Class 12 Hindi Notes Kavita 6 (रघुवीर सहाय: तोड़ो; वसंत आया) – Antra Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम आपकी पाठ्यपुस्तक 'अंतरा' भाग-2 में संकलित रघुवीर सहाय जी की दो महत्त्वपूर्ण कविताओं 'तोड़ो' और 'वसंत आया' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। ये कविताएँ न केवल साहित्यिक दृष्टि से बल्कि सामाजिक और मानवीय चेतना के स्तर पर भी अत्यंत प्रासंगिक हैं। सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए हमें इनके भाव, शिल्प और निहितार्थों को गहराई से समझना होगा।
कवि परिचय: रघुवीर सहाय (1929-1990)
रघुवीर सहाय हिंदी साहित्य के एक ऐसे स्तंभ हैं जिन्होंने अपनी कविताओं, कहानियों, निबंधों और पत्रकारिता के माध्यम से समकालीन समाज की विसंगतियों और मानवीय संवेदनाओं को मुखरता से व्यक्त किया।
- जन्म: 1929, लखनऊ, उत्तर प्रदेश।
- शिक्षा: लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए.।
- कार्यक्षेत्र: पत्रकारिता से जुड़े रहे। 'प्रतीक', 'कल्पना' जैसी पत्रिकाओं में काम किया। 'दिनमान' साप्ताहिक के संपादक रहे, जहाँ उन्होंने अपनी पत्रकारिता को एक नई दिशा दी।
- काव्य-संग्रह: 'सीढ़ियों पर धूप में', 'आत्महत्या के विरुद्ध', 'हँसो हँसो जल्दी हँसो', 'लोग भूल गए हैं', 'कुछ पते कुछ चिट्ठियाँ', 'एक समय था'।
- पुरस्कार: 'लोग भूल गए हैं' काव्य-संग्रह के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार (1984)।
- काव्य-विशेषताएँ:
- उनकी कविताएँ साधारण बोलचाल की भाषा में लिखी गई हैं, जिनमें गहरी व्यंग्यात्मकता और सामाजिक चेतना होती है।
- वे आधुनिक जीवन की विडंबनाओं, राजनीतिक भ्रष्टाचार, मानवीय अजनबीपन और शहरी संवेदनहीनता को अपनी कविताओं का विषय बनाते हैं।
- उनकी शैली में एक प्रकार की सीधी-सादी, सपाटबयानी होती है जो पाठक को सीधे मर्म तक पहुँचाती है।
- वे बिंबों और प्रतीकों का प्रयोग कुशलता से करते हैं।
कविता 1: तोड़ो
यह कविता सृजन के लिए विध्वंस की आवश्यकता को रेखांकित करती है। कवि बताता है कि किसी भी नई रचना या निर्माण से पहले पुरानी, अनुपयोगी और बांझ चीजों को हटाना आवश्यक है। यह केवल भौतिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि मानसिक और वैचारिक स्तर पर भी लागू होता है।
1. कविता का सार:
'तोड़ो' कविता में कवि रघुवीर सहाय सृजन के लिए आवश्यक परिस्थितियों का वर्णन करते हैं। कवि कहता है कि खेत को उपजाऊ बनाने के लिए पहले उसमें से कंकड़-पत्थर, ऊसर और बंजर भूमि को तोड़कर समतल करना पड़ता है। इसी प्रकार, मन में नए विचारों और भावनाओं के सृजन के लिए मन की ऊसरता, निराशा और जड़ता को तोड़ना आवश्यक है। मन की यह ऊसरता ही सृजन में सबसे बड़ी बाधा है। कवि प्रकृति के उदाहरण से यह स्पष्ट करता है कि जैसे मिट्टी को तैयार करने के लिए उसे तोड़ना पड़ता है, वैसे ही मन को भी सृजनशील बनाने के लिए उसकी निष्क्रियता को तोड़ना होगा। यह तोड़ना विध्वंस नहीं, बल्कि निर्माण की पहली सीढ़ी है।
2. कविता की व्याख्या:
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"तोड़ो तोड़ो तोड़ो / ये पत्थर ये चट्टानें / ये ऊसर ज़मीन / तोड़ो।"
- कवि आह्वान करता है कि पत्थरों, चट्टानों और ऊसर (अनुपजाऊ/बंजर) ज़मीन को तोड़ दो। यहाँ 'पत्थर' और 'चट्टानें' कठोरता, जड़ता और बाधाओं के प्रतीक हैं। 'ऊसर ज़मीन' अनुपजाऊपन और निष्क्रियता का प्रतीक है, जहाँ कुछ भी नया नहीं उग सकता।
- यह आह्वान केवल भौतिक ज़मीन को तोड़ने का नहीं, बल्कि मन की उन कठोरताओं, जड़ताओं और नकारात्मक विचारों को तोड़ने का भी है जो सृजन में बाधक हैं।
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"खेत बनाओ / बंजर तोड़ो / यह तोडो / यह तोडो।"
- कवि कहता है कि इन बाधाओं को तोड़कर खेत बनाओ, यानी सृजन के लिए उपयुक्त भूमि तैयार करो। 'बंजर' शब्द 'ऊसर' का ही पर्याय है, जो अनुपजाऊपन को दर्शाता है।
- दो बार 'यह तोड़ो' कहकर कवि तोड़ने की क्रिया पर विशेष बल देता है, जो सृजन के लिए अपरिहार्य है।
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"मैं तुम से कहता हूँ / मिट्टी में रस है ही / जब वह पोसेगी बीज को / हम उसको क्या नाम दें?"
