Class 12 History Notes Chapter 1 (Chapter 1) – Bharatiya Itihas ke Kuch Vishay-III Book

प्रिय विद्यार्थियों,
कक्षा 12 इतिहास की पुस्तक 'भारतीय इतिहास के कुछ विषय-III' के अध्याय 1 "विद्रोही और राज - 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान" के विस्तृत नोट्स यहाँ प्रस्तुत हैं। यह अध्याय सरकारी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। ध्यानपूर्वक अध्ययन करें।
अध्याय 1: विद्रोही और राज - 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान
1857 का विद्रोह भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी, जिसने ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी। इसे भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में भी जाना जाता है।
I. विद्रोह का खाका और संरचना (Pattern of the Revolt)
- मेरठ से शुरुआत: 10 मई 1857 को मेरठ छावनी में सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया। उन्होंने अपने अधिकारियों पर हमला किया, जेल तोड़कर बंद सिपाहियों को रिहा किया, और अंग्रेजों के बंगलों व दफ्तरों को जला दिया।
- दिल्ली की ओर प्रस्थान: 11 मई की सुबह, मेरठ के विद्रोही सिपाही दिल्ली पहुँचे। उन्होंने लाल किले में प्रवेश किया और अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर को अपना नेता घोषित किया।
- विद्रोह का फैलाव: दिल्ली के बाद, विद्रोह तेजी से उत्तर भारत के अन्य हिस्सों में फैल गया, जिसमें कानपुर, लखनऊ, झांसी, अवध, बरेली, ग्वालियर, इलाहाबाद और बिहार के कुछ हिस्से शामिल थे।
- संचार के साधन: विद्रोहियों ने गुप्त रूप से संदेशों का आदान-प्रदान किया। कमल के फूल और चपातियाँ (रोटियाँ) विद्रोह के प्रतीक बन गए, जिन्हें एक गाँव से दूसरे गाँव तक पहुँचाया जाता था। यह अफवाहें भी फैलीं कि ब्रिटिश राज 100 साल बाद (प्लासी के युद्ध 1757 के बाद) समाप्त हो जाएगा।
II. विद्रोह के कारण (Causes of the Revolt)
- आर्थिक कारण:
- भू-राजस्व नीतियाँ: अंग्रेजों की भू-राजस्व व्यवस्थाओं (स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी, महालवाड़ी) ने किसानों पर भारी कर बोझ डाला, जिससे वे गरीब और कर्जदार हो गए। उनकी ज़मीनें छीन ली गईं।
- दस्तकारों और शिल्पकारों का पतन: ब्रिटिश औद्योगिक नीतियों ने भारतीय दस्तकारी और हस्तशिल्प उद्योगों को नष्ट कर दिया, जिससे लाखों लोग बेरोजगार हो गए।
- धन का निष्कासन: भारत का धन ब्रिटेन भेजा जा रहा था, जिससे देश की अर्थव्यवस्था कमजोर हो रही थी।
- सामाजिक-धार्मिक कारण:
- ईसाई मिशनरियों की गतिविधियाँ: मिशनरियों द्वारा धर्म परिवर्तन के प्रयासों को भारतीयों ने अपनी संस्कृति और धर्म पर हमला माना।
- सामाजिक सुधार: सती प्रथा का उन्मूलन (1829), विधवा पुनर्विवाह अधिनियम (1856) जैसे सुधारों को रूढ़िवादी भारतीयों ने अपने धर्म में हस्तक्षेप समझा।
- रेलवे और टेलीग्राफ: इन नई तकनीकों को कुछ लोग अपनी धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध मानते थे।
- जातिगत भेदभाव: अंग्रेजों द्वारा भारतीयों के साथ किया जाने वाला जातिगत और नस्लीय भेदभाव भी असंतोष का कारण था।
- राजनीतिक कारण:
- डलहौजी की हड़प नीति (Doctrine of Lapse): लॉर्ड डलहौजी की इस नीति के तहत, जिन शासकों के कोई प्राकृतिक पुरुष उत्तराधिकारी नहीं होते थे, उनके राज्यों को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया जाता था। इस नीति के तहत सतारा (1848), संभलपुर (1850), उदयपुर (1852), नागपुर (1853) और झांसी (1854) जैसे राज्यों को हड़प लिया गया।
- अवध का विलय (1856): अवध को कुशासन का आरोप लगाकर ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया। अवध के विलय ने सिपाहियों (जो ज्यादातर अवध से आते थे) और स्थानीय लोगों में गहरा असंतोष पैदा किया।
- मुगल सम्राट का अपमान: अंग्रेजों ने मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर को लाल किले से हटाने और उनकी शाही उपाधि छीनने की योजना बनाई, जिससे मुस्लिम समुदाय में नाराजगी थी।
- पेशवा की पेंशन बंद: पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहब की पेंशन बंद कर दी गई।
- सैन्य कारण:
- भेदभाव: भारतीय सिपाहियों को यूरोपीय सिपाहियों की तुलना में कम वेतन, खराब सेवा शर्तें और पदोन्नति के कम अवसर मिलते थे।
- समुद्र पार सेवा: 1856 के 'सामान्य सेवा भर्ती अधिनियम' (General Service Enlistment Act) के तहत भारतीय सिपाहियों को समुद्र पार भी सेवा करने के लिए बाध्य किया गया, जिसे वे अपनी धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध मानते थे।
- तत्काल कारण: चर्बी वाले कारतूस: नई एनफील्ड राइफल में इस्तेमाल होने वाले कारतूसों पर गाय और सूअर की चर्बी लगी होने की अफवाह फैल गई। इन कारतूसों को राइफल में डालने से पहले दाँतों से काटना पड़ता था। यह अफवाह हिंदू और मुस्लिम दोनों सिपाहियों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाली थी, जिससे विद्रोह भड़क उठा। 29 मार्च 1857 को मंगल पांडे ने बैरकपुर में इस मुद्दे पर विद्रोह किया और उन्हें फाँसी दे दी गई।
III. विद्रोह का फैलाव और नेतृत्व (Spread and Leadership)
विद्रोह विभिन्न केंद्रों पर फैला और उसका नेतृत्व स्थानीय नेताओं ने किया:
- दिल्ली: बहादुर शाह ज़फर (नाममात्र के नेता), बख्त खान (वास्तविक सैन्य नेतृत्व)।
- कानपुर: नाना साहब (पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र), तात्या टोपे (उनके सेनापति)।
