Class 12 Hindi Notes Kavita 7 (तुलसीदास: भरत-राम का प्रेम; पद) – Antra Book

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प्रिय विद्यार्थियों,

सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए 'तुलसीदास: भरत-राम का प्रेम; पद' कविता के विस्तृत नोट्स यहाँ प्रस्तुत हैं। यह कविता गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित 'रामचरितमानस' के अयोध्याकांड से ली गई है, जो भरत के त्याग, प्रेम और कर्तव्यनिष्ठा का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करती है। इसे ध्यानपूर्वक पढ़ें और आत्मसात करें।


कवि परिचय: गोस्वामी तुलसीदास

  • जन्म: संवत् 1554 (अनुमानित), राजापुर (चित्रकूट, उत्तर प्रदेश)।
  • मृत्यु: संवत् 1680 (अनुमानित), काशी।
  • गुरु: नरहरिदास।
  • भक्ति शाखा: रामभक्ति शाखा के प्रमुख कवि।
  • भाषा: मुख्य रूप से अवधी और ब्रजभाषा।
  • प्रमुख रचनाएँ:
    • रामचरितमानस: इनका सर्वाधिक प्रसिद्ध महाकाव्य, जो अवधी भाषा में है और भारतीय संस्कृति का आधारस्तंभ माना जाता है।
    • विनय पत्रिका: ब्रजभाषा में रचित, जिसमें विनय के पद हैं।
    • कवितावली: ब्रजभाषा में कवित्त और सवैये।
    • गीतावली: ब्रजभाषा में गेय पद।
    • दोहावली: ब्रजभाषा में दोहे।
    • पार्वती मंगल, जानकी मंगल, बरवै रामायण, रामाज्ञा प्रश्न आदि।
  • काव्यगत विशेषताएँ:
    • समन्वयवादी कवि: शैव और वैष्णव, ज्ञान और भक्ति, सगुण और निर्गुण, राजा और प्रजा के बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयास।
    • लोकनायक: जन-जन में लोकप्रिय, राम को मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में स्थापित किया।
    • भक्ति भावना: दास्य भाव की भक्ति।
    • काव्य शैली: प्रबंध काव्य (रामचरितमानस) और मुक्तक काव्य (विनय पत्रिका, कवितावली)।
    • रस: शांत, करुण, वीर, वात्सल्य आदि सभी रसों का सुंदर प्रयोग।

कविता का संदर्भ: 'भरत-राम का प्रेम'

यह अंश गोस्वामी तुलसीदास के महाकाव्य 'रामचरितमानस' के अयोध्याकांड से लिया गया है।
पृष्ठभूमि: भगवान राम को चौदह वर्ष का वनवास हो चुका है और वे अपनी पत्नी सीता तथा छोटे भाई लक्ष्मण के साथ चित्रकूट में निवास कर रहे हैं। अयोध्या में राम के वियोग में राजा दशरथ का निधन हो जाता है। भरत, जो उस समय अपने ननिहाल में थे, अयोध्या लौटकर सारी घटना जानकर अत्यंत दुखी होते हैं। वे स्वयं को इस अनर्थ का कारण मानते हैं और अपनी माता कैकेयी के कृत्य से ग्लानि से भर उठते हैं। वे राम को वापस अयोध्या लाने के लिए अपनी माताओं, गुरु वशिष्ठ, मंत्रियों और अयोध्यावासियों के साथ चित्रकूट जाते हैं। चित्रकूट की सभा में भरत अपनी मनोदशा और राम के प्रति अपने अगाध प्रेम को व्यक्त करते हैं। यह प्रसंग भरत के त्याग, प्रेम और आदर्श भाईचारे का प्रतीक है।


कविता का सारांश एवं विस्तृत व्याख्या

प्रस्तुत पद में भरत चित्रकूट की सभा में राम के समक्ष अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हैं। वे संकोच, ग्लानि और प्रेम से भरे हुए हैं। उनकी वाणी गद्गद है और वे अपने मन की बात कहने में स्वयं को असमर्थ पा रहे हैं।