- कवि कहता है कि मिट्टी में स्वाभाविक रूप से रस (जीवनदायिनी शक्ति) होता है, वह उपजाऊ होती है। जब वह बीज को पोषित करती है, तो उसे क्या नाम दें?
- यहाँ मिट्टी मन का प्रतीक है। मन में भी सृजन की स्वाभाविक शक्ति होती है। जब मन किसी नए विचार या भावना को पोषित करता है, तो वह सृजन ही होता है। कवि प्रश्न करता है कि इस सृजन को क्या नाम दें, यह सृजन की महिमा को दर्शाता है।
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"मगर यह बंजर तोड़ो / यह ऊसर तोड़ो।"
- कवि फिर से दोहराता है कि मन की बांझपन और निष्क्रियता को तोड़ना आवश्यक है। यह सृजन की पूर्व शर्त है।
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"तुम क्यों सोचते हो / मिट्टी पर ही आधारित है / जीवन / भीतर की घुटन भी तोड़ो।"
- कवि पाठक को संबोधित करते हुए कहता है कि तुम क्यों सोचते हो कि जीवन केवल भौतिक मिट्टी (बाहरी परिस्थितियों) पर ही आधारित है। मन के भीतर की घुटन, निराशा, कुंठा और नकारात्मकता को भी तोड़ो।
- यह पंक्तियाँ कविता के अर्थ को और गहरा करती हैं, इसे केवल भौतिक सृजन से हटाकर मानसिक और आत्मिक सृजन तक ले जाती हैं। मन की घुटन भी एक प्रकार की बंजरता है जो सृजन को रोकती है।
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"वह अपने आप टूटेगी / नहीं / तुम अपने आप से लड़ो / तोड़ो तोड़ो तोड़ो।"
- कवि स्पष्ट करता है कि मन की यह घुटन या जड़ता अपने आप नहीं टूटेगी। इसके लिए स्वयं से संघर्ष करना होगा, अपनी निष्क्रियता और नकारात्मकता से लड़ना होगा।
- अंतिम पंक्तियाँ तोड़ने की क्रिया की अनिवार्यता और सक्रियता पर बल देती हैं। यह संघर्ष ही सृजन का मार्ग प्रशस्त करेगा।
3. काव्य-सौंदर्य:
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भाव-सौंदर्य:
- कविता सृजन के लिए विध्वंस की अनिवार्यता को दर्शाती है। यह विध्वंस रचनात्मक है, विनाशकारी नहीं।
- मनुष्य को अपनी आंतरिक जड़ता, निष्क्रियता और नकारात्मकता को तोड़ने के लिए प्रेरित करती है।
- आशावादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है कि मन में सृजन की असीम क्षमता है, बस बाधाओं को हटाना है।
- यह कविता एक प्रकार का आह्वान है, जो व्यक्ति को कर्मठ और सृजनशील बनने की प्रेरणा देता है।
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शिल्प-सौंदर्य:
- भाषा: सरल, सहज, बोलचाल के निकट की खड़ी बोली हिंदी। इसमें कोई बनावटीपन नहीं है।
- शैली: उपदेशात्मक और प्रेरणादायक। कवि सीधे पाठक से संवाद करता प्रतीत होता है।
- अलंकार:
- पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार: 'तोड़ो तोड़ो तोड़ो', 'यह तोड़ो यह तोड़ो' - क्रिया पर बल देने के लिए।
- रूपक अलंकार: 'ऊसर ज़मीन', 'बंजर' मन की निष्क्रियता और जड़ता के लिए प्रयुक्त हुए हैं। 'मिट्टी' मन का प्रतीक है।
- बिंब: 'पत्थर', 'चट्टानें', 'ऊसर ज़मीन', 'खेत', 'बीज' जैसे ठोस बिंबों का प्रयोग।
- छंद: मुक्त छंद। कविता में कोई निश्चित तुकबंदी या मात्रा-विधान नहीं है, जो इसकी सहजता को बढ़ाता है।
- स्वर: कवि का स्वर दृढ़, आत्मविश्वासपूर्ण और प्रेरक है।
4. प्रमुख बिंदु / विशेष:
- कविता का केंद्रीय विचार है कि निर्माण से पहले रुकावटों को हटाना आवश्यक है।
