Class 12 Hindi Notes Chapter 15 (Chapter 15) – Aroh Book

नमस्ते विद्यार्थियों! आज हम आपकी पाठ्यपुस्तक 'आरोह भाग-2' के पंद्रहवें अध्याय, कवि शमशेर बहादुर सिंह द्वारा रचित कविता 'उषा' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह कविता न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए भी इसमें अनेक महत्वपूर्ण बिंदु समाहित हैं। हम कवि परिचय से लेकर कविता के भावार्थ, काव्य सौंदर्य और परीक्षा उपयोगी तथ्यों तक हर पहलू पर गहराई से चर्चा करेंगे।
अध्याय 15: उषा (कवि: शमशेर बहादुर सिंह)
1. कवि परिचय: शमशेर बहादुर सिंह
शमशेर बहादुर सिंह आधुनिक हिंदी कविता के उन चुनिंदा कवियों में से हैं जिन्हें 'कवियों का कवि' कहा जाता है। उनकी कविता में बिंबों, रंगों और ध्वनियों का अद्भुत सामंजस्य मिलता है।
- जन्म: 13 जनवरी 1911, देहरादून, उत्तराखंड।
- निधन: 12 मई 1993, अहमदाबाद, गुजरात।
- शिक्षा: प्रारंभिक शिक्षा देहरादून में, उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से।
- विशेषताएँ:
- 'कवियों का कवि': मुक्तिबोध ने उन्हें 'कवियों का कवि' कहा था, जो उनकी बिंबधर्मी, सौंदर्यबोधक और सूक्ष्म संवेदनाओं को व्यक्त करने वाली कविता के लिए उपयुक्त है।
- प्रयोगवादी और प्रगतिशील: वे प्रयोगवादी कवियों में अग्रणी थे, लेकिन उनकी कविताओं में प्रगतिशील चेतना भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
- बिंबधर्मी कवि: उनकी कविताओं में चित्रकला का प्रभाव स्पष्ट दिखता है। वे शब्दों से चित्र रचते हैं। स्वयं एक चित्रकार भी थे।
- भाषा: उनकी भाषा में उर्दू और हिंदी का सुंदर मेल है। वे शब्दों के कुशल चितेरे थे।
- प्रमुख रचनाएँ:
- काव्य संग्रह: 'कुछ कविताएँ', 'कुछ और कविताएँ', 'चुका भी हूँ नहीं मैं', 'इतने पास अपने', 'उदिता: अभिव्यक्ति का संघर्ष', 'बात बोलेगी', 'काल तुझसे होड़ है मेरी'।
- संपादन: 'उर्दू-हिंदी कोश' का संपादन।
- प्रमुख सम्मान:
- साहित्य अकादमी पुरस्कार: 1977 में 'चुका भी हूँ नहीं मैं' काव्य संग्रह के लिए।
- कबीर सम्मान, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान आदि।
2. कविता परिचय: 'उषा'
'उषा' कविता शमशेर बहादुर सिंह की एक अत्यंत प्रसिद्ध कविता है जो प्रकृति के अनुपम सौंदर्य, विशेषकर भोर के समय के बदलते दृश्यों का सजीव चित्रण करती है।
- विषय वस्तु: यह कविता सूर्योदय से ठीक पहले के पल-पल बदलते प्रकृति के रंगीन और गतिशील दृश्यों का बिंबात्मक चित्रण करती है। इसमें गाँव की सुबह का एक अनूठा और मोहक वर्णन है।
- शैली: मुक्त छंद में रचित यह कविता बिंबधर्मी है, जिसमें कवि ने उपमानों की नवीनता और मौलिकता का प्रयोग किया है।
- केंद्रीय भाव: कवि ने शहरी जीवन से दूर गाँव की सुबह की ताजगी, पवित्रता और जीवंतता को विभिन्न उपमानों (शंख, राख से लीपा चौका, काली सिल, स्लेट) के माध्यम से व्यक्त किया है। यह कविता प्रकृति के जादू को शब्दों के माध्यम से प्रस्तुत करती है, जो सूर्योदय होते ही टूट जाता है।
3. कविता का विस्तृत भावार्थ एवं व्याख्या
