Class 12 Hindi Notes Chapter 8 (Chapter 8) – Aroh Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम आपकी 'आरोह' पुस्तक के अत्यंत महत्वपूर्ण और विचारोत्तेजक अध्याय 'बाजार दर्शन' पर विस्तार से चर्चा करेंगे। यह अध्याय जैनेंद्र कुमार द्वारा रचित एक गहरा निबंध है जो बाजार के आकर्षण, उपभोक्तावाद और मनुष्य की क्रय शक्ति के मनोविज्ञान पर प्रकाश डालता है। सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए इसके हर पहलू को समझना आवश्यक है।
अध्याय 8: बाजार दर्शन
लेखक: जैनेंद्र कुमार
1. लेखक परिचय: जैनेंद्र कुमार (1905-1988)
- मूल नाम: आनंदीलाल।
- जन्म: 1905, अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश)।
- शिक्षा: प्रारंभिक शिक्षा गुरुकुल में, उच्च शिक्षा काशी हिंदू विश्वविद्यालय में।
- प्रमुख रचनाएँ:
- उपन्यास: परख, सुनीता, त्यागपत्र, कल्याणी, जयवर्धन, मुक्तिबोध।
- कहानी संग्रह: वातायन, एक रात, दो चिड़ियाँ, पाजेब, नीलम देश की राजकन्या।
- निबंध संग्रह: प्रस्तुत प्रश्न, जड़ की बात, पूर्वोदय, साहित्य का श्रेय और प्रेय, सोच-विचार, काम, प्रेम और परिवार।
- साहित्यिक विशेषताएँ:
- मनोविश्लेषणात्मक शैली के लिए प्रसिद्ध।
- प्रेमचंदोत्तर युग के महत्वपूर्ण कथाकार।
- दर्शन, मनोविज्ञान और आध्यात्मिकता का गहरा प्रभाव।
- सरल भाषा में गंभीर विषयों की प्रस्तुति।
- पुरस्कार: साहित्य अकादमी पुरस्कार, भारत-भारती सम्मान, पद्म भूषण।
2. पाठ का सार एवं मुख्य बिंदु (विस्तृत नोट्स)
'बाजार दर्शन' जैनेंद्र कुमार का एक ललित निबंध है, जिसमें उन्होंने बाजार के जादू, उपभोक्तावाद और मनुष्य के मन पर उसके प्रभाव का गहरा विश्लेषण किया है। लेखक ने अपने अनुभवों और मित्रों के उदाहरणों के माध्यम से बाजार के आकर्षण, उसकी सार्थकता और निरर्थकता को समझाया है।
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बाजार का जादू:
- लेखक बताते हैं कि बाजार का एक जादू होता है, जो आँखों के रास्ते काम करता है। यह जादू तभी चलता है जब जेब भरी हो और मन खाली हो।
- मन खाली होने का अर्थ है कि व्यक्ति को अपनी आवश्यकताओं का स्पष्ट ज्ञान न हो। ऐसे में बाजार की चकाचौंध उसे आकर्षित करती है और वह अनावश्यक वस्तुएँ खरीद लेता है।
- यह जादू वैसे ही काम करता है जैसे रूप का जादू। जब उतरता है तो पता चलता है कि खरीदी गई वस्तुएँ आराम देने के बजाय उलटे बोझ बन गई हैं।
- यह जादू ग्राहक को अपनी ओर खींचता है और उसे फिजूलखर्ची करने पर मजबूर करता है।
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मित्रों के उदाहरण:
- पहला मित्र: बाजार गया तो था मामूली चीज़ लेने, लेकिन लौटते समय उसके साथ ढेर सारा अनावश्यक सामान था। उसने बताया कि यह सब 'अपनी परचेजिंग पावर' (क्रय शक्ति) के कारण आया। लेखक इस पर टिप्पणी करते हैं कि परचेजिंग पावर का प्रदर्शन करने के लिए लोग अनावश्यक वस्तुएँ खरीदते हैं, जो अंततः उन्हें कष्ट देती हैं। यह मन की कमजोरी का प्रतीक है।
- दूसरा मित्र: बाजार गया, लेकिन खाली हाथ लौट आया। उसने बताया कि बाजार में सब कुछ इतना अच्छा था कि वह कुछ भी नहीं खरीद पाया, क्योंकि एक चीज खरीदने का मतलब था दूसरी को छोड़ना। वह अपनी आवश्यकता को लेकर स्पष्ट नहीं था, इसलिए कुछ भी नहीं खरीद सका। लेखक कहते हैं कि इसका अर्थ है कि उसका मन खाली था, उसे पता नहीं था कि उसे क्या चाहिए।
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मन खाली न होने का महत्व:
- लेखक का मानना है कि यदि मन भरा हुआ हो (अर्थात व्यक्ति को अपनी आवश्यकताओं का स्पष्ट ज्ञान हो), तो बाजार का जादू उस पर नहीं चलता।
- मन भरा होने पर व्यक्ति केवल वही वस्तुएँ खरीदता है जिनकी उसे वास्तव में आवश्यकता होती है। वह बाजार की चकाचौंध से प्रभावित नहीं होता।
- मन बंद होना (जिद्दी होना) भी ठीक नहीं है, क्योंकि इससे व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं को भी अनदेखा कर सकता है। मन को खुला रखना चाहिए, लेकिन उसे अपनी दिशा का ज्ञान होना चाहिए।
