Class 12 Hindi Notes Kavita 9 (विद्यापति) – Antra Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम आपकी पाठ्यपुस्तक 'अंतरा भाग 2' में संकलित कवि विद्यापति के पदों का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्ययन सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, अतः प्रत्येक बिंदु पर ध्यान केंद्रित करें।
कवि विद्यापति: विस्तृत नोट्स
1. कवि परिचय
- नाम: विद्यापति
- जन्म: लगभग 1350 ईस्वी (कुछ स्रोतों में 1380 ईस्वी भी मिलता है), बिहार के मधुबनी जिले के बिस्फी गाँव में।
- मृत्यु: लगभग 1440 ईस्वी।
- काल: भक्तिकाल से पूर्व के कवि माने जाते हैं, इन्हें 'संक्रमण काल' का कवि भी कहा जाता है क्योंकि इनकी रचनाओं में श्रृंगार और भक्ति दोनों का अद्भुत समन्वय मिलता है।
- भाषाएँ: मुख्य रूप से मैथिली, संस्कृत और अवहट्ट (पुरानी हिंदी) में रचनाएँ कीं।
- आश्रयदाता: राजा शिवसिंह और कीर्तिसिंह जैसे राजाओं के आश्रय में रहे। राजा शिवसिंह ने इन्हें 'अभिनव जयदेव' की उपाधि दी थी।
- उपाधियाँ:
- मैथिली कोकिल: मैथिली भाषा में मधुर पदों की रचना के कारण।
- अभिनव जयदेव: संस्कृत के प्रसिद्ध कवि जयदेव (गीतगोविंद के रचयिता) के समान मधुर और श्रृंगारिक पदों की रचना के कारण।
- कविकंठहार, नवकविशेखर, खेलन कवि आदि।
- प्रमुख रचनाएँ:
- मैथिली में: पदावली (इनकी प्रसिद्धि का मुख्य आधार)
- अवहट्ट में: कीर्तिलता, कीर्तिपताका (ऐतिहासिक महत्व की रचनाएँ)
- संस्कृत में: भू-परिक्रमा, पुरुष परीक्षा, लिखनावली, गंगावाक्यावली, दानवाक्यावली, दुर्गाभक्ति तरंगिणी आदि।
- साहित्यिक विशेषताएँ:
- श्रृंगार रस के सिद्धहस्त कवि। इनकी राधा-कृष्ण संबंधी पदों में लौकिक प्रेम का चित्रण अधिक है, जिसे कुछ विद्वान भक्तिपरक मानते हैं और कुछ शुद्ध श्रृंगारिक।
- लोकभाषा मैथिली को साहित्य में प्रतिष्ठित किया।
- गीत परंपरा के प्रवर्तक माने जाते हैं।
- प्रकृति का चित्रण उद्दीपन रूप में किया है।
- इनके पदों में गेयता और संगीतात्मकता का अद्भुत समन्वय है।
2. पाठ्यपुस्तक में संकलित पदों का सार एवं व्याख्या
आपकी पाठ्यपुस्तक में विद्यापति के तीन पद संकलित हैं:
पद 1: "कखन हरब दुख मोर हे भोलानाथ!" (शिव स्तुति)
- संदर्भ: इस पद में कवि ने भगवान शिव की स्तुति की है और उनसे सांसारिक दुखों से मुक्ति की प्रार्थना की है। यह पद विद्यापति की भक्ति भावना को दर्शाता है।
- सार: कवि भगवान शिव को 'भोलानाथ' कहकर संबोधित करते हुए पूछते हैं कि वे उनके दुखों को कब हरेंगे। वे स्वयं को शिव का सेवक बताते हैं और कहते हैं कि इस संसार में दुख ही दुख हैं। वे शिव से अपने उद्धार की प्रार्थना करते हैं, क्योंकि वे ही एकमात्र सहारा हैं। कवि कहते हैं कि गंगा जल से पवित्र होने के बावजूद, वे संसार के भवसागर में डूब रहे हैं। वे शिव से अपनी पीड़ा हरने और मोक्ष प्रदान करने का निवेदन करते हैं।
- भाव पक्ष:
- रस: दैन्य रस, भक्ति रस।
- भाव: आत्मसमर्पण, विनम्रता, सांसारिक दुखों से मुक्ति की आकांक्षा।
- कला पक्ष:
- भाषा: मैथिली, जिसमें संस्कृतनिष्ठ शब्दावली का भी प्रयोग है।
- शैली: गीतात्मक, प्रार्थनापरक।
- अलंकार: अनुप्रास अलंकार (जैसे 'कखन हरब दुख मोर', 'भवसागर पार')।
- गुण: प्रसाद गुण।
पद 2: "सखि हे, मोर दिनगरि भेल राति!" (विरहिणी राधा की दशा)
