Class 12 Hindi Notes Story 12 (रामचंद्र शुक्ल) – Antra Book

Antra
प्रिय विद्यार्थियों, आज हम कक्षा 12 की पाठ्यपुस्तक 'अंतरा भाग 2' में संकलित महत्वपूर्ण पाठ 'रामचंद्र शुक्ल' का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह पाठ आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित एक निबंध है, जिसमें उन्होंने आचार्य रामचंद्र शुक्ल के व्यक्तित्व और कृतित्व का सूक्ष्म मूल्यांकन किया है। सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए यह पाठ अत्यंत महत्वपूर्ण है, अतः हम इसके हर पहलू पर गहराई से विचार करेंगे ताकि कोई भी आवश्यक जानकारी छूटे नहीं।


पाठ: रामचंद्र शुक्ल

लेखक: आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

विधा: निबंध


1. लेखक परिचय: आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

  • जन्म: 19 अगस्त, 1907 ई. को दुबे का छपरा, बलिया (उत्तर प्रदेश) में।
  • मृत्यु: 19 मई, 1979 ई. को दिल्ली में।
  • शिक्षा: काशी हिंदू विश्वविद्यालय से ज्योतिष और संस्कृत में आचार्य की उपाधि प्राप्त की।
  • कार्यक्षेत्र: शांति निकेतन में हिंदी विभाग के अध्यक्ष, काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के अध्यक्ष, पंजाब विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के अध्यक्ष।
  • प्रमुख कृतियाँ:
    • निबंध संग्रह: अशोक के फूल, कुटज, विचार और वितर्क, कल्पलता, आलोक पर्व। (विशेष रूप से 'आलोक पर्व' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।)
    • उपन्यास: बाणभट्ट की आत्मकथा, चारु चंद्रलेख, पुनर्नवा, अनामदास का पोथा।
    • आलोचना/इतिहास: हिंदी साहित्य की भूमिका, हिंदी साहित्य का आदिकाल, कबीर, सूर साहित्य, नाथ संप्रदाय, हिंदी साहित्य: उद्भव और विकास।
  • सम्मान: पद्म भूषण (1957), साहित्य अकादमी पुरस्कार (1973), डी. लिट. की मानद उपाधि।
  • विशेषता: द्विवेदी जी एक उत्कृष्ट ललित निबंधकार, इतिहासकार, आलोचक, उपन्यासकार और शोधकर्ता के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उनकी भाषा संस्कृतनिष्ठ, परिष्कृत और प्रवाहमयी है।

2. पाठ परिचय: 'रामचंद्र शुक्ल' (निबंध)

  • यह निबंध आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखा गया है, जिसमें उन्होंने हिंदी साहित्य के मूर्धन्य आलोचक, इतिहासकार और निबंधकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल के व्यक्तित्व और कृतित्व का गहन विश्लेषण किया है।
  • द्विवेदी जी ने शुक्ल जी के प्रति अपनी श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करते हुए उनके गंभीर, दृढ़ और स्वाभिमानी व्यक्तित्व के साथ-साथ उनके भीतर छिपी विनम्रता, शिष्टता और हास्यबोध जैसे मानवीय गुणों को भी उजागर किया है।
  • यह पाठ शुक्ल जी के साहित्यिक योगदान, विशेषकर उनके 'हिंदी साहित्य का इतिहास' और 'चिंतामणि' जैसे कालजयी ग्रंथों की महत्ता को भी रेखांकित करता है।
  • द्विवेदी जी ने शुक्ल जी की आलोचना पद्धति और उनके लोक मंगल संबंधी विचारों पर भी प्रकाश डाला है।

3. आचार्य रामचंद्र शुक्ल का व्यक्तित्व (द्विवेदी जी की दृष्टि में)

द्विवेदी जी ने आचार्य शुक्ल के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को सूक्ष्मता से प्रस्तुत किया है:

  • गंभीरता और दृढ़ता: शुक्ल जी का बाह्य व्यक्तित्व अत्यंत गंभीर और दृढ़ था। वे किसी भी बात को बिना सोचे-समझे स्वीकार नहीं करते थे और अपने विचारों पर अडिग रहते थे। उनकी मुखमुद्रा पर एक चिंतनशीलता और गंभीरता सदैव बनी रहती थी।
  • स्वाभिमान: उनमें प्रबल स्वाभिमान था। वे किसी भी प्रकार के अनुचित दबाव या प्रभाव को स्वीकार नहीं करते थे। वे अपनी मान्यताओं और सिद्धांतों पर अटल रहते थे।
  • विनम्रता और शिष्टता: उनकी गंभीर छवि के पीछे एक गहरी विनम्रता और शिष्टता छिपी थी, जिसे केवल उनके निकट के लोग ही जान पाते थे। वे कभी किसी को अनावश्यक कष्ट नहीं देते थे और दूसरों के प्रति आदरभाव रखते थे।
  • हास्यबोध और विनोदप्रियता: द्विवेदी जी ने विशेष रूप से उनके हास्यबोध को रेखांकित किया है। वे बताते हैं कि शुक्ल जी विनोदप्रिय व्यक्ति थे और हास-परिहास में भी अपनी बात कह जाते थे। उनका यह गुण उनकी गंभीर छवि से भिन्न था।
  • अध्यापन शैली: वे एक कुशल और प्रभावशाली अध्यापक थे। उनकी कक्षा में विद्यार्थी पूर्ण अनुशासन में रहते थे। उनके व्याख्यान अत्यंत सारगर्भित होते थे, जो छात्रों को सोचने, विश्लेषण करने और स्वतंत्र मत बनाने के लिए प्रेरित करते थे। वे केवल तथ्यों का रटना नहीं सिखाते थे, बल्कि ज्ञान की गहराई में उतरने का मार्ग प्रशस्त करते थे।
  • साहित्यिक निष्ठा: साहित्य के प्रति उनकी निष्ठा अद्वितीय थी। वे साहित्य को केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि जीवन और समाज को दिशा देने वाला, लोक मंगल का साधक मानते थे।
  • भारतीय संस्कृति और साहित्य के प्रति अनुराग: उन्हें भारतीय संस्कृति, साहित्य, परंपराओं और दर्शन से गहरा लगाव था। उनकी आलोचना में भारतीयता और भारतीय जीवन-मूल्यों का विशेष महत्व था।
  • निडरता और स्पष्टवादिता: वे अपने विचारों को निडरता और स्पष्टता से प्रस्तुत करते थे, भले ही वे तत्कालीन मान्यताओं या स्थापित विचारों के विरुद्ध क्यों न हों। वे सत्य को कहने में कभी संकोच नहीं करते थे।

4. आचार्य रामचंद्र शुक्ल का कृतित्व (साहित्यिक योगदान)

आचार्य शुक्ल का साहित्यिक योगदान अत्यंत व्यापक और मौलिक है। द्विवेदी जी ने उनके प्रमुख कृतित्व का उल्लेख किया है:

  • हिंदी साहित्य का इतिहास (1929 ई.):
    • यह उनका सर्वाधिक महत्वपूर्ण और कालजयी ग्रंथ है, जो मूलतः 'हिंदी शब्दसागर' की भूमिका के रूप में लिखा गया था।
    • इसमें उन्होंने हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक काल-विभाजन किया और प्रवृत्तियों के आधार पर नामकरण किया।
    • यह आज भी हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन का आधार स्तंभ माना जाता है।
    • इसमें उन्होंने कवियों और लेखकों का मूल्यांकन उनकी रचनाओं के आधार पर किया, न कि केवल उनकी ख्याति या परंपरा के आधार पर।
  • चिंतामणि (निबंध संग्रह):
    • यह उनके मनोवैज्ञानिक और भाव संबंधी निबंधों का संग्रह है।
    • भाग 1 (1939 ई.) में 'भाव या मनोविकार' संबंधी निबंध (जैसे श्रद्धा और भक्ति, करुणा, लज्जा और ग्लानि, लोभ और प्रीति, उत्साह) तथा 'साहित्यिक सिद्धांत' संबंधी निबंध (जैसे कविता क्या है) संकलित हैं।
    • इन निबंधों में उन्होंने भारतीय दर्शन, मनोविज्ञान और जीवन के अनुभवों का गहरा प्रभाव दिखाया है।
  • रस मीमांसा:
    • यह उनकी सैद्धांतिक आलोचना का ग्रंथ है।
    • इसमें उन्होंने रस सिद्धांत की विस्तृत व्याख्या की और उसे लोक मंगल से जोड़ा।
    • वे 'लोक मंगल की साधना अवस्था' को काव्य का चरम लक्ष्य मानते थे।
  • संपादन कार्य:
    • काशी नागरी प्रचारिणी पत्रिका: इसके संपादक मंडल में रहे।
    • तुलसी ग्रंथावली: गोस्वामी तुलसीदास की रचनाओं का संपादन।
    • जायसी ग्रंथावली: मलिक मुहम्मद जायसी के 'पद्मावत' का संपादन, जिसमें विस्तृत भूमिका भी लिखी।
    • भ्रमरगीत सार: सूरदास के भ्रमरगीत प्रसंग के महत्वपूर्ण पदों का संपादन, जिसमें भावपूर्ण और विस्तृत व्याख्या भी दी।
  • अनुवाद कार्य:
    • शशांक: बंकिमचंद्र चटर्जी के उपन्यास का बांग्ला से हिंदी में अनुवाद।
    • विश्व-प्रपंच: अर्नस्ट हेकल की 'द रिडल ऑफ द यूनिवर्स' (The Riddle of the Universe) का अनुवाद।
    • कल्पना का आनंद: एडिसन के निबंधों का अनुवाद।

5. आचार्य शुक्ल की आलोचना पद्धति

  • रसवादी आलोचक: वे रस सिद्धांत को काव्य का मूल आधार मानते थे और काव्य में भावों की प्रधानता पर बल देते थे।
  • लोक मंगल की साधना अवस्था: उनके अनुसार, काव्य का अंतिम लक्ष्य व्यक्तिगत आनंद न होकर 'लोक मंगल की साधना अवस्था' को स्थापित करना है। वे काव्य को समाज और जीवन से जोड़कर देखते थे।
  • भारतीय काव्यशास्त्र पर आधारित: उनकी आलोचना पद्धति पाश्चात्य सिद्धांतों से प्रभावित न होकर मुख्यतः भारतीय काव्यशास्त्र, विशेषकर रस सिद्धांत, पर आधारित थी।
  • तुलनात्मक आलोचना: उन्होंने कवियों की तुलना करते हुए उनकी विशेषताओं और सीमाओं को उजागर किया।
  • वैज्ञानिक और वस्तुनिष्ठ: उनकी आलोचना में वैज्ञानिकता और वस्तुनिष्ठता थी। वे किसी भी रचना का मूल्यांकन पूर्वाग्रह से मुक्त होकर करते थे।

6. द्विवेदी जी का शुक्ल जी के प्रति दृष्टिकोण

  • द्विवेदी जी ने शुक्ल जी का मूल्यांकन अत्यंत श्रद्धा, सम्मान और आत्मीयता के साथ किया है।
  • वे शुक्ल जी की विद्वत्ता, मौलिकता और साहित्यिक निष्ठा के प्रशंसक थे।
  • उन्होंने शुक्ल जी के व्यक्तित्व के उन पहलुओं को भी उजागर किया, जो सामान्यतः उनकी गंभीर छवि के कारण छिपे रहते थे (जैसे उनका हास्यबोध, विनम्रता और शिष्टता)।
  • कुछ साहित्यिक सिद्धांतों पर द्विवेदी जी के अपने स्वतंत्र विचार थे, जैसे वे आदिकाल के नामकरण या कबीर के मूल्यांकन पर शुक्ल जी से कुछ भिन्न मत रखते थे, लेकिन उन्होंने शुक्ल जी की महत्ता और उनके योगदान को कभी कम नहीं आंका। वे उन्हें हिंदी साहित्य का एक युग प्रवर्तक आचार्य मानते थे।

