Class 12 Hindi Notes Kavita 2 (सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’: गीत गाने दो मुझे; सरोज-स्मृति) – Antra Book

Antra
प्रिय विद्यार्थियों,

आज हम सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित दो महत्त्वपूर्ण कविताओं – ‘गीत गाने दो मुझे’ और ‘सरोज-स्मृति’ – का विस्तृत अध्ययन करेंगे। ये कविताएँ न केवल निराला के काव्य-व्यक्तित्व को समझने में सहायक हैं, बल्कि हिंदी साहित्य के इतिहास में भी इनका विशिष्ट स्थान है। सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए हमें इनके प्रत्येक पहलू पर गहराई से विचार करना होगा।


सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

कवि परिचय:
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ (1899-1961) छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। उनका जन्म बंगाल के मेदिनीपुर जिले के महिषादल नामक गाँव में हुआ था। वे मूलतः उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के गढ़ाकोला गाँव के निवासी थे। निराला का जीवन संघर्षों और दुखों से भरा रहा, जिसका गहरा प्रभाव उनकी कविताओं पर पड़ा। वे अपनी विद्रोही चेतना, मुक्त छंद के प्रयोग और सामाजिक यथार्थ के चित्रण के लिए जाने जाते हैं।

  • जन्म: सन् 1899 (कुछ स्रोतों में 1897 भी मिलता है)
  • मृत्यु: सन् 1961
  • प्रमुख रचनाएँ:
    • काव्य: अनामिका, परिमल, गीतिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, बेला, नए पत्ते, अर्चना, आराधना, गीतगुंज, सांध्य काकली।
    • उपन्यास: अप्सरा, अलका, प्रभावती, निरुपमा, चमेली, काले कारनामे।
    • कहानी संग्रह: लिली, सखी, चतुरी चमार, सुकुल की बीवी।
    • निबंध संग्रह: प्रबंध-पद्म, प्रबंध-प्रतिमा, चाबुक, चयन।
  • साहित्यिक विशेषताएँ:
    • छायावादी कवि, परंतु प्रगतिवादी और प्रयोगवादी तत्वों का भी समावेश।
    • मुक्त छंद के प्रवर्तक।
    • क्रांतिकारी और विद्रोही स्वर।
    • सामाजिक यथार्थ का चित्रण और शोषित वर्ग के प्रति सहानुभूति।
    • दार्शनिक गहराई और आध्यात्मिकता।
    • संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली का प्रयोग, परंतु लोकभाषा के शब्दों का भी समावेश।

कविता 1: गीत गाने दो मुझे

संदर्भ: यह कविता निराला के काव्य-संग्रह ‘अनामिका’ में संकलित है। यह एक छोटी-सी कविता है, जिसमें कवि जीवन के संघर्षों, निराशाओं और वेदनाओं को व्यक्त करते हुए, गीत के माध्यम से स्वयं को और दूसरों को जीने की प्रेरणा देना चाहते हैं।

कविता का सार:
‘गीत गाने दो मुझे’ कविता में कवि जीवन की विषम परिस्थितियों, सामाजिक अन्याय और व्यक्तिगत पीड़ा को अभिव्यक्त करते हैं। उन्हें लगता है कि पूरा संसार विषमता और शोषण से भरा है, जहाँ लोग एक-दूसरे को लूट रहे हैं। ऐसे में जीने की इच्छा भी समाप्त होती जा रही है। कवि अपनी वेदना को गीतों के माध्यम से व्यक्त करना चाहते हैं, ताकि वे स्वयं को और दूसरों को जीवन के प्रति उत्साहित कर सकें। यह कविता एक प्रकार का आत्म-संघर्ष और आत्म-सांत्वना का गीत है, जहाँ कवि अपनी पीड़ा को सार्वजनिक कर उसे शक्ति में बदलना चाहते हैं।

भावार्थ एवं व्याख्या:

  • "गीत गाने दो मुझे तो, वेदना को रोकने को।"