- लखनऊ: बेगम हज़रत महल (अवध की बेगम), बिरजिस कादर (उनके अल्पवयस्क पुत्र)।
- झांसी: रानी लक्ष्मीबाई।
- बिहार (जगदीशपुर): कुंवर सिंह।
- बरेली: खान बहादुर खान।
- फैजाबाद: मौलवी अहमदुल्ला शाह।
- मेरठ: कदम सिंह।
- ग्वालियर: तात्या टोपे (बाद में)।
IV. विद्रोही क्या चाहते थे? (What the Rebels Wanted?)
विद्रोहियों के इश्तहारों और घोषणाओं से पता चलता है कि वे एक ऐसे शासन की स्थापना चाहते थे जहाँ अंग्रेजों का कोई हस्तक्षेप न हो। वे मुगल साम्राज्य की पुनर्स्थापना और पुराने भारतीय शासकों के अधिकारों की बहाली चाहते थे। उन्होंने जाति, धर्म और क्षेत्र के भेदभाव के बिना सभी को एकजुट होने का आह्वान किया। वे अंग्रेजों द्वारा लाई गई सभी नई व्यवस्थाओं (जैसे भू-राजस्व, न्याय प्रणाली) को समाप्त करना चाहते थे और पूर्व-औपनिवेशिक व्यवस्था को बहाल करना चाहते थे।
V. अंग्रेजों द्वारा विद्रोह का दमन (Suppression of the Revolt by the British)
- पुनर्गठन और सुदृढ़ीकरण: अंग्रेजों ने अपनी सैन्य शक्ति को पुनर्गठित किया और ब्रिटेन से अतिरिक्त सेना बुलाई।
- दिल्ली पर पुनः कब्ज़ा: सितंबर 1857 में जॉन निकोलसन और हडसन के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना ने दिल्ली पर पुनः कब्ज़ा कर लिया। बहादुर शाह ज़फर को गिरफ्तार कर रंगून (बर्मा) निर्वासित कर दिया गया, जहाँ 1862 में उनकी मृत्यु हो गई।
- कानपुर और लखनऊ पर पुनः कब्ज़ा: सर कॉलिन कैंपबेल के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना ने कानपुर और लखनऊ पर पुनः कब्ज़ा किया।
- झांसी का पतन: जनरल ह्यू रोज़ ने झांसी पर हमला किया। रानी लक्ष्मीबाई ने बहादुरी से लड़ाई लड़ी और जून 1858 में ग्वालियर के पास युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुईं।
- तात्या टोपे की गिरफ्तारी: तात्या टोपे गुरिल्ला युद्ध जारी रखे हुए थे, लेकिन 1859 में उन्हें गिरफ्तार कर फाँसी दे दी गई।
- क्रूर दमन: अंग्रेजों ने विद्रोह को दबाने के लिए अत्यधिक क्रूरता का सहारा लिया। विद्रोहियों और आम नागरिकों को सार्वजनिक रूप से फाँसी दी गई, गाँवों को जला दिया गया और संपत्ति लूटी गई।
VI. विद्रोह की प्रकृति और परिणाम (Nature and Consequences of the Revolt)
- विद्रोह की प्रकृति:
- सिपाही विद्रोह: कुछ ब्रिटिश इतिहासकारों ने इसे केवल सिपाही विद्रोह माना।
- प्रथम स्वतंत्रता संग्राम: वी.डी. सावरकर जैसे राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने इसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा।
- सामंती विद्रोह: कुछ मार्क्सवादी इतिहासकारों ने इसे सामंती शक्तियों द्वारा अपने खोए हुए विशेषाधिकारों को पुनः प्राप्त करने का प्रयास बताया।
