Class 12 History Notes Chapter 1 (Chapter 1) – Bharatiya Itihas ke Kuch Vishay-II Book

प्रिय विद्यार्थियों,
आज हम आपकी कक्षा 12 की इतिहास की पुस्तक 'भारतीय इतिहास के कुछ विषय-II' के अध्याय 1, "यात्रियों के नज़रिए: समाज के बारे में उनकी समझ (लगभग दसवीं से सत्रहवीं सदी तक)" का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय सरकारी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह हमें मध्यकालीन भारतीय समाज को विभिन्न विदेशी यात्रियों की आँखों से देखने का अवसर देता है।
अध्याय 1: यात्रियों के नज़रिए: समाज के बारे में उनकी समझ (लगभग दसवीं से सत्रहवीं सदी तक)
परिचय:
विदेशी यात्रियों के वृत्तांत भारतीय इतिहास के महत्वपूर्ण स्रोतों में से एक हैं। ये वृत्तांत हमें तत्कालीन समाज, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और राजनीतिक व्यवस्था की जानकारी देते हैं, जिन्हें स्थानीय स्रोतों में अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। ये यात्री विभिन्न कारणों से भारत आए - कुछ काम की तलाश में, कुछ धार्मिक उद्देश्यों से, कुछ साहसिक यात्राओं के लिए, और कुछ व्यापार के लिए। उनके लेखन में अक्सर उनके अपने देश और भारत के बीच तुलनाएँ मिलती हैं, जो हमें उनके दृष्टिकोण और पूर्वाग्रहों को समझने में मदद करती हैं।
इस अध्याय में हम तीन प्रमुख यात्रियों के वृत्तांतों पर ध्यान केंद्रित करेंगे:
- अल-बिरूनी (Al-Biruni) - 11वीं शताब्दी (उज़्बेकिस्तान से)
- इब्न बतूता (Ibn Battuta) - 14वीं शताब्दी (मोरक्को से)
- फ्रांस्वा बर्नियर (François Bernier) - 17वीं शताब्दी (फ्रांस से)
1. अल-बिरूनी और 'किताब-उल-हिंद' (लगभग 11वीं शताब्दी)
पृष्ठभूमि:
- जन्म और शिक्षा: अल-बिरूनी का जन्म 973 ई. में ख़्वारिज़्म (आधुनिक उज़्बेकिस्तान) में हुआ था। वह कई भाषाओं के ज्ञाता थे, जिनमें सीरियाई, अरबी, फ़ारसी, हिब्रू और संस्कृत शामिल थीं।
- भारत आगमन: 1017 ई. में सुल्तान महमूद गज़नी ने ख़्वारिज़्म पर आक्रमण किया और अल-बिरूनी को बंधक बनाकर अपनी राजधानी गज़नी ले गया। यहीं पर अल-बिरूनी को भारत के प्रति रुचि हुई और उन्होंने संस्कृत सीखी, भारतीय दर्शन और धर्म का अध्ययन किया। उन्होंने ब्राह्मण पुजारियों और विद्वानों के साथ कई वर्ष बिताए।
किताब-उल-हिंद (तहकीक-ए-हिंद):
- विषय-वस्तु: अल-बिरूनी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'किताब-उल-हिंद' (भारत की पुस्तक) अरबी भाषा में लिखी। यह एक विशाल ग्रंथ है, जिसमें धर्म, दर्शन, त्योहारों, खगोल विज्ञान, कीमिया (रसायन विज्ञान), रीति-रिवाजों, सामाजिक जीवन, भार-माप, मूर्तिकला, कानून और माप-पद्धति जैसे विषयों पर 80 अध्याय हैं।
- लेखन शैली: अल-बिरूनी ने अपनी पुस्तक में एक विशिष्ट संरचना का पालन किया। प्रत्येक अध्याय की शुरुआत एक प्रश्न से होती थी, फिर संस्कृतवादी परंपराओं के आधार पर उसका वर्णन किया जाता था और अंत में अन्य संस्कृतियों से उसकी तुलना की जाती थी। यह एक वैज्ञानिक और वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण को दर्शाता है।
- चुनौतियाँ: अल-बिरूनी ने भारत को समझने में तीन प्रमुख बाधाएँ बताईं:
- भाषा: संस्कृत, अरबी और फ़ारसी से बहुत भिन्न थी।
- रीति-रिवाज और प्रथाएँ: भारतीय रीति-रिवाज उनके अपने समाज से बहुत अलग थे।
- आत्म-अलगाव: भारतीय समाज का आत्म-अलगाव (अपनी श्रेष्ठता का बोध) जिसने उनके लिए जानकारी प्राप्त करना कठिन बना दिया।
भारत का चित्रण:
