Class 12 Hindi Notes Chapter 12 (Chapter 12) – Aroh Book

Aroh
प्रिय विद्यार्थियों, आज हम आपकी पाठ्यपुस्तक 'आरोह' के अध्याय 12, 'बाजार दर्शन' पर विस्तृत चर्चा करेंगे। यह अध्याय जैनेंद्र कुमार द्वारा रचित एक महत्वपूर्ण वैचारिक निबंध है, जो उपभोक्तावाद और बाजारवाद की गहरी पड़ताल करता है। सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए इसके हर पहलू को समझना अत्यंत आवश्यक है।


अध्याय 12: बाजार दर्शन (लेखक: जैनेंद्र कुमार)

1. लेखक परिचय: जैनेंद्र कुमार (1905-1988)

  • जन्म: 1905, अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश)
  • प्रमुख रचनाएँ:
    • उपन्यास: परख, सुनीता, त्यागपत्र, कल्याणी, जयवर्धन, मुक्तिबोध।
    • कहानी संग्रह: वातायन, एक रात, दो चिड़ियाँ, फाँसी, नीलम देश की राजकन्या, पाजेब।
    • निबंध संग्रह: प्रस्तुत प्रश्न, जड़ की बात, पूर्वोदय, साहित्य का श्रेय और प्रेय, सोच-विचार, काम, प्रेम और परिवार।
  • पुरस्कार एवं सम्मान: साहित्य अकादमी पुरस्कार, भारत-भारती सम्मान, पद्म भूषण।
  • साहित्यिक विशेषताएँ:
    • मनोविश्लेषणात्मक शैली के लिए प्रसिद्ध।
    • गांधीवादी दर्शन से प्रभावित।
    • नैतिकता, आध्यात्मिकता और दार्शनिकता उनके साहित्य के मूल तत्व हैं।
    • सरल और सहज भाषा में गंभीर विषयों को प्रस्तुत करने में सिद्धहस्त।
    • उन्होंने हिंदी उपन्यास और कहानी को नई दिशा दी।

2. पाठ परिचय: 'बाजार दर्शन'
'बाजार दर्शन' जैनेंद्र कुमार का एक महत्वपूर्ण वैचारिक निबंध है। इसमें लेखक ने बाजार के जादू, उसकी शक्ति और मनुष्य पर पड़ने वाले उसके प्रभाव का सूक्ष्म विश्लेषण किया है। यह निबंध उपभोक्तावादी संस्कृति पर गहरा कटाक्ष करता है और बताता है कि बाजार की सार्थकता किसमें है। लेखक ने बाजार के आकर्षण, पैसे की व्यंग्य शक्ति और मन के खाली या भरे होने की स्थिति का मनोवैज्ञानिक चित्रण किया है।

3. पाठ का सार एवं मुख्य बिंदु

  • बाजार का जादू:

    • लेखक बताते हैं कि बाजार का जादू आँखों की राह काम करता है। यह जादू तभी चलता है जब मन खाली हो, यानी व्यक्ति को यह पता न हो कि उसे क्या खरीदना है।
    • बाजार की चमक-दमक और आकर्षक वस्तुएँ मन को मोहित कर लेती हैं। व्यक्ति अनावश्यक वस्तुएँ खरीदने के लिए विवश हो जाता है।
    • यह जादू उतरते ही व्यक्ति को पता चलता है कि उसने जो खरीदा है, वह उसकी जरूरत का नहीं था, बल्कि फिजूलखर्ची थी। तब उसे अपनी फिजूलखर्ची पर पश्चाताप होता है।
  • पैसे की व्यंग्य शक्ति:

    • लेखक के अनुसार, पैसा एक ऐसी शक्ति है जो मनुष्य को अपने आसपास की चीजों को खरीदने के लिए उकसाती है।
    • पैसे की व्यंग्य शक्ति बहुत दारुण होती है। यह हमें यह एहसास कराती है कि हमारे पास पैसा नहीं है, इसलिए हम वह सब कुछ नहीं खरीद सकते जो बाजार में उपलब्ध है। यह अभाव का एहसास कराकर हमें हीन महसूस कराती है।
    • कुछ लोग अपनी परचेज़िंग पावर (खरीदने की शक्ति) का प्रदर्शन करने के लिए अनावश्यक वस्तुएँ खरीदते हैं। वे यह सोचते हैं कि अधिक चीजें खरीदने से उनका समाज में मान-सम्मान बढ़ेगा।
  • मन खाली होना और भरा होना:

    • मन खाली होना: जब व्यक्ति बिना किसी निश्चित उद्देश्य के बाजार जाता है, तो उसका मन खाली होता है। ऐसी स्थिति में बाजार की हर चीज उसे अपनी ओर खींचती है और वह अनावश्यक खरीदारी कर बैठता है।
    • मन भरा होना: जब व्यक्ति को अपनी आवश्यकता का स्पष्ट ज्ञान होता है और वह जानता है कि उसे क्या खरीदना है, तो उसका मन भरा हुआ होता है। ऐसे मन पर बाजार का जादू नहीं चलता। वह केवल अपनी जरूरत की चीज खरीदता है और बाजार की अन्य आकर्षक वस्तुएँ उसे विचलित नहीं कर पातीं।
  • मित्रों के उदाहरण:

    • लेखक अपने एक मित्र का उदाहरण देते हैं जो बाजार से ढेर सारी अनावश्यक वस्तुएँ खरीदकर लौटते हैं, क्योंकि बाजार की चमक-दमक ने उन्हें मोहित कर लिया था। बाद में उन्हें अपनी फिजूलखर्ची पर पछतावा होता है।
    • दूसरे मित्र का उदाहरण देते हैं जो बाजार तो जाते हैं, लेकिन कुछ भी खरीद नहीं पाते, क्योंकि वे यह तय नहीं कर पाते कि उन्हें क्या चाहिए। वे बाजार की सभी चीजों को उपयोगी समझते हैं और अंततः कुछ भी नहीं खरीद पाते।
  • चूर्ण वाले भगत जी का चरित्र:

    • भगत जी इस निबंध के केंद्रीय और आदर्श पात्र हैं। वे चूर्ण बेचकर जीवन यापन करते हैं।
    • उनकी विशेषता यह है कि वे केवल अपनी आवश्यकतानुसार ही चूर्ण बनाते और बेचते हैं। छह आने की कमाई होते ही वे शेष चूर्ण बच्चों में मुफ्त बाँट देते हैं।
    • बाजार की चकाचौंध और बड़े-बड़े फैंसी स्टोर उन्हें कभी आकर्षित नहीं कर पाते। वे अपनी जरूरत की चीजें (जैसे काला नमक, जीरा) ही खरीदते हैं और सीधे घर लौट आते हैं।
    • भगत जी का चरित्र संतोष, आत्मनियंत्रण और अपरिग्रह (गैर-संग्रह) का प्रतीक है। वे बाजार के जादू से पूरी तरह अप्रभावित रहते हैं। वे बताते हैं कि मन पर नियंत्रण हो तो बाजार हमें गुलाम नहीं बना सकता।
  • बाजार की सार्थकता और अनैतिकता:

    • सार्थक बाजार: लेखक के अनुसार, बाजार तभी सार्थक है जब वह ग्राहक की आवश्यकताओं को पूरा करे। जब ग्राहक अपनी आवश्यकता जानता हो और बाजार केवल उस आवश्यकता की पूर्ति का माध्यम बने।
    • अनैतिक बाजार: जब बाजार मनुष्य को अपनी आवश्यकताओं से भटकाकर अनावश्यक खरीदारी के लिए प्रेरित करता है, जब वह ग्राहक को अपनी इच्छाओं का गुलाम बना देता है, तब वह अनैतिक हो जाता है। ऐसा बाजार शोषण को बढ़ावा देता है और मनुष्य को केवल 'क्रेता' और 'विक्रेता' में बदल देता है, जिससे मानवीय संबंध कमजोर पड़ते हैं।
    • जो लोग अपनी परचेज़िंग पावर के अभिमान में बाजार का दुरुपयोग करते हैं, वे बाजार को शैतानी शक्ति देते हैं।
  • मूल संदेश:

    • यह निबंध उपभोक्तावादी संस्कृति और बाजारवाद पर एक गहरा चिंतन है।
    • यह हमें सिखाता है कि हमें अपनी आवश्यकताओं को पहचानना चाहिए और आत्मनियंत्रण रखना चाहिए।
    • अनावश्यक वस्तुओं के संग्रह से बचना चाहिए और अपनी क्रय शक्ति का सदुपयोग करना चाहिए।
    • बाजार का उपयोग अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए करें, न कि उसे अपनी इच्छाओं का दास बनने दें।