- संदर्भ: यह पद विप्रलंभ श्रृंगार (वियोग श्रृंगार) का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसमें कृष्ण के वियोग में राधा की दयनीय शारीरिक और मानसिक दशा का चित्रण किया गया है, जिसे एक सखी दूसरी सखी को बताती है।
- सार: एक सखी दूसरी सखी को राधा की विरह-दशा का वर्णन करते हुए कहती है कि कृष्ण के बिना राधा के लिए दिन भी रात के समान लंबा हो गया है। राधा का शरीर इतना दुर्बल हो गया है कि वे उठ भी नहीं पातीं। उनके नैनों से अश्रुधारा निरंतर बहती रहती है, जिससे उनका बिस्तर भीग गया है। वे हर पल कृष्ण का नाम जपती रहती हैं। चाँदनी रात भी उन्हें आग के समान जलाती है। कमल का फूल भी उनके लिए विष के समान प्रतीत होता है। राधा की यह दशा देखकर सखी कहती है कि वे अब जीवित नहीं रह पाएंगी।
- भाव पक्ष:
- रस: विप्रलंभ श्रृंगार (वियोग श्रृंगार)।
- भाव: विरह वेदना, अश्रुपात, दुर्बलता, प्रकृति का उद्दीपन रूप।
- कला पक्ष:
- भाषा: मैथिली, जिसमें मधुरता और कोमलता है।
- शैली: गीतात्मक, संवाद शैली (सखी द्वारा वर्णन)।
- अलंकार:
- उपमा: 'दिनगरि भेल राति' (दिन रात जैसा)।
- अतिशयोक्ति: 'नयनक नीर सों भरल सब खाट' (आँसुओं से पूरा बिस्तर भर जाना)।
- विरोधाभास: 'चंदन चाँदनी' (चंदन शीतल होता है, चाँदनी प्रिय होती है, पर विरह में ये भी अग्नि के समान लगते हैं)।
- अनुप्रास: 'कमल कतहुँ जनि विष भेल'
- गुण: माधुर्य गुण की प्रधानता।
पद 3: "आध बदन ससि, आध बदन परकास!" (राधा के सौंदर्य का वर्णन)
- संदर्भ: यह पद संयोग श्रृंगार का उदाहरण है, जिसमें कृष्ण द्वारा राधा के अद्भुत रूप सौंदर्य का वर्णन किया गया है।
- सार: कृष्ण राधा के सौंदर्य का वर्णन करते हुए कहते हैं कि राधा का आधा मुख चंद्रमा के समान है और आधे मुख पर प्रकाश फैला हुआ है। उनके नेत्र चंचल हिरणी के समान सुंदर हैं। उनकी भौंहें कामदेव के धनुष के समान हैं, जो प्रेम के बाण चलाती हैं। उनके केशों का गुच्छा ऐसा प्रतीत होता है जैसे काले सर्प चंद्रमा को घेर रहे हों। उनकी वाणी इतनी मधुर है कि कोयल और भ्रमर भी सुनकर लज्जित हो जाते हैं। कृष्ण कहते हैं कि राधा का सौंदर्य इतना अद्भुत है कि वे इसे शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकते।
- भाव पक्ष:
- रस: संयोग श्रृंगार।
- भाव: सौंदर्य वर्णन, प्रेम की अभिव्यक्ति, नायिका के प्रति आसक्ति।
- कला पक्ष:
- भाषा: मैथिली, जिसमें बिंब विधान की उत्कृष्टता है।
- शैली: गीतात्मक, चित्रात्मक।
- अलंकार:
- उपमा: 'आध बदन ससि' (मुख चंद्रमा जैसा), 'नयन मृग मद' (नेत्र हिरण जैसे)।
- रूपक: 'भोंह कामक धनु' (भौंहों पर कामदेव के धनुष का आरोप)।
- उत्प्रेक्षा: 'केश पास जनि लोल भुअंगम' (केशों में काले सर्पों की संभावना)।
- अनुप्रास: 'कोकिल भ्रमर'
- गुण: माधुर्य गुण की प्रधानता।
3. काव्य सौंदर्य (समग्र)
- भाव पक्ष:
- रस: श्रृंगार रस (संयोग और वियोग दोनों) की प्रधानता। भक्ति रस (शिव स्तुति में) और दैन्य रस का भी प्रयोग।
- भाव: प्रेम की गहन अनुभूतियाँ, विरह की पीड़ा, सौंदर्य का चित्रण, आत्मनिवेदन।
- प्रकृति चित्रण: प्रकृति का उद्दीपन रूप में प्रयोग (जैसे चाँदनी का अग्नि के समान लगना)।
- कला पक्ष:
- भाषा: लोकभाषा मैथिली का मधुर और सहज प्रयोग। संस्कृतनिष्ठ शब्दावली का भी समावेश। भाषा में गेयता और संगीतात्मकता प्रमुख है।