- वर्ण व्यवस्था: अल-बिरूनी ने भारत की वर्ण व्यवस्था का विस्तृत वर्णन किया। उन्होंने इसे फ़ारसी समाज की चार श्रेणियों से तुलना की, लेकिन इस बात पर जोर दिया कि इस्लाम में सभी लोग समान माने जाते हैं। उन्होंने ब्राह्मणों द्वारा बताए गए वर्ण व्यवस्था के नियमों को दर्ज किया, लेकिन यह भी बताया कि इस व्यवस्था में शुद्धता और अपवित्रता की अवधारणाएँ गहरी थीं।
- जाति व्यवस्था: उन्होंने लिखा कि वर्ण व्यवस्था के भीतर ही उपजातियाँ थीं और यह व्यवस्था इतनी कठोर थी कि पेशे के आधार पर भी लोगों को अछूत माना जाता था।
- धार्मिक विश्वास: उन्होंने भारतीय देवी-देवताओं, अवतारों और धार्मिक अनुष्ठानों का वर्णन किया।
- विज्ञान और गणित: उन्होंने भारतीय खगोल विज्ञान और गणित की प्रशंसा की।
2. इब्न बतूता और 'रिहला' (लगभग 14वीं शताब्दी)
पृष्ठभूमि:
- जन्म और यात्राएँ: इब्न बतूता का जन्म 1304 ई. में मोरक्को के तांजेर शहर में हुआ था। वह इस्लामी कानून (शरिया) के ज्ञाता थे। उन्होंने 1332-33 ई. में भारत आने से पहले उत्तरी अफ्रीका, पश्चिम एशिया और मध्य एशिया की यात्रा की थी।
- भारत आगमन: 1333 ई. में वह स्थल मार्ग से सिंध पहुँचे। दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक ने उनकी विद्वत्ता से प्रभावित होकर उन्हें दिल्ली का क़ाज़ी (न्यायाधीश) नियुक्त किया। वह आठ वर्षों तक इस पद पर रहे।
- चीन की यात्रा: 1342 ई. में सुल्तान ने उन्हें मंगोल शासक के पास दूत बनाकर चीन भेजा। इस यात्रा के दौरान उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
रिहला (Rihla):
- विषय-वस्तु: इब्न बतूता ने अपनी यात्रा का वृत्तांत अरबी भाषा में 'रिहला' नामक पुस्तक में लिखा। यह पुस्तक 14वीं शताब्दी के भारतीय उपमहाद्वीप के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करती है।
- लेखन शैली: इब्न बतूता ने अपने वृत्तांत में जिज्ञासा और रोमांच का पुट डाला। उन्होंने उन चीजों का वर्णन किया जो उनके लिए असामान्य थीं, जैसे नारियल और पान।
भारत का चित्रण:
- शहरी केंद्र: इब्न बतूता ने भारतीय शहरों को घनी आबादी वाला, समृद्ध और अवसरों से भरा बताया। उन्होंने दिल्ली को एक विशाल और समृद्ध शहर बताया। दौलताबाद (महाराष्ट्र) को भी दिल्ली जितना ही बड़ा बताया।
- बाजार: भारतीय बाजार न केवल आर्थिक विनिमय के केंद्र थे, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के भी केंद्र थे। अधिकांश बाजारों में एक मस्जिद और एक मंदिर होता था।
- संचार और डाक व्यवस्था: सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक की कुशल डाक व्यवस्था (डाक प्रणाली) से इब्न बतूता बहुत प्रभावित हुए।
- अश्व डाक (उलुक): हर चार मील पर राजकीय घोड़े तैनात होते थे।
- पैदल डाक (दावा): हर मील पर तीन चौकियाँ होती थीं, जहाँ तीन हरकारे (संदेशवाहक) होते थे। यह व्यवस्था अश्व डाक से भी तेज थी और अक्सर खुरासान से फल लाने के लिए इस्तेमाल होती थी।
- कृषि: भारतीय मिट्टी उपजाऊ थी और किसान वर्ष में दो फसलें उगाते थे।
- नारियल और पान: इब्न बतूता ने नारियल का वर्णन एक ऐसे फल के रूप में किया जो मनुष्य के सिर जैसा दिखता है और पान का वर्णन एक ऐसी बेल के रूप में किया जिसकी खेती पत्तों के लिए होती है।
- दास प्रथा: इब्न बतूता ने भारत में दास प्रथा का विस्तृत वर्णन किया। सुल्तान दासों को उपहार के रूप में प्राप्त करते थे और उन्हें विभिन्न कार्यों में लगाते थे। महिलाएं दासों को घरेलू काम के लिए खरीदती थीं। दासियों को संगीत और नृत्य सिखाया जाता था।
- सती प्रथा: उन्होंने सती प्रथा का भी वर्णन किया, जिसमें विधवाएँ अपने पति की चिता पर स्वयं को जला देती थीं। वे इस प्रथा से बहुत प्रभावित हुए।
