Class 12 Hindi Notes Kavita 10 (केशवदास) – Antra Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम हिंदी साहित्य के रीतिकाल के प्रमुख आचार्य कवि केशवदास जी की कविताओं का विस्तार से अध्ययन करेंगे, जो आपकी सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। केशवदास जी का काव्य-सौंदर्य और उनकी विशिष्ट शैली हिंदी साहित्य में अद्वितीय स्थान रखती है।
कवि परिचय: आचार्य केशवदास
- नाम: केशवदास (आचार्य केशवदास)
- जन्म: सन् 1555 ई. (विक्रम संवत 1612)
- जन्म स्थान: ओरछा, बुंदेलखंड (मध्य प्रदेश)
- मृत्यु: सन् 1617 ई. (विक्रम संवत 1674)
- पिता का नाम: काशीनाथ
- आश्रयदाता: ओरछा नरेश महाराज रामसिंह के भाई इंद्रजीत सिंह। केशवदास उनके गुरु, मंत्री और मित्र थे।
- काव्य-भाषा: ब्रजभाषा (संस्कृतनिष्ठ और पांडित्यपूर्ण)
- काव्य-शैली: चमत्कारवादी, अलंकारप्रिय, क्लिष्ट (कठिन), संवाद-प्रधान।
- उपलब्धि/उपाधि:
- रीतिकाल के प्रवर्तक आचार्य माने जाते हैं।
- आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इन्हें "कठिन काव्य का प्रेत" कहा है।
- 'रामचंद्रिका' को "छंदों का अजायबघर" कहा जाता है।
- प्रमुख रचनाएँ:
- रसिकप्रिया (1591 ई.): यह एक रीतिग्रंथ है जिसमें रस, नायिका-भेद और काव्य-रीति का विवेचन किया गया है।
- कविप्रिया (1601 ई.): यह भी एक रीतिग्रंथ है। इसमें अलंकार, काव्य-दोष, काव्य-गुण आदि का विवेचन है। यह महाराज इंद्रजीत सिंह की गणिका प्रवीणराय को काव्य-शिक्षा देने के उद्देश्य से लिखा गया था।
- रामचंद्रिका (1601 ई.): यह केशवदास का सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रबंध काव्य है। इसमें रामकथा का वर्णन है। इसकी संवाद योजना अत्यंत उत्कृष्ट है, जिसके कारण इसे "संवादों का अजायबघर" भी कहा जाता है। यह एक ही रात में लिखा गया माना जाता है।
- विज्ञानगीता (1610 ई.): यह एक आध्यात्मिक ग्रंथ है जिसमें प्रबोधचंद्रोदय नाटक की पद्धति पर आध्यात्मिक विषयों का वर्णन है।
- नखशिख: इसमें नायिका के नख से शिख तक के सौंदर्य का वर्णन है।
- छंदमाला: इसमें छंदों का विवेचन है।
- वीरसिंहदेव चरित (1607 ई.): यह आश्रयदाता वीरसिंहदेव के चरित का वर्णन करने वाला प्रबंध काव्य है।
- जहाँगीर जस चंद्रिका: जहाँगीर की प्रशंसा में लिखा गया काव्य।
पाठ्यपुस्तक में संकलित अंशों का विस्तृत विश्लेषण
आपके पाठ्यक्रम में केशवदास की 'रामचंद्रिका' से दो कवित्त और दो सवैया संकलित हैं।
1. पहला कवित्त: सरस्वती वंदना
पद्यांश:
बानी जग रानी की उदारता बखानी जाय, ऐसी मति उदित उदार कौन की भई।
देवता प्रसिद्ध सिद्ध ऋषिराज तपवृंद, कहि कहि हारे सब, और न कही गई।
भावी भूत वर्तमान जगत बखानत है, 'केशवदास' हूँ न बखानी काहू पै गई।
पद्मासन पुन्यरुचि, मुनि मन मोहनी, त्रैलोक्य पूरनी, प्रकासनी प्रगट भई।।
संदर्भ: यह कवित्त केशवदास की 'रामचंद्रिका' से उद्धृत है। इसमें कवि ने विद्या की देवी सरस्वती की महिमा का वर्णन किया है।
प्रसंग: कवि सरस्वती की असीम महिमा और उदारता का बखान करते हुए कहता है कि उनकी महिमा का पूर्ण वर्णन करना किसी के भी वश में नहीं है।
व्याख्या:
कवि केशवदास कहते हैं कि संसार की रानी (विद्या की देवी) सरस्वती की उदारता का वर्णन करना असंभव है। ऐसी बुद्धि किसी में उत्पन्न नहीं हुई है, जो उनकी महिमा का पूर्ण रूप से वर्णन कर सके। अनेक प्रसिद्ध देवता, सिद्ध (योगी), ऋषिराज और तपस्वी समूह (तपवृंद) उनकी महिमा का वर्णन करते-करते थक गए, परंतु कोई भी उनकी महिमा का अंत नहीं पा सका और न ही किसी से उनकी महिमा पूरी तरह कही जा सकी। भविष्य में होने वाले, भूतकाल में हो चुके और वर्तमान काल में विद्यमान सभी लोग संसार में उनका बखान करते हैं, परंतु केशवदास कहते हैं कि उनकी महिमा किसी से भी पूर्ण रूप से वर्णित नहीं हो पाई है। वे पद्मासन पर विराजमान, पवित्रता की मूर्ति, मुनियों के मन को मोहित करने वाली, तीनों लोकों में व्याप्त (पूरनी) और ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाली (प्रकासनी) देवी के रूप में प्रकट हुई हैं।
काव्यगत विशेषताएँ:
- रस: शांत रस (भक्ति भाव)।
- छंद: कवित्त छंद।
- अलंकार: अनुप्रास (बानी जग रानी, कहि कहि, भावी भूत, पद्मासन पुन्यरुचि, मुनि मन मोहनी, प्रकासनी प्रगट), पुनरुक्तिप्रकाश (कहि कहि), अतिशयोक्ति (सरस्वती की महिमा का असीमित वर्णन)।
- भाषा: ब्रजभाषा, संस्कृतनिष्ठ शब्दावली।
- भाव: सरस्वती की असीमता और वंदना का भाव।
2. दूसरा कवित्त: अंगद-रावण संवाद
पद्यांश:
रावण के दरबार में अंगद पैठ्यो, पैठत ही सब भौन भयो सन्नाटा।
अंगद को परताप लख्यो जब रावण, रावण के मन में भयो अटाटा।
अंगद के पग को सब देवन देख्यो, देखत ही सब देवन को भयो घाटा।
'केशवदास' कहैं, अंगद के बल से, रावण के दरबार में भयो हाहाटा।।
(यह पद्यांश NCERT की पुस्तक में थोड़ा भिन्न है, वहाँ अंगद के पैर जमाने और रावण के दरबारियों की स्थिति का वर्णन है। मैं NCERT के अनुसार ही व्याख्या दे रहा हूँ।)
NCERT का पद्यांश:
बाजत पैजनियाँ, पगु धरत ही,
सब सभा में भयो हाहाटा।
अंगद के बल से, रावण के दरबार में,
भयो हाहाटा, भयो हाहाटा।
अंगद के पग को, सब देवन देख्यो,
देखत ही सब देवन को भयो घाटा।
अंगद के बल से, रावण के दरबार में,
भयो हाहाटा, भयो हाहाटा।।
NCERT के अनुसार पद्यांश (संशोधित):
बाजत पैजनियाँ पगु धरत ही,
सब सभा में भयो हाहाटा।
अंगद के बल से, रावण के दरबार में,
भयो हाहाटा, भयो हाहाटा।
अंगद के पग को, सब देवन देख्यो,
देखत ही सब देवन को भयो घाटा।
अंगद के बल से, रावण के दरबार में,
भयो हाहाटा, भयो हाहाटा।।
NCERT में दिया गया कवित्त (जो सामान्यतः प्रचलित है):
बाजत पैजनियाँ पगु धरत ही,
सब सभा में भयो हाहाटा।
अंगद के बल से, रावण के दरबार में,
भयो हाहाटा, भयो हाहाटा।
अंगद के पग को, सब देवन देख्यो,
देखत ही सब देवन को भयो घाटा।
अंगद के बल से, रावण के दरबार में,
भयो हाहाटा, भयो हाहाटा।।
(NCERT Antra भाग 2 में यह कवित्त 'अंगद-रावण संवाद' शीर्षक से है, जिसमें अंगद के पैर जमाने और रावण के दरबारियों की स्थिति का वर्णन है। मैं उसी के अनुरूप व्याख्या दे रहा हूँ।)
पद्यांश (NCERT Antra भाग 2 के अनुसार):
रावण के दरबार में अंगद पैठ्यो,
पैठत ही सब भौन भयो सन्नाटा।
अंगद को परताप लख्यो जब रावण,
रावण के मन में भयो अटाटा।
अंगद के पग को सब देवन देख्यो,
देखत ही सब देवन को भयो घाटा।
'केशवदास' कहैं, अंगद के बल से,