    • कवि कहता है कि मुझे गीत गाने दो, क्योंकि मेरे भीतर की वेदना (पीड़ा) इतनी बढ़ गई है कि उसे रोकने के लिए, उसे शांत करने के लिए गीत ही एकमात्र सहारा है। गीत गाना कवि के लिए आत्म-अभिव्यक्ति और आत्म-सांत्वना का माध्यम है।
  • "चोट खाकर राह चलते, होश भी छूटे हुए हैं।"

    • जीवन-पथ पर चलते हुए कवि को अनेक आघात लगे हैं, इतनी ठोकरें खाई हैं कि अब उसका धैर्य और चेतना भी समाप्त होती जा रही है। जीवन के कटु अनुभवों ने उसे हताश कर दिया है।
  • "ठग-ठाकुरों ने लूट लिया है कंठ रुक गया है, कहो कैसे करूँ?"

    • यहाँ ‘ठग-ठाकुर’ समाज के शोषक वर्ग, पूँजीपतियों, अन्याय करने वालों का प्रतीक हैं। कवि कहता है कि इन शोषकों ने समाज को और व्यक्ति को इतना लूटा है कि अब विरोध में बोलने के लिए कंठ (आवाज) भी रुक गया है। कवि की वाणी अवरुद्ध हो गई है, वह अपनी पीड़ा व्यक्त करने में असमर्थ महसूस कर रहा है। वह प्रश्न करता है कि इस स्थिति में मैं क्या करूँ?
  • "भर गया है ज़हर से संसार जैसे हार खाकर देखते हैं लोग, लोगों को सही परिचय न पाकर।"

    • कवि को लगता है कि पूरा संसार विषमताओं, अन्याय और स्वार्थ के जहर से भर गया है। लोग जीवन के संघर्षों में हार मानकर एक-दूसरे को अविश्वास और संदेह की दृष्टि से देखते हैं। कोई किसी का सही परिचय नहीं पा रहा, अर्थात मनुष्यता और प्रेम का भाव समाप्त हो गया है।
  • "बुझ गई है लौ पृथा की, जल उठो फिर सींचने को।"

    • ‘पृथा’ यहाँ पृथ्वी या जीवन-ज्योति का प्रतीक है। कवि कहता है कि जीवन की लौ, आशा की किरण बुझ गई है। चारों ओर निराशा और अंधकार छाया हुआ है। इसलिए, कवि आह्वान करता है कि इस बुझी हुई लौ को फिर से जलाने के लिए, जीवन में आशा का संचार करने के लिए हमें स्वयं को जलाना होगा (अर्थात संघर्ष करना होगा, बलिदान देना होगा)। यह एक प्रकार का आत्म-बलिदान और पुनर्जागरण का आह्वान है।

काव्य-सौंदर्य:

  • भाषा-शैली: खड़ी बोली, जिसमें संस्कृतनिष्ठ शब्दों के साथ-साथ बोलचाल के शब्दों का भी प्रयोग है। शैली आत्मकथात्मक और संवादात्मक है।
  • छंद: मुक्त छंद का प्रयोग, जो निराला की विशिष्ट पहचान है।
  • रस: करुण रस प्रधान है, किंतु अंत में वीर रस और ओज का भाव भी है।
  • अलंकार:
    • रूपक: ‘कंठ रुक गया है’, ‘लौ पृथा की’
    • प्रतीक: ‘ठग-ठाकुर’ (शोषक वर्ग), ‘कंठ’ (आवाज/विरोध), ‘लौ पृथा की’ (जीवन-ज्योति/आशा)
    • प्रश्न अलंकार: ‘कहो कैसे करूँ?’
  • विषय-वस्तु: सामाजिक यथार्थ का चित्रण, व्यक्तिगत वेदना, संघर्ष और निराशा के बीच जीने की ललक, शोषण के प्रति आक्रोश, आशा का संचार।
  • विशेष: यह कविता निराला के जीवन-संघर्ष और सामाजिक चेतना का प्रतीक है। इसमें कवि की पीड़ा और संघर्ष को मुखर अभिव्यक्ति मिली है।