3. फ्रांस्वा बर्नियर और 'ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर' (लगभग 17वीं शताब्दी)
पृष्ठभूमि:
- जन्म और पेशा: फ्रांस्वा बर्नियर का जन्म 1625 ई. में फ्रांस में हुआ था। वह एक चिकित्सक, दार्शनिक और इतिहासकार थे।
- भारत आगमन: वह 1656 से 1668 ई. तक 12 वर्षों तक भारत में रहे। उन्होंने मुगल दरबार में दारा शिकोह के चिकित्सक के रूप में और बाद में दानिशमंद खान नामक एक अर्मेनियाई अमीर के साथ एक बुद्धिजीवी और वैज्ञानिक के रूप में काम किया।
- लेखन: उन्होंने अपनी यात्रा के अनुभव को 'ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर' (Travels in the Mughal Empire) नामक पुस्तक में लिखा। यह पुस्तक फ्रांस में प्रकाशित हुई और जल्द ही अंग्रेजी, डच, जर्मन और इतालवी भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ।
भारत का चित्रण (तुलनात्मक दृष्टिकोण):
बर्नियर ने भारत को यूरोप से तुलना करते हुए अक्सर भारत को निम्न दर्शाया। उनकी राय में, भारत में यूरोप की तुलना में बहुत कमियाँ थीं।
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भू-स्वामित्व का प्रश्न: बर्नियर के अनुसार, मुगल साम्राज्य में निजी भू-स्वामित्व का अभाव था। उनका मानना था कि राज्य ही भूमि का एकमात्र मालिक था।
- नकारात्मक प्रभाव: इस सिद्धांत के अनुसार, भूमि का स्वामित्व न होने के कारण भू-धारकों को भूमि में निवेश करने का कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता था, जिससे कृषि का पतन होता था। किसानों को बेदखल किया जा सकता था, जिससे वे गरीब हो जाते थे।
- "प्राच्य निरंकुशता" (Oriental Despotism): बर्नियर के इस विचार को "प्राच्य निरंकुशता" के सिद्धांत के रूप में विकसित किया गया, जिसमें पूर्वी शासकों को निरंकुश और अपनी प्रजा पर पूर्ण नियंत्रण रखने वाला बताया गया। यह सिद्धांत कार्ल मार्क्स जैसे विचारकों द्वारा भी अपनाया गया।
- आलोचना: आधुनिक इतिहासकारों ने बर्नियर के इस विचार की आलोचना की है, क्योंकि मुगल काल में भू-स्वामित्व के विभिन्न रूप मौजूद थे, जैसे जमींदारी और रैयतवारी।
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शहर और शहरी जीवन: बर्नियर ने मुगल शहरों को "शाही शिविर" (camp towns) बताया, जो शाही दरबार के साथ चलते थे और जब दरबार एक जगह से दूसरी जगह जाता था तो उनका अस्तित्व समाप्त हो जाता था।
- वास्तविकता: हालांकि, कई मुगल शहर जैसे आगरा, दिल्ली, लाहौर, अहमदाबाद आदि महत्वपूर्ण व्यापारिक और उत्पादन केंद्र थे, जो शाही उपस्थिति से स्वतंत्र रूप से विकसित हुए थे।
- उत्पादन: बर्नियर ने भारत में बड़े पैमाने पर उत्पादन का भी वर्णन किया, जिसमें रेशम, कपास और विभिन्न प्रकार के वस्त्र शामिल थे।
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सामाजिक असमानता: बर्नियर ने मुगल भारत में "अत्यधिक धनी" और "अत्यधिक निर्धन" के बीच एक बड़ा सामाजिक अंतर देखा। उन्होंने मध्य वर्ग के अभाव का उल्लेख किया, जो यूरोप में मौजूद था।
- सेना: मुगल सेना में बड़ी संख्या में सैनिक थे, लेकिन उनकी स्थिति भी अस्थिर थी।
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महिलाओं की स्थिति: बर्नियर ने महिलाओं की स्थिति को "दयनीय" बताया।
- सती प्रथा: उन्होंने सती प्रथा को "क्रूर" बताया और इसका विस्तृत वर्णन किया।
- दास प्रथा: उन्होंने लिखा कि महिलाएं दासों के रूप में खरीदी और बेची जाती थीं।