4. भाषा-शैली

  • शैली: विचारात्मक, निबंधात्मक, मनोवैज्ञानिक।
  • भाषा: सहज, सरल, व्यावहारिक हिंदी। संस्कृतनिष्ठ शब्दों के साथ-साथ उर्दू और अंग्रेजी के प्रचलित शब्दों का भी प्रयोग।
  • प्रस्तुति: उदाहरणों और दृष्टांतों के माध्यम से अपनी बात को स्पष्ट करते हैं। भगत जी का चरित्र एक आदर्श उदाहरण है।
  • प्रभाव: पाठक को सोचने पर विवश करती है और उपभोक्तावादी मानसिकता पर पुनर्विचार करने को प्रेरित करती है।

5. महत्वपूर्ण उद्धरण/वाक्यांश

  • "बाजार का जादू आँख की राह काम करता है।"
  • "पैसे की व्यंग्य शक्ति कितनी दारुण है।"
  • "मन खाली हो तब बाजार की पुकार जादू करती है।"
  • "मन भरा हो तब बाजार का जादू नहीं चलता।"
  • "बाजार को सार्थकता वही मनुष्य देता है जो अपनी आवश्यकता जानता है।"
  • "जो लोग बाजार का बाजारूपन बढ़ाते हैं, वे कपट और शोषण को बढ़ावा देते हैं।"
  • "पैसे की गर्मी या एनर्जी।"

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

1. 'बाजार दर्शन' पाठ के लेखक कौन हैं?
(क) प्रेमचंद
(ख) जैनेंद्र कुमार
(ग) महादेवी वर्मा
(घ) हजारी प्रसाद द्विवेदी

2. 'बाजार दर्शन' साहित्य की कौन-सी विधा है?
(क) कहानी
(ख) उपन्यास
(ग) निबंध
(घ) संस्मरण

3. लेखक के अनुसार, बाजार का जादू किस राह काम करता है?
(क) कान की राह
(ख) नाक की राह
(ग) आँख की राह
(घ) मन की राह

4. 'परचेज़िंग पावर' का क्या अर्थ है?
(क) खरीदने की शक्ति
(ख) बेचने की शक्ति
(ग) सोचने की शक्ति
(घ) समझने की शक्ति

5. लेखक ने बाजार के जादू से बचने का क्या उपाय बताया है?
(क) बाजार न जाना
(ख) मन को खाली रखना
(ग) मन को भरा रखना
(घ) बहुत सारा पैसा लेकर जाना

6. चूर्ण वाले भगत जी एक दिन में कितने आने से अधिक नहीं कमाते थे?
(क) चार आने
(ख) छह आने
(ग) आठ आने
(घ) दस आने

7. भगत जी का चरित्र हमें किस बात की प्रेरणा देता है?
(क) अधिक कमाने की
(ख) बाजार से दूर रहने की
(ग) संतोष और आत्मनियंत्रण की
(घ) दिखावा करने की

8. बाजार को सार्थकता कौन देता है?
(क) जो अपनी परचेज़िंग पावर दिखाता है
(ख) जो बाजार की चकाचौंध में खो जाता है
(ग) जो अपनी आवश्यकता जानता है
(घ) जो अनावश्यक वस्तुएँ खरीदता है

9. पैसे की व्यंग्य शक्ति का क्या अर्थ है?
(क) पैसा कमाने की शक्ति
(ख) पैसा खर्च करने की शक्ति
(ग) पैसे के अभाव में हीनता का अनुभव कराना
(घ) पैसे से सब कुछ खरीद लेना

10. लेखक के अनुसार, बाजार का बाजारूपन कब बढ़ता है?
(क) जब लोग अपनी आवश्यकताएँ जानते हैं
(ख) जब लोग केवल जरूरत की चीजें खरीदते हैं
(ग) जब लोग अपनी परचेज़िंग पावर का प्रदर्शन करते हैं
(घ) जब लोग बाजार नहीं जाते


उत्तरमाला:

  1. (ख) जैनेंद्र कुमार
  2. (ग) निबंध
  3. (ग) आँख की राह
  4. (क) खरीदने की शक्ति
  5. (ग) मन को भरा रखना
  6. (ख) छह आने
  7. (ग) संतोष और आत्मनियंत्रण की
  8. (ग) जो अपनी आवश्यकता जानता है
  9. (ग) पैसे के अभाव में हीनता का अनुभव कराना
  10. (ग) जब लोग अपनी परचेज़िंग पावर का प्रदर्शन करते हैं

मुझे आशा है कि यह विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपकी परीक्षा की तैयारी में सहायक सिद्ध होंगे। इस पाठ के गहन अर्थों को समझकर आप न केवल अच्छे अंक प्राप्त कर सकेंगे, बल्कि जीवन में भी इसके संदेश को आत्मसात कर पाएंगे। शुभकामनाएँ!

Read more