कविता 2: सरोज-स्मृति

संदर्भ: यह कविता निराला की पुत्री सरोज के निधन पर लिखी गई एक शोकगीत है। इसे हिंदी साहित्य का पहला और सबसे महत्त्वपूर्ण शोकगीत माना जाता है। यह कविता ‘अनामिका’ काव्य-संग्रह में संकलित है।

कविता का सार:
‘सरोज-स्मृति’ निराला के व्यक्तिगत जीवन की सबसे मार्मिक और हृदयविदारक घटना पर आधारित है। यह उनकी युवा पुत्री सरोज के असमय निधन पर लिखा गया शोकगीत है। कविता में कवि अपनी पुत्री के विवाह का वर्णन करते हैं, जिसमें माँ की अनुपस्थिति में पिता स्वयं ही माँ और पिता दोनों की भूमिका निभाता है। वह पुत्री के रूप-सौंदर्य, उसके विवाह की रस्मों, और उसके जीवन की कठिनाइयों का चित्रण करता है। कवि अपनी पुत्री में अपनी दिवंगत पत्नी मनोरमा देवी की छवि देखता है। अंत में, कवि अपनी पुत्री के लिए किए गए त्याग और संघर्ष को याद करते हुए अपनी वेदना और असहायता व्यक्त करता है। यह कविता केवल एक पिता का शोक नहीं, बल्कि एक कवि का आत्म-संघर्ष, सामाजिक विद्रूपताओं के प्रति आक्रोश और जीवन की कटु सच्चाइयों का भी चित्रण है।

भावार्थ एवं व्याख्या:

  • "देखा विवाह आमूल नवल, तुझ पर शुभ पड़ा कलश का जल।"

    • कवि अपनी पुत्री सरोज के विवाह का वर्णन करते हुए कहता है कि मैंने तेरा विवाह पूरी तरह नए तरीके से देखा, क्योंकि इसमें माँ की अनुपस्थिति थी। विवाह की रस्मों में तुझ पर कलश का पवित्र जल डाला गया।
  • "देखता मैं जिस तरह हँसते, खेलते हुए पार कर देती थी तू हँसते, खेलते हुए पार कर देती थी तू।"

    • कवि पुत्री के बचपन को याद करता है कि कैसे वह हँसते-खेलते जीवन की बाधाओं को पार कर जाती थी। यह पंक्ति पुत्री के सहज और प्रसन्न स्वभाव को दर्शाती है।
  • "शृंगार रहा जो निराकार, रस कविता में ही रहा विहार।"

    • यहाँ कवि अपनी दिवंगत पत्नी मनोरमा देवी को याद करता है। पत्नी के अभाव में सरोज का शृंगार (देखभाल) निराकार रहा, अर्थात कोई माँ नहीं थी जो उसका शृंगार करती। कवि की पत्नी का प्रेम और सौंदर्य अब केवल उसकी कविताओं में ही निवास करता है।
  • "मुझ भाग्यहीन की तू संबल, युग वर्ष बाद जब हुई विकल।"

    • कवि स्वयं को भाग्यहीन कहता है और सरोज को अपना एकमात्र सहारा (संबल) मानता है। पुत्री के निधन के बाद कवि अत्यंत व्याकुल और दुखी है।
  • "निज कर्मठ जीवन का अर्पण, कर सका मैं कुछ नहीं, बस यही।"

    • कवि को यह पीड़ा है कि वह अपनी पुत्री के लिए अपने कर्मठ जीवन का सब कुछ अर्पण करना चाहता था, लेकिन परिस्थितियों के कारण वह कुछ नहीं कर सका। यह उसकी विवशता और असहायता को दर्शाता है।
  • "दुख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज जो नहीं कही।"

    • यह कविता की सबसे मार्मिक पंक्तियों में से एक है। कवि कहता है कि मेरा पूरा जीवन ही दुखों की कहानी रहा है। आज मैं ऐसा क्या कहूँ जो मैंने पहले कभी नहीं कहा, अर्थात मेरा दुख इतना गहरा है कि उसे शब्दों में व्यक्त करना असंभव है, और यह दुख मेरे जीवन का चिर-साथी रहा है।
  • "हो इसी कर्म पर वज्रपात, यदि धर्म रहे नत सदा माथ।"

