति भिन्न-भिन्न आर्द्रता (गीला होने की प्रवृत्ति) पर आधारित। सल्फाइड अयस्क कण तेल से गीले होकर झाग के साथ ऊपर आ जाते हैं, जबकि गैंग कण जल से गीले होकर नीचे बैठ जाते हैं।
- प्रक्रिया: बारीक पिसे हुए सल्फाइड अयस्क को जल और पाइन तेल (या अन्य संग्राहक) के साथ एक टैंक में मिलाया जाता है। वायु को तेजी से प्रवाहित करने पर झाग बनता है, जो सल्फाइड अयस्क कणों को लेकर ऊपर आ जाता है।
- अभिकर्मक:
- संग्राहक (Collectors): पाइन तेल, फैटी अम्ल, जेनथेट। ये अयस्क कणों को जल विकर्षक बनाते हैं।
- झाग स्थायीकारक (Froth Stabilizers): क्रेसॉल, ऐनिलीन। ये झाग को स्थिर रखते हैं।
- अवनमक (Depressants): कुछ अयस्कों के मिश्रण को अलग करने के लिए उपयोग किए जाते हैं। उदाहरण के लिए, ZnS और PbS के मिश्रण से PbS को अलग करने के लिए NaCN का उपयोग किया जाता है। NaCN, ZnS को Na2[Zn(CN)4] कॉम्प्लेक्स बनाकर झाग में आने से रोकता है, जबकि PbS झाग के साथ ऊपर आ जाता है।
- उपयोग: मुख्य रूप से सल्फाइड अयस्कों (जैसे गैलेना (PbS), जिंक ब्लैंड (ZnS), कॉपर पाइराइट (CuFeS2)) के लिए।
- निक्षालन (Leaching):
- सिद्धांत: यह एक रासायनिक विधि है जिसमें अयस्क को एक उपयुक्त विलायक में घोला जाता है, जिससे अयस्क घुलनशील यौगिक बनाता है, जबकि गैंग अघुलनशील रहता है।
- प्रक्रिया:
- बॉक्साइट का निक्षालन (एल्यूमीनियम के लिए):
- बेयर प्रक्रम (Bayer's Process): बॉक्साइट (Al2O3.nH2O) को NaOH के सांद्र विलयन (473-523 K, 35-36 bar) के साथ गर्म किया जाता है। Al2O3 घुल जाता है और सोडियम मेटा-एलुमिनेट बनाता है, जबकि अशुद्धियाँ (Fe2O3, TiO2, SiO2) अघुलनशील रहती हैं।
Al2O3(s) + 2NaOH(aq) + 3H2O(l) → 2NaAl(OH)4 - विलयन को छानकर अशुद्धियाँ हटा दी जाती हैं। फिर विलयन को तनु करके या CO2 गैस प्रवाहित करके जलयोजित एल्यूमिना अवक्षेपित किया जाता है।
2NaAl(OH)4 + CO2(g) → Al2O3.xH2O(s) + 2NaHCO3(aq) - जलयोजित एल्यूमिना को 1470 K पर गर्म करके शुद्ध Al2O3 (ऐलुमिना) प्राप्त किया जाता है।
Al2O3.xH2O(s) → Al2O3(s) + xH2O(g)
- बेयर प्रक्रम (Bayer's Process): बॉक्साइट (Al2O3.nH2O) को NaOH के सांद्र विलयन (473-523 K, 35-36 bar) के साथ गर्म किया जाता है। Al2O3 घुल जाता है और सोडियम मेटा-एलुमिनेट बनाता है, जबकि अशुद्धियाँ (Fe2O3, TiO2, SiO2) अघुलनशील रहती हैं।
- चाँदी और सोने का निक्षालन (मैकआर्थर-फॉरेस्ट साइनाइड प्रक्रम):
- बारीक पिसे हुए अयस्क को वायु की उपस्थिति में NaCN या KCN के तनु विलयन के साथ निक्षालित किया जाता है।
4M(s) + 8CN-(aq) + 2H2O(aq) + O2(g) → 4[M(CN)2]-(aq) + 4OH-(aq) (जहाँ M = Ag या Au) - प्राप्त जटिल आयन विलयन से धातु को अधिक सक्रिय धातु (जैसे जिंक) द्वारा विस्थापित करके प्राप्त किया जाता है (विद्युत रासायनिक श्रेणी के आधार पर)।
