Class 12 Chemistry Notes Chapter 9 (उपसहसंयोजन यौगिक) – Rasayan Vigyan Bhag-I Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम रसायन विज्ञान के अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय 'उपसहसंयोजन यौगिक' का विस्तृत अध्ययन करेंगे, जो आपकी सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अत्यंत सहायक सिद्ध होगा। यह अध्याय न केवल सैद्धांतिक समझ के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि इसके अनुप्रयोग भी व्यापक हैं।
अध्याय 9: उपसहसंयोजन यौगिक (Coordination Compounds)
परिचय:
उपसहसंयोजन यौगिक (या संकुल यौगिक) वे यौगिक होते हैं जिनमें एक केंद्रीय धातु परमाणु या आयन (अक्सर संक्रमण धातु) लिगेंड नामक आयनों या उदासीन अणुओं से उपसहसंयोजक बंधों द्वारा जुड़ा होता है। ये यौगिक विलयन में अपनी पहचान बनाए रखते हैं, द्विक लवणों (double salts) से भिन्न होते हैं जो विलयन में अपने घटक आयनों में टूट जाते हैं।
उदाहरण:
- द्विक लवण: कार्नेलाइट (KCl·MgCl2·6H2O) - विलयन में K+, Mg2+, Cl- आयन देता है।
- उपसहसंयोजन यौगिक: पोटैशियम फेरोसायनाइड (K4[Fe(CN)6]) - विलयन में K+ और [Fe(CN)6]4- आयन देता है, संकुल आयन [Fe(CN)6]4- अपनी पहचान बनाए रखता है।
अल्फ्रेड वर्नर (Alfred Werner): इन्हें उपसहसंयोजन रसायन का जनक माना जाता है। इन्होंने 1893 में उपसहसंयोजन यौगिकों की संरचना और बंधन के लिए अपना सिद्धांत प्रस्तुत किया।
1. महत्वपूर्ण पद (Important Terms):
- केंद्रीय धातु परमाणु/आयन (Central Metal Atom/Ion): यह एक लुईस अम्ल होता है जो लिगेंड से इलेक्ट्रॉन युग्म स्वीकार करता है। यह आमतौर पर एक संक्रमण धातु होती है (जैसे Fe, Co, Ni, Cr, Pt, Ag, Au)।
- लिगेंड (Ligands): ये आयन या अणु होते हैं जो केंद्रीय धातु परमाणु/आयन को इलेक्ट्रॉन युग्म दान करके उपसहसंयोजक बंध बनाते हैं। लिगेंड लुईस क्षार के रूप में कार्य करते हैं।
- एकदंती लिगेंड (Monodentate Ligands): केवल एक दाता परमाणु होता है। उदाहरण: Cl-, H2O, NH3, CN-, NO2-।
- द्विदंती लिगेंड (Bidentate Ligands): दो दाता परमाणु होते हैं। उदाहरण: एथेन-1,2-डाइएमीन (en), ऑक्सलेटो (ox), बाइपिरिडिल (bipy)।
- बहुदंती लिगेंड (Polydentate Ligands): दो से अधिक दाता परमाणु होते हैं। उदाहरण: EDTA4- (एथिलीनडाइएमीनटेट्राएसीटेटो) - यह षटदंती लिगेंड है।
- कीलेट लिगेंड (Chelate Ligands): जब एक द्विदंती या बहुदंती लिगेंड केंद्रीय धातु परमाणु से दो या अधिक दाता परमाणुओं के माध्यम से जुड़ता है, तो एक वलय जैसी संरचना बनती है। ऐसे लिगेंड को कीलेट लिगेंड कहते हैं और इस प्रभाव को कीलेट प्रभाव (Chelate Effect) कहते हैं, जो संकुल की स्थिरता को बढ़ाता है।
- उभयदंती लिगेंड (Ambidentate Ligands): वे लिगेंड जिनमें दो भिन्न दाता परमाणु होते हैं, लेकिन एक समय में केवल एक ही दाता परमाणु केंद्रीय धातु परमाणु से बंध बनाता है। उदाहरण: NO2- (नाइट्राइटो-N या नाइट्राइटो-O), SCN- (थायोसायनेटो-S या थायोसायनेटो-N)।