- शैली: गीतात्मक, मुक्तक शैली। पदों में गेयता होने के कारण ये पद लोकगीतों के रूप में भी प्रचलित हुए।
- छंद: पद (गेय छंद)।
- अलंकार: उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अनुप्रास, पुनरुक्ति प्रकाश, विरोधाभास, अतिशयोक्ति आदि अलंकारों का सहज और प्रभावी प्रयोग।
- शब्द शक्ति: अभिधा और लक्षणा।
- गुण: माधुर्य गुण की प्रधानता, प्रसाद गुण भी विद्यमान।
- बिंब विधान: इनकी कविताओं में सुंदर और सजीव बिंबों का प्रयोग मिलता है, जो पाठक के मन में एक स्पष्ट चित्र उकेरते हैं।
4. महत्वपूर्ण बिंदु (सरकारी परीक्षाओं हेतु)
- विद्यापति को 'मैथिली कोकिल' और 'अभिनव जयदेव' जैसी उपाधियाँ क्यों मिलीं, यह महत्वपूर्ण है।
- उनकी रचनाओं में श्रृंगार और भक्ति का अद्भुत समन्वय, जिसे 'शृंगारिक भक्ति' भी कहा जाता है।
- लोकभाषा मैथिली को साहित्य में प्रतिष्ठित करने का श्रेय।
- गीत परंपरा के प्रवर्तक के रूप में उनका महत्व।
- उनके पदों में लौकिक प्रेम और अलौकिक प्रेम के बीच की सूक्ष्म रेखा को समझना।
- उनके आश्रयदाता राजा शिवसिंह का नाम और उनकी प्रमुख रचनाएँ (पदावली, कीर्तिलता, कीर्तिपताका)।
- उनके पदों में प्रयुक्त रस (श्रृंगार, भक्ति, दैन्य) और प्रमुख अलंकार (उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा)।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
-
विद्यापति का जन्म किस शताब्दी में हुआ था?
क) 12वीं शताब्दी
ख) 13वीं शताब्दी
ग) 14वीं शताब्दी
घ) 15वीं शताब्दी -
विद्यापति को 'मैथिली कोकिल' की उपाधि क्यों दी गई?
क) वे कोयल की तरह गाते थे।
ख) उन्होंने मैथिली भाषा में मधुर पदों की रचना की।
ग) वे मैथिली के राजा थे।
घ) उन्होंने कोयल पर अनेक कविताएँ लिखीं। -
'अभिनव जयदेव' की उपाधि विद्यापति को किसने दी थी?
क) राजा कीर्तिसिंह
ख) राजा शिवसिंह
ग) स्वयं विद्यापति ने
घ) जनता ने -
विद्यापति की कौन सी रचना अवहट्ट भाषा में है?
क) पदावली
ख) भू-परिक्रमा
ग) कीर्तिलता
घ) गंगावाक्यावली -
'कखन हरब दुख मोर हे भोलानाथ!' पद में कवि किस रस की अभिव्यक्ति कर रहे हैं?
क) श्रृंगार रस
ख) वीर रस
ग) भक्ति रस
घ) रौद्र रस -
'सखि हे, मोर दिनगरि भेल राति!' पद में किस प्रकार के श्रृंगार का चित्रण है?
क) संयोग श्रृंगार
ख) विप्रलंभ श्रृंगार
ग) हास्य श्रृंगार
घ) अद्भुत श्रृंगार -
'आध बदन ससि, आध बदन परकास!' पद में राधा के सौंदर्य वर्णन के लिए किस अलंकार का प्रयोग हुआ है?
क) यमक
ख) श्लेष
ग) उपमा
घ) मानवीकरण -
विद्यापति के पदों की प्रमुख भाषा क्या है?
क) अवधी
ख) ब्रजभाषा
ग) मैथिली
घ) खड़ी बोली -
विद्यापति को किस काल का कवि माना जाता है?
क) आदिकाल
ख) भक्तिकाल
ग) रीतिकाल
घ) संक्रमण काल (भक्तिकाल से पूर्व) -
'केश पास जनि लोल भुअंगम' पंक्ति में कौन सा अलंकार है?
क) उपमा
ख) रूपक
ग) उत्प्रेक्षा
घ) अतिशयोक्ति
उत्तरमाला:
- ग) 14वीं शताब्दी
- ख) उन्होंने मैथिली भाषा में मधुर पदों की रचना की।
- ख) राजा शिवसिंह
- ग) कीर्तिलता
- ग) भक्ति रस
- ख) विप्रलंभ श्रृंगार
- ग) उपमा
- ग) मैथिली
- घ) संक्रमण काल (भक्तिकाल से पूर्व)
- ग) उत्प्रेक्षा
आशा है यह विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपकी सरकारी परीक्षाओं की तैयारी में सहायक सिद्ध होंगे। अपनी पढ़ाई जारी रखें और सफलता प्राप्त करें!