- 'तोड़ना' यहाँ सकारात्मक अर्थ में प्रयुक्त हुआ है, जिसका लक्ष्य सृजन है।
- यह कविता मनुष्य के आंतरिक संघर्ष और आत्म-प्रेरणा पर जोर देती है।
- प्रकृति (मिट्टी, बीज) का उदाहरण देकर मानवीय मन की स्थितियों को समझाया गया है।
कविता 2: वसंत आया
यह कविता आधुनिक शहरी जीवन की विडंबना को दर्शाती है, जहाँ मनुष्य प्रकृति से कटकर कृत्रिम जीवन जीने को विवश है। प्रकृति के सहज सौंदर्य का अनुभव करने के बजाय वह कैलेंडर और दफ्तर की सूचनाओं पर निर्भर रहता है।
1. कविता का सार:
'वसंत आया' कविता आधुनिक शहरी मनुष्य की प्रकृति से बढ़ती दूरी और संवेदनहीनता को उजागर करती है। कवि बताता है कि आज के शहरी जीवन में वसंत का आगमन किसी प्राकृतिक अनुभव से नहीं, बल्कि कैलेंडर की तारीख देखकर या दफ्तर में छुट्टी के ऐलान से पता चलता है। वसंत के प्राकृतिक संकेत जैसे पेड़ों पर नए पत्ते, कोयल की कूक, हवा में फूलों की गंध आदि अब शहरी व्यक्ति के लिए मायने नहीं रखते। वह प्रकृति के साथ सीधा संवाद खो चुका है और कृत्रिम साधनों पर निर्भर हो गया है। कविता व्यंग्य करती है कि वसंत अब एक प्राकृतिक घटना न होकर एक 'औपचारिक' घटना बन गया है, जिसका संबंध पिकनिक और छुट्टियों से अधिक है।
2. कविता की व्याख्या:
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"जैसे बहन दा कहती है / ऐसे किसी बँगले के किसी तरु अशोक पर / कोई चिड़िया कुहूकी / चलती सड़क के किनारे / लाल बजरी पर / चुरमुराए पाँव तले / ऊँचे तरुवर से गिरे / बड़े-बड़े पियराए पत्ते।"
- कवि कहता है कि वसंत के आने का पता कैसे चला? जैसे किसी ने कहा हो (जैसे बहन दा ने बताया हो)।
- किसी बंगले के अशोक के पेड़ पर चिड़िया कुहूकी, लेकिन कवि ने उसे सीधे नहीं सुना, बल्कि 'किसी' चिड़िया के कुहुकने का वर्णन करता है, जो उसके अनुभव की दूरी दर्शाता है।
- सड़क किनारे लाल बजरी पर चलते हुए पैरों के नीचे ऊँचे पेड़ से गिरे पीले पत्ते चुरमुराए। यह वसंत के आगमन का एक प्राकृतिक संकेत है, लेकिन कवि इसे 'पाँव तले चुरमुराए' के रूप में अनुभव करता है, जो एक प्रकार की यांत्रिक क्रिया है, न कि प्रकृति से जुड़ाव।
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"कोई छह बजे सुबह जैसे / गरम पानी से नहाई हो / खिली हुई हवा आई / फिरकी-सी आई, चली गई।"
- सुबह छह बजे की हवा का वर्णन है जो गरम पानी से नहाई हुई-सी खिली हुई और ताजगी भरी थी, लेकिन वह 'फिरकी-सी आई, चली गई' - क्षणिक और अप्रभावी रही, शहरी जीवन में उसका कोई गहरा प्रभाव नहीं पड़ा।
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"ऐसे मैंने जाना कि वसंत आया।"
- कवि कहता है कि इन अप्रत्यक्ष और क्षणिक अनुभवों से मैंने जाना कि वसंत आ गया है। यह 'जानना' अनुभव करने से अलग है, यह एक बौद्धिक या सूचनात्मक प्रक्रिया है।
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"और कैलेंडर से मालूम था / अमुक दिन अमुक बार मदनमहीने की होवेगी पंचमी / दफ्तर में छुट्टी थी / यह था प्रमाण / और कविताएँ पढ़ते रहने से यह पता था / कि दहर-दहर दहकेंगे कहीं ढाक के जंगल / आम बौर आवेंगे / रंग और गंध से लदे फँदे दूर के / विदेश के वे नंदनवन / शोभाशाली मदनमहीने के दिन।"