- उपसहसंयोजन संख्या (Coordination Number - CN): केंद्रीय धातु परमाणु/आयन से सीधे जुड़े लिगेंड के दाता परमाणुओं की कुल संख्या।
- उदाहरण: [Co(NH3)6]3+ में Co की CN = 6। [Ag(CN)2]- में Ag की CN = 2।
- उपसहसंयोजन सत्ता/मंडल (Coordination Entity/Sphere): केंद्रीय धातु परमाणु/आयन और उससे जुड़े लिगेंड को एक बड़े कोष्ठक [ ] के भीतर लिखा जाता है। यह एक एकल इकाई के रूप में कार्य करता है।
- उदाहरण: [Co(NH3)6]3+।
- प्रति आयन (Counter Ions): उपसहसंयोजन मंडल के बाहर उपस्थित आयन जो संकुल के आवेश को संतुलित करते हैं।
- उदाहरण: K4[Fe(CN)6] में K+ प्रति आयन है। [Co(NH3)6]Cl3 में Cl- प्रति आयन है।
- संकुल का आवेश (Charge on the Complex): केंद्रीय धातु आयन के आवेश और सभी लिगेंड के आवेशों का बीजगणितीय योग।
- होमोलेप्टिक संकुल (Homoleptic Complexes): वे संकुल जिनमें केंद्रीय धातु परमाणु केवल एक प्रकार के लिगेंड से जुड़ा होता है। उदाहरण: [Co(NH3)6]3+।
- हेटेरोलेप्टिक संकुल (Heteroleptic Complexes): वे संकुल जिनमें केंद्रीय धातु परमाणु एक से अधिक प्रकार के लिगेंड से जुड़ा होता है। उदाहरण: [Co(NH3)4Cl2]+।
2. उपसहसंयोजन यौगिकों का नामकरण (Nomenclature of Coordination Compounds - IUPAC):
IUPAC नियमों का पालन किया जाता है:
- धनायन का नाम पहले, फिर ऋणायन का नाम। (संकुल आयन धनायन या ऋणायन हो सकता है)।
- संकुल आयन के नामकरण में:
- लिगेंड का नाम पहले, फिर धातु का नाम।
- लिगेंड का क्रम: लिगेंड को उनके अंग्रेजी नाम के पहले अक्षर के अनुसार वर्णानुक्रम में लिखा जाता है।
- लिगेंड के नाम:
- ऋणात्मक लिगेंड के नाम के अंत में 'o' जोड़ा जाता है (जैसे क्लोराइडो (Cl-), सल्फेटो (SO4^2-), ऑक्सलेटो (ox^2-), नाइट्राइटो-N (NO2-), नाइट्राइटो-O (ONO-))।
- उदासीन लिगेंड के नाम सामान्य होते हैं, लेकिन कुछ विशिष्ट नाम हैं:
- H2O: एक्वा
- NH3: एम्मीन
- CO: कार्बोनिल
- NO: नाइट्रोसिल
- en: एथेन-1,2-डाइएमीन
- धनात्मक लिगेंड के नाम के अंत में 'ium' जोड़ा जाता है (जैसे नाइट्रोसोनियम (NO+), हाइड्रैज़ीनियम (N2H5+))।
- लिगेंड की संख्या:
- यदि लिगेंड सरल हैं (जैसे Cl-, NH3), तो संख्या के लिए डाई (di), ट्राई (tri), टेट्रा (tetra) आदि उपसर्गों का उपयोग किया जाता है।
- यदि लिगेंड के नाम में पहले से ही संख्यात्मक उपसर्ग है (जैसे एथेन-1,2-डाइएमीन), तो संख्या के लिए बिस (bis), ट्रिस (tris), टेट्राकिस (tetrakis) आदि का उपयोग किया जाता है, और लिगेंड का नाम कोष्ठक में लिखा जाता है।
- केंद्रीय धातु का नाम:
- यदि संकुल धनायनिक या उदासीन है, तो धातु का नाम सामान्य रहता है (जैसे कोबाल्ट, निकेल, क्रोमियम)।
- यदि संकुल ऋणायनिक है, तो धातु के नाम के अंत में 'एट' (ate) प्रत्यय जोड़ा जाता है (जैसे फेरेट (Fe), क्यूप्रेट (Cu), अर्जेंटेट (Ag), ऑरेट (Au), प्लैटिनेट (Pt))।
- धातु की ऑक्सीकरण अवस्था: धातु के नाम के बाद उसकी ऑक्सीकरण अवस्था को छोटे रोमन अंकों में कोष्ठक में लिखा जाता है।
- सेतु लिगेंड (Bridging Ligands): यदि कोई लिगेंड दो धातु परमाणुओं के बीच सेतु बनाता है, तो उसके नाम से पहले 'μ-' (म्यू) लगाया जाता है।