2[M(CN)2]-(aq) + Zn(s) → [Zn(CN)4]2-(aq) + 2M(s)
- बारीक पिसे हुए अयस्क को वायु की उपस्थिति में NaCN या KCN के तनु विलयन के साथ निक्षालित किया जाता है।
- बॉक्साइट का निक्षालन (एल्यूमीनियम के लिए):
3.2. सांद्रित अयस्क से कच्ची धातु का निष्कर्षण (Extraction of Crude Metal from Concentrated Ore):
इस चरण में सांद्रित अयस्क को धातु ऑक्साइड में परिवर्तित किया जाता है और फिर ऑक्साइड को धातु में अपचयित किया जाता है।
3.2.1. ऑक्साइड में परिवर्तन (Conversion to Oxide):
- निस्तापन (Calcination):
- प्रक्रिया: अयस्क को वायु की अनुपस्थिति या सीमित आपूर्ति में उसके गलनांक से नीचे गर्म करना।
- उद्देश्य:
- कार्बोनेट अयस्कों (जैसे ZnCO3, CaCO3) से CO2 को हटाना।
ZnCO3(s) → ZnO(s) + CO2(g) - हाइड्रॉक्साइड अयस्कों (जैसे बॉक्साइट) से जल को हटाना।
Al2O3.xH2O(s) → Al2O3(s) + xH2O(g) - कार्बनिक पदार्थ और अन्य वाष्पशील अशुद्धियों को दूर करना।
- कार्बोनेट अयस्कों (जैसे ZnCO3, CaCO3) से CO2 को हटाना।
- भर्जन (Roasting):
- प्रक्रिया: अयस्क को वायु की पर्याप्त उपस्थिति में उसके गलनांक से नीचे गर्म करना।
- उद्देश्य:
- सल्फाइड अयस्कों (जैसे ZnS, PbS, Cu2S) को उनके ऑक्साइड में परिवर्तित करना और SO2 गैस मुक्त करना।
2ZnS(s) + 3O2(g) → 2ZnO(s) + 2SO2(g)
2PbS(s) + 3O2(g) → 2PbO(s) + 2SO2(g)
2Cu2S(s) + 3O2(g) → 2Cu2O(s) + 2SO2(g) - आर्सेनिक (As), एंटीमनी (Sb), सल्फर (S) जैसी अशुद्धियों को उनके वाष्पशील ऑक्साइड (As2O3, Sb2O3, SO2) के रूप में हटाना।
- सल्फाइड अयस्कों (जैसे ZnS, PbS, Cu2S) को उनके ऑक्साइड में परिवर्तित करना और SO2 गैस मुक्त करना।
3.2.2. ऑक्साइड का धातु में अपचयन (Reduction of Oxide to Metal):
धातु ऑक्साइड को धातु में अपचयित करने के लिए विभिन्न अपचायकों का उपयोग किया जाता है। अपचायक का चुनाव ऊष्मागतिक सिद्धांतों पर आधारित होता है।
-
ऊष्मागतिक सिद्धांत (Thermodynamic Principles) / एलींघम आरेख (Ellingham Diagram):
- सिद्धांत: किसी भी अपचयन अभिक्रिया के लिए गिब्स मुक्त ऊर्जा परिवर्तन (ΔG) का मान ऋणात्मक होना चाहिए (ΔG < 0)।
ΔG = ΔH - TΔS (जहाँ ΔH एन्थैल्पी परिवर्तन, T ताप, ΔS एन्ट्रॉपी परिवर्तन है) - एलींघम आरेख: यह विभिन्न धातु ऑक्साइडों के निर्माण के लिए गिब्स मुक्त ऊर्जा परिवर्तन (ΔG°) बनाम तापमान (T) का ग्राफ है।
- विशेषताएँ:
- अधिकांश धातु ऑक्साइडों के निर्माण के लिए ΔG° बनाम T वक्र ऊपर की ओर ढलान वाले होते हैं (अर्थात् ΔS ऋणात्मक होता है, क्योंकि गैसीय ऑक्सीजन ठोस ऑक्साइड में बदलती है)।
- कार्बन से CO और CO2 बनने वाले वक्रों में ढलान का अंतर ΔS के परिवर्तन के कारण होता है।