7. पाठ की भाषा शैली

  • यह निबंध आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की अपनी विशिष्ट ललित निबंध शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है।
  • गंभीर विचारों को भी सहज, प्रवाहमयी और आकर्षक भाषा में प्रस्तुत किया गया है।
  • संस्कृतनिष्ठ शब्दावली का प्रयोग प्रचुर मात्रा में है, किंतु बोधगम्यता बनी रहती है।
  • शैली में वैयक्तिक स्पर्श है, जिसमें लेखक की अपनी अनुभूतियाँ, अवलोकन और आत्मीयता शामिल है।
  • वाक्य विन्यास सुगठित और विचारोत्तेजक है।

निष्कर्ष

यह निबंध आचार्य रामचंद्र शुक्ल के बहुआयामी व्यक्तित्व और उनके अप्रतिम साहित्यिक योगदान को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। द्विवेदी जी ने एक महान आलोचक का मूल्यांकन करते हुए स्वयं भी एक महान आलोचक और निबंधकार के रूप में अपनी पहचान स्थापित की है। यह पाठ हमें बताता है कि कैसे एक विद्वान दूसरे विद्वान का सम्मान करते हुए भी उसके व्यक्तित्व के अनछुए पहलुओं को उजागर कर सकता है।


बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

  1. 'रामचंद्र शुक्ल' नामक निबंध के लेखक कौन हैं?
    क) आचार्य रामचंद्र शुक्ल
    ख) हजारी प्रसाद द्विवेदी
    ग) नामवर सिंह
    घ) रामविलास शर्मा

  2. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म किस वर्ष हुआ था?
    क) 1905
    ख) 1907
    ग) 1910
    घ) 1912

  3. द्विवेदी जी के अनुसार, आचार्य शुक्ल का बाह्य व्यक्तित्व कैसा था?
    क) अत्यंत विनोदप्रिय
    ख) गंभीर और दृढ़
    ग) चंचल और उत्साही
    घ) शांत और अंतर्मुखी

  4. आचार्य रामचंद्र शुक्ल का कौन सा ग्रंथ हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन का आधार स्तंभ माना जाता है?
    क) चिंतामणि
    ख) रस मीमांसा
    ग) हिंदी साहित्य का इतिहास
    घ) भ्रमरगीत सार

  5. 'चिंतामणि' किस विधा की रचना है?
    क) उपन्यास
    ख) कहानी संग्रह
    ग) निबंध संग्रह
    घ) आलोचना ग्रंथ

  6. आचार्य शुक्ल ने काव्य का चरम लक्ष्य किसे माना है?
    क) व्यक्तिगत आनंद
    ख) लोक मंगल की साधना अवस्था
    ग) कला-कला के लिए
    घ) मनोरंजन

  7. आचार्य शुक्ल ने 'भ्रमरगीत सार' का संपादन किस कवि के पदों को लेकर किया था?
    क) तुलसीदास
    ख) कबीरदास
    ग) सूरदास
    घ) जायसी

  8. आचार्य शुक्ल द्वारा 'शशांक' नामक उपन्यास का अनुवाद मूलतः किस भाषा से किया गया था?
    क) अंग्रेजी
    ख) बांग्ला
    ग) संस्कृत
    घ) मराठी

  9. द्विवेदी जी ने आचार्य शुक्ल के किस गुण को उनकी गंभीर छवि के विपरीत बताया है?
    क) उनकी विद्वत्ता
    ख) उनका स्वाभिमान
    ग) उनका हास्यबोध
    घ) उनकी निर्भीकता

  10. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को किस रचना के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था?
    क) अशोक के फूल
    ख) बाणभट्ट की आत्मकथा
    ग) आलोक पर्व
    घ) कुटज


उत्तरमाला:

  1. ख) हजारी प्रसाद द्विवेदी
  2. ख) 1907
  3. ख) गंभीर और दृढ़
  4. ग) हिंदी साहित्य का इतिहास
  5. ग) निबंध संग्रह
  6. ख) लोक मंगल की साधना अवस्था
  7. ग) सूरदास
  8. ख) बांग्ला
  9. ग) उनका हास्यबोध
  10. ग) आलोक पर्व

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