उदाहरण:
- [Co(NH3)6]Cl3: हेक्साएम्मीनकोबाल्ट(III) क्लोराइड
- K4[Fe(CN)6]: पोटैशियम हेक्सासायनोफेरेट(II)
- [Co(en)2Cl2]Cl: डाइक्लोराइडोबिस(एथेन-1,2-डाइएमीन)कोबाल्ट(III) क्लोराइड
- [Cr(H2O)4Cl2]Cl: टेट्राएक्वाडाइक्लोराइडोक्रोमियम(III) क्लोराइड
- [Ag(NH3)2][Ag(CN)2]: डाइएम्मीनसिल्वर(I) डाइसायनोअर्जेंटेट(I)
3. उपसहसंयोजन यौगिकों में समावयवता (Isomerism in Coordination Compounds):
समावयवता वह घटना है जहाँ दो या दो से अधिक यौगिकों का रासायनिक सूत्र समान होता है, लेकिन उनके परमाणुओं की व्यवस्था भिन्न होती है।
अ. संरचनात्मक समावयवता (Structural Isomerism):
परमाणुओं के बंधन के क्रम में भिन्नता।
- आयनन समावयवता (Ionisation Isomerism): संकुल यौगिकों में आयनन मंडल के अंदर और बाहर लिगेंड के रूप में भिन्न आयन होते हैं।
- उदाहरण: [Co(NH3)5Br]SO4 (पेंटाएम्मीनब्रोमाइडोकोबाल्ट(III) सल्फेट) और [Co(NH3)5SO4]Br (पेंटाएम्मीनसल्फेटोकोबाल्ट(III) ब्रोमाइड)।
- पहला सल्फेट आयन देता है, दूसरा ब्रोमाइड आयन देता है।
- उदाहरण: [Co(NH3)5Br]SO4 (पेंटाएम्मीनब्रोमाइडोकोबाल्ट(III) सल्फेट) और [Co(NH3)5SO4]Br (पेंटाएम्मीनसल्फेटोकोबाल्ट(III) ब्रोमाइड)।
- बंधनी समावयवता (Linkage Isomerism): उभयदंती लिगेंड के कारण होती है, जहाँ लिगेंड केंद्रीय धातु परमाणु से भिन्न दाता परमाणुओं के माध्यम से बंध बनाता है।
- उदाहरण: [Co(NH3)5(NO2)]Cl2 (पेंटाएम्मीननाइट्राइटो-N-कोबाल्ट(III) क्लोराइड) और [Co(NH3)5(ONO)]Cl2 (पेंटाएम्मीननाइट्राइटो-O-कोबाल्ट(III) क्लोराइड)।
- उपसहसंयोजन समावयवता (Coordination Isomerism): यह समावयवता तब उत्पन्न होती है जब धनायनिक और ऋणायनिक दोनों संकुल आयन होते हैं और लिगेंड का आदान-प्रदान होता है।
- उदाहरण: [Co(NH3)6][Cr(CN)6] और [Cr(NH3)6][Co(CN)6]।
- विलायकयोजन/जलयोजन समावयवता (Solvate/Hydrate Isomerism): यह आयनन समावयवता का एक विशेष रूप है जहाँ जल के अणु लिगेंड के रूप में या क्रिस्टलन जल के रूप में भिन्न होते हैं।
- उदाहरण: [Cr(H2O)6]Cl3 (बैंगनी), [Cr(H2O)5Cl]Cl2·H2O (हरा), [Cr(H2O)4Cl2]Cl·2H2O (गहरा हरा)।
ब. त्रिविम समावयवता (Stereoisomerism):
परमाणुओं के स्थानिक विन्यास में भिन्नता।
- ज्यामितीय समावयवता (Geometric Isomerism - Cis-Trans Isomerism): यह तब उत्पन्न होती है जब लिगेंड केंद्रीय धातु परमाणु के सापेक्ष विभिन्न स्थानिक व्यवस्थाओं में होते हैं।
- वर्ग समतलीय संकुल (Square Planar Complexes): MA2B2 प्रकार के संकुल (जैसे Pt(NH3)2Cl2) सिस (cis) और ट्रांस (trans) समावयवी दर्शाते हैं।
- सिस: समान लिगेंड एक-दूसरे के निकट (90° पर)।
- ट्रांस: समान लिगेंड एक-दूसरे के विपरीत (180° पर)।
- अष्टफलकीय संकुल (Octahedral Complexes): MA4B2 प्रकार (जैसे [Co(NH3)4Cl2]+) सिस और ट्रांस समावयवी दर्शाते हैं।
- MA3B3 प्रकार के संकुल फलकीय (facial - fac) और मध्याह्न (meridional - mer) समावयवी दर्शाते हैं।
- फलकीय: समान लिगेंड एक अष्टफलक के एक फलक के शीर्ष पर होते हैं।
