Class 12 Hindi Notes Chapter 11 (Chapter 11) – Aroh Book

Aroh
प्रिय विद्यार्थियों,

आज हम आपकी पाठ्यपुस्तक 'आरोह भाग-2' के गद्य खंड के ग्यारहवें अध्याय 'बाजार दर्शन' पर विस्तार से चर्चा करेंगे। यह अध्याय जैनेंद्र कुमार द्वारा रचित एक महत्वपूर्ण वैचारिक निबंध है, जो सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।


अध्याय 11: बाजार दर्शन

लेखक: जैनेंद्र कुमार


1. लेखक परिचय: जैनेंद्र कुमार

  • जन्म: सन् 1905, अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश)
  • निधन: सन् 1988
  • मूल नाम: आनंदीलाल
  • शिक्षा: प्रारंभिक शिक्षा गुरुकुल ऋषिकेश में। उच्च शिक्षा काशी हिंदू विश्वविद्यालय में।
  • साहित्यिक पहचान: हिंदी साहित्य में 'मनोविश्लेषणात्मक कथाधारा के प्रवर्तक' के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने समाज, धर्म, दर्शन, राजनीति और अर्थशास्त्र जैसे विषयों पर गहन चिंतन किया है।
  • प्रमुख रचनाएँ:
    • उपन्यास: परख, सुनीता, त्यागपत्र, कल्याणी, जयवर्धन, मुक्तिबोध।
    • कहानी संग्रह: वातायन, एक रात, दो चिड़ियाँ, पाजेब, नीलम देश की राजकन्या, अपना-अपना भाग्य।
    • निबंध संग्रह: प्रस्तुत प्रश्न, जड़ की बात, पूर्वोदय, साहित्य का श्रेय और प्रेय, सोच-विचार, समय और हम।
  • पुरस्कार एवं सम्मान: साहित्य अकादमी पुरस्कार (मुक्तिबोध उपन्यास पर), भारत-भारती सम्मान, पद्म भूषण।
  • भाषा-शैली: उनकी भाषा सरल, सुबोध खड़ी बोली है, जिसमें संस्कृतनिष्ठ शब्दों के साथ-साथ उर्दू और अंग्रेजी के प्रचलित शब्दों का भी सहज प्रयोग मिलता है। उनकी शैली चिंतन-प्रधान और विश्लेषणात्मक है।

2. पाठ परिचय: 'बाजार दर्शन'

'बाजार दर्शन' जैनेंद्र कुमार का एक ललित निबंध है, जिसमें उन्होंने बाजारवाद और उपभोक्तावाद की गहरी पड़ताल की है। यह निबंध बाजार के जादू, उसकी शक्ति और मनुष्य पर पड़ने वाले उसके प्रभाव का विश्लेषण करता है। लेखक ने अपनी दार्शनिक दृष्टि से यह समझाने का प्रयास किया है कि बाजार की सार्थकता किसमें है और हम कैसे बाजार के दास बनने से बच सकते हैं। यह निबंध अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान और दर्शनशास्त्र का एक सुंदर समन्वय प्रस्तुत करता है।


3. पाठ का सार (विस्तृत व्याख्या)