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बाजारूपन:
- लेखक 'बाजारूपन' की अवधारणा प्रस्तुत करते हैं। बाजार की सार्थकता तभी है जब वह आवश्यकता की पूर्ति करे।
- जब बाजार में लोग अपनी परचेजिंग पावर का प्रदर्शन करने लगते हैं, अनावश्यक वस्तुएँ खरीदते हैं, और एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हैं, तो बाजार में 'बाजारूपन' आ जाता है।
- बाजारूपन से बाजार की वास्तविक सार्थकता नष्ट हो जाती है। ऐसे बाजार में ग्राहक और विक्रेता दोनों का शोषण होता है। ग्राहक अपनी अनावश्यक खरीदारी से, और विक्रेता केवल लाभ कमाने की होड़ में नैतिक मूल्यों को खोकर।
- बाजारूपन भाईचारे को समाप्त कर देता है और लोगों को एक-दूसरे का ग्राहक मानकर व्यवहार करने को मजबूर करता है।
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भगत जी का उदाहरण (आदर्श उपभोक्ता):
- लेखक ने भगत जी का उदाहरण देकर एक आदर्श उपभोक्ता का चित्र प्रस्तुत किया है। भगत जी एक चूरन बेचने वाले व्यक्ति थे, जो संतोषी और सरल स्वभाव के थे।
- वे प्रतिदिन अपनी निश्चित मात्रा में चूरन बेचते थे और जैसे ही उनका चूरन खत्म होता या उनकी दैनिक कमाई पूरी हो जाती, वे बाकी चूरन बच्चों में मुफ्त बाँट देते थे।
- बाजार की चकाचौंध उन्हें कभी प्रभावित नहीं करती थी। वे सीधे पंसारी की दुकान पर जाते, अपनी जरूरत का जीरा और नमक खरीदते और वापस आ जाते। बाजार की अन्य कोई वस्तु उनके लिए अस्तित्व में ही नहीं थी।
- भगत जी का मन भरा हुआ था। उन्हें पता था कि उन्हें क्या चाहिए और कितना चाहिए। उनकी इच्छाएँ नियंत्रित थीं।
- वे बाजार में अपनी आँखें खुली रखते थे, लेकिन उनका मन बंद नहीं था। वे जानते थे कि उन्हें क्या लेना है और क्या नहीं।
- भगत जी का उदाहरण बताता है कि कैसे मन पर नियंत्रण रखकर बाजार के जादू से बचा जा सकता है और बाजार का सदुपयोग किया जा सकता है।
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बाजार की सार्थकता:
- लेखक के अनुसार, बाजार की सार्थकता तभी है जब वह व्यक्ति की वास्तविक आवश्यकताओं की पूर्ति करे।
- जो व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं को जानता है, वही बाजार को सार्थकता प्रदान करता है।
- यदि हम अपनी आवश्यकताओं को जाने बिना बाजार जाते हैं, तो हम बाजार के गुलाम बन जाते हैं और बाजार हमें निरर्थक बना देता है।
- बाजार को सच्चा लाभ तभी मिलता है जब ग्राहक अपनी आवश्यकतानुसार खरीदारी करे, न कि अपनी क्रय शक्ति के प्रदर्शन के लिए।
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निष्कर्ष:
- यह निबंध उपभोक्तावादी संस्कृति पर एक गहरा प्रहार है।
- यह हमें सिखाता है कि हमें अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए और अपनी वास्तविक आवश्यकताओं को समझना चाहिए।
- मनुष्य को बाजार का गुलाम नहीं, बल्कि उसका उपयोग करने वाला बनना चाहिए।
- सच्चा सुख भौतिक वस्तुओं के संग्रह में नहीं, बल्कि मन के संतोष और संयम में है।
3. मुख्य शब्द एवं अवधारणाएँ:
- बाजार का जादू: बाजार की वह आकर्षण शक्ति जो अनावश्यक खरीदारी के लिए प्रेरित करती है।
- परचेजिंग पावर (क्रय शक्ति): खरीदने की क्षमता, जिसका प्रदर्शन लोग अनावश्यक वस्तुओं को खरीदकर करते हैं।
- मन खाली होना: अपनी आवश्यकताओं का स्पष्ट ज्ञान न होना, जिससे व्यक्ति बाजार से प्रभावित होता है।
- मन भरा होना: अपनी आवश्यकताओं का स्पष्ट ज्ञान होना, जिससे व्यक्ति बाजार के जादू से अप्रभावित रहता है।
- बाजारूपन: बाजार का वह रूप जब वह केवल दिखावे और अनावश्यक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन जाता है, अपनी मूल सार्थकता खो देता है।
- संयम: अपनी इच्छाओं और इंद्रियों पर नियंत्रण।
- आवश्यकता: वास्तविक जरूरतें।
- इच्छा: अनावश्यक चाहतें या कामनाएँ।
- भगत जी: पाठ में प्रस्तुत आदर्श उपभोक्ता का प्रतीक।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
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'बाजार दर्शन' पाठ के लेखक कौन हैं?