- मध्याह्न: समान लिगेंड एक अष्टफलक के मध्याह्न वृत्त के साथ होते हैं।
- MA3B3 प्रकार के संकुल फलकीय (facial - fac) और मध्याह्न (meridional - mer) समावयवी दर्शाते हैं।
- चतुष्फलकीय संकुल ज्यामितीय समावयवता नहीं दर्शाते हैं क्योंकि सभी स्थितियाँ एक-दूसरे के सापेक्ष समतुल्य होती हैं।
- वर्ग समतलीय संकुल (Square Planar Complexes): MA2B2 प्रकार के संकुल (जैसे Pt(NH3)2Cl2) सिस (cis) और ट्रांस (trans) समावयवी दर्शाते हैं।
- प्रकाशिक समावयवता (Optical Isomerism): वे संकुल जो एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिंब होते हैं लेकिन एक-दूसरे पर अध्यारोपित नहीं हो सकते (अर्थात, काइरल होते हैं)। ये समतल-ध्रुवित प्रकाश के तल को घुमाते हैं।
- अष्टफलकीय संकुल अक्सर प्रकाशिक समावयवता दर्शाते हैं, विशेषकर द्विदंती लिगेंड वाले।
- उदाहरण: [Co(en)3]3+, सिस-[Co(en)2Cl2]+।
- ट्रांस-अष्टफलकीय संकुल आमतौर पर प्रकाशिक रूप से निष्क्रिय होते हैं क्योंकि उनमें समरूपता का तल होता है।
- वर्ग समतलीय संकुल आमतौर पर प्रकाशिक समावयवता नहीं दर्शाते हैं क्योंकि उनमें समरूपता का तल होता है।
4. उपसहसंयोजन यौगिकों में बंधन (Bonding in Coordination Compounds):
अ. वर्नर का सिद्धांत (Werner's Theory - 1893):
- केंद्रीय धातु परमाणु दो प्रकार की संयोजकताएँ दर्शाता है:
- प्राथमिक संयोजकता (Primary Valency): यह धातु की ऑक्सीकरण अवस्था के अनुरूप होती है और आयनीकृत होती है। इसे डैश वाली रेखाओं (---) से दर्शाया जाता है।
- द्वितीयक संयोजकता (Secondary Valency): यह धातु की उपसहसंयोजन संख्या के अनुरूप होती है और गैर-आयनीकृत होती है। इसे ठोस रेखाओं (—) से दर्शाया जाता है। यह धातु के चारों ओर एक निश्चित ज्यामिति को संतुष्ट करती है।
- प्रत्येक धातु में एक निश्चित उपसहसंयोजन संख्या होती है।
- प्राथमिक संयोजकताएँ ऋणात्मक आयनों द्वारा संतुष्ट होती हैं, जबकि द्वितीयक संयोजकताएँ ऋणात्मक आयनों या उदासीन अणुओं द्वारा संतुष्ट हो सकती हैं।
- कुछ आयन दोनों संयोजकताओं को संतुष्ट कर सकते हैं।
ब. संयोजकता बंध सिद्धांत (Valence Bond Theory - VBT):
पॉलिंग द्वारा प्रस्तुत।
- केंद्रीय धातु परमाणु लिगेंड से इलेक्ट्रॉन युग्म स्वीकार करने के लिए अपने s, p, और d कक्षकों का संकरण करता है।
- संकरणित कक्षक लिगेंड के इलेक्ट्रॉन युग्म वाले कक्षकों के साथ अतिव्यापन करके उपसहसंयोजक बंध बनाते हैं।
- संकरण के प्रकार से संकुल की ज्यामिति निर्धारित होती है:
- sp3: चतुष्फलकीय (Tetrahedral)
- dsp2: वर्ग समतलीय (Square Planar)
- sp3d2: बाह्य कक्षक अष्टफलकीय (Outer Orbital Octahedral)
- d2sp3: आंतरिक कक्षक अष्टफलकीय (Inner Orbital Octahedral)
- चुंबकीय गुण (Magnetic Properties):
- यदि संकरण में आंतरिक d-कक्षक (n-1)d शामिल होते हैं (जैसे d2sp3), तो इसे आंतरिक कक्षक संकुल (Inner Orbital Complex) कहते हैं।
- यदि संकरण में बाह्य d-कक्षक (nd) शामिल होते हैं (जैसे sp3d2), तो इसे बाह्य कक्षक संकुल (Outer Orbital Complex) कहते हैं।
- अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति संकुल को अनुचुंबकीय (Paramagnetic) बनाती है।
- सभी इलेक्ट्रॉनों का युग्मित होना संकुल को प्रतिचुंबकीय (Diamagnetic) बनाता है।
- प्रबल क्षेत्र लिगेंड (Strong Field Ligands): ये d-इलेक्ट्रॉनों का युग्मन कराते हैं (जैसे CN-, CO, en, NH3)।
- दुर्बल क्षेत्र लिगेंड (Weak Field Ligands): ये d-इलेक्ट्रॉनों का युग्मन नहीं कराते हैं (जैसे F-, Cl-, Br-, I-, H2O)।
- सीमाएँ:
- संकुलों के रंग की व्याख्या नहीं करता।
- चुंबकीय आघूर्ण के मात्रात्मक मानों की व्याख्या नहीं करता।
- प्रबल और दुर्बल क्षेत्र लिगेंड के बीच अंतर का कोई सैद्धांतिक आधार नहीं देता।
- ऊष्मागतिकीय या गतिकीय स्थिरता की व्याख्या नहीं करता।
स. क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत (Crystal Field Theory - CFT):
बेथे और वैन वेलेक द्वारा विकसित।
- यह सिद्धांत धातु-लिगेंड बंध को विशुद्ध रूप से आयनिक मानता है, जिसमें लिगेंड को बिंदु आवेश (ऋणात्मक आयन) या द्विध्रुव (उदासीन अणु) के रूप में माना जाता है।
- केंद्रीय धातु परमाणु के d-कक्षकों का विपाटन (splitting) लिगेंड के विद्युत क्षेत्र के कारण होता है।
- अष्टफलकीय क्रिस्टल क्षेत्र में d-कक्षकों का विपाटन:
- अष्टफलकीय क्षेत्र में, लिगेंड अक्षों के साथ (x, y, z) आते हैं।
- eg कक्षक (dx2-y2, dz^2) जो अक्षों के अनुदिश होते हैं, लिगेंड से अधिक प्रतिकर्षण अनुभव करते हैं और उनकी ऊर्जा बढ़ जाती है।
- t2g कक्षक (dxy, dyz, dzx) जो अक्षों के बीच होते हैं, लिगेंड से कम प्रतिकर्षण अनुभव करते हैं और उनकी ऊर्जा घट जाती है।
- t2g और eg कक्षकों के बीच ऊर्जा अंतर को क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन ऊर्जा (Crystal Field Splitting Energy - CFSE) या Δo (अष्टफलकीय के लिए) कहते हैं।
- चतुष्फलकीय क्रिस्टल क्षेत्र में d-कक्षकों का विपाटन:
- चतुष्फलकीय क्षेत्र में, लिगेंड अक्षों के बीच से आते हैं।
- t2 कक्षक (dxy, dyz, dzx) लिगेंड के अधिक निकट होते हैं, इसलिए उनकी ऊर्जा बढ़ जाती है।
- e कक्षक (dx2-y2, dz^2) लिगेंड से दूर होते हैं, इसलिए उनकी ऊर्जा घट जाती है।
- Δt (चतुष्फलकीय के लिए) = 4/9 Δo।
- स्पेक्ट्रोरसायन श्रेणी (Spectrochemical Series): लिगेंड की वह श्रेणी जो उनके क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन ऊर्जा (Δo) उत्पन्न करने की क्षमता के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित होती है।
I- < Br- < SCN- < Cl- < F- < OH- < C2O4^2- < H2O < NCS- < EDTA^4- < NH3 < en < CN- < CO
(दुर्बल क्षेत्र लिगेंड) -----------------------------------------------------> (प्रबल क्षेत्र लिगेंड) - इलेक्ट्रॉन वितरण (Electron Distribution): d-कक्षकों में इलेक्ट्रॉन दो कारकों पर निर्भर करते हैं:
- Δo (क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन ऊर्जा)
- P (युग्मन ऊर्जा - Pairing Energy)
- प्रबल क्षेत्र लिगेंड (Strong Field Ligands): Δo > P। इलेक्ट्रॉन पहले t2g में युग्मित होते हैं, फिर eg में जाते हैं। निम्न प्रचक्रण संकुल (Low Spin Complex) बनते हैं।