- दो वक्रों का प्रतिच्छेदन बिंदु वह तापमान दर्शाता है जहाँ दोनों अभिक्रियाओं के लिए ΔG° समान होता है।
- अपचायक का चुनाव: एक धातु ऑक्साइड को अपचयित करने के लिए, अपचायक (जो स्वयं ऑक्सीकृत होता है) का ΔG° वक्र उस धातु ऑक्साइड के ΔG° वक्र से नीचे होना चाहिए (अर्थात् अपचायक के ऑक्सीकरण की ΔG° अधिक ऋणात्मक होनी चाहिए) उस तापमान पर जिस पर अपचयन किया जा रहा है।
- उदाहरण: कार्बन (कोक) या कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) का उपयोग लोहे, जिंक और कॉपर के ऑक्साइडों को अपचयित करने के लिए किया जाता है।
- ZnO + C → Zn + CO
- Fe2O3 + 3CO → 2Fe + 3CO2
- एल्यूमीनियम जैसे अधिक अभिक्रियाशील धातुओं के लिए, कार्बन पर्याप्त अपचायक नहीं होता है, क्योंकि उच्च तापमान पर एल्यूमीनियम ऑक्साइड का ΔG° वक्र कार्बन के वक्र से नीचे होता है।
- उदाहरण: कार्बन (कोक) या कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) का उपयोग लोहे, जिंक और कॉपर के ऑक्साइडों को अपचयित करने के लिए किया जाता है।
- विशेषताएँ:
- सिद्धांत: किसी भी अपचयन अभिक्रिया के लिए गिब्स मुक्त ऊर्जा परिवर्तन (ΔG) का मान ऋणात्मक होना चाहिए (ΔG < 0)।
-
अपचयन की विधियाँ:
- कार्बन द्वारा अपचयन (कार्बोथर्मिक प्रक्रम):
- ZnO(s) + C(s) $\xrightarrow{1673 K}$ Zn(g) + CO(g)
- Fe2O3(s) + 3C(s) $\xrightarrow{उच्च ताप}$ 2Fe(s) + 3CO(g)
- कार्बन मोनोऑक्साइड द्वारा अपचयन: लोहे के निष्कर्षण में वात्या भट्टी में।
- Fe2O3(s) + 3CO(g) $\xrightarrow{500-800 K}$ 2Fe(s) + 3CO2(g)
- स्वयं अपचयन (Auto-reduction): कुछ धातुओं (Cu, Hg, Pb) के सल्फाइड अयस्कों को आंशिक रूप से भर्जित करने के बाद, बिना किसी बाहरी अपचायक के, शेष सल्फाइड ऑक्साइड के साथ अभिक्रिया करके धातु में अपचयित हो जाता है।
- 2Cu2O(s) + Cu2S(s) → 6Cu(s) + SO2(g)
- 2PbO(s) + PbS(s) → 3Pb(s) + SO2(g)
- विद्युत अपघटनी अपचयन (Electrolytic Reduction): अत्यधिक अभिक्रियाशील धातुओं (जैसे Na, K, Ca, Mg, Al) के लिए, जिनके ऑक्साइडों को कार्बन द्वारा अपचयित करना मुश्किल होता है। इनके गलित लवणों का विद्युत अपघटन किया जाता है।
- उदाहरण: हॉल-हेरॉल्ट प्रक्रम द्वारा एल्यूमीनियम का निष्कर्षण।
- विस्थापन विधि (Displacement method): अधिक सक्रिय धातु द्वारा कम सक्रिय धातु के लवण विलयन से उसका विस्थापन।
- उदाहरण: 2AgCN2-(aq) + Zn(s) → Zn(CN)42-(aq) + 2Ag(s) (सोने और चाँदी के निक्षालन के बाद)
- कार्बन द्वारा अपचयन (कार्बोथर्मिक प्रक्रम):
3.3. धातु का शोधन (Refining of Metal):
कच्ची धातु में अशुद्धियाँ होती हैं, जिन्हें हटाकर शुद्ध धातु प्राप्त की जाती है। विभिन्न शोधन विधियाँ धातु और अशुद्धियों के गुणों पर निर्भर करती हैं।