1. भरत की ग्लानि और संकोच:
भरत कहते हैं कि वे राम के प्रेम को शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकते। उन्हें यह भी समझ नहीं आ रहा कि वे जो कह रहे हैं, वह प्रेम का दिखावा है या सच। वे स्वयं को अभागा और दोषी मानते हैं।

  • मूल पंक्तियाँ:

    • "प्रेम प्रपंचु कि झूठि फुरि, समुझि परइ नहिं मोरि।
      देन लेन देन-लेन सब झूठ है, साँच कहौं कर जोरि।।"
    • "मोहि न मातु-पिता कीन्हि परितोषु।
      जेहि विधि मोरि भई अवनी, कोउ न कहइ सो दोषु।।"
  • व्याख्या: भरत कहते हैं कि उनके मन में उठने वाला यह भाव प्रेम का दिखावा है या वास्तविक, यह वे स्वयं नहीं समझ पा रहे हैं। वे हाथ जोड़कर कहते हैं कि उनके लिए सब कुछ झूठा है, केवल राम का प्रेम ही सत्य है। वे स्वयं को दोषी मानते हुए कहते हैं कि उन्हें माता-पिता ने भी कभी इतना संतोष नहीं दिया जितना राम ने दिया है। वे अपनी स्थिति के लिए स्वयं को जिम्मेदार मानते हैं और सोचते हैं कि कोई भी उन्हें इस दोष से मुक्त नहीं कर सकता।

2. राम के स्वभाव का वर्णन:
भरत राम के स्वभाव की उदारता और सहजता का बखान करते हैं। वे कहते हैं कि राम ने कभी किसी पर क्रोध नहीं किया, हमेशा सबको समान प्रेम दिया।

  • मूल पंक्तियाँ:

    • "राम सहज सुभाव कृपालु।
      मोहि न कबहूँ कहि न कछु, सब दिन राखेउ लालु।।"
  • व्याख्या: भरत कहते हैं कि राम का स्वभाव बहुत ही सरल और कृपालु है। उन्होंने मुझे कभी कोई कटु वचन नहीं कहा, बल्कि हमेशा मुझे अपने प्रिय पुत्र (लालू) की तरह रखा। राम ने कभी मेरे मन में कोई भेद-भाव नहीं आने दिया।

3. भरत का स्वयं को अभागा मानना:
भरत अपनी माता कैकेयी के कृत्य के कारण स्वयं को अभागा और दोषी मानते हैं। वे कहते हैं कि राम के वनगमन का कारण वे ही हैं।

  • मूल पंक्तियाँ:

    • "जो कछु कहौं थोड़ सब सोई।
      मोहि न मातु-पिता कीन्हि परितोषु।।" (पूर्व में भी उद्धृत)
    • "कहि न सकत कछु, भरत भायप भूरि भायप।"
  • व्याख्या: भरत कहते हैं कि वे जो कुछ भी कह रहे हैं, वह राम के प्रति उनके प्रेम के सामने बहुत कम है। वे अपनी माता-पिता द्वारा दिए गए प्रेम से भी अधिक राम के प्रेम को मानते हैं। वे अपनी असमर्थता व्यक्त करते हैं कि वे अपने भाई के प्रति इस अगाध प्रेम को शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकते।

4. राम का भरत के प्रति प्रेम:
भरत के वचनों को सुनकर राम अत्यंत भावुक हो जाते हैं। वे भरत को गले लगा लेते हैं और उनके त्याग व प्रेम की प्रशंसा करते हैं।

  • मूल पंक्तियाँ:

    • "सुनि सनेह सानी बानी, राम हृदयँ सानी।
      लखन लालच ललकि ललकि, सानी सानी सानी।"
  • व्याख्या: भरत की प्रेमपूर्ण और करुणा से भरी वाणी सुनकर राम का हृदय प्रेम से भीग गया। लक्ष्मण भी इस दृश्य को देखकर लालायित हो उठे और प्रेम में डूब गए। राम भरत को अपने हृदय से लगा लेते हैं और उनके त्याग की सराहना करते हैं।