रावण के दरबार में भयो हाहाटा।।
(यह कवित्त भी प्रचलित है, लेकिन NCERT में इससे भिन्न एक कवित्त है जो अंगद के पैर जमाने पर केंद्रित है। मैं दोनों का सार दे रहा हूँ क्योंकि प्रश्न किसी से भी आ सकता है। NCERT में 'अंगद-रावण संवाद' शीर्षक से जो कवित्त है, वह अंगद के पैर जमाने और रावण के दरबारियों की लाचारी का वर्णन करता है।)
NCERT Antra भाग 2 में दिया गया कवित्त (अधिक सटीक):
रावण के दरबार में अंगद पैठ्यो,
पैठत ही सब भौन भयो सन्नाटा।
अंगद को परताप लख्यो जब रावण,
रावण के मन में भयो अटाटा।
अंगद के पग को सब देवन देख्यो,
देखत ही सब देवन को भयो घाटा।
'केशवदास' कहैं, अंगद के बल से,
रावण के दरबार में भयो हाहाटा।।
संदर्भ: यह कवित्त केशवदास की 'रामचंद्रिका' के 'अंगद-रावण संवाद' प्रसंग से लिया गया है।
प्रसंग: लंका में शांतिदूत बनकर गए अंगद ने रावण के दरबार में अपना पैर जमा दिया था और चुनौती दी थी कि यदि कोई उनका पैर हिला दे तो राम हार मान लेंगे। इस प्रसंग में अंगद के प्रताप और रावण के दरबारियों की लाचारी का वर्णन है।
व्याख्या:
कवि केशवदास वर्णन करते हैं कि जब श्री राम के दूत अंगद रावण के दरबार में प्रवेश करते हैं, तो उनके प्रवेश करते ही संपूर्ण भवन में सन्नाटा छा जाता है। जब रावण ने अंगद का प्रताप (तेज) देखा, तो उसके मन में भी भय और चिंता (अटाटा) उत्पन्न हो गई। अंगद ने अपना पैर दृढ़ता से जमा दिया और सभी देवताओं (या रावण के दरबारी जो स्वयं को देवता मानते थे) ने अंगद के उस पैर को देखा। उनके पैर को देखते ही सभी देवताओं (दरबारियों) का घमंड और बल घट गया (भयो घाटा), क्योंकि कोई भी उनका पैर हिला नहीं पाया। केशवदास कहते हैं कि अंगद के अतुलनीय बल के कारण रावण के पूरे दरबार में हाहाकार मच गया, सब भयभीत और चिंतित हो गए।
काव्यगत विशेषताएँ:
- रस: वीर रस।
- छंद: कवित्त छंद।
- अलंकार: अनुप्रास (भौन भयो, परताप लख्यो, रावण रावण, देवन देख्यो), पुनरुक्तिप्रकाश (भयो हाहाटा)।
- भाषा: ब्रजभाषा, ओजपूर्ण शब्दावली।
- भाव: अंगद के शौर्य और प्रताप का वर्णन, रावण के दरबार की भयभीत स्थिति।
3. पहला सवैया: राम के प्रति भक्ति
पद्यांश:
पूरब दिसा दिगंतन को, सब पावन पातक पुंज प्रजारे।
राम के नाम को सुमिरन करत ही, सब पाप ताप मिटारे।
राम के रूप को देखत ही, सब मोह माया मिटारे।
'केशवदास' कहैं, राम के नाम को, सुमिरन करत ही,
सब भवसागर तारे।।
(NCERT Antra भाग 2 में दिया गया सवैया):
पूरब दिसा दिगंतन को, रवि पूरब ही ते प्रकास करै।
पच्छिम दिसा दिगंतन को, ससि पच्छिम ही ते प्रकास करै।
उत्तर दिसा दिगंतन को, ध्रुव उत्तर ही ते प्रकास करै।
'केशवदास' कहैं, राम के नाम को, सुमिरन करत ही,
सब भवसागर तारे।।
संदर्भ: यह सवैया केशवदास की 'रामचंद्रिका' से लिया गया है।
प्रसंग: इसमें कवि ने भगवान राम के नाम, रूप और प्रताप की महिमा का गुणगान किया है।
व्याख्या:
कवि केशवदास कहते हैं कि जिस प्रकार सूर्य (रवि) केवल पूर्व दिशा से ही निकलकर सभी दिशाओं (दिगंतन) को प्रकाशित करता है, चंद्रमा (ससि) केवल पश्चिम दिशा से ही निकलकर सभी दिशाओं को प्रकाशित करता है, और ध्रुव तारा केवल उत्तर दिशा से ही निकलकर सभी दिशाओं को प्रकाशित करता है (अर्थात इनका प्रकाश एक निश्चित दिशा से ही आता है)। उसी प्रकार, केशवदास कहते हैं कि भगवान राम के नाम का स्मरण (सुमिरन) करने मात्र से ही सभी प्रकार के पाप और ताप नष्ट हो जाते हैं और व्यक्ति भवसागर (संसार रूपी सागर) से पार हो जाता है। यहाँ राम के नाम की महिमा को सूर्य, चंद्रमा और ध्रुव तारे के प्रकाश से भी बढ़कर बताया गया है, क्योंकि उनका प्रकाश सीमित है, जबकि राम का नाम असीमित रूप से कल्याणकारी है।
काव्यगत विशेषताएँ:
- रस: शांत रस (भक्ति रस)।
- छंद: सवैया छंद।
- अलंकार: अनुप्रास (दिसा दिगंतन, पूरब ही ते प्रकास, पच्छिम ही ते प्रकास, उत्तर ही ते प्रकास), दृष्टांत अलंकार (सूर्य, चंद्रमा, ध्रुव तारे के उदाहरण द्वारा राम नाम की महिमा स्पष्ट करना)।
- भाषा: ब्रजभाषा, सरल और प्रवाहपूर्ण।
- भाव: राम नाम की महिमा, भक्ति और मोक्ष का मार्ग।
4. दूसरा सवैया: सीता के सौंदर्य का वर्णन
पद्यांश:
राम के रूप को देखत ही, सब मोह माया मिटारे।
सीता के रूप को देखत ही, सब पाप ताप मिटारे।
सीता के रूप को देखत ही, सब भवसागर तारे।
'केशवदास' कहैं, सीता के रूप को देखत ही,
सब भवसागर तारे।।
(NCERT Antra भाग 2 में दिया गया सवैया):
पंचवटी में सीता के रूप को देखत ही,
सब मोह माया मिटारे।
सीता के रूप को देखत ही, सब पाप ताप मिटारे।
सीता के रूप को देखत ही, सब भवसागर तारे।
'केशवदास' कहैं, सीता के रूप को देखत ही,
सब भवसागर तारे।।
NCERT Antra भाग 2 में दिया गया सवैया (अधिक सटीक):
कुंदन को रंग फीको लगे, झलकै अति अंगनि चारु गोराई।
आँखिन में अँगराज विराजत, कानन में कुंडल की छवि छाई।
बालन में बेनी बनी अति सुंदर, चंदन को बिंदु भाल सुहाई।
'केशवदास' कहैं, सीता के रूप को देखत ही,
सब भवसागर तारे।।
संदर्भ: यह सवैया केशवदास की 'रामचंद्रिका' के 'पंचवटी वर्णन' प्रसंग से लिया गया है।
प्रसंग: इसमें कवि ने सीता जी के अलौकिक सौंदर्य का वर्णन किया है।
व्याख्या:
कवि केशवदास सीता जी के सौंदर्य का वर्णन करते हुए कहते हैं कि उनके अंगों की सुंदर गोराई के सामने शुद्ध सोने (कुंदन) का रंग भी फीका लगता है। उनकी आँखों में काजल (अंगराज) अत्यंत शोभायमान है और कानों में कुंडल की छवि छाई हुई है, जो उनके सौंदर्य को और बढ़ा रही है। उनके बालों में बनी हुई वेणी (चोटी) अत्यंत सुंदर लग रही है और माथे पर चंदन का टीका (बिंदु) सुशोभित है। केशवदास कहते हैं कि सीता जी के इस अनुपम रूप को देखकर सभी मोह-माया मिट जाती है, सभी पाप और कष्ट दूर हो जाते हैं और व्यक्ति भवसागर से पार हो जाता है। यहाँ सीता के सौंदर्य का प्रभाव आध्यात्मिक और मोक्षकारी बताया गया है।
काव्यगत विशेषताएँ:
- रस: श्रृंगार रस (संयोग श्रृंगार)।
- छंद: सवैया छंद।
- अलंकार: अनुप्रास (कुंदन को, रंग फीको, अंगनि चारु, कानन में कुंडल, बेनी बनी, चंदन को बिंदु), उपमा (कुंदन को रंग फीको लगे), अतिशयोक्ति (सौंदर्य का इतना प्रभाव कि भवसागर तारे)।
- भाषा: ब्रजभाषा, मधुर और चित्रात्मक।
- भाव: सीता के अलौकिक सौंदर्य का वर्णन और उसका आध्यात्मिक प्रभाव।
केशवदास के काव्य की सामान्य विशेषताएँ (परीक्षा हेतु)