- राष्ट्रीय विद्रोह: बेंजामिन डिज़रायली जैसे ब्रिटिश राजनेताओं ने इसे राष्ट्रीय विद्रोह कहा।
- यह विद्रोह विभिन्न वर्गों के लोगों की भागीदारी के साथ एक व्यापक जन-विद्रोह था, जिसमें धार्मिक और राष्ट्रीय भावनाएँ भी शामिल थीं।
- परिणाम:
- कंपनी शासन का अंत: 1858 के भारत सरकार अधिनियम (Government of India Act, 1858) द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त कर दिया गया। भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन (ताज) के अधीन आ गया।
- वायसराय का पद: गवर्नर-जनरल का पद बदलकर वायसराय कर दिया गया। लॉर्ड कैनिंग भारत के पहले वायसराय बने।
- सेना का पुनर्गठन: पील कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर सेना का पुनर्गठन किया गया। यूरोपीय सैनिकों की संख्या बढ़ाई गई और भारतीय सैनिकों की संख्या घटाई गई। 'फूट डालो और राज करो' की नीति के तहत सेना में जाति, धर्म और क्षेत्र के आधार पर नई रेजीमेंट बनाई गईं।
- राज्यों के प्रति नीति में बदलाव: विलय की नीति का परित्याग किया गया और भारतीय शासकों को गोद लेने के अधिकार को मान्यता दी गई, बशर्ते वे ब्रिटिश सर्वोच्चता स्वीकार करें।
- सामाजिक-धार्मिक हस्तक्षेप में कमी: अंग्रेजों ने भारतीयों के सामाजिक और धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप न करने की नीति अपनाई।
- भारत सचिव का पद: ब्रिटेन में 'भारत सचिव' (Secretary of State for India) का पद सृजित किया गया, जो ब्रिटिश कैबिनेट का सदस्य होता था।
- राष्ट्रवाद का उदय: इस विद्रोह ने भारतीयों में एकता और राष्ट्रवाद की भावना को जन्म दिया, जिसने भविष्य के स्वतंत्रता आंदोलनों की नींव रखी।
VII. विद्रोह के व्याख्यान (Representations of the Revolt)
- ब्रिटिश चित्रण: ब्रिटिश अधिकारियों और इतिहासकारों ने विद्रोहियों को बर्बर, क्रूर और विश्वासघाती के रूप में चित्रित किया, जबकि अंग्रेजों को वीर और सभ्यता के रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया।
- भारतीय राष्ट्रवादी चित्रण: भारतीय राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने 1857 के विद्रोह को विदेशी शासन के खिलाफ एक महान संघर्ष और प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में महिमामंडित किया।
- कला और साहित्य: चित्रकला, साहित्य (उपन्यास, कविताएँ) और पत्रकारिता में विद्रोह को विभिन्न दृष्टिकोणों से दर्शाया गया। रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहब और तात्या टोपे जैसे नेताओं को राष्ट्रीय नायकों के रूप में चित्रित किया गया।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
-
1857 का विद्रोह किस तिथि को मेरठ से शुरू हुआ था?