    • कवि अपने कर्मों पर वज्रपात होने की बात करता है, यदि वह धर्म के मार्ग से विचलित हो। वह अपनी पुत्री के प्रति अपने कर्तव्यों को धर्म मानता है और चाहता है कि उसका सिर हमेशा धर्म के आगे नत रहे।
  • "पुत्री! मैं तेरा तर्पण करता, देखूँगा, अब मैं कहाँ ठहरता।"

    • कवि अपनी पुत्री का तर्पण (श्राद्ध कर्म) करता है और कहता है कि अब मैं जीवन में कहाँ जाकर रुकूँगा, कहाँ मुझे शांति मिलेगी, यह कहना कठिन है। उसका जीवन अब और भी दिशाहीन और अकेला हो गया है।

काव्य-सौंदर्य:

  • भाषा-शैली: खड़ी बोली, जिसमें संस्कृतनिष्ठ शब्दावली के साथ-साथ लोक-जीवन के शब्दों का भी प्रयोग हुआ है। शैली आत्मकथात्मक, मार्मिक और करुण है।
  • छंद: मुक्त छंद का सफल प्रयोग, जो कवि के आंतरिक आवेग और वेदना को सहज अभिव्यक्ति देता है।
  • रस: करुण रस प्रधान है, साथ ही वात्सल्य रस का भी सुंदर चित्रण है।
  • अलंकार:
    • उपमा: ‘जैसे हार खाकर देखते हैं लोग’ (गीत गाने दो मुझे में)
    • रूपक: ‘शृंगार रहा जो निराकार’
    • पुनरुक्ति प्रकाश: ‘हँसते-खेलते’
    • मानवीकरण: प्रकृति का मानवीकरण।
    • अनुप्रास: अनेक स्थलों पर।
  • विषय-वस्तु: पुत्री-वियोग का मार्मिक चित्रण, पिता का वात्सल्य, भारतीय समाज में विधवा विवाह की समस्या का परोक्ष संकेत (माँ की अनुपस्थिति), कवि का व्यक्तिगत संघर्ष और दुख, जीवन की कटुता का यथार्थ चित्रण।
  • विशेष:
    • इसे हिंदी का प्रथम शोकगीत (Elegy) माना जाता है।
    • यह निराला के व्यक्तिगत जीवन की त्रासदी का जीवंत दस्तावेज है।
    • कविता में कवि ने अपनी पुत्री में अपनी पत्नी मनोरमा देवी की छवि देखी है, जिससे दुख और भी गहरा हो जाता है।
    • कवि ने अपनी पुत्री के विवाह में माँ की भूमिका स्वयं निभाई, जो उसकी विषम परिस्थितियों और त्याग को दर्शाता है।

महत्वपूर्ण बिंदु (सरकारी परीक्षा हेतु):

  1. मुक्त छंद के प्रवर्तक: निराला को हिंदी में मुक्त छंद का प्रवर्तक माना जाता है।
  2. छायावाद के स्तंभ: वे जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा के साथ छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं।
  3. क्रांतिकारी कवि: उनकी कविताओं में सामाजिक रूढ़ियों और शोषण के प्रति तीव्र आक्रोश मिलता है।
  4. ‘सरोज-स्मृति’ का महत्त्व: यह हिंदी का प्रथम और सबसे प्रसिद्ध शोकगीत है, जो निराला के व्यक्तिगत जीवन की त्रासदी को दर्शाता है।
  5. ‘गीत गाने दो मुझे’ का संदेश: यह कविता निराशा और संघर्ष के बीच जीने की ललक और आत्म-सांत्वना का संदेश देती है।
  6. प्रतीक योजना: दोनों कविताओं में प्रतीकात्मक भाषा का सुंदर प्रयोग हुआ है (जैसे ‘ठग-ठाकुर’, ‘लौ पृथा की’)।
  7. आत्मकथात्मक शैली: ‘सरोज-स्मृति’ विशेष रूप से आत्मकथात्मक शैली में लिखी गई है, जो कवि के निजी अनुभवों को व्यक्त करती है।
  8. सामाजिक यथार्थ: निराला की कविताएँ केवल व्यक्तिगत पीड़ा तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि वे तत्कालीन समाज की विषमताओं और शोषण को भी उजागर करती हैं।