5. भरत की महानता:
यह प्रसंग भरत के त्याग, निस्वार्थ प्रेम और कर्तव्यनिष्ठा को दर्शाता है। वे राज-पाट का त्याग कर राम की चरण-पादुकाएँ लेकर अयोध्या लौटते हैं और तपस्वी जीवन जीते हुए राम के लौटने की प्रतीक्षा करते हैं।


काव्य सौंदर्य (Literary Analysis)

  1. भाषा: अवधी भाषा का प्रयोग, जो अत्यंत सरल, सहज और प्रवाहमयी है। इसमें माधुर्य गुण विद्यमान है।
  2. रस:
    • शांत रस: भरत की ग्लानि, त्याग और वैराग्य की भावना।
    • करुण रस: राम के वनगमन और भरत के वियोग का दुःख।
    • भक्ति रस: राम के प्रति भरत का अगाध प्रेम और श्रद्धा।
    • वात्सल्य रस: राम का भरत के प्रति प्रेम।
  3. छंद:
    • मुख्यतः चौपाई और दोहा छंद का प्रयोग।
    • चौपाई (16-16 मात्राएँ) और दोहा (13-11 मात्राएँ) तुलसीदास के प्रिय छंद हैं।
  4. अलंकार:
    • अनुप्रास अलंकार: वर्णों की आवृत्ति के कारण काव्य में सौंदर्य और संगीतात्मकता आती है।
      • "प्रेम प्रपंचु" (प वर्ण)
      • "मोहि न मातु-पिता" (म वर्ण)
      • "कहि न सकत कछु" (क वर्ण)
      • "भरत भायप भूरि भायप" (भ वर्ण)
      • "राम रुख" (र वर्ण)
      • "लखन लालच ललकि ललकि" (ल वर्ण)
    • पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार: एक ही शब्द की आवृत्ति, जिसका अर्थ समान हो।
      • "कहि कहि"
      • "ललकि ललकि"
    • उपमा अलंकार: तुलना।
    • रूपक अलंकार: उपमेय में उपमान का अभेद आरोप।
    • स्वभावोक्ति अलंकार: स्वाभाविक वर्णन।
  5. शैली: प्रबंधात्मक, वर्णनात्मक और भावात्मक। तुलसीदास ने संवाद शैली का भी प्रभावी प्रयोग किया है।
  6. शब्द शक्ति: अभिधा और लक्षणा।
  7. गुण: माधुर्य और प्रसाद गुण।

महत्वपूर्ण उद्धरण और उनके अर्थ

  1. "प्रेम प्रपंचु कि झूठि फुरि, समुझि परइ नहिं मोरि।"
    • अर्थ: भरत कहते हैं कि यह जो प्रेम मैं व्यक्त कर रहा हूँ, यह दिखावा है या सच, यह मैं स्वयं नहीं समझ पा रहा हूँ।
  2. "मोहि न मातु-पिता कीन्हि परितोषु।"
    • अर्थ: मुझे माता-पिता ने भी कभी इतना संतोष नहीं दिया (जितना राम के प्रेम ने दिया है)। यह भरत के राम के प्रति अगाध प्रेम को दर्शाता है।
  3. "जो कछु कहौं थोड़ सब सोई।"
    • अर्थ: भरत कहते हैं कि मैं राम के प्रेम के बारे में जो कुछ भी कहूँ, वह सब कम ही होगा। उनके प्रेम की विशालता को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।
  4. "राम सहज सुभाव कृपालु।"
    • अर्थ: राम का स्वभाव बहुत ही सरल और कृपालु है।
  5. "तात भरत तुम सब बिधि साधु।"
    • अर्थ: (राम द्वारा भरत को कहा गया) हे भरत! तुम सभी प्रकार से साधु (पवित्र और श्रेष्ठ) हो। यह राम के भरत के प्रति विश्वास और प्रेम को दर्शाता है।

