Class 12 Hindi Notes Chapter 17 (Chapter 17) – Aroh Book

Aroh
नमस्ते विद्यार्थियों,

आज हम आपकी 'आरोह' पुस्तक के अध्याय 17, "बाजार दर्शन" पर विस्तार से चर्चा करेंगे, जो जैनेंद्र कुमार द्वारा रचित एक महत्वपूर्ण निबंध है। यह अध्याय न केवल आपकी परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि जीवन में उपभोक्तावाद और बाजार की शक्ति को समझने के लिए भी अत्यंत प्रासंगिक है।


अध्याय 17: बाजार दर्शन (जैनेंद्र कुमार)

विधा: ललित निबंध

विषय: बाजार के जादू, उपभोक्तावाद, अर्थशास्त्र और नीतिशास्त्र का संबंध, संतोष और तृष्णा।


1. लेखक परिचय: जैनेंद्र कुमार

  • जन्म: 1905, अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश)
  • निधन: 1988
  • मूल नाम: आनंदीलाल
  • प्रमुख रचनाएँ:
    • उपन्यास: परख, सुनीता, त्यागपत्र, कल्याणी, विवर्त, सुखदा, व्यतीत, जयवर्धन, मुक्तिबोध।
    • कहानी संग्रह: वातायन, एक रात, दो चिड़ियाँ, फाँसी, नीलम देश की राजकन्या, पाजेब।
    • निबंध संग्रह: प्रस्तुत प्रश्न, जड़ की बात, पूर्वोदय, साहित्य और संस्कृति, मंथन, सोच-विचार, काम, प्रेम और परिवार।
  • साहित्यिक विशेषताएँ:
    • हिंदी में मनोवैज्ञानिक उपन्यास के जनक माने जाते हैं।
    • फणीश्वरनाथ रेणु और अज्ञेय के साथ प्रेमचंदोत्तर युग के महत्वपूर्ण कथाकार।
    • नैतिक और दार्शनिक प्रश्नों पर चिंतन।
    • गांधीवादी चिंतन से प्रभावित, विशेषकर 'अहिंसा', 'सत्य' और 'आत्म-नियंत्रण' के विचार।
    • सरल, सहज और चिंतनपरक भाषा शैली।
  • पुरस्कार एवं सम्मान: साहित्य अकादमी पुरस्कार (1966), भारत-भारती सम्मान, पद्म भूषण (1971)।

2. पाठ परिचय: "बाजार दर्शन"

'बाजार दर्शन' जैनेंद्र कुमार का एक महत्वपूर्ण वैचारिक निबंध है। इसमें लेखक ने बाजार की जादुई शक्ति, उपभोक्तावाद, और मनुष्य के मन पर उसके प्रभाव का सूक्ष्म विश्लेषण किया है। यह निबंध हमें बाजार के उपयोग और दुरुपयोग के बीच का अंतर समझाता है। लेखक के अनुसार, बाजार की सार्थकता तभी है जब वह मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति करे, न कि उसे अनावश्यक वस्तुओं की खरीद के लिए उकसाए। यह निबंध अर्थशास्त्र और नीतिशास्त्र के संबंधों पर भी प्रकाश डालता है।


3. निबंध का सार एवं प्रमुख बिंदु

  1. बाजार का जादू और परचेजिंग पावर:

    • लेखक बताता है कि बाजार में एक अदृश्य जादू होता है, जो आँखों के रास्ते मन में प्रवेश करता है। यह जादू तभी चलता है जब जेब भरी हो और मन खाली हो।
    • मनुष्य अपनी 'परचेजिंग पावर' (क्रय शक्ति) का प्रदर्शन करने के लिए अनावश्यक वस्तुएँ खरीदता है, जिससे बाजार को बढ़ावा मिलता है।
    • यह जादू व्यक्ति को अपनी आवश्यकताएँ भूलकर, केवल आकर्षण में फँसकर वस्तुएँ खरीदने पर मजबूर करता है।
  2. मन खाली होना और मन भरा होना:

    • मन खाली होना: जब व्यक्ति का मन खाली होता है, उसे पता नहीं होता कि उसे क्या चाहिए, तब बाजार का जादू उस पर पूरी तरह हावी हो जाता है। वह अनावश्यक चीजें खरीद लेता है और बाद में पछताता है।
    • मन भरा होना: जब व्यक्ति का मन भरा होता है, उसे अपनी आवश्यकताओं का स्पष्ट ज्ञान होता है, तब बाजार का जादू उस पर कोई असर नहीं डाल पाता। वह केवल वही वस्तु खरीदता है जिसकी उसे आवश्यकता होती है।
  3. बाजार का मूक निमंत्रण:

    • बाजार हमें चुपचाप आमंत्रित करता है कि "आओ, मुझे देखो, मेरे पास सब कुछ है।" यह निमंत्रण ग्राहक को अपनी ओर खींचता है।
    • यह निमंत्रण ग्राहक को यह एहसास कराता है कि उसकी कमी केवल बाजार में ही पूरी हो सकती है।
  4. बाजारूपन:

    • लेखक 'बाजारूपन' शब्द का प्रयोग करता है, जिसका अर्थ है बाजार का वह विकृत रूप जब दुकानदार ग्राहक को लूटने और केवल अपना लाभ देखने लगता है।
    • बाजारूपन तब बढ़ता है जब ग्राहक और विक्रेता के बीच केवल 'क्रय-विक्रय' का संबंध रह जाता है, मानवीय संबंध समाप्त हो जाते हैं।
    • इससे बाजार में कपट, बेईमानी और शोषण बढ़ता है।
  5. भगत जी का उदाहरण (संतोष और आत्म-नियंत्रण):

    • लेखक एक चूर्ण बेचने वाले भगत जी का उदाहरण देता है, जो बाजार की चकाचौंध से अप्रभावित रहते हैं।
    • वे केवल उतना ही चूर्ण बेचते हैं जिससे उनकी दैनिक आवश्यकताएँ पूरी हो जाएँ। छह आने पूरे होते ही वे बाकी चूर्ण बच्चों को मुफ्त बाँट देते हैं।
    • बाजार की फैंसी चीजों और बड़े-बड़े स्टोर्स से उनका मन विचलित नहीं होता। वे केवल जीरा और नमक खरीदने के लिए बाजार जाते हैं और सीधे पंसारी की दुकान पर जाकर अपनी जरूरत का सामान लेते हैं।
    • भगत जी का उदाहरण यह दर्शाता है कि जिस व्यक्ति का मन नियंत्रित और संतोषी होता है, उस पर बाजार का जादू नहीं चलता। वे बाजार को अपनी आवश्यकतानुसार उपयोग करते हैं, न कि बाजार द्वारा उपयोग किए जाते हैं।
  6. पैसे की व्यंग्य शक्ति:

    • लेखक बताता है कि पैसे में एक व्यंग्य शक्ति होती है। जब हम कोई महंगी वस्तु नहीं खरीद पाते, तो पैसा हमें यह एहसास कराता है कि हम गरीब हैं, हमारी हैसियत नहीं है।
    • यह व्यंग्य हमें हीन भावना से भर देता है और हमें अपनी 'परचेजिंग पावर' बढ़ाने के लिए उकसाता है।
  7. अर्थशास्त्र और नीतिशास्त्र का संबंध:

    • लेखक के अनुसार, जो अर्थशास्त्र बाजार को केवल लाभ कमाने का साधन मानता है और मनुष्य की आवश्यकताओं को उत्तेजित करता है, वह अनीतिपूर्ण है।
    • सच्चा अर्थशास्त्र वह है जो मनुष्य को संतुष्ट करे, उसकी आवश्यकताओं को पूरा करे और उसे अनावश्यक तृष्णा से बचाए।
    • बाजार की सार्थकता तभी है जब वह ग्राहक की आवश्यकताओं को पूरा करे, न कि उसे अपनी ओर खींचकर फिजूलखर्ची करवाए।
  8. अंतिम संदेश:

    • लेखक हमें सिखाता है कि हमें अपनी आवश्यकताओं को पहचानना चाहिए और मन पर नियंत्रण रखना चाहिए।
    • बाजार का सदुपयोग करना चाहिए, दुरुपयोग नहीं।
    • संग्रहवृत्ति और अनावश्यक खरीद से बचना चाहिए।
    • जो व्यक्ति बाजार के जादू से बचकर अपनी आवश्यकताओं को पूरा करता है, वही सच्चा उपभोक्ता है।