कवि शमशेर बहादुर सिंह ने 'उषा' कविता में भोर के समय आकाश में होने वाले परिवर्तनों को विभिन्न उपमानों के माध्यम से प्रस्तुत किया है:
1. प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे
भोर का नभ
- व्याख्या: कवि भोर के समय के आकाश की तुलना एक बहुत ही नीले शंख से करते हैं। शंख की पवित्रता, शुभता और नीले रंग की गहराई आकाश में व्याप्त शांति और निर्मलता को दर्शाती है। यह आकाश इतना नीला है कि मानो कोई पवित्र शंख रखा हो।
2. राख से लीपा हुआ चौका
अभी गीला पड़ा है
- व्याख्या: अगले ही पल, आकाश का रंग बदलने लगता है। कवि उसकी तुलना ऐसे चौके (रसोईघर के उस हिस्से) से करते हैं जिसे अभी-अभी राख से लीपा गया हो और वह अभी भी गीला पड़ा हो।
- उपमान की नवीनता: यह उपमान ग्रामीण परिवेश से लिया गया है। राख से लीपा चौका पवित्रता और स्वच्छता का प्रतीक है।
- 'गीला पड़ा है': यह बताता है कि भोर की नमी अभी भी वातावरण में है, और आकाश में थोड़ी सी धूसरता (ग्रे रंग) और ताजगी व्याप्त है। यह क्षणभंगुरता को भी दर्शाता है कि यह दृश्य ज्यादा देर टिकने वाला नहीं है।
3. बहुत काली सिल ज़रा से लाल केसर से
कि जैसे धुल गई हो
स्लेट पर या लाल खड़िया चाक
मल दी हो किसी ने
- व्याख्या: आकाश में और परिवर्तन आता है। अब वह ऐसा प्रतीत होता है जैसे किसी बहुत काली सिल (मसाले पीसने का पत्थर) को थोड़े से लाल केसर से धो दिया गया हो।
- 'काली सिल': यह भोर के गहरे नीले या हल्के कालेपन को दर्शाता है।
- 'लाल केसर से धुल गई हो': यह क्षितिज पर फैलती हुई हल्की लालिमा को दर्शाता है, जो सूर्योदय से पहले की लाली होती है। यह उपमान भी ग्रामीण जीवन से जुड़ा है।
- अगला उपमान: कवि एक और उपमान का प्रयोग करते हैं - ऐसा लगता है मानो किसी बच्चे की स्लेट पर किसी ने लाल खड़िया चाक मल दी हो।
- 'स्लेट पर लाल खड़िया': यह उपमान भोर के आकाश में फैलते लाल रंग को और अधिक स्पष्ट करता है। स्लेट का कालापन और उस पर लाल खड़िया का रंग, भोर के आकाश में व्याप्त नीले-कालेपन और लालिमा के मिश्रण का सुंदर बिंब प्रस्तुत करता है। यह बाल-सुलभ क्रियाकलाप से जुड़ा होने के कारण एक सहजता और मासूमियत भी जोड़ता है।
4. नील जल में या किसी की
गौर झिलमिल देह
जैसे हिल रही हो
और जादू टूटता है इस उषा का अब
सूर्योदय हो रहा है।
- व्याख्या: अब सूर्योदय होने वाला है। आकाश का रंग और भी चमकीला हो जाता है। कवि कहते हैं कि यह दृश्य ऐसा लगता है जैसे नीले जल (स्वच्छ आकाश) में किसी गोरे रंग की, झिलमिलाती हुई देह (सूर्य की किरणें) हिल रही हो।
- 'नील जल': यह स्वच्छ, गहरा नीला आकाश है।
- 'गौर झिलमिल देह': यह उगते हुए सूर्य की सुनहरी, चमकीली किरणों का मानवीकरण है। सूर्य की किरणें जब धीरे-धीरे ऊपर आती हैं, तो वे हिलती हुई प्रतीत होती हैं। यह उपमान अत्यंत सुंदर और कल्पनाशील है, जो उषा के सौंदर्य को चरम पर ले जाता है।
- अंतिम पंक्ति: "और जादू टूटता है इस उषा का अब सूर्योदय हो रहा है।"
- 'जादू टूटता है': कवि कहता है कि सूर्योदय होते ही उषा का वह अद्भुत, पल-पल परिवर्तित होने वाला सौंदर्य, वह रहस्यमय जादू समाप्त हो जाता है। सूर्य के पूर्ण रूप से प्रकट होते ही प्रकृति का वह क्षणिक और मोहक रूप, जो कल्पनाओं को उड़ान दे रहा था, यथार्थ में बदल जाता है।