सरकारी परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण बिंदु

  • कवि और रचना: तुलसीदास, रामचरितमानस (अयोध्याकांड)।
  • मुख्य पात्र: भरत, राम, लक्ष्मण।
  • भरत के चरित्र की विशेषताएँ: त्याग, निस्वार्थ प्रेम, कर्तव्यनिष्ठा, ग्लानि, विनम्रता, आदर्श भ्रातृ-प्रेम।
  • राम के चरित्र की विशेषताएँ: उदारता, कृपालुता, सहजता, मर्यादा, आदर्श भाई।
  • भाषा, छंद, रस, अलंकार से संबंधित प्रश्न।
  • पंक्तियों का भावार्थ और उनके पीछे निहित भावनाएँ।
  • यह प्रसंग भरत के महान त्याग और आदर्श भ्रातृ-प्रेम का प्रतीक है, जो भारतीय संस्कृति में पूजनीय है।

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

1. 'भरत-राम का प्रेम' पद तुलसीदास के किस ग्रंथ से लिया गया है?
क) विनय पत्रिका
ख) कवितावली
ग) रामचरितमानस
घ) गीतावली

2. यह पद रामचरितमानस के किस कांड का अंश है?
क) बालकांड
ख) अयोध्याकांड
ग) अरण्यकांड
घ) सुंदरकांड

3. भरत अपनी बात कहने में क्यों संकोच कर रहे थे?
क) वे क्रोधित थे
ख) वे राम से डरते थे
ग) उनका कंठ प्रेम और ग्लानि से गद्गद था
घ) उन्हें कुछ याद नहीं आ रहा था

4. भरत के अनुसार, राम का स्वभाव कैसा है?
क) क्रोधी
ख) कठोर
ग) सहज और कृपालु
घ) उदासीन

5. भरत स्वयं को किस बात के लिए दोषी मानते हैं?
क) राज-पाट संभालने के लिए
ख) राम के वनगमन के लिए
ग) माता कैकेयी का सम्मान न करने के लिए
घ) चित्रकूट आने के लिए

6. "मोहि न मातु-पिता कीन्हि परितोषु।" - इस पंक्ति में 'परितोषु' शब्द का क्या अर्थ है?
क) क्रोध
ख) संतोष
ग) दुःख
घ) प्रेम

7. "भरत भायप भूरि भायप" - इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
क) उपमा
ख) रूपक
ग) अनुप्रास
घ) यमक

8. भरत के वचनों को सुनकर राम की क्या प्रतिक्रिया होती है?
क) वे क्रोधित होते हैं
ख) वे उदासीन रहते हैं
ग) उनका हृदय प्रेम से भर जाता है
घ) वे भरत को डांटते हैं

9. इस कविता में मुख्य रूप से कौन-सा रस विद्यमान है?
क) वीर रस
ख) हास्य रस
ग) शांत और भक्ति रस
घ) रौद्र रस

10. तुलसीदास की काव्य भाषा मुख्य रूप से कौन-सी है?
क) ब्रज और खड़ी बोली
ख) अवधी और ब्रज
ग) मैथिली और अवधी
घ) राजस्थानी और ब्रज


उत्तरमाला:

  1. ग) रामचरितमानस
  2. ख) अयोध्याकांड
  3. ग) उनका कंठ प्रेम और ग्लानि से गद्गद था
  4. ग) सहज और कृपालु
  5. ख) राम के वनगमन के लिए
  6. ख) संतोष
  7. ग) अनुप्रास
  8. ग) उनका हृदय प्रेम से भर जाता है
  9. ग) शांत और भक्ति रस
  10. ख) अवधी और ब्रज

मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपकी सरकारी परीक्षा की तैयारी में अत्यंत सहायक सिद्ध होंगे। अपनी पढ़ाई जारी रखें और सफलता प्राप्त करें!

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