4. महत्वपूर्ण उद्धरण एवं शब्दावली

  • "बाजार का जादू है।"
  • "जेब भरी हो और मन खाली हो।"
  • "परचेजिंग पावर।"
  • "बाजार का मूक निमंत्रण।"
  • "बाजारूपन।"
  • "मन खाली नहीं रहना चाहिए।"
  • "जो जरूरत को ठीक-ठीक जानता है, वह बाजार में एक-एक चीज को देखता है, पर उसकी आँखें खुली की खुली रह जाती हैं।"
  • "पैसे की व्यंग्य शक्ति।"
  • "भगत जी का संतोष।"
  • "अनीतिशास्त्र।"

5. सरकारी परीक्षा हेतु विशेष ध्यान देने योग्य बिंदु

  • लेखक का पूरा नाम, जन्म-मृत्यु, प्रमुख रचनाएँ (उपन्यास, कहानी, निबंध)।
  • 'बाजार दर्शन' की विधा (निबंध)।
  • निबंध का केंद्रीय भाव (उपभोक्तावाद, बाजार का जादू, संतोष)।
  • 'परचेजिंग पावर', 'बाजारूपन', 'मन खाली/भरा होना' जैसे प्रमुख शब्दों का अर्थ।
  • भगत जी के चरित्र की विशेषताएँ और उनका महत्व।
  • लेखक की भाषा शैली और गांधीवादी दर्शन का प्रभाव।
  • अर्थशास्त्र और नीतिशास्त्र पर लेखक के विचार।

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

1. 'बाजार दर्शन' निबंध के लेखक कौन हैं?
(अ) प्रेमचंद
(ब) जैनेंद्र कुमार
(स) हजारी प्रसाद द्विवेदी
(द) धर्मवीर भारती

2. 'बाजार दर्शन' किस विधा की रचना है?
(अ) कहानी
(ब) उपन्यास
(स) निबंध
(द) नाटक

3. लेखक के अनुसार, बाजार का जादू कब चलता है?
(अ) जब जेब खाली हो और मन भरा हो
(ब) जब जेब भरी हो और मन खाली हो
(स) जब जेब भरी हो और मन भरा हो
(द) जब जेब खाली हो और मन खाली हो

4. 'परचेजिंग पावर' का अर्थ क्या है?
(अ) खरीदने की इच्छा
(ब) खरीदने की शक्ति
(स) खरीदने का अनुभव
(द) खरीदने का शौक

5. बाजार का निमंत्रण कैसा होता है?
(अ) मुखर
(ब) मूक
(स) आकर्षक
(द) डरावना

6. निबंध में किस चूर्ण बेचने वाले व्यक्ति का उदाहरण दिया गया है?
(अ) रामू काका
(ब) भगत जी
(स) श्यामलाल
(द) दीनू

7. भगत जी बाजार से क्या खरीदने जाते थे?
(अ) फैंसी सामान
(ब) जीरा और नमक
(स) जूते और कपड़े
(द) मिठाई

8. लेखक के अनुसार, बाजार की सार्थकता किसमें है?
(अ) ग्राहकों को अनावश्यक वस्तुएँ खरीदने के लिए उकसाने में
(ब) ग्राहकों की आवश्यकताओं की पूर्ति करने में
(स) दुकानदारों का मुनाफा बढ़ाने में
(द) परचेजिंग पावर का प्रदर्शन करने में

9. 'बाजारूपन' से लेखक का क्या आशय है?
(अ) बाजार की सुंदरता
(ब) बाजार में कपट और शोषण
(स) बाजार का आकर्षण
(द) बाजार की विविधता

10. जैनेंद्र कुमार को किस प्रकार के उपन्यास का जनक माना जाता है?
(अ) ऐतिहासिक
(ब) आंचलिक
(स) मनोवैज्ञानिक
(द) सामाजिक


उत्तरमाला:

  1. (ब)
  2. (स)
  3. (ब)
  4. (ब)
  5. (ब)
  6. (ब)
  7. (ब)
  8. (ब)
  9. (ब)
  10. (स)

मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपको 'बाजार दर्शन' अध्याय की गहन समझ प्रदान करेंगे और आपकी सरकारी परीक्षा की तैयारी में सहायक सिद्ध होंगे। अपनी पढ़ाई जारी रखें और किसी भी संदेह के लिए पूछने में संकोच न करें।

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