- आसवन (Distillation):
- सिद्धांत: कम क्वथनांक वाली धातुओं (जैसे Zn, Cd, Hg) को उनके उच्च क्वथनांक वाली अशुद्धियों से अलग करने के लिए।
- प्रक्रिया: अशुद्ध धातु को गर्म करके वाष्पीकृत किया जाता है, और वाष्प को संघनित करके शुद्ध धातु प्राप्त की जाती है।
- द्रवण (Liquation):
- सिद्धांत: कम गलनांक वाली धातुओं (जैसे Sn, Pb, Bi) को उनके उच्च गलनांक वाली अशुद्धियों से अलग करने के लिए।
- प्रक्रिया: अशुद्ध धातु को एक ढलान वाली भट्टी में गर्म किया जाता है। शुद्ध धातु पिघलकर बह जाती है, जबकि उच्च गलनांक वाली अशुद्धियाँ पीछे रह जाती हैं।
- वैद्युत अपघटनी शोधन (Electrolytic Refining):
- सिद्धांत: विद्युत अपघटन द्वारा अशुद्ध धातु से शुद्ध धातु प्राप्त करना।
- प्रक्रिया:
- एनोड: अशुद्ध धातु की मोटी छड़।
- कैथोड: शुद्ध धातु की पतली पट्टी।
- वैद्युत अपघट्य: धातु के लवण का विलयन।
- अभिक्रियाएँ:
- एनोड पर: M(अशुद्ध) → M2+(aq) + 2e- (अशुद्ध धातु ऑक्सीकृत होकर विलयन में जाती है)
- कैथोड पर: M2+(aq) + 2e- → M(शुद्ध) (शुद्ध धातु कैथोड पर जमा होती है)
- कम सक्रिय अशुद्धियाँ एनोड के नीचे एनोड पंक (Anode Mud) के रूप में जमा हो जाती हैं (जैसे Ag, Au, Pt)। अधिक सक्रिय अशुद्धियाँ विलयन में रहती हैं।
- उपयोग: Cu, Zn, Al, Ag, Au आदि धातुओं के शोधन के लिए।
- मंडल परिष्करण (Zone Refining):
- सिद्धांत: अशुद्धियाँ गलित अवस्था में ठोस अवस्था की तुलना में अधिक घुलनशील होती हैं।
- प्रक्रिया: एक अशुद्ध धातु की छड़ को एक सिरे से गर्म किया जाता है, जिससे एक छोटा गलित मंडल (Molten Zone) बनता है। इस गलित मंडल को धीरे-धीरे छड़ के एक सिरे से दूसरे सिरे तक ले जाया जाता है। अशुद्धियाँ गलित मंडल में चली जाती हैं और छड़ के एक सिरे पर केंद्रित हो जाती हैं, जिसे बाद में काटकर अलग कर दिया जाता है।
- उपयोग: अति शुद्ध धातुएँ (जैसे Ge, Si, B, Ga, In) प्राप्त करने के लिए।
- वाष्प प्रावस्था परिष्करण (Vapour Phase Refining):
- सिद्धांत: धातु को एक वाष्पशील यौगिक में परिवर्तित किया जाता है, फिर इस वाष्पशील यौगिक को विघटित करके शुद्ध धातु प्राप्त की जाती है।
- शर्तें:
- धातु एक वाष्पशील यौगिक बना सके।
- वाष्पशील यौगिक को आसानी से विघटित किया जा सके।
- विधियाँ:
- मॉन्ड प्रक्रम (Mond's Process) - निकल (Ni) के लिए:
- अशुद्ध Ni को CO गैस के साथ 330-350 K पर गर्म करने पर वाष्पशील निकल टेट्राकार्बोनिल [Ni(CO)4] बनता है।
Ni(s) + 4CO(g) $\xrightarrow{330-350 K}$ Ni(CO)4(g) - इस वाष्पशील यौगिक को 450-470 K पर गर्म करने पर शुद्ध Ni प्राप्त होता है।
Ni(CO)4(g) $\xrightarrow{450-470 K}$ Ni(s) + 4CO(g)