- यह पंक्ति कविता के शीर्षक 'उषा' के महत्व को भी स्पष्ट करती है कि कविता सूर्योदय से ठीक पहले के क्षणों पर केंद्रित है, न कि सूर्योदय के बाद के।
4. काव्यगत विशेषताएँ (काव्य सौंदर्य)
- बिंबात्मकता: कविता में दृश्य बिंबों की प्रधानता है। कवि ने शब्दों से चित्र उकेरे हैं। जैसे - नीला शंख, राख से लीपा चौका, काली सिल, लाल खड़िया, नील जल में गौर देह।
- उपमानों की नवीनता: कवि ने परंपरागत उपमानों का प्रयोग न करके ग्रामीण परिवेश से जुड़े नए और मौलिक उपमानों (शंख, चौका, सिल, स्लेट) का प्रयोग किया है, जो कविता को ताज़गी प्रदान करते हैं।
- गतिशीलता: कविता में एक दृश्य से दूसरे दृश्य में संक्रमण अत्यंत स्वाभाविक और गतिशील है, जो भोर के पल-पल बदलते रूप को दर्शाता है।
- भाषा: सरल, सहज खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है। तत्सम और तद्भव शब्दों का सुंदर मिश्रण है। भाषा में चित्रात्मकता और बिंबात्मकता है।
- छंद: मुक्त छंद का प्रयोग किया गया है, जिससे कविता में प्रवाह और सहजता है।
- अलंकार:
- उपमा अलंकार: "नीला शंख जैसे", "राख से लीपा हुआ चौका जैसे", "लाल केसर से कि जैसे धुल गई हो", "गौर झिलमिल देह जैसे हिल रही हो"।
- उत्प्रेक्षा अलंकार: "जैसे धुल गई हो", "जैसे हिल रही हो"।
- मानवीकरण अलंकार: "गौर झिलमिल देह जैसे हिल रही हो" (सूर्य की किरणों का मानवीकरण)।
- विशेषण विपर्यय: "बहुत काली सिल" (यहाँ काली सिल के लिए प्रयुक्त विशेषण है, लेकिन यह भोर के अँधेरे को दर्शाता है)।
- भाव: प्रकृति प्रेम, सौंदर्य बोध, ग्रामीण परिवेश के प्रति लगाव।
- शैली: वर्णनात्मक, चित्रात्मक, बिंबात्मक।
5. सरकारी परीक्षाओं हेतु महत्वपूर्ण बिंदु
- कवि का उपनाम: 'कवियों का कवि' (मुक्तिबोध द्वारा)।
- कवि की विचारधारा: प्रयोगवादी और प्रगतिशील।
- प्रमुख रचनाएँ: 'चुका भी हूँ नहीं मैं' (साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त), 'बात बोलेगी', 'इतने पास अपने'।
- 'उषा' कविता का केंद्रीय भाव: भोर के पल-पल बदलते प्राकृतिक सौंदर्य का गतिशील बिंबों के माध्यम से चित्रण।
- कविता में प्रयुक्त प्रमुख उपमान:
- नीला शंख: भोर के आकाश की पवित्रता और नीलिमा।
- राख से लीपा चौका: भोर की नमी, ताजगी और पवित्रता।
- काली सिल पर लाल केसर: भोर के अँधेरे और लालिमा का मिश्रण।
- स्लेट पर लाल खड़िया चाक: भोर की लालिमा का गहरा होना, बाल-सुलभ चित्रण।
- नील जल में गौर झिलमिल देह: उगते सूर्य की किरणों का मानवीकरण।
- 'जादू टूटता है' का अर्थ: सूर्योदय होने पर उषा का क्षणिक, रहस्यमय और मोहक सौंदर्य समाप्त हो जाना।
- कविता की भाषा: सरल, सहज खड़ी बोली, बिंबात्मक, चित्रात्मक।
- अलंकार: उपमा, उत्प्रेक्षा, मानवीकरण की पहचान।
- कविता का छंद: मुक्त छंद।
- कवि का चित्रकार होना: उनकी कविताओं में बिंबों और रंगों के प्रयोग का एक कारण।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
1. 'उषा' कविता के कवि कौन हैं?
a) सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
b) शमशेर बहादुर सिंह
c) हरिवंश राय बच्चन
d) रघुवीर सहाय
2. शमशेर बहादुर सिंह को किस उपनाम से जाना जाता है?
a) प्रकृति का सुकुमार कवि
b) कवियों का कवि
c) एक भारतीय आत्मा
d) कठिन काव्य का प्रेत
3. 'उषा' कविता में भोर के नभ की तुलना किससे की गई है?
a) नीले सागर से
b) नीले शंख से
c) नीले कमल से
d) नीले आकाश से
4. 'राख से लीपा हुआ चौका' उपमान किस भाव को व्यक्त करता है?
a) गंदगी और मैलापन
b) पवित्रता और ताजगी
c) उदासी और नीरसता
d) प्राचीनता और जीर्णता
5. 'काली सिल ज़रा से लाल केसर से कि जैसे धुल गई हो' में कौन सा अलंकार है?
a) उपमा
b) उत्प्रेक्षा
c) मानवीकरण
d) रूपक
6. 'स्लेट पर या लाल खड़िया चाक मल दी हो किसी ने' यह पंक्ति किस समय के दृश्य को दर्शाती है?
a) दोपहर के
b) शाम के
c) भोर के
d) रात के
7. 'नील जल में या किसी की गौर झिलमिल देह जैसे हिल रही हो' में 'गौर झिलमिल देह' किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?
a) चाँदनी के लिए
b) तारे के लिए
c) सूर्य की किरणों के लिए
d) बादल के लिए
8. 'और जादू टूटता है इस उषा का अब सूर्योदय हो रहा है।' इस पंक्ति का क्या अर्थ है?
a) उषा का सौंदर्य अब समाप्त हो रहा है।
b) उषा का जादू अब शुरू हो रहा है।
c) उषा का जादू हमेशा के लिए रहेगा।
d) उषा का जादू कभी नहीं टूटता।
9. शमशेर बहादुर सिंह को किस रचना के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था?
a) कुछ कविताएँ
b) बात बोलेगी
c) चुका भी हूँ नहीं मैं
d) इतने पास अपने
10. 'उषा' कविता में कवि ने किस प्रकार के बिंबों का प्रयोग किया है?
a) केवल श्रव्य बिंब
b) केवल स्पर्श बिंब
c) गतिशील दृश्य बिंब
d) केवल घ्राण बिंब
उत्तरमाला:
- b) शमशेर बहादुर सिंह
- b) कवियों का कवि
- b) नीले शंख से
- b) पवित्रता और ताजगी
- b) उत्प्रेक्षा
- c) भोर के
- c) सूर्य की किरणों के लिए
- a) उषा का सौंदर्य अब समाप्त हो रहा है।
- c) चुका भी हूँ नहीं मैं
- c) गतिशील दृश्य बिंब
मुझे आशा है कि यह विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपको 'उषा' कविता को गहराई से समझने और सरकारी परीक्षाओं की तैयारी में सहायक होंगे। शुभकामनाएँ!