- कवि व्यंग्य करता है कि वसंत का आगमन कैलेंडर से पता चला, जिसमें 'मदनमहीने की पंचमी' (वसंत पंचमी) की तारीख लिखी थी।
- दफ्तर में छुट्टी होना ही वसंत के आगमन का 'प्रमाण' था। यह शहरी जीवन की विडंबना है कि प्रकृति के उत्सव का प्रमाण दफ्तर की छुट्टी है।
- कविताओं से यह पता था कि ढाक (पलाश) के जंगल दहकेंगे (लाल फूलों से भर जाएँगे), आम पर बौर (मंजरियाँ) आएँगे, और दूर के नंदनवन (बाग) रंग और गंध से लद जाएँगे। ये सब कविताओं से प्राप्त जानकारी है, प्रत्यक्ष अनुभव नहीं।
- 'विदेश के वे नंदनवन' कहकर कवि यह भी संकेत देता है कि प्रकृति का यह सौंदर्य अब शहरी व्यक्ति के लिए दूर की बात हो गई है, जैसे वह किसी विदेशी स्थान का वर्णन कर रहा हो।
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"और यह सब जब होवेगा / तब होवेगा / मैंने जाना कि वसंत आया।"
- कवि कहता है कि जब ये सब प्राकृतिक घटनाएँ होंगी, तब होंगी। लेकिन मैंने तो बस 'जाना' कि वसंत आ गया है। यह 'जानना' फिर से अनुभव की कमी को दर्शाता है।
- यह पंक्तियाँ शहरी व्यक्ति की प्रकृति से विमुखता और उसके जीवन की यांत्रिकता पर गहरा व्यंग्य करती हैं।
3. काव्य-सौंदर्य:
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भाव-सौंदर्य:
- आधुनिक शहरी जीवन की विडंबना और प्रकृति से मनुष्य के अलगाव को दर्शाता है।
- प्रकृति के सहज सौंदर्य के प्रति संवेदनहीनता और औपचारिक दृष्टिकोण पर व्यंग्य करता है।
- त्योहारों और प्राकृतिक घटनाओं के बाजारीकरण और यांत्रिकीकरण को उजागर करता है।
- कविता में एक प्रकार की उदासी और खोखलेपन का भाव है, जहाँ प्रकृति का उत्सव भी कृत्रिम हो गया है।
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शिल्प-सौंदर्य:
- भाषा: बोलचाल की सरल खड़ी बोली हिंदी, जिसमें कहीं-कहीं तत्सम शब्दों का भी प्रयोग है ('तरुवर', 'पियराए', 'मदनमहीने', 'नंदनवन', 'शोभाशाली')।
- शैली: वर्णनात्मक और व्यंग्यात्मक। कवि तटस्थ भाव से शहरी जीवन की सच्चाई को प्रस्तुत करता है।
- अलंकार:
- उपमा अलंकार: 'फिरकी-सी आई', 'गरम पानी से नहाई हो' (हवा के लिए)।
- पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार: 'दहर-दहर' (तीव्रता दर्शाने के लिए)।
- अनुप्रास अलंकार: 'कैलेंडर से मालूम', 'मदनमहीने की', 'रंग और गंध' आदि।
- बिंब: 'पीले पत्ते', 'लाल बजरी', 'कोयल की कूक', 'ढाक के जंगल', 'आम बौर' जैसे दृश्य और श्रव्य बिंबों का प्रयोग।
- छंद: मुक्त छंद। कविता में कोई निश्चित तुकबंदी नहीं है, जो इसकी सहज और यथार्थवादी शैली के अनुकूल है।
- स्वर: कवि का स्वर उदासीन, विडंबनापूर्ण और कहीं-कहीं व्यंग्यात्मक है।
4. प्रमुख बिंदु / विशेष:
- कविता का केंद्रीय विषय शहरीकरण के कारण प्रकृति से मनुष्य का कटाव है।
- वसंत का आगमन कैलेंडर और दफ्तर की छुट्टी से पता चलना, आधुनिक जीवन की कृत्रिमता पर तीखा व्यंग्य है।
- 'जानना' और 'अनुभव करना' के बीच का अंतर कविता का मूल भाव है।
- कविता में 'पलाश' (ढाक) के लाल फूलों का उल्लेख वसंत के सबसे प्रमुख प्राकृतिक संकेतों में से एक है।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
निर्देश: सही विकल्प का चयन करें।
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'तोड़ो' कविता में 'ऊसर ज़मीन' किसका प्रतीक है?