- अशुद्ध Ni को CO गैस के साथ 330-350 K पर गर्म करने पर वाष्पशील निकल टेट्राकार्बोनिल [Ni(CO)4] बनता है।
- वैन-आर्केल विधि (Van Arkel Method) - ज़िरकोनियम (Zr) और टाइटेनियम (Ti) के लिए:
- अशुद्ध Zr या Ti को आयोडीन के साथ 870 K पर गर्म करने पर वाष्पशील धातु आयोडाइड बनता है।
Zr(s) + 2I2(g) $\xrightarrow{870 K}$ ZrI4(g) - इस वाष्पशील आयोडाइड को 1800 K पर एक टंगस्टन फिलामेंट पर गर्म करने पर शुद्ध धातु जमा होती है।
ZrI4(g) $\xrightarrow{1800 K}$ Zr(s) + 2I2(g)
- अशुद्ध Zr या Ti को आयोडीन के साथ 870 K पर गर्म करने पर वाष्पशील धातु आयोडाइड बनता है।
- मॉन्ड प्रक्रम (Mond's Process) - निकल (Ni) के लिए:
- वर्णलेखी विधि (Chromatographic Method):
- सिद्धांत: मिश्रण के घटकों के अधिशोषण के भिन्न-भिन्न गुणों पर आधारित।
- उपयोग: जब अशुद्धियाँ बहुत कम मात्रा में हों या धातुएँ समान रासायनिक गुणों वाली हों।
4. कुछ महत्वपूर्ण धातुओं का निष्कर्षण (Extraction of Some Important Metals)
4.1. ऐलुमिनियम का निष्कर्षण (Extraction of Aluminium):
- मुख्य अयस्क: बॉक्साइट (Al2O3.nH2O)।
- चरण:
- बॉक्साइट का निक्षालन (Leaching): बेयर प्रक्रम या हॉल प्रक्रम द्वारा बॉक्साइट से शुद्ध एल्यूमिना (Al2O3) प्राप्त करना (जैसा कि ऊपर निक्षालन में वर्णित है)।
- हॉल-हेरॉल्ट प्रक्रम (Hall-Heroult Process) - वैद्युत अपघटनी अपचयन:
- प्रक्रिया: शुद्ध एल्यूमिना (Al2O3) का गलनांक बहुत अधिक (2323 K) होता है, इसलिए इसे क्रायोलाइट (Na3AlF6) और फ्लूओस्पार (CaF2) के मिश्रण में घोला जाता है। यह मिश्रण गलनांक को कम करता है (लगभग 1270 K तक) और चालकता बढ़ाता है।
- विद्युत अपघटनी सेल: एक स्टील का टैंक जिसमें कार्बन की परत लगी होती है (कैथोड का कार्य करता है) और ग्रेफाइट की छड़ें एनोड का कार्य करती हैं।
- अभिक्रियाएँ:
- कैथोड पर: Al3+(गलित) + 3e- → Al(l) (पिघला हुआ एल्यूमीनियम टैंक के तल पर जमा होता है)
- एनोड पर: 2O2-(गलित) → O2(g) + 4e-
- एनोड पर मुक्त हुई ऑक्सीजन ग्रेफाइट एनोड के साथ अभिक्रिया करके CO और CO2 बनाती है, जिससे एनोड का उपभोग होता रहता है और उन्हें समय-समय पर बदलना पड़ता है।
C(s) + O2-(गलित) → CO(g) + 2e-
C(s) + 2O2-(गलित) → CO2(g) + 4e-
4.2. कॉपर का निष्कर्षण (Extraction of Copper):
- मुख्य अयस्क: कॉपर पाइराइट (CuFeS2), क्यूप्राइट (Cu2O), कॉपर ग्लान्स (Cu2S)।
- कॉपर पाइराइट से निष्कर्षण के चरण:
- अयस्क का सांद्रण: झाग प्लवन विधि द्वारा।
- भर्जन (Roasting): सांद्रित अयस्क को परावर्तनी भट्टी में वायु की उपस्थिति में गर्म किया जाता है।
2CuFeS2(s) + O2(g) $\xrightarrow{भर्जन}$ Cu2S(s) + 2FeS(s) + SO2(g)