- दुर्बल क्षेत्र लिगेंड (Weak Field Ligands): Δo < P। इलेक्ट्रॉन पहले t2g और eg में अयुग्मित रूप से भरते हैं, फिर युग्मन होता है। उच्च प्रचक्रण संकुल (High Spin Complex) बनते हैं।
- संकुलों का रंग (Color of Complexes):
- संक्रमण धातु संकुल रंगीन होते हैं क्योंकि वे दृश्य प्रकाश के एक निश्चित तरंग दैर्ध्य को अवशोषित करते हैं और उसके पूरक रंग को उत्सर्जित करते हैं।
- यह रंग d-d संक्रमणों के कारण होता है, जहाँ एक इलेक्ट्रॉन निम्न ऊर्जा वाले t2g कक्षक से उच्च ऊर्जा वाले eg कक्षक में उत्तेजित होता है।
- अवशोषित प्रकाश की ऊर्जा (और इस प्रकार रंग) Δo के मान पर निर्भर करती है।
- सीमाएँ:
- लिगेंड को बिंदु आवेश मानना एक अति सरलीकरण है।
- धातु-लिगेंड बंध में सहसंयोजक प्रकृति की व्याख्या नहीं करता।
- π-बंधन वाले लिगेंड (जैसे CO, CN-) के व्यवहार की व्याख्या नहीं करता।
5. उपसहसंयोजन यौगिकों का महत्व और अनुप्रयोग (Importance and Applications):
- जैव प्रणालियों में (In Biological Systems):
- हीमोग्लोबिन (Hemoglobin): आयरन (Fe) का एक संकुल जो रक्त में ऑक्सीजन परिवहन करता है।
- क्लोरोफिल (Chlorophyll): मैग्नीशियम (Mg) का एक संकुल जो पौधों में प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक है।
- विटामिन B12 (Vitamin B12): कोबाल्ट (Co) का एक संकुल।
- विश्लेषणात्मक रसायन में (In Analytical Chemistry):
- EDTA (एथिलीनडाइएमीनटेट्राएसीटेटो): जल की कठोरता के निर्धारण में उपयोग होता है।
- गुणात्मक विश्लेषण में कई धातु आयनों (जैसे Ni2+, Cu2+, Ag+) की पहचान के लिए संकुलों का निर्माण किया जाता है।
- धातु निष्कर्षण में (In Metallurgy):
- सोने (Au) और चांदी (Ag) जैसी धातुओं का उनके अयस्कों से निष्कर्षण संकुल निर्माण के माध्यम से किया जाता है (सायनाइड प्रक्रम)।
- औषधि रसायन में (In Medicine):
- सिस-प्लैटिन (Cisplatin - Pt(NH3)2Cl2): कैंसर के उपचार में एक प्रभावी एंटी-कैंसर एजेंट के रूप में उपयोग किया जाता है।
- EDTA का उपयोग सीसा विषाक्तता के उपचार में किया जाता है (कीलेट चिकित्सा)।
- उत्प्रेरण में (In Catalysis):
- विल्किन्सन उत्प्रेरक (Wilkinson's Catalyst - [RhCl(PPh3)3]): एल्कीनों के हाइड्रोजनीकरण में उपयोग होता है।
- जिगलर-नाटा उत्प्रेरक (Ziegler-Natta Catalyst) पॉलीएल्कीनों के उत्पादन में।
- विद्युत लेपन (Electroplating):
- चांदी और सोने जैसी धातुओं के समान और चिकने विद्युत लेपन के लिए उनके संकुल आयनों का उपयोग किया जाता है (जैसे [Ag(CN)2]-, [Au(CN)2]-)।
- फोटोग्राफी (Photography):
- फोटोग्राफिक फिल्म से अप्रयुक्त AgBr को हटाने के लिए सोडियम थायोसल्फेट (हाइपो) का उपयोग किया जाता है, जो [Ag(S2O3)2]3- संकुल बनाता है।
बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions - MCQs)
निर्देश: प्रत्येक प्रश्न के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुनें।
-
निम्नलिखित में से कौन सा एक उभयदंती लिगेंड है?