a) 29 मार्च 1857
b) 10 मई 1857
c) 11 मई 1857
d) 4 जून 1857
उत्तर: b) 10 मई 1857 -
1857 के विद्रोह के समय भारत का गवर्नर-जनरल कौन था?
a) लॉर्ड डलहौजी
b) लॉर्ड कैनिंग
c) लॉर्ड विलियम बेंटिंक
d) लॉर्ड हेस्टिंग्स
उत्तर: b) लॉर्ड कैनिंग -
1857 के विद्रोह में कानपुर का नेतृत्व किसने किया था?
a) रानी लक्ष्मीबाई
b) बेगम हज़रत महल
c) नाना साहब
d) कुंवर सिंह
उत्तर: c) नाना साहब -
'हड़प नीति' (Doctrine of Lapse) का सिद्धांत किस गवर्नर-जनरल से संबंधित था?
a) लॉर्ड वेलेज़ली
b) लॉर्ड डलहौजी
c) लॉर्ड लिटन
d) लॉर्ड रिपन
उत्तर: b) लॉर्ड डलहौजी -
1857 के विद्रोह के बाद भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन किस अधिनियम द्वारा आया?
a) पिट्स इंडिया एक्ट 1784
b) चार्टर एक्ट 1833
c) भारत सरकार अधिनियम 1858
d) भारतीय परिषद अधिनियम 1861
उत्तर: c) भारत सरकार अधिनियम 1858 -
बहादुर शाह ज़फर को गिरफ्तार करके कहाँ निर्वासित किया गया था?
a) अंडमान निकोबार
b) रंगून
c) मॉरीशस
d) सिंगापुर
उत्तर: b) रंगून -
अवध को किस आधार पर ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाया गया था?
a) हड़प नीति
b) कुशासन का आरोप
c) युद्ध
d) सहायक संधि
उत्तर: b) कुशासन का आरोप -
1857 के विद्रोह के समय दिल्ली में वास्तविक सैन्य नेतृत्व किसने किया था?
a) बहादुर शाह ज़फर
b) बख्त खान
c) मौलवी अहमदुल्ला शाह
d) तात्या टोपे
उत्तर: b) बख्त खान -
किस ब्रिटिश जनरल ने झांसी पर हमला किया और रानी लक्ष्मीबाई से युद्ध किया?
a) जॉन निकोलसन
b) हेनरी लॉरेंस
c) ह्यू रोज़
d) कॉलिन कैंपबेल
उत्तर: c) ह्यू रोज़ -
1857 के विद्रोह को "भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम" किसने कहा था?
a) आर.सी. मजूमदार
b) एस.एन. सेन
c) वी.डी. सावरकर
d) जवाहरलाल नेहरू
उत्तर: c) वी.डी. सावरकर
मुझे आशा है कि ये विस्तृत नोट्स और बहुविकल्पीय प्रश्न आपकी परीक्षा की तैयारी में सहायक सिद्ध होंगे। अपनी पढ़ाई जारी रखें और सफलता प्राप्त करें!