Class 12 Hindi Notes Kavita 1 (जयशंकर प्रसाद: देवसेना का गीत; कार्नेलिया का गीत) – Antra Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित दो अत्यंत महत्वपूर्ण कविताओं 'देवसेना का गीत' और 'कार्नेलिया का गीत' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। ये कविताएँ न केवल आपकी पाठ्यपुस्तक का हिस्सा हैं, बल्कि विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। हम इनके संदर्भ, भावार्थ, काव्य सौंदर्य और विशिष्ट बिंदुओं पर गहराई से चर्चा करेंगे।
जयशंकर प्रसाद: कवि परिचय
- जन्म: 1889 ई. (काशी, उत्तर प्रदेश)
- निधन: 1937 ई.
- प्रमुख कवि: छायावादी युग के चार स्तंभों में से एक (अन्य: सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा)।
- प्रमुख काव्य कृतियाँ: कामायनी (महाकाव्य), आँसू, लहर, झरना, कानन कुसुम।
- प्रमुख नाटक: स्कंदगुप्त, चंद्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, अजातशत्रु, जन्मेजय का नागयज्ञ।
- प्रमुख उपन्यास: कंकाल, तितली, इरावती (अधूरा)।
- प्रमुख कहानियाँ: आकाशदीप, आँधी, इंद्रजाल, प्रतिध्वनि।
- काव्यगत विशेषताएँ:
- इतिहास और कल्पना का अद्भुत समन्वय।
- प्रेम, सौंदर्य, वेदना, दर्शन और राष्ट्रीय चेतना का चित्रण।
- प्रकृति का मानवीकरण।
- लाक्षणिकता और चित्रात्मकता।
- संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली का प्रयोग।
1. देवसेना का गीत
यह गीत प्रसाद के प्रसिद्ध नाटक 'स्कंदगुप्त' से लिया गया है।
क. संदर्भ एवं पृष्ठभूमि:
- नाटक: 'स्कंदगुप्त' (ऐतिहासिक नाटक)।
- पात्र: देवसेना, मालवा के राजा बंधुवर्मा की बहन है। वह स्कंदगुप्त से प्रेम करती है, किंतु स्कंदगुप्त विजया से प्रेम करता है। बाद में स्कंदगुप्त को अपनी भूल का अहसास होता है और वह देवसेना से विवाह का प्रस्ताव रखता है, लेकिन तब तक देवसेना जीवन के कटु अनुभवों से टूट चुकी होती है और वह स्कंदगुप्त के प्रस्ताव को अस्वीकार कर देती है।
- गीत का प्रसंग: यह गीत देवसेना द्वारा जीवन के अंतिम पड़ाव पर गाया गया है, जब वह स्कंदगुप्त के प्रेम-प्रस्ताव को अस्वीकार कर चुकी है और आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लेकर भिक्षावृत्ति करती हुई पर्णदत्त के आश्रम में रहती है। वह अपने जीवन की असफलताओं, प्रेम की वेदना और संघर्षों को याद कर रही है।
ख. मूल भाव/विषय-वस्तु:
- प्रेम की विफलता: स्कंदगुप्त के प्रति देवसेना के एकतरफा प्रेम की विफलता और उसके त्याग की मार्मिक अभिव्यक्ति।
- जीवन की वेदना और निराशा: जीवन भर संघर्ष करने के बाद भी सुख न मिलने की गहरी पीड़ा।
- आत्म-सम्मान और आत्म-त्याग: स्कंदगुप्त के प्रस्ताव को ठुकराकर अपने आत्म-सम्मान की रक्षा करना और जीवन को लोक-कल्याण में समर्पित करना।
- स्मृतियों का बोझ: अतीत की मधुर और कटु स्मृतियों का बोझ, जो वर्तमान को और भी दुखद बना देता है।
- नियतिवाद: जीवन में सब कुछ नियति के अधीन मानकर स्वीकार कर लेना।
ग. व्याख्या (संक्षेप में महत्वपूर्ण पंक्तियों के आधार पर):
- "आह वेदना मिली विदाई! मैंने भ्रमवश जीवन संचित, मधुकरियों की भीख लुटाई।"
- देवसेना कहती है कि जीवन के अंतिम पड़ाव पर उसे केवल वेदना और दुख ही विदाई के रूप में मिले हैं। उसने भ्रमवश (स्कंदगुप्त के प्रेम की आशा में) अपने जीवन भर की कमाई हुई मधुर स्मृतियों (मधुकरियों) को भी लुटा दिया है, अर्थात उसका प्रेम निष्फल रहा।
- "छलछल था संध्या के श्रमकण, आँसू-से गिरते थे प्रतिपल।"
- जीवन की संध्या (बुढ़ापे) में उसके परिश्रम के कण आँसुओं की तरह लगातार गिर रहे थे, अर्थात जीवन भर के संघर्ष का परिणाम केवल आँसू ही हैं।
- "मेरी यात्रा पर लेती थी नीरवता अनंत अरण्य रोदन।"
- उसके जीवन की यात्रा पर अनंत जंगल का मौन रोदन छाया हुआ था, अर्थात उसका एकाकी जीवन भीतर ही भीतर वेदना से भरा था।
- "श्रमित स्वप्न की मधुमाया में, गहन विपिन की तरु-छाया में पथिक उनींदी श्रुति में किसने, यह विहाग की तान उठाई?"