- संपत्ति अधिकार: उन्होंने भारतीय महिलाओं को संपत्ति के अधिकारों से वंचित बताया।
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यूरोप से तुलना: बर्नियर ने लगातार भारत की तुलना यूरोप से की और भारत को यूरोप से निम्न दर्शाया। उनका उद्देश्य यूरोप में अपनी पुस्तक के माध्यम से मुगल साम्राज्य की कमियों को उजागर करना था।
निष्कर्ष:
इन यात्रियों के वृत्तांत हमें मध्यकालीन भारत की एक बहुआयामी तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। अल-बिरूनी ने एक विद्वान के रूप में भारतीय समाज, धर्म और विज्ञान का अध्ययन किया। इब्न बतूता ने एक साहसी यात्री के रूप में शहरों, व्यापार और संचार प्रणालियों का विस्तृत वर्णन किया। फ्रांस्वा बर्नियर ने एक यूरोपीय चिकित्सक के रूप में मुगल साम्राज्य की राजनीतिक अर्थव्यवस्था और सामाजिक असमानताओं पर ध्यान केंद्रित किया, अक्सर तुलनात्मक और आलोचनात्मक दृष्टिकोण अपनाते हुए।
ये वृत्तांत महत्वपूर्ण स्रोत हैं, लेकिन हमें उनकी सीमाओं को भी समझना चाहिए। यात्रियों के अपने पूर्वाग्रह, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और उद्देश्य उनके लेखन को प्रभावित करते थे। फिर भी, वे हमें उन पहलुओं को समझने में मदद करते हैं जो स्थानीय स्रोतों में अक्सर अनुपस्थित होते हैं।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs) - 10 प्रश्न
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'किताब-उल-हिंद' नामक पुस्तक किस भाषा में लिखी गई थी?
a) फ़ारसी
b) संस्कृत
c) अरबी
d) तुर्की -
अल-बिरूनी का जन्म किस स्थान पर हुआ था?
a) तांजेर, मोरक्को
b) ख़्वारिज़्म, उज़्बेकिस्तान
c) पेरिस, फ्रांस
d) दिल्ली, भारत -
इब्न बतूता किस देश का यात्री था?
a) फ्रांस
b) उज़्बेकिस्तान
c) मोरक्को
d) पुर्तगाल -
'रिहला' नामक यात्रा वृत्तांत किसने लिखा था?
a) अल-बिरूनी
b) फ्रांस्वा बर्नियर
c) इब्न बतूता
d) अब्दुल रज्जाक -
मुहम्मद बिन तुगलक ने इब्न बतूता को किस पद पर नियुक्त किया था?
a) सेनापति
b) वज़ीर
c) क़ाज़ी (न्यायाधीश)
d) राजदूत -
इब्न बतूता ने किस फल का वर्णन मनुष्य के सिर जैसा किया है?
a) आम
b) केला
c) नारियल
d) खजूर -
फ्रांस्वा बर्नियर किस मुगल शासक के दरबार से संबंधित था?
a) अकबर
b) जहाँगीर
c) शाहजहाँ और औरंगज़ेब
d) हुमायूँ -
"प्राच्य निरंकुशता" (Oriental Despotism) का सिद्धांत किस यात्री के विचारों से जुड़ा है?
a) अल-बिरूनी
b) इब्न बतूता
c) फ्रांस्वा बर्नियर
d) मार्को पोलो -
बर्नियर के अनुसार, मुगल साम्राज्य में भू-स्वामित्व के संबंध में कौन सा कथन सही है?
a) निजी भू-स्वामित्व व्यापक था।
b) राज्य ही भूमि का एकमात्र मालिक था।
c) किसानों के पास भूमि का स्थायी स्वामित्व था।
d) भूमि का स्वामित्व केवल ब्राह्मणों के पास था। -
इब्न बतूता ने भारत की किस डाक व्यवस्था का विस्तृत वर्णन किया है?
a) केवल अश्व डाक (उलुक)
b) केवल पैदल डाक (दावा)
c) अश्व डाक (उलुक) और पैदल डाक (दावा) दोनों
d) कोई डाक व्यवस्था नहीं थी
उत्तरमाला:
- c) अरबी
- b) ख़्वारिज़्म, उज़्बेकिस्तान
- c) मोरक्को
- c) इब्न बतूता
- c) क़ाज़ी (न्यायाधीश)
- c) नारियल
- c) शाहजहाँ और औरंगज़ेब (दारा शिकोह और दानिशमंद खान के साथ जुड़े)
- c) फ्रांस्वा बर्नियर
- b) राज्य ही भूमि का एकमात्र मालिक था।
- c) अश्व डाक (उलुक) और पैदल डाक (दावा) दोनों
मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपकी सरकारी परीक्षा की तैयारी में सहायक सिद्ध होंगे। अपनी पढ़ाई जारी रखें और किसी भी संदेह के लिए पूछने में संकोच न करें।