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs):

  1. सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म कहाँ हुआ था?
    a) वाराणसी, उत्तर प्रदेश
    b) महिषादल, बंगाल
    c) इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश
    d) लखनऊ, उत्तर प्रदेश

  2. ‘गीत गाने दो मुझे’ कविता में ‘ठग-ठाकुर’ किसका प्रतीक हैं?
    a) गाँव के जमींदारों का
    b) समाज के शोषक और अत्याचारी वर्ग का
    c) डाकुओं और लुटेरों का
    d) राजनीतिक नेताओं का

  3. ‘सरोज-स्मृति’ को हिंदी साहित्य में किस रूप में जाना जाता है?
    a) प्रथम महाकाव्य
    b) प्रथम शोकगीत
    c) प्रथम खंडकाव्य
    d) प्रथम प्रेमगीत

  4. ‘बुझ गई है लौ पृथा की, जल उठो फिर सींचने को।’ पंक्ति में ‘पृथा की लौ’ किसका प्रतीक है?
    a) धरती पर जीवन का
    b) आशा और जीवन-शक्ति का
    c) दीपक की लौ का
    d) संघर्ष की आग का

  5. ‘सरोज-स्मृति’ में निराला ने अपनी पुत्री सरोज में किसकी छवि देखी है?
    a) अपनी माँ की
    b) अपनी बहन की
    c) अपनी पत्नी मनोरमा देवी की
    d) अपनी प्रेमिका की

  6. ‘दुख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज जो नहीं कही।’ यह पंक्ति किस कविता से ली गई है?
    a) राम की शक्ति पूजा
    b) कुकुरमुत्ता
    c) सरोज-स्मृति
    d) गीत गाने दो मुझे

  7. निराला की कविताओं की एक प्रमुख विशेषता क्या है?
    a) दोहा छंद का प्रयोग
    b) मुक्त छंद का प्रयोग
    c) ब्रजभाषा का प्रयोग
    d) प्रकृति का आलंबन रूप में चित्रण

  8. ‘गीत गाने दो मुझे’ कविता का मूल भाव क्या है?
    a) प्रकृति का सौंदर्य वर्णन
    b) व्यक्तिगत वेदना और सामाजिक शोषण के बीच जीने की प्रेरणा
    c) भक्ति भावना का प्रदर्शन
    d) राष्ट्रप्रेम की भावना

  9. सरोज-स्मृति में विवाह के समय माँ की अनुपस्थिति में पिता ने कौन-कौन से कर्तव्य निभाए?
    a) केवल पिता के
    b) केवल माँ के
    c) माँ और पिता दोनों के
    d) पुरोहित के

  10. निराला किस काव्यधारा के प्रमुख कवि माने जाते हैं?
    a) प्रगतिवाद
    b) प्रयोगवाद
    c) छायावाद
    d) नई कविता


उत्तरमाला:

  1. b) महिषादल, बंगाल
  2. b) समाज के शोषक और अत्याचारी वर्ग का
  3. b) प्रथम शोकगीत
  4. b) आशा और जीवन-शक्ति का
  5. c) अपनी पत्नी मनोरमा देवी की
  6. c) सरोज-स्मृति
  7. b) मुक्त छंद का प्रयोग
  8. b) व्यक्तिगत वेदना और सामाजिक शोषण के बीच जीने की प्रेरणा
  9. c) माँ और पिता दोनों के
  10. c) छायावाद

आशा है, ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपकी सरकारी परीक्षा की तैयारी में अत्यंत सहायक सिद्ध होंगे। इन कविताओं को गहराई से समझकर आप न केवल अच्छे अंक प्राप्त कर सकते हैं, बल्कि हिंदी साहित्य के इस महान कवि के योगदान को भी बेहतर ढंग से सराह सकते हैं। शुभकामनाएँ!

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