- थके हुए सपनों की मधुर कल्पना में, घने जंगल की वृक्ष-छाया में, किसी थके हुए पथिक (स्वयं देवसेना) की नींद में डूबी श्रवण शक्ति में किसने यह विहाग (रात्रि के अंतिम प्रहर का दुखद राग) की तान छेड़ दी? अर्थात अतीत की स्मृतियाँ उसे और भी विचलित कर रही हैं।
- "लौटा लो, लौटा लो मेरी अपनी थाती।"
- देवसेना स्कंदगुप्त से कहती है कि वह अपने प्रेम की थाती (धरोहर) वापस ले ले, क्योंकि वह अब इस प्रेम के बोझ को ढोने में असमर्थ है। वह हार चुकी है और अपने जीवन को लोक-कल्याण में समर्पित करना चाहती है।
घ. काव्य सौंदर्य:
- भाषा: संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली, जिसमें प्रसाद की लाक्षणिकता और चित्रात्मकता स्पष्ट दिखती है।
- रस: करुण रस की प्रधानता।
- अलंकार:
- रूपक: 'जीवन संचित मधुकरियाँ', 'श्रमित स्वप्न की मधुमाया', 'अनंत अरण्य रोदन', 'जीवन-रथ'।
- मानवीकरण: 'संध्या के श्रमकण आँसू-से गिरते थे', 'नीरवता अनंत अरण्य रोदन लेती थी'।
- उपमा: 'आँसू-से गिरते थे'।
- अनुप्रास: 'गहन विपिन', 'पथिक उनींदी', 'श्रुति में किसने'।
- छंद: मुक्त छंद, जिसमें गेयता और संगीतात्मकता है।
- शैली: भावात्मक, गीतात्मक और प्रतीकात्मक।
ङ. विशेष बिंदु:
- यह गीत देवसेना के त्याग, बलिदान और आत्म-सम्मान का प्रतीक है।
- इसमें प्रसाद ने नारी हृदय की वेदना और संघर्ष को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है।
- 'थाती' शब्द का प्रयोग प्रेम की धरोहर के लिए किया गया है, जिसे देवसेना अब वापस लौटाना चाहती है।
2. कार्नेलिया का गीत
यह गीत प्रसाद के प्रसिद्ध नाटक 'चंद्रगुप्त' से लिया गया है।
क. संदर्भ एवं पृष्ठभूमि:
- नाटक: 'चंद्रगुप्त' (ऐतिहासिक नाटक)।
- पात्र: कार्नेलिया, सिकंदर के सेनापति सेल्यूकस की पुत्री है। वह भारत आती है और बाद में चंद्रगुप्त मौर्य से विवाह करती है।
- गीत का प्रसंग: कार्नेलिया सिंधु नदी के किनारे बैठकर भारत की प्राकृतिक सुंदरता, शांति और सांस्कृतिक गरिमा को देखकर अत्यंत प्रभावित होती है। वह भारत को अपना देश मानकर इस गीत को गाती है, जिसमें उसकी भारत-प्रेम की भावना व्यक्त हुई है।
ख. मूल भाव/विषय-वस्तु:
- भारत-प्रेम और राष्ट्रीय चेतना: एक विदेशी पात्र के माध्यम से भारत की महिमा, सौंदर्य और सांस्कृतिक गरिमा का बखान।
- भारत की प्राकृतिक सुंदरता: यहाँ के सूर्योदय, हरियाली, पक्षियों, नदियों और शीतल हवा का मनोहारी चित्रण।
- भारत की सांस्कृतिक श्रेष्ठता: भारत की अतिथि-सत्कार की परंपरा, करुणा और शांतिप्रियता का गुणगान।
- शरण स्थली भारत: भारत को एक ऐसे देश के रूप में चित्रित करना जहाँ अनजान और थके हुए लोगों को भी सहारा मिलता है।
- स्वर्णिम भारत की कल्पना: भारत को एक समृद्ध, शांतिपूर्ण और आध्यात्मिक देश के रूप में प्रस्तुत करना।
ग. व्याख्या (संक्षेप में महत्वपूर्ण पंक्तियों के आधार पर):
- "अरुण यह मधुमय देश हमारा! जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।"