क) अनुपजाऊ भूमि का
ख) मन की निष्क्रियता और जड़ता का
ग) कठोर चट्टानों का
घ) क और ख दोनों -
'तोड़ो' कविता में कवि किस प्रकार के 'तोड़ने' की बात करता है?
क) विध्वंसक तोड़ने की
ख) सृजन के लिए आवश्यक बाधाओं को हटाने की
ग) पुरानी इमारतों को गिराने की
घ) रिश्तों को तोड़ने की -
'वसंत आया' कविता में कवि को वसंत के आगमन का पहला संकेत किससे मिलता है?
क) कोयल की कूक से
ख) कैलेंडर की तारीख से
ग) दफ्तर की छुट्टी से
घ) पाँव तले चुरमुराए पीले पत्तों से -
'वसंत आया' कविता में 'मदनमहीने की पंचमी' से कवि का क्या तात्पर्य है?
क) होली का त्योहार
ख) वसंत पंचमी
ग) किसी विशेष महीने की पाँचवीं तारीख
घ) प्रेम का महीना -
रघुवीर सहाय की कविताओं की प्रमुख विशेषता क्या है?
क) पौराणिक कथाओं का वर्णन
ख) प्रकृति का मानवीकरण
ग) साधारण बोलचाल की भाषा में सामाजिक विसंगतियों पर व्यंग्य
घ) भक्ति भावना का चित्रण -
'तोड़ो' कविता में 'मिट्टी में रस है ही' पंक्ति का क्या अर्थ है?
क) मिट्टी में पानी होता है
ख) मिट्टी में उपजाऊ शक्ति होती है
ग) मन में सृजन की स्वाभाविक क्षमता होती है
घ) ख और ग दोनों -
'वसंत आया' कविता में 'फिरकी-सी आई, चली गई' किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?
क) कोयल की आवाज़ के लिए
ख) वसंत की हवा के लिए
ग) किसी व्यक्ति के लिए
घ) पीले पत्तों के लिए -
'लोग भूल गए हैं' किस कवि का प्रसिद्ध काव्य-संग्रह है जिसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला?
क) सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
ख) जयशंकर प्रसाद
ग) रघुवीर सहाय
घ) सुमित्रानंदन पंत -
'वसंत आया' कविता में कवि किस पर व्यंग्य करता है?
क) ग्रामीण जीवन पर
ख) प्रकृति पर
ग) आधुनिक शहरी जीवन की कृत्रिमता और प्रकृति से अलगाव पर
घ) राजनीतिक व्यवस्था पर -
'तोड़ो' कविता में 'भीतर की घुटन भी तोड़ो' पंक्ति का क्या आशय है?
क) घर की दीवारों को तोड़ना
ख) मन की निराशा और कुंठा को दूर करना
ग) शारीरिक कष्टों को दूर करना
घ) समाज की रूढ़ियों को तोड़ना
उत्तरमाला:
- घ) क और ख दोनों
- ख) सृजन के लिए आवश्यक बाधाओं को हटाने की
- घ) पाँव तले चुरमुराए पीले पत्तों से
- ख) वसंत पंचमी
- ग) साधारण बोलचाल की भाषा में सामाजिक विसंगतियों पर व्यंग्य
- घ) ख और ग दोनों
- ख) वसंत की हवा के लिए
- ग) रघुवीर सहाय
- ग) आधुनिक शहरी जीवन की कृत्रिमता और प्रकृति से अलगाव पर
- ख) मन की निराशा और कुंठा को दूर करना
मुझे आशा है कि यह विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपकी परीक्षा की तैयारी में अत्यंत सहायक सिद्ध होंगे। इन कविताओं को गहराई से समझने के लिए आप इनका कई बार पाठ करें और इनके भावार्थ पर चिंतन करें। शुभकामनाएँ!