(a) NH3
(b) Cl-
(c) NO2-
(d) H2O -
संकुल [Co(NH3)5Cl]SO4 किस प्रकार की समावयवता प्रदर्शित करता है?
(a) बंधनी समावयवता
(b) जलयोजन समावयवता
(c) आयनन समावयवता
(d) ज्यामितीय समावयवता -
[Ni(CN)4]2- आयन में निकेल की संकरण अवस्था और ज्यामिति क्या है?
(a) sp3, चतुष्फलकीय
(b) dsp2, वर्ग समतलीय
(c) sp3d2, अष्टफलकीय
(d) d2sp3, अष्टफलकीय -
क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत (CFT) के अनुसार, संक्रमण धातु संकुलों का रंग किसके कारण होता है?
(a) धातु-लिगेंड बंधों का आयनिक गुण
(b) d-d संक्रमण
(c) लिगेंड से धातु में आवेश स्थानांतरण
(d) धातु का ऑक्सीकरण अवस्था -
निम्नलिखित में से कौन सा लिगेंड कीलेट प्रभाव दर्शाता है?
(a) क्लोराइडो (Cl-)
(b) एम्मीन (NH3)
(c) एथेन-1,2-डाइएमीन (en)
(d) कार्बोनिल (CO) -
वर्नर के सिद्धांत के अनुसार, [Co(NH3)6]Cl3 में कोबाल्ट की प्राथमिक और द्वितीयक संयोजकताएँ क्रमशः क्या हैं?
(a) 3 और 6
(b) 6 और 3
(c) 3 और 3
(d) 6 और 6 -
स्पेक्ट्रोरसायन श्रेणी में, लिगेंड की क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन ऊर्जा (Δo) उत्पन्न करने की क्षमता के बढ़ते क्रम में सही व्यवस्था क्या है?
(a) CN- < NH3 < H2O < Cl-
(b) Cl- < H2O < NH3 < CN-
(c) H2O < Cl- < NH3 < CN-
(d) NH3 < CN- < H2O < Cl- -
[Fe(H2O)6]3+ एक उच्च प्रचक्रण संकुल है, जबकि [Fe(CN)6]3- एक निम्न प्रचक्रण संकुल है। इसका कारण क्या है?
(a) H2O एक प्रबल क्षेत्र लिगेंड है और CN- एक दुर्बल क्षेत्र लिगेंड है।
(b) H2O एक दुर्बल क्षेत्र लिगेंड है और CN- एक प्रबल क्षेत्र लिगेंड है।
(c) Fe3+ आयन का आकार।
(d) ऑक्सीकरण अवस्था में अंतर। -
निम्नलिखित में से कौन सा उपसहसंयोजन यौगिक कैंसर के उपचार में उपयोग किया जाता है?
(a) विटामिन B12
(b) क्लोरोफिल
(c) सिस-प्लैटिन
(d) हीमोग्लोबिन -
संकुल [Cr(H2O)4Cl2]Cl में क्रोमियम की ऑक्सीकरण अवस्था क्या है?
(a) +1
(b) +2
(c) +3
(d) +4
उत्तर कुंजी (Answer Key):
- (c)
- (c)
- (b)
- (b)
- (c)
- (a)
- (b)
- (b)
- (c)
- (c)
मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपकी 'उपसहसंयोजन यौगिक' अध्याय की तैयारी में अत्यंत सहायक सिद्ध होंगे। अपनी पढ़ाई जारी रखें और किसी भी संदेह के लिए पूछने में संकोच न करें।