(आंशिक ऑक्सीकरण होता है, FeS और Cu2S बनते हैं) - प्रगलन (Smelting): भर्जित अयस्क को कोक और सिलिका (SiO2) के साथ वात्या भट्टी में गर्म किया जाता है।
- FeS, SiO2 के साथ अभिक्रिया करके गलनीय धातुमल (FeSiO3) बनाता है।
FeO(s) + SiO2(s) → FeSiO3(l) (धातुमल) - Cu2S और शेष FeS का गलित मिश्रण प्राप्त होता है, जिसे मैट (Matte) कहते हैं।
- FeS, SiO2 के साथ अभिक्रिया करके गलनीय धातुमल (FeSiO3) बनाता है।
- बेसेमरीकरण (Bessemerisation): मैट को बेसेमर परिवर्तक में वायु और SiO2 मिलाकर गर्म किया जाता है।
- शेष FeS ऑक्सीकृत होकर FeO बनाता है, जो SiO2 के साथ धातुमल बनाता है।
2FeS(s) + 3O2(g) → 2FeO(s) + 2SO2(g)
FeO(s) + SiO2(s) → FeSiO3(l) (धातुमल) - Cu2S ऑक्सीकृत होकर Cu2O बनाता है, जो शेष Cu2S के साथ स्वयं अपचयन द्वारा कॉपर देता है।
2Cu2S(s) + 3O2(g) → 2Cu2O(s) + 2SO2(g)
2Cu2O(s) + Cu2S(s) → 6Cu(l) + SO2(g) - इस प्रक्रिया से प्राप्त कॉपर में SO2 गैस के बुलबुलों के कारण फफोले पड़ जाते हैं, जिसे फफोलेदार कॉपर (Blister Copper) कहते हैं। यह लगभग 98% शुद्ध होता है।
- शेष FeS ऑक्सीकृत होकर FeO बनाता है, जो SiO2 के साथ धातुमल बनाता है।
- वैद्युत अपघटनी शोधन (Electrolytic Refining): फफोलेदार कॉपर का वैद्युत अपघटनी शोधन करके शुद्ध कॉपर प्राप्त किया जाता है।
- एनोड: फफोलेदार कॉपर
- कैथोड: शुद्ध कॉपर की पतली पट्टी
- वैद्युत अपघट्य: अम्लीकृत CuSO4 विलयन
4.3. जिंक का निष्कर्षण (Extraction of Zinc):
- मुख्य अयस्क: जिंक ब्लैंड (ZnS), कैलेमाइन (ZnCO3)।
- चरण:
- अयस्क का सांद्रण: ZnS के लिए झाग प्लवन विधि।
- भर्जन/निस्तापन:
- ZnS को भर्जित करने पर ZnO बनता है: 2ZnS(s) + 3O2(g) → 2ZnO(s) + 2SO2(g)
- ZnCO3 को निस्तापित करने पर ZnO बनता है: ZnCO3(s) → ZnO(s) + CO2(g)
- अपचयन: ZnO को कोक (कार्बन) के साथ 1673 K पर गर्म करके अपचयित किया जाता है।
ZnO(s) + C(s) $\xrightarrow{1673 K}$ Zn(g) + CO(g)- जिंक इस तापमान पर वाष्पशील होता है, इसलिए इसे आसवन द्वारा संघनित करके एकत्र किया जाता है।
- शोधन: आसवन या वैद्युत अपघटनी शोधन द्वारा।
4.4. आयरन का निष्कर्षण (Extraction of Iron):
- मुख्य अयस्क: हेमेटाइट (Fe2O3), मैग्नेटाइट (Fe3O4), सिडेराइट (FeCO3), आयरन पाइराइट (FeS2)।
- हेमेटाइट से निष्कर्षण के चरण:
- अयस्क का सांद्रण: गुरुत्व पृथक्करण या चुंबकीय पृथक्करण द्वारा।
- निस्तापन/भर्जन: अयस्क को गर्म करके नमी, CO2, सल्फर और आर्सेनिक जैसी अशुद्धियों को दूर किया जाता है।
- प्रगलन (Smelting) - वात्या भट्टी (Blast Furnace) में:
- कच्चा माल:
- अयस्क: हेमेटाइट (Fe2O3)
- कोक: अपचायक (कार्बन) और ईंधन।
- चूना पत्थर: फ्लक्स (अशुद्धियों को हटाने के लिए)।
- वात्या भट्टी के विभिन्न क्षेत्रों में अभिक्रियाएँ:
- दहन क्षेत्र (Combustion Zone) - सबसे नीचे (2170 K):
- कोक जलकर CO2 बनाता है, जो ऊष्मा उत्पन्न करता है।
C(s) + O2(g) → CO2(g) (ΔH = -393.5 kJ) - CO2 ऊपर जाकर कोक से अभिक्रिया करके CO बनाता है, जो मुख्य अपचायक है।
CO2(g) + C(s) → 2CO(g) (ΔH = +170 kJ)
- कोक जलकर CO2 बनाता है, जो ऊष्मा उत्पन्न करता है।
- धातुमल निर्माण क्षेत्र (Slag Formation Zone) - मध्य (1270 K):
- चूना पत्थर विघटित होकर CaO बनाता है।
CaCO3(s) → CaO(s) + CO2(g) - CaO अम्लीय अशुद्धियों (जैसे SiO2) के साथ अभिक्रिया करके गलनीय धातुमल (CaSiO3) बनाता है।
CaO(s) + SiO2(s) → CaSiO3(l) (धातुमल)
- चूना पत्थर विघटित होकर CaO बनाता है।
- अपचयन क्षेत्र (Reduction Zone) - सबसे ऊपर (500-800 K):
- CO गैस हेमेटाइट को विभिन्न चरणों में अपचयित करती है।
3Fe2O3 + CO → 2Fe3O4 + CO2
Fe3O4 + 4CO → 3Fe + 4CO2
Fe2O3 + 3CO → 2Fe + 3CO2 - उच्च तापमान पर (900-1500 K) FeO का अपचयन भी होता है।
FeO + CO → Fe + CO2
FeO + C → Fe + CO
- CO गैस हेमेटाइट को विभिन्न चरणों में अपचयित करती है।
- दहन क्षेत्र (Combustion Zone) - सबसे नीचे (2170 K):
- उत्पाद: वात्या भट्टी से प्राप्त पिघला हुआ लोहा पिग आयरन (Pig Iron) कहलाता है। इसमें लगभग 4% कार्बन और Mn, Si, P, S जैसी अशुद्धियाँ होती हैं।
- कच्चा माल:
- लोहे के प्रकार:
- पिग आयरन (Pig Iron): लोहे का सबसे अशुद्ध रूप (4% कार्बन)।
- ढलवाँ लोहा (Cast Iron): पिग आयरन को स्क्रैप आयरन और कोक के साथ पिघलाकर प्राप्त होता है। इसमें कार्बन की मात्रा 3% के आसपास होती है। यह भंगुर होता है।
- पिटवाँ लोहा (Wrought Iron): लोहे का सबसे शुद्ध रूप (0.1-0.25% कार्बन)। इसे पिग आयरन को परावर्तनी भट्टी में हेमेटाइट (जो ऑक्सीकारक का कार्य करता है) की परत के साथ ऑक्सीकृत करके बनाया जाता है।
5. फ्लक्स (Flux) और धातुमल (Slag):
- फ्लक्स: वह पदार्थ जो अयस्क में उपस्थित अगलनीय अशुद्धियों (गैंग) के साथ अभिक्रिया करके एक गलनीय पदार्थ बनाता है, जिसे धातुमल कहते हैं।
- धातुमल (Slag): फ्लक्स और गैंग के संयोजन से बना गलनीय पदार्थ, जिसे पिघली हुई धातु से अलग किया जा सकता है।
- प्रकार:
- अम्लीय फ्लक्स: जब गैंग क्षारीय प्रकृति का हो (जैसे FeO, CaO)। उदाहरण: SiO2।
FeO(s) + SiO2(s) → FeSiO3(l) (धातुमल) - क्षारीय फ्लक्स: जब गैंग अम्लीय प्रकृति का हो (जैसे SiO2, P4O10)। उदाहरण: CaO, MgO।
CaO(s) + SiO2(s) → CaSiO3(l) (धातुमल)
- अम्लीय फ्लक्स: जब गैंग क्षारीय प्रकृति का हो (जैसे FeO, CaO)। उदाहरण: SiO2।
बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions - MCQs)
-
निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?