a) प्रेमचंद
b) महादेवी वर्मा
c) जैनेंद्र कुमार
d) हजारी प्रसाद द्विवेदी -
लेखक के अनुसार बाजार का जादू कब चलता है?
a) जब जेब खाली हो और मन भरा हो
b) जब जेब भरी हो और मन खाली हो
c) जब जेब और मन दोनों भरे हों
d) जब जेब और मन दोनों खाली हों -
'परचेजिंग पावर' का अर्थ क्या है?
a) खरीदने की इच्छा
b) खरीदने की क्षमता
c) बेचने की क्षमता
d) बेचने की इच्छा -
लेखक ने बाजार के जादू की तुलना किससे की है?
a) रूप के जादू से
b) धन के जादू से
c) शक्ति के जादू से
d) वाणी के जादू से -
लेखक के पहले मित्र ने बाजार से अनावश्यक वस्तुएँ क्यों खरीदीं?
a) क्योंकि उसे उनकी आवश्यकता थी
b) क्योंकि वह अपनी परचेजिंग पावर का प्रदर्शन करना चाहता था
c) क्योंकि दुकानदार ने उसे मजबूर किया
d) क्योंकि वह खाली हाथ नहीं लौटना चाहता था -
भगत जी बाजार से क्या खरीदते थे?
a) केवल चूरन
b) अपनी जरूरत का जीरा और नमक
c) कपड़े और जूते
d) मिठाई और फल -
भगत जी का चूरन बेचने का सिद्धांत क्या था?
a) वे अधिक से अधिक लाभ कमाना चाहते थे
b) वे केवल निश्चित मात्रा में चूरन बेचते थे और बाकी बच्चों में बाँट देते थे
c) वे केवल अमीर लोगों को चूरन बेचते थे
d) वे कभी चूरन नहीं बेचते थे -
लेखक के अनुसार, बाजार को सार्थकता कौन प्रदान करता है?
a) जो अपनी परचेजिंग पावर का प्रदर्शन करता है
b) जो अपनी आवश्यकताओं को जानता है
c) जो बाजार की चकाचौंध में खो जाता है
d) जो बाजार से कुछ भी नहीं खरीदता -
'बाजारूपन' से क्या आशय है?
a) बाजार का सुंदर दिखना
b) बाजार में अनावश्यक प्रतिस्पर्धा और दिखावा
c) बाजार में वस्तुओं की कमी
d) बाजार का सस्ता होना -
जैनेंद्र कुमार किस प्रकार के कथाकार के रूप में प्रसिद्ध हैं?
a) यथार्थवादी
b) आदर्शवादी
c) मनोविश्लेषणात्मक
d) प्रगतिवादी
उत्तरमाला:
- c) जैनेंद्र कुमार
- b) जब जेब भरी हो और मन खाली हो
- b) खरीदने की क्षमता
- a) रूप के जादू से
- b) क्योंकि वह अपनी परचेजिंग पावर का प्रदर्शन करना चाहता था
- b) अपनी जरूरत का जीरा और नमक
- b) वे केवल निश्चित मात्रा में चूरन बेचते थे और बाकी बच्चों में बाँट देते थे
- b) जो अपनी आवश्यकताओं को जानता है
- b) बाजार में अनावश्यक प्रतिस्पर्धा और दिखावा
- c) मनोविश्लेषणात्मक
मुझे आशा है कि यह विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपको 'बाजार दर्शन' अध्याय को गहराई से समझने और आपकी परीक्षा की तैयारी में सहायक होंगे। किसी भी अन्य प्रश्न या स्पष्टीकरण के लिए आप पूछ सकते हैं।