  1. बाजार का जादू: लेखक बताता है कि बाजार में एक अदृश्य शक्ति या जादू होता है। यह जादू तभी चलता है जब हमारी आँखें उसे देखती हैं और मन खाली होता है। यह जादू चुंबक की तरह आकर्षित करता है और व्यक्ति को अनावश्यक वस्तुएँ खरीदने के लिए विवश कर देता है। यह जादू रूप का जादू है, जो आँखों के रास्ते काम करता है।
  2. पैसे की परचेजिंग पावर (क्रय शक्ति): लेखक के अनुसार, पैसा एक व्यंग्य शक्ति है। लोग अपनी परचेजिंग पावर यानी खरीदने की शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए अनावश्यक वस्तुएँ खरीदते हैं। यह दिखावा उन्हें समाज में अपनी हैसियत दर्शाने का एक माध्यम लगता है।
  3. मित्रों के उदाहरण:
    • पहले मित्र का अनुभव: लेखक का एक मित्र बाजार गया था सिर्फ एक मामूली चीज खरीदने, लेकिन लौटते समय उसके पास ढेर सारी अनावश्यक वस्तुएँ थीं। उसने इसका कारण अपनी पत्नी को बताया, लेकिन लेखक इसे पैसे की गर्मी और परचेजिंग पावर का खेल मानता है। मित्र का मन खाली था, इसलिए बाजार की चकाचौंध उसे आकर्षित कर पाई।
    • दूसरे मित्र का अनुभव: लेखक का दूसरा मित्र बाजार गया, लेकिन कुछ भी नहीं खरीद पाया। उसने बताया कि बाजार में सब कुछ इतना आकर्षक था कि वह तय ही नहीं कर पाया कि क्या खरीदे, इसलिए कुछ भी नहीं ले पाया। लेखक इसे मन के भरे होने का प्रतीक मानता है। जब मन में निश्चित लक्ष्य होता है, तो बाजार का आकर्षण प्रभावी नहीं होता।
  4. मन का खालीपन और भरापन: लेखक कहता है कि मन खाली हो तो बाजार का जादू चलता है। मन भरा हो तो बाजार का जादू नहीं चलता। मन का खालीपन व्यक्ति को बाजार की अनावश्यक वस्तुओं की ओर खींचता है, जबकि मन का भरापन उसे अपनी आवश्यकताओं के प्रति सचेत रखता है।
  5. बाजारूपन: बाजार की सार्थकता आवश्यकतानुसार वस्तुएँ उपलब्ध कराने और खरीदने में है। जब लोग अपनी परचेजिंग पावर का प्रदर्शन करने या सिर्फ दिखावे के लिए बाजार का दुरुपयोग करते हैं, तो बाजार में 'बाजारूपन' आ जाता है। इससे बाजार का मूल उद्देश्य समाप्त हो जाता है और वह केवल शोषण का माध्यम बन जाता है।
  6. चूर्ण वाले भगत जी का उदाहरण: लेखक एक चूर्ण बेचने वाले भगत जी का उदाहरण देते हैं। वे अत्यंत संतोषी स्वभाव के व्यक्ति हैं। वे प्रतिदिन केवल छह आने का चूर्ण बेचते हैं और बाकी बचा हुआ चूर्ण बच्चों को मुफ्त में बाँट देते हैं। उन्हें बाजार की चकाचौंध या पैसे की चमक बिल्कुल प्रभावित नहीं करती। उनके पास पैसे की कमी नहीं है, लेकिन वे उसका दुरुपयोग नहीं करते। वे अपनी आवश्यकताओं को जानते हैं और केवल उतना ही लेते हैं जितना उन्हें चाहिए। वे बाजार को अपनी आवश्यकता के अनुसार देखते हैं, न कि बाजार के गुलाम बनते हैं। भगत जी का मन भरा हुआ है, इसलिए बाजार का जादू उन पर नहीं चलता।
  7. बाजार की सार्थकता: लेखक के अनुसार, बाजार की सार्थकता तभी है जब हम अपनी आवश्यकताओं को पहचान कर खरीदारी करें। जो व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं को नहीं जानता, वह बाजार को निरर्थक बना देता है और स्वयं भी असंतुष्ट रहता है। बाजार तभी सार्थक है जब वह आवश्यकता की पूर्ति करे, न कि तृष्णा और दिखावे को बढ़ावा दे।
  8. अहंकार और दिखावा: लोग अपनी परचेजिंग पावर का प्रदर्शन कर स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास करते हैं, जिससे समाज में असमानता, तृष्णा और ईर्ष्या बढ़ती है। यह एक प्रकार का अहंकार है जो बाजार को अनैतिक बनाता है।
  9. मन की शक्ति और संयम: लेखक कहता है कि मन को बंद नहीं करना चाहिए, बल्कि उसे नियंत्रित करना चाहिए। मन को खुला रखकर भी हम अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रख सकते हैं। हमें अपनी आवश्यकताओं को पहचानना चाहिए और अनावश्यक मोह से बचना चाहिए।

4. प्रमुख बिंदु एवं अवधारणाएँ

  • बाजार का जादू: दृश्य आकर्षण, मोहक शक्ति जो अनावश्यक खरीददारी को प्रेरित करती है।
  • परचेजिंग पावर (क्रय शक्ति): पैसे की वह शक्ति जिससे वस्तुएँ खरीदी जाती हैं। इसका दुरुपयोग दिखावे के लिए होता है।
  • बाजारूपन: बाजार का वह रूप जहाँ लोग केवल दिखावे और अनावश्यक खरीददारी के लिए जाते हैं, जिससे बाजार का मूल उद्देश्य (आवश्यकता पूर्ति) समाप्त हो जाता है।
  • संतोष: भगत जी का गुण, जो उन्हें बाजार के जादू से बचाता है।
  • तृष्णा और ईर्ष्या: बाजारूपन और अनावश्यक प्रतिस्पर्धा का परिणाम।
  • मन का खालीपन/भरापन: मन की स्थिति जो बाजार के प्रभाव को निर्धारित करती है। खाली मन बाजार के प्रभाव में आता है, भरा मन नहीं।
  • अहंकार: परचेजिंग पावर के प्रदर्शन से उत्पन्न होता है।
  • मितव्ययिता: सोच-समझकर खर्च करना।
  • फिजूलखर्ची: अनावश्यक खर्च।
  • बाजार की सार्थकता: आवश्यकतानुसार वस्तुएँ उपलब्ध कराना और खरीदना।

5. भाषा शैली

  • चिंतन-प्रधान, दार्शनिक और वैचारिक शैली।
  • सरल, सुबोध खड़ी बोली का प्रयोग।
  • उदाहरणों और दृष्टांतों (मित्रों और भगत जी के उदाहरण) के माध्यम से अपनी बात को स्पष्ट करना।
  • विश्लेषणात्मक और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण।
  • संस्कृतनिष्ठ, उर्दू और अंग्रेजी शब्दों का सहज मिश्रण (जैसे: परचेजिंग पावर, फैंसी)।