a) सभी अयस्क खनिज होते हैं।
b) सभी खनिज अयस्क होते हैं।
c) अयस्क से धातु का निष्कर्षण आर्थिक रूप से लाभदायक होता है।
d) गैंग अयस्क में उपस्थित अवांछित अशुद्धियाँ हैं। -
बॉक्साइट अयस्क का निक्षालन किस अभिकर्मक का उपयोग करके किया जाता है?
a) NaCN
b) NaOH
c) SiO2
d) CO -
सल्फाइड अयस्कों के सांद्रण के लिए सामान्यतः किस विधि का उपयोग किया जाता है?
a) गुरुत्व पृथक्करण
b) चुंबकीय पृथक्करण
c) झाग प्लवन विधि
d) निक्षालन -
निस्तापन और भर्जन के बीच मुख्य अंतर क्या है?
a) निस्तापन में वायु की उपस्थिति होती है, जबकि भर्जन में अनुपस्थिति।
b) निस्तापन में वायु की अनुपस्थिति होती है, जबकि भर्जन में उपस्थिति।
c) निस्तापन सल्फाइड अयस्कों के लिए है, जबकि भर्जन कार्बोनेट अयस्कों के लिए।
d) निस्तापन में अयस्क पिघलता है, जबकि भर्जन में नहीं। -
एलींघम आरेख का उपयोग किस सिद्धांत को समझने के लिए किया जाता है?
a) धातु ऑक्साइड के निर्माण की गतिजता।
b) अपचायक के चुनाव के लिए ऊष्मागतिक सिद्धांत।
c) धातु के गलनांक का निर्धारण।
d) अयस्क के सांद्रण की दक्षता। -
मॉन्ड प्रक्रम का उपयोग किस धातु के शोधन के लिए किया जाता है?
a) जिंक
b) कॉपर
c) निकल
d) एल्यूमीनियम -
फफोलेदार कॉपर में फफोले किस गैस की उपस्थिति के कारण होते हैं?
a) CO
b) CO2
c) SO2
d) H2S -
हॉल-हेरॉल्ट प्रक्रम में क्रायोलाइट (Na3AlF6) का मुख्य कार्य क्या है?
a) एल्यूमिना के गलनांक को बढ़ाना।
b) एल्यूमिना के गलनांक को कम करना और चालकता बढ़ाना।
c) एल्यूमिना को अपचयित करना।
d) एनोड के उपभोग को रोकना। -
लोहे का सबसे शुद्ध रूप कौन-सा है?
a) पिग आयरन
b) ढलवाँ लोहा
c) पिटवाँ लोहा
d) स्टील -
मंडल परिष्करण (Zone Refining) विधि किस सिद्धांत पर आधारित है?
a) धातु और अशुद्धियों के क्वथनांक में अंतर।
b) धातु और अशुद्धियों के गलनांक में अंतर।
c) अशुद्धियों की गलित अवस्था में अधिक घुलनशीलता।
d) अशुद्धियों की ठोस अवस्था में अधिक घुलनशीलता।
उत्तरमाला (Answer Key):
- b
- b
- c
- b
- b
- c
- c
- b
- c
- c
मुझे आशा है कि यह विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपकी सरकारी परीक्षाओं की तैयारी में अत्यंत सहायक सिद्ध होंगे। किसी भी संदेह या अतिरिक्त जानकारी के लिए आप पूछ सकते हैं।