- कार्नेलिया कहती है कि यह भारत देश लालिमा से युक्त और प्रेममय है। यह ऐसा देश है जहाँ आकर अनजान और थके हुए लोगों को भी सहारा मिलता है, अर्थात भारत अतिथि-सत्कार के लिए प्रसिद्ध है।
- "सरस तामरस गर्भ विभा पर, नाच रही तरुशिखा मनोहर। छिटका जीवन हरियाली पर, मंगल कुंकुम सारा।"
- यहाँ सूर्य की लालिमा कमल के गर्भ जैसी सुंदर आभा बिखेरती है, और वृक्षों की मनोहर चोटियाँ उस पर नृत्य करती प्रतीत होती हैं। जीवन की हरियाली पर मंगलमय कुंकुम (शुभता का प्रतीक) बिखरा हुआ है, अर्थात भारत में चारों ओर सुख-समृद्धि और शुभता व्याप्त है।
- "लघु सुरधनु से पंख पसारे, शीतल मलय समीर सहारे। उड़ते खग जिस ओर मुँह किए, समझ नीड़ निज प्यारा।"
- छोटे इंद्रधनुष जैसे पंख फैलाए हुए पक्षी शीतल और सुगंधित मलय पवन के सहारे उड़ते हुए उसी दिशा में जाते हैं, जिधर वे अपने प्यारे घोंसले को समझते हैं। यह भारत की शांति और पक्षियों के प्राकृतिक प्रेम को दर्शाता है।
- "बरसाती आँखों के बादल, बनते जहाँ भरे करुणा जल। लहरें टकराती अनंत की, पाकर जहाँ किनारा।"
- भारत में लोगों की आँखों से करुणा के आँसू बरसते हैं, अर्थात यहाँ के लोग दयालु और सहानुभूतिपूर्ण हैं। अनंत सागर की लहरें भी यहाँ आकर किनारा पाती हैं, अर्थात भारत में शांति और स्थिरता है।
- "हेम कुंभ ले उषा सवेरे, भरती ढुलकाती सुख मेरे। मंदिर ऊँघते रहते जब, जगकर रजनी भर तारा।"
- सुबह की उषा (भोर) सोने का घड़ा लेकर आती है और मेरे जीवन में सुख बिखेरती है। जब रात भर जागने के बाद तारे ऊँघने लगते हैं, तब भी मंदिर अपनी आध्यात्मिक शांति में लीन रहते हैं। यह भारत की आध्यात्मिक और प्राकृतिक सुंदरता का अद्भुत मेल है।
घ. काव्य सौंदर्य:
- भाषा: संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली, जिसमें चित्रात्मकता, लाक्षणिकता और गेयता का सुंदर समन्वय है।
- रस: शांत रस और देशप्रेम के कारण श्रृंगार रस की भी अनुभूति होती है।
- अलंकार:
- मानवीकरण: 'उषा सवेरे हेम कुंभ ले भरती ढुलकाती सुख मेरे', 'मंदिर ऊँघते रहते जब'।
- रूपक: 'मंगल कुंकुम', 'जीवन हरियाली'।
- उपमा: 'लघु सुरधनु से पंख', 'तामरस गर्भ विभा पर'।
- अनुप्रास: 'मधुमय देश', 'सरस तामरस', 'लघु सुरधनु से', 'मलय समीर'।
- छंद: मुक्त छंद, जिसमें संगीतात्मकता और प्रवाह है।
- शैली: भावात्मक, गीतात्मक और वर्णनात्मक।
ङ. विशेष बिंदु:
- यह गीत भारत की प्राकृतिक, सांस्कृतिक और मानवीय विशेषताओं का एक विदेशी पात्र की दृष्टि से किया गया गुणगान है।
- इसमें प्रसाद की राष्ट्रीय चेतना और भारत के गौरवशाली अतीत के प्रति उनका अनुराग स्पष्ट झलकता है।
- 'अरुण यह मधुमय देश हमारा' पंक्ति भारत के स्वर्णिम और प्रेममय स्वरूप को दर्शाती है।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
निर्देश: निम्नलिखित प्रश्नों के सही विकल्प का चयन कीजिए।
-
'देवसेना का गीत' जयशंकर प्रसाद के किस नाटक से लिया गया है?