6. संदेश

'बाजार दर्शन' के माध्यम से जैनेंद्र कुमार हमें उपभोक्तावाद और बाजारवाद की अंधी दौड़ से बचने का संदेश देते हैं। वे अनावश्यक खरीददारी से बचने, संतोष, संयम और आत्म-नियंत्रण का महत्व समझाने का प्रयास करते हैं। लेखक यह भी बताते हैं कि पैसे को केवल साधन मानना चाहिए, साध्य नहीं। बाजार का सदुपयोग अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए करना चाहिए, न कि दिखावे या तृष्णा के लिए।


7. सरकारी परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य

  • लेखक: जैनेंद्र कुमार
  • विधा: ललित निबंध
  • विषय: बाजारवाद, उपभोक्तावाद, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान, दर्शन।
  • प्रमुख पात्र/उदाहरण: भगत जी (चूर्ण वाले), लेखक के मित्र।
  • प्रमुख अवधारणाएँ: बाजार का जादू, परचेजिंग पावर, बाजारूपन, मन का खालीपन/भरापन।
  • जैनेंद्र कुमार को हिंदी साहित्य में 'मनोविश्लेषणात्मक कथाधारा के प्रवर्तक' के रूप में जाना जाता है।
  • यह निबंध हमें उपभोक्ता संस्कृति पर विचार करने और अपनी क्रय शक्ति का सदुपयोग करने की प्रेरणा देता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

यहाँ 'बाजार दर्शन' पाठ पर आधारित 10 महत्वपूर्ण बहुविकल्पीय प्रश्न दिए गए हैं, जो आपकी सरकारी परीक्षा की तैयारी में सहायक होंगे:

  1. 'बाजार दर्शन' पाठ के लेखक कौन हैं?
    अ) महादेवी वर्मा
    ब) जैनेंद्र कुमार
    स) हजारी प्रसाद द्विवेदी
    द) धर्मवीर भारती

  2. 'बाजार दर्शन' साहित्य की कौन सी विधा है?
    अ) कहानी
    ब) उपन्यास
    स) निबंध
    द) आत्मकथा

  3. लेखक के अनुसार बाजार का जादू कब चलता है?
    अ) जब मन भरा हो
    ब) जब मन खाली हो
    स) जब जेब खाली हो
    द) जब जेब भरी हो

  4. 'परचेजिंग पावर' का अर्थ क्या है?
    अ) खरीदने की शक्ति
    ब) बेचने की शक्ति
    स) देखने की शक्ति
    द) सोचने की शक्ति

  5. लेखक ने किसे संतोषी व्यक्ति का उदाहरण बताया है?
    अ) अपने मित्र को
    ब) चूर्ण वाले भगत जी को
    स) स्वयं को
    द) किसी दुकानदार को

  6. भगत जी प्रतिदिन कितने आने का चूर्ण बेचते थे?
    अ) चार आने
    ब) छह आने
    स) आठ आने
    द) एक रुपया

  7. लेखक के अनुसार बाजार की सार्थकता किसमें है?
    अ) अपनी परचेजिंग पावर दिखाने में
    ब) अनावश्यक वस्तुएँ खरीदने में
    स) आवश्यकतानुसार वस्तुएँ खरीदने में
    द) केवल घूमने में

  8. जब बाजार का आकर्षण व्यक्ति को अपनी आवश्यकताओं से परे खींच ले जाता है, तो उसे क्या कहते हैं?
    अ) बाजार का सदुपयोग
    ब) बाजार का बाजारूपन
    स) बाजार का जादू
    द) बाजार की सार्थकता

  9. जैनेंद्र कुमार को हिंदी साहित्य में किस धारा के प्रवर्तक के रूप में जाना जाता है?
    अ) प्रगतिवादी
    ब) प्रयोगवादी
    स) मनोविश्लेषणात्मक
    द) छायावादी

  10. लेखक ने पैसे को क्या माना है?
    अ) साध्य
    ब) साधन
    स) शक्ति
    द) सुख


उत्तरमाला:

  1. ब) जैनेंद्र कुमार
  2. स) निबंध
  3. ब) जब मन खाली हो
  4. अ) खरीदने की शक्ति
  5. ब) चूर्ण वाले भगत जी को
  6. ब) छह आने
  7. स) आवश्यकतानुसार वस्तुएँ खरीदने में
  8. ब) बाजार का बाजारूपन
  9. स) मनोविश्लेषणात्मक
  10. ब) साधन

मुझे आशा है कि यह विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपकी परीक्षा की तैयारी में अत्यंत सहायक सिद्ध होंगे। अपनी पढ़ाई जारी रखें और किसी भी संदेह के लिए पूछने में संकोच न करें।

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