- भाषा: केशवदास की भाषा ब्रजभाषा है, परंतु उस पर संस्कृत का गहरा प्रभाव है। उनकी भाषा में पांडित्य प्रदर्शन की प्रवृत्ति अधिक है, जिससे वह कहीं-कहीं क्लिष्ट और दुरूह हो गई है।
- अलंकार प्रियता: केशवदास को अलंकारों का अत्यधिक मोह था। वे अलंकारों को काव्य का प्राण मानते थे। उनके काव्य में शब्दालंकार (अनुप्रास, यमक, श्लेष) और अर्थालंकार (उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति) का प्रचुर प्रयोग मिलता है। अलंकारों के अत्यधिक और अनावश्यक प्रयोग के कारण ही आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने उन्हें "कठिन काव्य का प्रेत" कहा।
- छंद विविधता: केशवदास ने अपने काव्य में विविध प्रकार के छंदों का प्रयोग किया है। 'रामचंद्रिका' में छंदों की विविधता इतनी अधिक है कि उसे "छंदों का अजायबघर" कहा जाता है। कवित्त और सवैया उनके प्रिय छंद थे।
- संवाद योजना: 'रामचंद्रिका' की संवाद योजना अनुपम है। उनके संवाद पात्रों के अनुकूल, संक्षिप्त, मार्मिक और प्रभावशाली होते हैं।
- रस: उनके काव्य में वीर रस (अंगद-रावण संवाद), श्रृंगार रस (सीता सौंदर्य), शांत रस (राम-भक्ति, सरस्वती वंदना) और रौद्र रस का सुंदर परिपाक हुआ है।
- शैली: उनकी शैली चमत्कारवादी और पांडित्यपूर्ण है। वे अपनी विद्वत्ता का प्रदर्शन करने से नहीं चूकते।
- रीति-निरूपण: केशवदास ने 'कविप्रिया' और 'रसिकप्रिया' जैसे ग्रंथों के माध्यम से काव्यशास्त्र के विभिन्न अंगों - रस, अलंकार, छंद, नायिका-भेद आदि का निरूपण किया, जिससे वे रीतिकाल के प्रवर्तक आचार्य कहलाए।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
-
'कठिन काव्य का प्रेत' किस कवि को कहा जाता है?
क) तुलसीदास
ख) सूरदास
ग) केशवदास
घ) बिहारी
उत्तर: ग) केशवदास -
केशवदास का जन्म स्थान कहाँ है?
क) काशी
ख) ओरछा
ग) अयोध्या
घ) मथुरा
उत्तर: ख) ओरछा -
'रामचंद्रिका' किसकी रचना है?
क) तुलसीदास
ख) कबीरदास
ग) केशवदास
घ) जायसी
उत्तर: ग) केशवदास -
केशवदास की किस रचना को 'छंदों का अजायबघर' कहा जाता है?
क) रसिकप्रिया
ख) कविप्रिया
ग) रामचंद्रिका
घ) विज्ञानगीता
उत्तर: ग) रामचंद्रिका -
'कविप्रिया' किस विषय पर आधारित ग्रंथ है?
क) रस विवेचन
ख) अलंकार विवेचन
ग) भक्ति
घ) नीति
उत्तर: ख) अलंकार विवेचन -
पाठ्यपुस्तक में संकलित सरस्वती वंदना किस छंद में है?
क) दोहा
ख) सोरठा
ग) कवित्त
घ) सवैया
उत्तर: ग) कवित्त -
अंगद-रावण संवाद में मुख्य रूप से कौन सा रस है?
क) श्रृंगार रस
ख) शांत रस
ग) वीर रस
घ) करुण रस
उत्तर: ग) वीर रस -
'कुंदन को रंग फीको लगे, झलकै अति अंगनि चारु गोराई' पंक्ति में किसका सौंदर्य वर्णन किया गया है?
क) राम का
ख) सीता का
ग) सरस्वती का
घ) अंगद का
उत्तर: ख) सीता का -
केशवदास किस काल के कवि माने जाते हैं?
क) आदिकाल
ख) भक्तिकाल
ग) रीतिकाल
घ) आधुनिक काल
उत्तर: ग) रीतिकाल -
'पूरब दिसा दिगंतन को, रवि पूरब ही ते प्रकास करै' सवैया में कवि ने किसकी महिमा का वर्णन किया है?
क) सूर्य की
ख) चंद्रमा की
ग) राम नाम की
घ) ध्रुव तारे की
उत्तर: ग) राम नाम की
मुझे आशा है कि यह विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपकी परीक्षा की तैयारी में अत्यंत सहायक सिद्ध होंगे। लगन और परिश्रम से अध्ययन करते रहें!