क) चंद्रगुप्त
ख) स्कंदगुप्त
ग) ध्रुवस्वामिनी
घ) अजातशत्रु -
'देवसेना का गीत' में देवसेना ने अपने जीवन की किस भावना को व्यक्त किया है?
क) प्रेम की सफलता का उल्लास
ख) जीवन की वेदना और निराशा
ग) युद्ध में विजय का गर्व
घ) प्रकृति प्रेम -
'मैंने भ्रमवश जीवन संचित, मधुकरियों की भीख लुटाई' - इस पंक्ति में 'मधुकरियाँ' किसका प्रतीक हैं?
क) धन-संपत्ति
ख) मधुर स्मृतियाँ और आशाएँ
ग) फूलों का रस
घ) मीठे वचन -
'कार्नेलिया का गीत' जयशंकर प्रसाद के किस नाटक का अंश है?
क) स्कंदगुप्त
ख) ध्रुवस्वामिनी
ग) चंद्रगुप्त
घ) जन्मेजय का नागयज्ञ -
'अरुण यह मधुमय देश हमारा' पंक्ति में 'अरुण' शब्द किसका द्योतक है?
क) सूर्य की लालिमा
ख) भारत का गौरव
ग) प्रेम और सौंदर्य
घ) उपरोक्त सभी -
'जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा' - इस पंक्ति में भारत की किस विशेषता का वर्णन है?
क) प्राकृतिक सुंदरता
ख) अतिथि-सत्कार और शरण देने की प्रवृत्ति
ग) आर्थिक समृद्धि
घ) वीरता और पराक्रम -
'हेम कुंभ ले उषा सवेरे, भरती ढुलकाती सुख मेरे' - इस पंक्ति में कौन सा अलंकार है?
क) उपमा
ख) रूपक
ग) मानवीकरण
घ) अनुप्रास -
देवसेना स्कंदगुप्त से अपने प्रेम की 'थाती' लौटाने को क्यों कहती है?
क) वह स्कंदगुप्त से नाराज़ थी।
ख) वह प्रेम के बोझ को ढोने में असमर्थ थी और आत्म-त्याग का मार्ग चुन चुकी थी।
ग) उसे किसी और से प्रेम हो गया था।
घ) स्कंदगुप्त ने उसे धोखा दिया था। -
कार्नेलिया भारत की प्राकृतिक सुंदरता का वर्णन करते हुए किन-किन दृश्यों का उल्लेख करती है?
क) केवल नदियों और पहाड़ों का
ख) सूर्योदय, हरियाली, पक्षियों और शीतल हवा का
ग) केवल ऐतिहासिक इमारतों का
घ) शहरी जीवन का -
जयशंकर प्रसाद किस काव्य धारा के प्रमुख कवि माने जाते हैं?
क) प्रगतिवाद
ख) प्रयोगवाद
ग) छायावाद
घ) रहस्यवाद
उत्तरमाला:
- ख) स्कंदगुप्त
- ख) जीवन की वेदना और निराशा
- ख) मधुर स्मृतियाँ और आशाएँ
- ग) चंद्रगुप्त
- घ) उपरोक्त सभी
- ख) अतिथि-सत्कार और शरण देने की प्रवृत्ति
- ग) मानवीकरण
- ख) वह प्रेम के बोझ को ढोने में असमर्थ थी और आत्म-त्याग का मार्ग चुन चुकी थी।
- ख) सूर्योदय, हरियाली, पक्षियों और शीतल हवा का
- ग) छायावाद
आशा है, यह विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपकी परीक्षा की तैयारी में अत्यंत सहायक सिद्ध होंगे। इन कविताओं के मूल भाव और काव्य सौंदर्य को गहराई से समझने का प्रयास करें। शुभकामनाएँ!